By पं. सुव्रत शर्मा
मेष संक्रांति के साथ विवाह, गृह प्रवेश और समस्त 16 संस्कारों का पुनः शुभारंभ

सनातन वैदिक कालगणना, मुहूर्त चिंतामणि, धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु में 'खरमास' (मलमास) की समाप्ति का क्षण संपूर्ण समाज, गृहस्थ जीवन और संस्कृति के लिए एक महान आध्यात्मिक मुक्ति और उल्लास का पर्व माना गया है। वैदिक ज्योतिष के गणितीय सिद्धांतों के अनुसार जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव देवगुरु बृहस्पति की दो राशियों-धनु (Dhanu) अथवा मीन (Meena)-में संचरण करते हैं तब उस एक मास की विशिष्ट अवधि को 'खरमास' अथवा 'धनुर्मास/मीनमलमास' कहा जाता है।
फाल्गुन मास के उत्तरार्ध में जब सूर्य देव कुंभ राशि से निकलकर मीन राशि में प्रविष्ट हुए थे तब से समस्त मांगलिक और शुभ संस्कारों पर एक मास का पूर्ण विराम लग गया था। चैत्र मास के उत्तरार्ध में, ठीक मेष संक्रांति के क्षण, जैसे ही सूर्य देव मीन राशि के जल-तत्त्वीय बंधनों को समाप्त कर मंगल की अग्नि-तत्त्वीय राशि मेष में 0° पर प्रवेश करते हैं, उसी क्षण खरमास का यह संकोच और गतिहीनता पूरी तरह समाप्त हो जाती है। सूर्य के अपनी उच्च राशि मेष में स्थापित होते ही संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड में सात्विक, तेजस्वी, रचनात्मक और सृजनात्मक ऊर्जा का महा-संचार होता है, जिसके साथ ही विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, कर्णवेध, यज्ञोपवीत और नए व्यापारिक प्रतिष्ठानों की नींव रखने के शुभ मुहूर्त पुनः उन्मुक्त हो जाते हैं।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व मुहूर्तिक विवरण |
|---|---|
| खरमास की अवधि | सूर्य का मीन राशि में गोचर काल (लगभग 14/15 मार्च से 13/14 अप्रैल) |
| समाप्ति का निश्चित क्षण | मेष संक्रांति का प्रवेश काल (सूर्य का 0° मेष में प्रवेश) |
| सौर मास का शुभारंभ | सौर वैशाख मास (अग्नि-तत्त्वीय सौर नववर्ष का प्रथम मास) |
| सूर्य का ज्योतिषीय पद | मीन की गुरु-दास्यता से मुक्त होकर मेष में स्व-पराक्रमी व उच्च पद |
| पुनरारंभ होने वाले संस्कार | विवाह, उपनयन (जनेऊ), मुंडन, गृहप्रवेश, नामकरण, व्यापार आरंभ |
| प्रमुख अधिष्ठाता सत्ता | भुवन भास्कर सूर्य नारायण, देवगुरु बृहस्पति, मंगल देव |
| मुख्य तात्विक स्वरूप | गुरु के ज्ञान और सूर्य के तेज का समन्वय, मांगलिक शक्ति का प्राकट्य |
| आगामी प्रमुख मांगलिक मास | वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ (देवशयनी एकादशी तक के शुभ मुहूर्त) |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | गृहस्थ सुख, दांपत्य स्थिरता, कुल-वृद्धि, संस्कारों की सिद्धि |
खरमास की समाप्ति के इस पावन संधिकाल पर अपने गृह में नवीन मांगलिक कार्यों के संकल्प, शुभ मुहूर्तों के वरण और देव-आशीर्वाद की प्राप्ति हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय आचार नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
भविष्य पुराण, पद्म पुराण और सौर संहिताओं में खरमास के नामकरण और इसके आध्यात्मिक औचित्य से संबंधित एक अत्यंत रोचक, रूपक-युक्त और सांकेतिक कथा प्राप्त होती है।
सृष्टि के आरंभ में भगवान सूर्य नारायण सात दिव्य घोड़ों (सप्त-अश्व) से जुते हुए अपने स्वर्ण रथ पर निरंतर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते थे। उनके रथ के घोड़े भगवान के असीम तेज और ब्रह्मांडीय गुरुत्वाकर्षण का वहन करते हुए बिना एक क्षण विश्राम किए निरंतर दौड़ते रहते थे।
एक बार निरंतर दौड़ते रहने के कारण सूर्य देव के वे सातों घोड़े अत्यंत थक गए। उनकी जिह्वा से फेन निकलने लगा और वे प्यास से व्याकुल होकर लड़खड़ाने लगे। भगवान सूर्य अत्यंत दयालु हैं; वे अपने घोड़ों की यह दारुण अवस्था देखकर द्रवित हो उठे। उन्होंने सोचा कि यदि वे रथ को रोकते हैं, तो संपूर्ण सृष्टि की कालगणना, ऋतु-चक्र और जीवों का जीवन रुक जाएगा और यदि नहीं रोकते हैं, तो ये अश्व प्राण त्याग देंगे।
उसी समय सूर्य देव का रथ एक पावन सरोवर के निकट से गुजर रहा था। उस सरोवर के तट पर दो 'खर' (गधे) विचरण कर रहे थे। सूर्य देव ने अपने थके हुए घोड़ों को विश्राम देने और जल पीने हेतु उस सरोवर पर रथ से खोल दिया और रथ में उन दोनों 'खरों' को जोत दिया।
| कथा का सोपान | रूपकात्मक व पौराणिक विवरण | अंतर्निहित खगोलीय व दार्शनिक रहस्य |
|---|---|---|
| घोड़ों की थकान | सात घोड़ों (सात रंगों/रश्मियों) का थकना | शीतकाल के अंत में सौर ऊर्जा का क्षीण होना |
| रथ में खरों (गधों) का जुतना | गधों द्वारा रथ को खींचना | सूर्य की गति का धीमा, मंद और निस्तेज हो जाना |
| 'खरमास' नामकरण | गधों के जुतने के कारण उस मास का नाम | ऊर्जा की दुर्बलता, मांगलिक कार्यों में उत्साह का अभाव |
| देवगुरु की राशियों में वास | धनु और मीन में सूर्य का प्रवेश | शिष्य (सूर्य) का गुरु (बृहस्पति) के घर में विनयपूर्वक विश्राम |
| मेष में पुनः घोड़ों का जुतना | मेष संक्रांति पर पुनः तेजस्वी अश्वों का आगमन | सूर्य का पुनः उच्च, प्रचंड और पराक्रमी ऊर्जा में लौटना |
गधे स्वभाव से मंद, हठी और धीमी गति से चलने वाले होते हैं। अतः उनके जुतते ही सूर्य के रथ की गति अत्यंत धीमी हो गई और सूर्य का तेज मद्धिम पड़ गया। सूर्य देव ने उन खरों के सहारे एक मास तक यात्रा की, जिसके कारण इस कालखंड को लोक और शास्त्र में 'खरमास' कहा गया। एक मास पूर्ण होने के पश्चात, जब उनके सातों अश्व पुनः स्वस्थ, तृप्त और ऊर्जावान हो गए, तो मेष संक्रांति के पावन क्षण सूर्य देव ने पुनः उन दिव्य घोड़ों को रथ में जोत लिया। रथ में घोड़ों के लौटते ही सूर्य अपनी परम उच्च गति और प्रखर तेज के साथ मेष राशि में दहाड़ने लगे और संपूर्ण जगत में मांगलिक चेतना का पुनः सूर्योदय हो गया।
खरमास में शुभ कार्य क्यों वर्जित रहते हैं? इसका उत्तर वैदिक ज्योतिष के 'आधिपत्य और संबंध' (Planetary Relationship) के सूक्ष्म विज्ञान में निहित है।
वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को संपूर्ण ब्रह्मांड के आध्यात्मिक गुरु, ज्ञान, धर्म, विवेक, संस्कार और वैवाहिक सुख के कारक माना गया है। दूसरी ओर, भगवान सूर्य राजा, आत्मा, अहंकार और भौतिक तेज के अधिष्ठाता हैं।
जब सूर्य गुरु की राशि में होता है, तो गुरु का अपना स्वतंत्र प्रभाव भी दब जाता है। गुरु ज्ञान और चिंतन में लीन हो जाते हैं। सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य-विशेष रूप से विवाह, जनेऊ और गृह प्रवेश-के लिए दो ग्रहों का पूर्ण बलवान होना अनिवार्य है:
खरमास के दौरान सूर्य गुरु के प्रभाव में संकुचित रहता है और गुरु सूर्य के आग्नेय ताप से संत्रस्त रहते हैं। इस स्थिति को ज्योतिष में 'गुरु का मलिन होना' या 'मलमास' कहा जाता है। अतः इस संधिकाल में किया गया विवाह दांपत्य कलह, संतान बाधा अथवा सुख की कमी उत्पन्न कर सकता है।
परंतु जैसे ही सूर्य मेष राशि में आते हैं, वे अपने मित्र मंगल के घर में आकर 'उच्च' हो जाते हैं। यहाँ सूर्य का अपना संपूर्ण तेज जाग्रत हो जाता है और गुरु भी सूर्य के संकोच से मुक्त होकर अपने पूर्ण शुभ प्रभाव से संसार को अनुग्रहीत करने लगते हैं।
सनातन धर्म में मानव जीवन को जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत पवित्र, अनुशासित और देव-तुल्य बनाने हेतु 'षोडश संस्कारों' (16 संस्कारों) की वैज्ञानिक व्यवस्था की गई है। गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक प्रत्येक संस्कार मानव चेतना के रूपांतरण का एक दिव्य सोपान है।
खरमास के समाप्त होते ही जिन प्रमुख संस्कारों के द्वार पुनः खुलते हैं, उनका विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
| संस्कार का नाम | संस्कार का क्रम | शास्त्रीय उद्देश्य एवं विधि | खरमास बाद पुनरारंभ का महत्व |
|---|---|---|---|
| गर्भाधान संस्कार | प्रथम संस्कार | श्रेष्ठ, सात्विक व धर्मात्मा संतान की उत्पत्ति | उच्च सूर्य के तेज से तेजस्वी आत्मा का गर्भ में प्रवेश |
| पुंसवन संस्कार | द्वितीय संस्कार | गर्भस्थ शिशु के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य रक्षा | तीसरे माह में भ्रूण की रक्षा व बल संवर्धन |
| सीमंतोन्नयन संस्कार | तृतीय संस्कार | गर्भवती स्त्री के चित्त की शुद्धि व प्रसन्नता | छठे/आठवें माह में आसुरी शक्तियों से गर्भ की सुरक्षा |
| जातकर्म संस्कार | चतुर्थ संस्कार | शिशु जन्म के उपरांत स्वर्ण शलाका से मधु-सर्पि चटाना | नवजात की मेधा बुद्धि व दीर्घायु का बीजारोपण |
| नामकरण संस्कार | पंचम संस्कार | जन्म के 11वें या 101वें दिन नक्षत्र अनुकूल नामकरण | बालक के आभामंडल व सामाजिक पहचान की प्रतिष्ठा |
| निष्क्रमण संस्कार | षष्ठ संस्कार | चौथे माह में शिशु को प्रथम बार गृह से बाहर ले जाना | सूर्य व चंद्र के प्रत्यक्ष दर्शन से प्रकृति से परिचय |
| अन्नप्राशन संस्कार | सप्तम संस्कार | छठे माह में प्रथम बार स्वर्ण/चांदी के चम्मच से खीर खिलाना | बालक की जठराग्नि व शारीरिक धातुओं का पोषण |
| चूड़ाकर्म (मुंडन) | अष्टम संस्कार | प्रथम या तृतीय वर्ष में जन्म के अपवित्र केशों का मुंडन | मस्तिष्क के क्रेनियल नर्व्स की शुद्धि, बुद्धि-विकास |
| कर्णवेध संस्कार | नवम संस्कार | बालक/बालिका के कानों का शास्त्रीय वेधन | स्नायु तंत्र संतुलन, हर्निया व अंधापन से रक्षा |
| उपनयन (यज्ञोपवीत) | दशम संस्कार | गायत्री मंत्र की दीक्षा, जनेऊ धारण व ब्रह्मचर्य आरंभ | द्विजत्व की प्राप्ति, वेदों के स्वाध्याय का अधिकार |
| वेदारंभ संस्कार | एकादश संस्कार | गुरु के आश्रम में जाकर वेदों का अध्ययन प्रारंभ करना | ज्ञान, विद्या, तर्क व आचार-संहिता का परिष्कार |
| केशांत (गोदान) | द्वादश संस्कार | 16 वर्ष की आयु में प्रथम बार दाढ़ी-मूंछ का मुंडन | किशोरावस्था से युवावस्था में मर्यादित प्रवेश |
| समावर्तन संस्कार | त्रयोदश संस्कार | शिक्षा पूर्ण कर ब्रह्मचर्य से गृहस्थ की ओर प्रस्थान | स्नातक दीक्षांत समारोह, समाज सेवा का संकल्प |
| विवाह संस्कार | चतुर्दश संस्कार | अग्नि की साक्षी में वर-वधू का सात फेरों से एकात्म होना | धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का आधार, वंश रक्षा |
| आवसथाधान | पंचदश संस्कार | गृहस्थ आश्रम में प्रतिदिन पंच महायज्ञों की अग्नि स्थापना | गृहस्थ जीवन में धर्म, दान और अतिथियों की सेवा |
| अंत्येष्टि संस्कार | षोडश संस्कार | मृत्यु के उपरांत देह का पंचमहाभूतों में विसर्जन | जीवात्मा की सद्गति व पितृलोक की यात्रा |
16 संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण संस्कार 'विवाह संस्कार' (Vivaha Samskara) है, क्योंकि विवाह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, अपितु दो कुलों, दो आत्माओं और आगामी पीढ़ियों के धर्म का संयुक्त अनुष्ठान है।
खरमास समाप्त होते ही वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास में विवाह के शुभ मुहूर्त प्रारंभ हो जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक आदर्श विवाह मुहूर्त के चयन हेतु 'त्रिबल शुद्धि' (Tribala Shuddhi) का परीक्षण अनिवार्य माना गया है:
| मुहूर्त घटक | शास्त्रीय नियम | त्याज्य स्थितियां (वर्जित दोष) |
|---|---|---|
| विहित तिथियां | द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, एकादशी, त्रयोदशी | रिक्ता तिथियां (४, ९, १४), अमावस्या व पूर्णिमा |
| विहित नक्षत्र | रोहिणी, मृगशिरा, मघा, तीनों उत्तरा (फाल्गुनी, आषाढ़ा, भाद्रपदा), हस्त, अनुराधा, स्वाति, मूल, रेवती | आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, भरणी, कृत्तिका |
| त्याज्य महादोष | लता, पात, युति, वेध, जामित्र, बाण, विष्टि (भद्रा) | 10 प्रमुख विवाह दोषों से रहित लग्न का वरण |
| लग्न की शुद्धि | विवाह लग्न के अष्टम भाव में कोई ग्रह न हो, सप्तम भाव में क्रूर ग्रह न हों | लग्न भंग, अष्टमस्थ मंगल अथवा राहु |
मेष संक्रांति के साथ खरमास के समाप्त होते ही नए घर में प्रवेश (गृह प्रवेश) और नए व्यापारिक प्रतिष्ठानों, उद्योगों और दुकानों के शुभारंभ के मुहूर्त खुल जाते हैं।
वैशाख मास को शास्त्रों में 'माधव मास' कहा गया है। यह भगवान विष्णु का साक्षात प्रिय मास है।
मेष संक्रांति से लेकर आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी-जब भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं) तक की अवधि मांगलिक कार्यों का स्वर्णिम कालखंड होती है।
खरमास की समाप्ति और मेष संक्रांति का यह संक्रमण मानव जीवन को प्रकृति का सबसे गहरा दार्शनिक पाठ पढ़ाता है: जीवन में निरंतर दौड़ते रहना ही प्रगति नहीं है; समय पर रुकना, ऊर्जा का संचय करना और सही समय आने पर पुनः प्रहार करना ही वास्तविक प्रज्ञा है।
सूर्य के रथ के घोड़ों का विश्राम करना यह सिखाता है कि जिस प्रकार एक धनुर्धर बाण को आगे छोड़ने से पूर्व डोरी को पीछे खींचता है, उसी प्रकार खरमास का एक महीना समाज को बाह्य उत्सवों और प्रदर्शन से रोककर अंतर्मुखी होने, धर्म-चिंतन करने और अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को संचित करने का अवसर देता है।
जब मनुष्य संयम और साधना के उस एक महीने को पूरा कर लेता है तब उसके जीवन में संस्कारों का जो नया सवेरा होता है, वह अधिक परिपक्व, तेजस्वी और शाश्वत होता है। विवाह और 16 संस्कार केवल सांसारिक उत्सव नहीं हैं, वे मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाने वाले पवित्र सेतु हैं।
आइए इस पावन संधिकाल पर हम सूर्य नारायण के उच्च तेज को अपने अंतःकरण में धारण करें, अपने जीवन को संस्कारों की पावन मर्यादा से सुशोभित करें और अपने गृहस्थ जीवन को धर्म, प्रेम और सत्य के प्रकाश से आलोकित करें।
खरमास कब समाप्त होता है?
खरमास प्रतिवर्ष अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 13 अथवा 14 अप्रैल को मेष संक्रांति के दिन, ठीक उस क्षण समाप्त होता है जब सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं।
सूर्य के किस राशि में रहने पर खरमास लगता है?
जब सूर्य देव देवगुरु बृहस्पति की दो राशियों-धनु (Dhanu) अथवा मीन (Meena)-में गोचर करते हैं तब उस एक मास की अवधि को खरमास कहा जाता है।
खरमास के दौरान विवाह और शुभ कार्य क्यों वर्जित रहते हैं?
गुरु की राशि में होने के कारण सूर्य अपना भौतिक तेज खोकर विनीत हो जाता है और गुरु भी सूर्य के प्रभाव से मलिन हो जाते हैं; सूर्य और गुरु के कमजोर होने से मांगलिक कार्य फलित नहीं होते।
खरमास समाप्त होने के बाद विवाह के लिए सबसे बड़ा अबूझ मुहूर्त कौन सा है?
खरमास समाप्ति के उपरांत वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आने वाली 'अक्षय तृतीया' विवाह का सबसे बड़ा अबूझ (स्वयंसिद्ध) मुहूर्त मानी जाती है।
सनातन धर्म में कुल कितने संस्कार होते हैं और इनका क्या उद्देश्य है?
सनातन धर्म में कुल 16 संस्कार (गर्भाधान से अंत्येष्टि तक) होते हैं, जिनका उद्देश्य मानव देह और चित्त को शुद्ध कर उसे धर्म, नीति और मोक्ष के योग्य बनाना है।
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