गणगौर पर्व (चैत्र शुक्ल तृतीया): शिव-पार्वती का मिलन, अखंड सौभाग्य और राजस्थान का लोक उत्सव

By पं. सुव्रत शर्मा

शिव-पार्वती का मिलन, 16 दिवसीय अनुष्ठान, ईसर-गवर पूजन और लोक संस्कृति

गणगौर पर्व: पूजा विधि, 16 दिवसीय नियम, ईसर-गवर और कथा

सामग्री तालिका

पंचांग विवरण एवं गणगौर की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को 'गणगौर' (Gangaur) अथवा 'गौरी तृतीया' के पावन महापर्व के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश के मालवा व निमाड़, गुजरात तथा ब्रज मंडल में अखंड सुहाग, दांपत्य प्रेम और पारिवारिक समृद्धि के प्रतीक के रूप में अत्यंत भव्यता से संपन्न होता है। संस्कृत वांग्मय के अनुसार 'गणगौर' शब्द दो आधारभूत आध्यात्मिक शब्दों के संयोग से बना है: 'गण' (भगवान देवाधिदेव महादेव शिव) + 'गौर' (माता भगवती पार्वती अथवा गौरी)। इस प्रकार गणगौर का साक्षात अर्थ है-शिव और शक्ति का एकात्म स्वरूप।

खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह तिथि ऋतुराज वसंत के यौवन और ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल पर घटित होती है। इस समय भुवन भास्कर सूर्य देव मीन राशि के अंतिम अंशों को पार कर अपनी उच्च राशि मेष में प्रविष्ट होने की तैयारी करते हैं, जबकि चंद्रमा भरणी अथवा कृत्तिका नक्षत्र में गोचर करते हुए स्त्री चेतना और सृजन-शक्ति को आंदोलित करता है। यह पर्व केवल एक दिवसीय अनुष्ठान नहीं है, अपितु यह चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (धुलंडी/होली के अगले दिन) से प्रारंभ होकर पूरे 16 दिनों तक चलने वाला एक दीर्घ, अनुशासित और साधना-युक्त लोक-अनुष्ठान है, जिसका चरमोत्कर्ष चैत्र शुक्ल तृतीया को होता है।

पंचांग व खगोलीय घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व सांस्कृतिक विवरण
मास एवं पक्ष चैत्र मास, शुक्ल पक्ष
तिथि तृतीया तिथि (चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन)
पर्व का शास्त्रीय नाम गणगौर, गौरी तृतीया, सौभाग्य तृतीया
अनुष्ठान की कुल अवधि 16 दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक)
मुख्य अधिष्ठाता सत्ता भगवान शिव (ईसर जी) एवं माता पार्वती (गवर / गौरी माता)
भौगोलिक मुख्य विस्तार राजस्थान (जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, बीकानेर), मालवा, निमाड़, ब्रज
मुख्य पारम्परिक प्रतीक मिट्टी के ईसर-गवर, जवारे (दूब), कुमकुम, काजल, चूड़ा, घेवर
मुख्य आध्यात्मिक फल अखंड सौभाग्य, सुयोग्य वर की प्राप्ति, दांपत्य सामंजस्य, कुल वृद्धि

गणगौर के इस पावन पर्व पर शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त करने और दांपत्य जीवन को प्रेममय बनाने हेतु साधक व व्रती महिलाओं को विशिष्ट नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • धुलंडी (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) के दिन से ही होलिका दहन की पवित्र भस्म लाकर उसमें शुद्ध मिट्टी मिलाकर 16 पिंडी (पिंडियां/गोर) बनाना।
  • प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व शीतल जल से स्नान कर स्वच्छ पारंपरिक वस्त्र धारण करना।
  • किसी स्वच्छ बगीचे अथवा जलाशय से ताजी हरी दूब (दूर्वा) और शीतल जल लेकर आना।
  • 16 दिनों तक प्रतिदिन ईसर-गौरी को दूब के माध्यम से दूध और जल के छींटे देकर 'जल पिलाने' की रस्म निभाना।
  • रोली, काजल, मेहंदी और सिंदूर की 16-16 बिंदियां लगाकर अपने सुहाग की अमरता का संकल्प लेना।
  • प्रतिदिन पारंपरिक गणगौर गीतों का गायन करना और परिवार में किसी भी प्रकार के कलह, कटु वाणी व क्रोध से बचना।
  • तृतीया तिथि के दिन शुद्ध घी में बने पारंपरिक मिष्ठान्न 'गुने' और 'घेवर' का भोग लगाना।
  • सायंकाल के समय भव्य रूप से सजी ईसर-गवर की सवारी में भाग लेना और जलाशय में आदरपूर्वक विसर्जन करना।

पौराणिक पृष्ठभूमि: शिव-पार्वती का पृथ्वी भ्रमण और सुहाग-दान

शिव पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में गणगौर से संबंधित एक अत्यंत रोचक, भावपूर्ण और अमर आख्यान प्राप्त होता है।

एक बार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में देवाधिदेव महादेव शिव, माता भगवती पार्वती और देवर्षि नारद जी के साथ मृत्युलोक (पृथ्वी) का भ्रमण करने निकले। भ्रमण करते हुए वे तीनों एक अत्यंत रमणीक वन और सरोवर के निकट पहुँचे। जब उस वन के समीप स्थित गांव के लोगों को यह ज्ञात हुआ कि साक्षात उमा-महेश्वर उनके क्षेत्र में पधारे हैं, तो संपूर्ण गांव में आनंद की लहर दौड़ गई।

गांव की निर्धन और साधारण वर्ग की स्त्रियां जो भी कंद-मूल, जंगली फूल और सादा जल उनके पास उपलब्ध था, उसे लेकर तत्काल माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करने दौड़ी चली आईं। उन स्त्रियों के मन में कोई दिखावा नहीं था; उनके हृदय में केवल विशुद्ध भक्ति, प्रेम और श्रद्धा थी। माता पार्वती उनके इस निश्छल प्रेम से इतनी द्रवित हुईं कि उन्होंने अपने हाथ में जल लेकर उन समस्त स्त्रियों पर अपने सुहाग-रस (सौभाग्य-अमृत) के छींटे मार दिए और कहा: "जाओ, तुम्हारा सुहाग अचल रहेगा और तुम्हारे घरों में सदैव शांति व संतोष का वास होगा।"

श्रेणी स्त्रियों का भाव अर्पित सामग्री माता पार्वती का वरदान
साधारण/निर्धन स्त्रियां निश्छल भक्ति, सरलता, शीघ्र आगमन वन्य पुष्प, कंद-मूल, सादा शीतल जल अक्षत सौभाग्य-अमृत रस के छींटे (अखंड सुहाग)
कुलीन/धनाढ्य स्त्रियां विलंब से आगमन, बाह्य प्रदर्शन, अहंकार छप्पन भोग, स्वर्ण थाल, रत्न, रेशमी वस्त्र अपनी उंगली चीरकर साक्षात रक्त-रूपी सिंदूर दान

थोड़ी देर बाद उस नगर की रानी, पटरानी और धनाढ्य कुलीन स्त्रियां भांति-भांति के छप्पन भोग, स्वर्ण के थाल, हीरे-मोती और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र लेकर सज-धजकर बड़े अहंकार के साथ उपस्थित हुईं।

भगवान शिव ने माता पार्वती से मुस्कुराते हुए पूछा: "हे देवी! तुमने अपने सौभाग्य का संपूर्ण रस तो पहले ही उन निर्धन स्त्रियों पर छिड़क दिया, अब इन कुलीन स्त्रियों को तुम क्या दोगी?"

तब जगदम्बा पार्वती ने कहा: "हे प्रभु! उनका सौभाग्य केवल बाह्य जल से सिंचित हुआ था, परंतु इन स्त्रियों को मैं अपने शरीर के तेज से सौभाग्य प्रदान करूंगी।" माता पार्वती ने अपनी कनिष्ठिका उंगली को थोड़ा सा चीरा और उससे निकले रक्त की बूंदों को उन कुलीन स्त्रियों पर छिड़क दिया। माता ने कहा: "जिस प्रकार मेरे रक्त का रंग लाल और अमिट है, उसी प्रकार तुम सबका सौभाग्य भी संसार में अटल और अमर रहेगा। परंतु यह तभी संभव होगा जब तुम अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर अपने पति और कुल की सेवा करोगी।"

इसके उपरांत माता पार्वती ने नदी के तट पर जाकर बालू (रेत) के शिव-पार्वती बनाकर स्वयं उनका गुप्त पूजन किया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर माता पार्वती को वरदान दिया कि जो भी कुंवारी कन्या अथवा सौभाग्यवती स्त्री चैत्र शुक्ल तृतीया को इस प्रकार पूजन करेगी, उसका पति दीर्घायु होगा और उसका दांपत्य जीवन स्वर्ग के समान सुखमय रहेगा।


16 दिवसीय अनुष्ठान: होलिका भस्म से ईसर-गवर निर्माण का विज्ञान

गणगौर का पर्व केवल अंतिम दिन का उत्सव नहीं है, अपितु यह 16 दिनों की एक मनोवैज्ञानिक और तांत्रिक साधना है। इस अनुष्ठान के प्रत्येक दिन और चरण का अपना गहरा वैज्ञानिक व सामाजिक महत्व है।

1. होलिका भस्म और पिंडियों का निर्माण (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा)

धुलंडी की सुबह महिलाएं होलिका दहन के स्थान पर जाती हैं और वहां की ठंडी भस्म (राख) को अपने अंचल में समेटकर घर लाती हैं। इस भस्म में शुद्ध कुम्हार के चाक की चिकनी मिट्टी और गंगाजल मिलाकर 16 छोटी-छोटी पिंडियां बनाई जाती हैं।

  • भस्म कामदेव के दहन और अहंकार के भस्म होने का प्रतीक है।
  • यह सिखाता है कि गृहस्थ जीवन की नींव वासना पर नहीं, अपितु वासना को भस्म करके उत्पन्न हुए पवित्र प्रेम और त्याग पर टिकी होनी चाहिए।

2. दूब और दूध से 'जल पिलाने' की रस्म

प्रतिदिन सुबह कुंवारी कन्याएं और सुहागिनें एक लोटे में ताजा जल और कच्चा दूध भरती हैं और हाथ में हरी दूब (दूर्वा) लेकर ईसर-गौरा को जल अर्पित करती हैं।

  • दूब अमृत के समान अमर रहने वाली वनस्पति है; यह कितनी भी गर्मी में सूख जाए, जल मिलते ही पुनः हरी हो जाती है।
  • दूब से जल छिड़कना यह भावना प्रकट करता है कि कुल और वंश परंपरा दूब की तरह सदैव हरी-भरी और विस्तृत बनी रहे।

3. सोलह बिंदियों का श्रृंगार विधान

पूजा के समय दीवार पर अथवा एक कागज पर रोली, काजल, मेहंदी और सिंदूर की 16-16 बिंदियां लगाई जाती हैं:

  • रोली की 16 बिंदियां: सूर्य के तेज, मान-सम्मान और स्वास्थ्य का प्रतीक।
  • काजल की 16 बिंदियां: नजर-दोष से रक्षा, नेत्र-ज्योति और मर्यादा का प्रतीक।
  • मेहंदी की 16 बिंदियां: प्रेम, शीतलता और अनुराग का प्रतीक।
  • सिंदूर की 16 बिंदियां: अखंड सौभाग्य, समर्पण और शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक।

ईसर-गवर की काष्ठ व मृत्तिका शिल्प-कला और पारंपरिक वस्त्र

राजस्थान में गणगौर के अवसर पर पूजे जाने वाले 'ईसर जी' (शिव) और 'गवर माता' (पार्वती) के विग्रह अत्यंत सुंदर, कलात्मक और स्थानीय लोक-शिल्प के उत्कृष्ट उदाहरण होते हैं।

  • काष्ठ और मिट्टी के विग्रह: प्राचीन काल में मिट्टी के विग्रह बनाए जाते थे, परंतु वर्तमान में बस्सी (चित्तौड़गढ़) और जयपुर के काष्ठ-शिल्पियों द्वारा लकड़ी के नक्काशीदार चेहरे बनाए जाते हैं, जिन्हें 'कावड़' शैली में रंगा जाता है।
  • ईसर जी का परिधान: भगवान ईसर जी को राजपूती जामा, चूड़ीदार पाजामा, कमरबंद और सिर पर पारंपरिक राजस्थानी पगड़ी (फेंटा/साफा) पहनाई जाती है। उनके हाथ में तलवार अथवा कटार और चेहरे पर राजसी मूंछें होती हैं, जो मर्यादा और रक्षक के रूप का प्रतीक हैं।
  • गवर माता का श्रृंगार: माता गवर को बारीक गोटा-पत्ती और लप्पा-किनारी से सजी लाल, पीली अथवा केसरी बंधेज और लहरिया की ओढ़नी पहनाई जाती है। उन्हें पारंपरिक राजस्थानी आभूषण-शीशफूल, बोरला, नथ, रखड़ी, बाजूबंद, हथफूल और पैरों में बिछिया-पहनाए जाते हैं।
विग्रह तात्विक रूप पहनावा व श्रृंगार दार्शनिक प्रतीक
ईसर जी साक्षात देवाधिदेव शिव राजपूती साफा, जामा, तलवार, मूंछें संप्रभुता, धैर्य, रक्षक धर्म, वैराग्य में गृहस्थ
गवर माता साक्षात भगवती पार्वती बंधेज ओढ़नी, बोरला, नथ, चूड़ा सृजन शक्ति, लज्जा, सौंदर्य, अखंड सौभाग्य
कान्हाराम (देवर) ईसर जी के छोटे भाई कुंवारे युवक का पारंपरिक वेश पारिवारिक सौहार्द, देवर-भाभी का पवित्र स्नेह
मालिन (रोवा) प्रकृति व सेवा की प्रतीक साधारण घाघरा-ओढ़नी, हाथ में टोकरी लोक-संस्कृति, श्रम का सम्मान, वनस्पति सेवा

गणगौर के पारंपरिक लोक-गीत: संस्कृति की मधुर अभिव्यक्ति

गणगौर का पर्व लोक-गीतों के बिना अधूरा है। इन गीतों में केवल संगीत नहीं है, अपितु इनमें भारतीय नारी के हृदय के कोमल भाव, दांपत्य प्रेम, मायके का लाड़-प्यार और ससुराल की मर्यादा का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है।

1. जल पिलाने का प्रमुख गीत

जब महिलाएं दूब से ईसर-गवर को जल अर्पित करती हैं तब यह प्रसिद्ध गीत गाया जाता है:

गोर ए गणगौर माता खोल ए किवाड़ी।
बाहर ऊभी थारी पूजणहारी॥
पूजो ए पूजणहारी काईं काईं मांगो?
अन्न मांगूं धन मांगूं मांगूं अमर सुहाग॥

2. बिंदियां लगाते समय का गीत

टीकी टीकी ए म्हारी रोली री टीकी।
काजल टीकी म्हारे नैणां बसी॥
ईसर जी रा राज में सुहाग अमर रहवे।
गवरल बाई रा चरणां में सीस नमी॥


पारम्परिक नैवेद्य: गुने और घेवर का सांस्कृतिक व स्वास्थ्य विज्ञान

गणगौर के पावन अवसर पर दो पारंपरिक मिष्ठान्न अनिवार्य रूप से बनाए जाते हैं: 'गुने' और 'घेवर'।

  • गुने (Gune): गुने मैदा अथवा बेसन में मोयन डालकर बनाए जाने वाले गोल, खोखले और नली के आकार के नमकीन अथवा मीठे पकवान होते हैं। पूजा के समय 16 गुने माता गवर को अर्पित किए जाते हैं। इसके पश्चात सास अथवा ननद को 'बायना' (उपहार) के रूप में 16 गुने और साड़ी भेंट की जाती है। गुने का खोखला और बंधा हुआ आकार यह सिखाता है कि स्त्री को अपने ससुराल के समस्त रहस्यों और मर्यादाओं को अपने भीतर समेट कर रखना चाहिए।
  • घेवर (Ghevar): मधुमक्खी के छत्ते के समान जालीदार घेवर राजस्थान की पारंपरिक पहचान है। वसंत से ग्रीष्म के संधिकाल में जब शरीर में शुष्कता बढ़ने लगती है तब शुद्ध घी और दूध की रबड़ी से बना घेवर शरीर की धातुओं को पोषण देता है और पित्त को शांत रखता है।

गणगौर की सवारी और विसर्जन की भावुक विदाई

चैत्र शुक्ल तृतीया की संध्या को गणगौर उत्सव अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचता है। इस दिन राजस्थान के प्रमुख नगरों-विशेष रूप से जयपुर और उदयपुर-में 'गणगौर माता की सवारी' निकाली जाती है।

  • जयपुर की शाही सवारी: जयपुर के सिटी पैलेस के त्रिपोलिया गेट से जनानी ड्योढ़ी से माता गवर की पालकी राजसी ठाट-बाट, तोपों की सलामी, सजे-धजे हाथियों, घोड़ों और ऊंटों के लवाजमे के साथ निकलती है। हजारों देशी-विदेशी पर्यटक इस अलौकिक दृश्य को देखने तालकटोरा झील के मार्ग पर एकत्रित होते हैं।
  • उदयपुर का गणगौर घाट: पिछोला झील के किनारे स्थित गणगौर घाट पर सजी-धजी नौकाओं में ईसर-गवर की प्रतिमाओं को विराजित कर जल-क्रीड़ा कराई जाती है।
  • भावुक विसर्जन: तीसरे दिन की संध्या अथवा चौथे दिन (चैत्र शुक्ल चतुर्थी) को माता गवर को किसी पवित्र बावड़ी, कुएं, तालाब अथवा नदी के जल में विसर्जित (सीराना) किया जाता है। विसर्जन का यह क्षण अत्यंत भावुक होता है; महिलाएं रोते हुए गाती हैं: "ओ जी म्हारी गवरल जावे सासरिये, अखियां में नीर बहे..."। यह विदाई एक बेटी के अपने ससुराल जाने की साक्षात अनुकृति होती है।

दार्शनिक एवं सामाजिक संदेश

गणगौर का पर्व भारतीय समाज में स्त्री की महत्ता, परिवार की सुदृढ़ता और दांपत्य निष्ठा का अमर प्रतीक है।

यह पर्व हमें सिखाता है कि सुखी दांपत्य जीवन केवल बाह्य आकर्षण पर नहीं, अपितु शिव जैसे त्याग और पार्वती जैसी अनन्य निष्ठा और तपस्या पर आधारित होता है। यह उत्सव कुंवारी कन्याओं को यह संस्कार देता है कि वे अपने जीवन में सत्य, धर्म और मर्यादा का वरण करें, तथा सुहागिनों को यह प्रेरणा देता है कि वे विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपने परिवार और पति की संबल बनकर खड़ी रहें। गणगौर प्रकृति, कला, संगीत, भक्ति और प्रेम का एक ऐसा अनुपम संगम है जो सनातन संस्कृति के शाश्वत सौंदर्य को संपूर्ण विश्व में गुंजायमान करता है।


FAQ

गणगौर का पर्व मुख्य रूप से कितने दिनों तक मनाया जाता है?
गणगौर का पर्व कुल 16 दिनों तक मनाया जाता है; यह होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से प्रारंभ होकर चैत्र शुक्ल तृतीया को संपन्न होता है।

'ईसर' और 'गवर' शब्द किसके प्रतीक हैं?
'ईसर' देवाधिदेव भगवान शिव के प्रतीक हैं और 'गवर' (गौरी) साक्षात माता पार्वती की प्रतीक हैं।

गणगौर की पूजा में 16 की संख्या का क्या विशेष महत्व है?
16 का अंक 16 श्रृंगार, 16 सोमवार, 16 दिनों की साधना और चंद्रमा की 16 कलाओं का प्रतीक है; इसलिए 16 पिंडियां, 16 बिंदियां और 16 गुने अर्पित किए जाते हैं।

गणगौर पर 'बायना' किसे दिया जाता है?
पूजा के उपरांत सास, ननद अथवा घर की किसी वरिष्ठ सुहागिन महिला को आदरपूर्वक सुहाग सामग्री, मिठाई (गुने) और वस्त्र भेंट किए जाते हैं, जिसे 'बायना' कहते हैं।

राजस्थान में गणगौर की सबसे प्रसिद्ध सवारी कहाँ निकलती है?
राजस्थान में गणगौर की सबसे भव्य और ऐतिहासिक शाही सवारी जयपुर के सिटी पैलेस (त्रिपोलिया गेट) से तथा उदयपुर की पिछोला झील (गणगौर घाट) पर निकलती है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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