गुड़ी पड़वा का महात्म्य और पूजन विधान क्या है?

By पं. नीलेश शर्मा

महाराष्ट्र का विजय ध्वज, नीम-मिश्री का प्रसाद और नव संवत्सर का उल्लास

गुड़ी पड़वा: इतिहास, गुड़ी स्थापना विधि, नीम प्रसाद और पूरन पोली

सामग्री तालिका

पंचांग विवरण और महाराष्ट्र के विजय पर्व की खगोलीय पृष्ठभूमि

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को महाराष्ट्र, गोवा, उत्तरी कर्नाटक और कोंकण क्षेत्र में 'गुड़ी पड़वा' के पावन महापर्व के रूप में अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। संस्कृत वांग्मय में 'गुड़ी' शब्द का अर्थ विजय पताका, छत्र अथवा दिव्य ध्वज होता है, जबकि 'पड़वा' प्राकृत और मराठी भाषा में चांद्र मास की प्रथम तिथि 'प्रतिपदा' को संबोधित करता है। इस प्रकार गुड़ी पड़वा का शाब्दिक और तात्विक अर्थ है: प्रतिपदा तिथि पर फहराई जाने वाली विजय पताका।

खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से यह पर्व उस क्षण का साक्षी बनता है जब भगवान भुवन भास्कर सूर्य देव मीन राशि के जल तत्त्वीय क्षेत्र को पार कर अपनी परम उच्च राशि मेष (Aries) के संधिकाल में प्रवेश करते हैं। इस दिन चंद्रमा का उदय रेवती अथवा अश्विनी नक्षत्र के संयोग में होता है, जो काल गणना के नवीन संवत्सर (शालिवाहन शक संवत और विक्रम संवत) के शुभारंभ का प्रतीक है। महाराष्ट्र में यह पर्व मुख्य रूप से 'शालिवाहन शक संवत' के प्रथम दिवस के रूप में मान्य है, जिसे सातवाहन वंश के प्रतापी राजा शालिवाहन ने विदेशी आक्रांताओं पर विजय प्राप्त करके प्रवर्तित किया था।

पंचांग व खगोलीय घटक शास्त्रीय व सांस्कृतिक विवरण
तिथि एवं पक्ष चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा तिथि (प्रथम दिन)
संवत्सर प्रणाली शालिवाहन शक संवत (78 ईस्वी) एवं विक्रम संवत (57 ई.पू.)
सौर व चांद्र स्थिति उत्तरायण सूर्य, वसंत विषुव संधिकाल, नवीन चांद्र कला
मुख्य अधिष्ठाता सत्ता मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, छत्रपति शिवाजी महाराज, ब्रह्मा जी
प्रधान प्रतीक नीम-आम्र पल्लव, रेशमी वस्त्र और उलटे ताम्र/रजत कलश से सुसज्जित गुड़ी
मुख्य पावन प्रसाद नीम की कोपलें, गुड़, इमली, अजवाइन व चने की दाल (षड्रस)
मुख्य आध्यात्मिक फल गृह-क्लेश निवारण, विजय सिद्धि, दीर्घायु और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा

गुड़ी पड़वा के इस पावन अवसर पर अपने गृह में विजय, आरोग्य और समृद्धि की स्थापना हेतु प्रत्येक परिवार को सूर्योदय से पूर्व विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शीतल जल में गंगाजल और नीम का अर्क मिलाकर अभ्यंग स्नान (तिल तेल मालिश उपरांत स्नान) करना।
  • स्नान के पश्चात स्वच्छ अथवा नवीन पारंपरिक वस्त्र (जैसे पुरुषों द्वारा कुर्ता-धोती और महिलाओं द्वारा नौवारी साड़ी) धारण करना।
  • गृह के मुख्य द्वार की देहरी को स्वच्छ जल से धोकर उस पर गाय के गोबर अथवा हल्दी का लेप लगाना और रंगोली सजाना।
  • तांबे अथवा पीतल के पात्र से उदीयमान भगवान सूर्यनारायण को कुमकुम, अक्षत और लाल पुष्प मिश्रित जल का तीन बार अर्घ्य समर्पित करना।
  • शुभ मुहूर्त में घर के मुख्य द्वार के दाईं ओर अथवा बालकनी/छत पर विधिपूर्वक विजय ध्वज (गुड़ी) स्थापित करना।
  • परिवार के सभी सदस्यों के साथ बैठकर नीम की कोपलों, गुड़, इमली और अजवाइन से निर्मित विशेष आरोग्य प्रसाद ग्रहण करना।
  • गृह मंदिर में भगवान श्री राम और कुल देवता का षोडशोपचार पूजन संपन्न कर श्री राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करना।
  • दोपहर के समय पारंपरिक मिष्ठान्न पूरन पोली, श्रीखंड और बासुंदी का भोग लगाकर परिजनों व अतिथियों को भोजन कराना।

ऐतिहासिक व पौराणिक संदर्भ: राम विजय से छत्रपति शिवाजी महाराज तक

गुड़ी पड़वा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, अपितु यह भारतवर्ष के शौर्य, स्वाभिमान और धर्म रक्षा के गौरवशाली इतिहास का सजीव स्मारक है। इस महापर्व के पीछे तीन अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यान जुड़े हुए हैं:

1. लंका विजय उपरांत श्री राम का स्वागत और बालि वध

पौराणिक मान्यता के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने किष्किंधा के अत्याचारी वानर राज बालि का वध कर सुग्रीव को भयमुक्त किया था और दक्षिण भारत की प्रजा को बालि के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। यह घटना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही घटित हुई थी, जिसके उल्लास में किष्किंधा की प्रजा ने अपने-अपने घरों पर विजय पताकाएं फहराई थीं।

इसके अतिरिक्त, जब चौदह वर्ष के वनवास और रावण संहार के पश्चात भगवान श्री राम माता जानकी और लक्ष्मण जी सहित अयोध्या लौटे तब भी संपूर्ण राष्ट्र में इसी प्रकार की गुड़ी (विजय ध्वज) लगाकर उनका स्वागत किया गया था।

2. राजा शालिवाहन की मिट्टी की सेना और शक विजय

ईसा की प्रथम शताब्दी (78 ईस्वी) में जब मध्य एशिया के क्रूर शक आक्रांताओं ने दक्षिण और पश्चिम भारत को अपने अत्याचारों से त्रस्त कर रखा था तब पैठन (प्रतिष्ठानपुर) के कुम्हार-पुत्र शालिवाहन ने एक अभूतपूर्व क्रांति का सूत्रपात किया।

इतिहास साक्षी है कि शालिवाहन के पास कोई विशाल राजसी सेना नहीं थी। उन्होंने अपने कौशल से मिट्टी के हजारों सैनिकों, अश्वों और गजों का निर्माण किया और उन पर मंत्र शक्ति व जन-संकल्प का संचार करके शकों के विरुद्ध महायुद्ध छेड़ दिया। शालिवाहन की इस जन-सेना ने शकों को परास्त कर नर्मदा के पार खदेड़ दिया। इस महान राष्ट्रीय विजय की स्मृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से 'शालिवाहन शक संवत' का प्रवर्तन हुआ, जो आज भारत सरकार का आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर भी है।

3. छत्रपति शिवाजी महाराज का हिंदवी स्वराज्य

17वीं शताब्दी में जब मुगलों और आदिलशाही सल्तनत के अत्याचार चरम पर थे तब राष्ट्रनायक छत्रपति शिवाजी महाराज ने महाराष्ट्र की सह्याद्रि पहाड़ियों में 'हिंदवी स्वराज्य' की स्थापना की। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी सेना और संपूर्ण प्रजा को संगठित करने के लिए गुड़ी पड़वा के दिन प्रत्येक दुर्ग, किले और जन-सामान्य के घर पर भगवा ध्वज और गुड़ी फहराने का आदेश दिया था। यह गुड़ी मुगलों के विरुद्ध हिंदवी स्वराज्य के अदम्य स्वाभिमान और कभी न झुकने वाले संकल्प का प्रतीक बन गई।

ऐतिहासिक घटना संबंधित युग व काल मुख्य ऐतिहासिक पात्र सामाजिक व आध्यात्मिक संदेश
बालि वध व किष्किंधा मुक्ति त्रेतायुग (रामायण काल) भगवान श्री राम व सुग्रीव अधर्म और तानाशाही पर धर्म की विजय
शक आक्रांताओं का संहार 78 ईस्वी (ऐतिहासिक काल) राजा शालिवाहन (सातवाहन) जन-शक्ति द्वारा विदेशी दासता से मुक्ति
हिंदवी स्वराज्य का उद्घोष 17वीं शताब्दी (मध्यकाल) छत्रपति शिवाजी महाराज स्वाभिमान, स्वतंत्रता व राष्ट्र रक्षा का संकल्प
सृष्टि रचना का प्रथम प्रभात सत्ययुग का आरंभ काल परमपिता ब्रह्मा जी अंधकार से प्रकाश की ओर ब्रह्मांडीय यात्रा

गुड़ी का निर्माण विज्ञान: तांबे का कलश, नीम और रेशमी वस्त्र

महाराष्ट्र के घरों में स्थापित की जाने वाली 'गुड़ी' केवल एक सजावटी वस्तु नहीं है, अपितु यह वास्तु शास्त्र और ऊर्जा विज्ञान के अत्यंत सूक्ष्म नियमों पर आधारित एक दैवीय ऊर्जा संग्राहक (Cosmic Energy Antenna) है।

गुड़ी के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले प्रत्येक घटक का अपना विशिष्ट वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व होता है:

  • बांस का लंबा डंडा: गुड़ी का आधार एक 5 से 8 फीट लंबा, सीधा और स्वच्छ बांस का डंडा होता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार बांस रीढ़ की हड्डी (सुषुम्ना नाड़ी) का प्रतीक है। यह पृथ्वी की चुंबकीय ऊर्जा को आकाश की कॉस्मिक ऊर्जा के साथ जोड़ता है।
  • रेशमी अथवा जरीदार वस्त्र: बांस के शीर्ष पर गहरे पीले, केसरिया, लाल अथवा हरे रंग का नया रेशमी वस्त्र बांधा जाता है। ये रंग सूर्य के तेज, त्याग, शौर्य और प्रकृति के नवजीवन का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • नीम की ताजी टहनी और पल्लव: वस्त्र के साथ नीम की कोमल पत्तियों और टहनियों को बांधा जाता है। नीम एक अत्यंत शक्तिशाली प्राकृतिक रोगाणुरोधक (Antimicrobial) है। यह घर के मुख्य द्वार पर आने वाली वायु को शुद्ध करता है और वसंत ऋतु के संक्रामक जीवाणुओं को नष्ट करता है।
  • आम्र पल्लव और लाल पुष्पों की माला: नीम के साथ ताजे आम के पत्ते और गेंदे अथवा गुलाब के लाल-पीले पुष्पों की माला बांधी जाती है। आम के पत्ते ऑक्सीजन का उत्सर्जन बढ़ाते हैं और पुष्प सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न करते हैं।
  • गाठी (बताशों की माला): गुड़ी पर शुद्ध शर्करा (बताशों) से बनी हुई माला बांधी जाती है, जिसे मराठी में 'गाठी' कहा जाता है। यह जीवन में मिठास, आनंद और सौहार्द का प्रतीक है।
  • उल्टा तांबे अथवा चांदी का कलश (तांब्या): इन समस्त सामग्रियों के ऊपर तांबे, पीतल अथवा चांदी के चमकीले लोटे को उल्टा करके स्थापित किया जाता है। तांबा विद्युत और सूक्ष्म ऊर्जा का सर्वोत्तम सुचालक (Conductor) है। उल्टा रखा हुआ यह कलश अंतरिक्ष से आने वाली सकारात्मक सौर किरणों और प्राणिक तरंगों को आकर्षित कर घर के भीतर परावर्तित (Reflect) करता है।
गुड़ी का घटक भौतिक व रासायनिक प्रकृति वास्तु व सूक्ष्म ऊर्जा प्रभाव आध्यात्मिक व पौराणिक प्रतीक
सीधा बांस का डंडा सुदृढ़, लचीला, काष्ठीय मेरुदंड व मूलाधार का संतुलन स्थिरता, आत्मबल व उन्नति की दिशा
रेशमी पीत/लाल वस्त्र प्राकृतिक रेशम, ताप संवाहक तेज व ओज का विकीर्णन सूर्य देव की रश्मियां व विजय पताका
नीम की कोमल टहनी तिक्त, एंटी-वायरल, औषधीय सूक्ष्म रोगाणुओं का समूल नाश आरोग्य, शुद्धि व अमंगल से रक्षा
बताशों की माला (गाठी) शुद्ध सुक्रोज, मिष्ठान्न सकारात्मक ऊर्जा का पोषण जीवन में माधुर्य व पारिवारिक एकता
आम्र पल्लव व पुष्प फाइटोनसाइड्स उत्सर्जक प्राणवायु संवर्धन व सुगंध समृद्धि, शुभता व सात्विक आकर्षण
उल्टा तांबे का कलश विद्युत-चुंबकीय सुचालक कॉस्मिक तरंगों का गृह में परावर्तन छत्र, मुकुट व साक्षात ब्रह्म-कलश

गुड़ी स्थापना की संपूर्ण शास्त्रीय विधि और शुभ मुहूर्त

गुड़ी पड़वा के दिन गुड़ी की स्थापना सदैव सूर्योदय के तुरंत पश्चात प्रातः काल के शुभ मुहूर्त में ही की जानी चाहिए। दोपहर अथवा संध्या काल में गुड़ी बांधना शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता।

चरणबद्ध स्थापना विधान

  1. स्थान का चयन व शुद्धि: घर के मुख्य द्वार की दाईं ओर (घर से बाहर निकलते समय दाहिना हाथ) अथवा बालकनी/छत पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके एक स्वच्छ स्थान चुनें। उस स्थान को जल से धोकर वहां गाय के गोबर अथवा हल्दी का चौकोर लेप लगाएं और उस पर चावल के आटे से सुंदर स्वस्तिक अथवा अष्टदल कमल की रंगोली बनाएं।
  2. पाट (चौकी) की स्थापना: रंगोली के ऊपर लकड़ी की एक साफ चौकी (पाट) रखें। चौकी पर थोड़ा सा अक्षत (बिना टूटे चावल) और लाल चंदन छिड़कें।
  3. गुड़ी का श्रृंगार: बांस के डंडे को स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। उसके ऊपरी सिरे पर नए रेशमी वस्त्र को मौली (कलावा) से मजबूती से बांधें। वस्त्र के ऊपर नीम की टहनी, आम के पत्ते, लाल पुष्पों की माला और बताशों की गाठी को एक साथ बांधें। इसके उपरांत तांबे के लोटे पर रोली से स्वस्तिक बनाकर उसे डंडे के शीर्ष पर उल्टा करके मजबूती से स्थापित करें।
  4. प्रतिष्ठा व पूजन: तैयार की गई गुड़ी को चौकी पर सीधा खड़ा करें (इसके लिए किसी दीवार अथवा खिड़की का सहारा लिया जा सकता है)। गुड़ी के आधार और कलश पर हल्दी, कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। सुगंधित धूप और गाय के घी का दीपक दिखाकर गुड़ी की आरती उतारें।
  5. प्रार्थना मंत्र: हाथ जोड़कर ब्रह्म ध्वज और भगवान श्री राम का ध्यान करते हुए निम्नलिखित शास्त्रीय मंत्र का पाठ करें:

ब्रह्मध्वज नमस्तेऽस्तु सर्वाभीष्ट फलप्रद।
प्राप्तेऽस्मिन् वत्सरे नित्यं मद्गृहे मङ्गलं कुरु॥

(अर्थ: हे समस्त अभीष्ट फलों को प्रदान करने वाले ब्रह्मध्वज, आपको मेरा नमन है। इस नवीन वर्ष में आप मेरे घर में निरंतर सुख, शांति और मंगल की स्थापना करें।)

गुड़ी को दिनभर फहराने के पश्चात सूर्यास्त के समय, प्रदोष काल में पुनः धूप-दीप दिखाकर ससम्मान उतारा जाता है और उस पर चढ़ी बताशों की माला (गाठी) को परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

नीम-गुड़ का कड़वा-मीठा प्रसाद: जीवन दर्शन और आयुर्वेद

गुड़ी पड़वा के महापर्व का सबसे अनूठा, दार्शनिक और वैज्ञानिक अंग इसका विशेष पावन प्रसाद है। इस दिन स्नान और गुड़ी पूजन के उपरांत घर के प्रत्येक सदस्य को एक विशेष मिश्रण का सेवन कराया जाता है, जिसे मराठी में 'कडुलिंबाचा प्रसाद' कहा जाता है।

इस पावन प्रसाद को तैयार करने में छह विभिन्न रस वाले द्रव्यों का सम्मिश्रण किया जाता है:

  • कड़वा रस: नीम की ताजी, कोमल कोपलें
  • मीठा रस: नया गुड़ अथवा धागे वाली मिश्री
  • खट्टा रस: भीगी हुई इमली अथवा कच्चा आम
  • कसैला रस: भीगी हुई चने की दाल
  • तीखा रस: काली मिर्च अथवा सोंठ का चूर्ण
  • नमकीन रस: शुद्ध सेंधा नमक और अजवाइन
प्रसाद का घटक प्रयुक्त रस (स्वाद) शारीरिक व आयुर्वेदिक प्रभाव अंतर्निहित जीवन दर्शन
नीम की कोपलें तिक्त (कड़वा) कफ का शमन, रक्त शोधन, जीवाणु नाश जीवन के कष्टों व दुखों की स्वीकृति
नया गुड़/मिश्री मधुर (मीठा) जठराग्नि प्रदीपन, ऊर्जा, पित्त संतुलन सुख, आनंद व प्रेम का उल्लास
इमली/कच्चा आम अम्ल (खट्टा) पाचक रसों का स्राव, अरुचि का निवारण जीवन के खट्टे व खट्टे-मीठे अनुभव
सेंधा नमक लवण (नमकीन) इलेक्ट्रोलाइट संतुलन, वायु अनुलोमन जीवन में उत्साह व कर्मठता का रस
काली मिर्च/सोंठ कटु (तीखा) आमाशय के आमदोष का पाचन चुनौतियों से लड़ने का शौर्य व साहस
भीगी चने की दाल कषाय (कसैला) धातुओं का पोषण, अतिसार निवारण त्याग, संतुलन व वैराग्य की भावना

दार्शनिक संदेश

यह कड़वा-मीठा प्रसाद मनुष्य को सनातन जीवन दर्शन का सर्वोच्च पाठ पढ़ाता है: जीवन केवल सुखों और आनंद का नाम नहीं है। जीवन में जिस प्रकार सुख, सफलता और हर्ष (गुड़) आते हैं, उसी प्रकार दुख, संघर्ष और असफलताएं (नीम) भी अवश्यंभावी हैं। जो व्यक्ति सुख में अत्यधिक उन्मत्त नहीं होता और दुख में धैर्य नहीं खोता, वही जीवन के समत्व योग को प्राप्त करता है। यह प्रसाद हमें आगामी वर्ष के प्रत्येक अनुभव को समभाव और ईश्वर के प्रसाद के रूप में स्वीकार करने की मानसिक शक्ति प्रदान करता है।

गुड़ी पड़वा का सामाजिक उत्सव और पारंपरिक व्यंजन

गुड़ी पड़वा केवल एक व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक अनुष्ठान नहीं है, अपितु यह संपूर्ण समाज में नई ऊर्जा और एकता का संचार करने वाला लोकोत्सव है।

  • शोभायात्रा और स्वागत यात्रा: महाराष्ट्र के नगरों और ग्रामों में इस दिन प्रातः काल विशाल 'नववर्ष स्वागत यात्राएं' निकाली जाती हैं। युवा और युवतियां पारंपरिक परिधानों में सजकर, सिर पर फेटा (पगड़ी) बांधकर, ढोल-ताशों की गूंज पर लेजिम नृत्य करते हैं। इन यात्राओं में छत्रपति शिवाजी महाराज, जीजामाता और भारतीय संस्कृति की गौरव गाथाओं को प्रदर्शित करने वाली सजीव झांकियां निकाली जाती हैं।
  • पारंपरिक महा-व्यंजन (पूरन पोली): गुड़ी पड़वा के दिन महाराष्ट्र के प्रत्येक घर में 'पूरन पोली' बनाई जाती है। चने की दाल को उबालकर उसमें गुड़, जायफल और इलायची मिलाकर 'पूरन' (मीठा भरावन) तैयार किया जाता है, जिसे गेहूं के आटे की लोई में भरकर घी में सेका जाता है। इसे गरमा-गरम दूध, घी अथवा तीखी 'कट की आमटी' (मसालेदार दाल) के साथ परोसा जाता है।
  • श्रीखंड और पुरी: इसके साथ ही ताजे चक्के (हंग कर्ड) में केसर, पिस्ता, बादाम और इलायची मिलाकर बनाया गया सुगंधित 'केसरिया श्रीखंड' और कुरकुरी पूरियां इस दिन के भोजन को अमृतमय बना देती हैं।

नव संवत्सर का संकल्प और विजय का मार्ग

गुड़ी पड़वा का यह पावन पर्व हमें स्मरण कराता है कि प्रत्येक प्रभात हमारे जीवन में एक नई संभावना लेकर आता है। गुड़ी का वह आकाश छूता हुआ कलश हमें अपनी दृष्टि को सदैव उच्च रखने, अपने विचारों को उदात्त बनाने और विपरीत परिस्थितियों में भी विजय का ध्वज फहराए रखने की प्रेरणा देता है।

नीम की कड़वाहट हमारे भीतर के विकारों को जलाकर भस्म कर देती है और गुड़ की मिठास हमारे संबंधों में प्रेम का संचार करती है। जब हम अपनी प्राचीन परंपराओं, आयुर्वेदिक नियमों और राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ नव संवत्सर का स्वागत करते हैं, तो हमारा जीवन स्वतः ही एक उत्सव में रूपांतरित हो जाता है।

आइए इस गुड़ी पड़वा पर हम अपने घरों के साथ-साथ अपने अंतःकरण में भी धर्म, सत्य और मर्यादा की एक अमर गुड़ी स्थापित करें और संकल्प लें कि हम अपने राष्ट्र, समाज और संस्कृति के उत्थान के लिए निरंतर कर्मरत रहेंगे। 'नववर्ष की पावन गुड़ी, लाए जीवन में सुख समृद्धि की लड़ी।'

FAQ

गुड़ी पड़वा मुख्य रूप से भारत के किन राज्यों में मनाया जाता है?
गुड़ी पड़वा मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गोवा, उत्तरी कर्नाटक और कोंकण क्षेत्र में नए साल (नव संवत्सर) के आरंभ के रूप में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है।

गुड़ी पर तांबे का लोटा उल्टा करके क्यों लगाया जाता है?
तांबा ऊर्जा का उत्तम संवाहक है; उल्टा रखा हुआ लोटा ब्रह्मांडीय सौर और प्राणिक तरंगों को अवशोषित कर घर के भीतर सकारात्मक ऊर्जा के रूप में परावर्तित करता है।

गुड़ी पड़वा के दिन नीम और गुड़ का प्रसाद खाना क्यों अनिवार्य है?
यह प्रसाद आयुर्वेदिक दृष्टि से कफ शांत कर रक्त शुद्ध करता है और दार्शनिक दृष्टि से जीवन के सुख (मीठा) और दुख (कड़वा) को समभाव से स्वीकार करने की सीख देता है।

गुड़ी को घर के किस स्थान पर स्थापित करना सबसे शुभ माना जाता है?
गुड़ी को घर के मुख्य द्वार की दाईं ओर, बालकनी में अथवा छत पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके स्थापित करना वास्तु शास्त्र के अनुसार सर्वाधिक शुभ माना जाता है।

गुड़ी पड़वा के दिन कौन सा पारंपरिक व्यंजन मुख्य रूप से बनाया जाता है?
इस दिन महाराष्ट्र के घरों में चने की दाल और गुड़ से बनी प्रसिद्ध मीठी रोटी 'पूरन पोली', केसरिया श्रीखंड, बासुंदी और पूरी मुख्य रूप से बनाई जाती है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

पं. नीलेश शर्मा (63)


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