By पं. नरेंद्र शर्मा
एकादश रुद्रावतार का प्राकट्य, सिंदूर अर्पण का विज्ञान, अष्ट सिद्धियां और शनि शांति

सनातन वैदिक पंचांग और आगम संहिताओं में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को कलयुग के साक्षात जाग्रत, चिरंजीवी और संकटमोचन महाप्रभु श्री हनुमान जी के अवतरण दिवस-'हनुमान जयंती' (Hanuman Jayanti)-के रूप में संपूर्ण विश्व में अपार श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक तेज के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व वासंती चैत्र मास का पूर्ण चंद्र दिवस है। यह वही तिथि है जो एक ओर चैत्र मास के पवित्र व्रतों की पूर्णाहुति करती है, तो दूसरी ओर भगवान देवाधिदेव महादेव शिव के एकादश (11वें) रुद्रावतार के भूतल पर प्रत्यक्ष अवतरण की साक्षी बनती है।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चैत्र पूर्णिमा का क्षण संपूर्ण सौरमंडल में जल-तत्त्व और अग्नि-तत्त्व के अद्भुत संतुलन की पराकाष्ठा है। इस समय भुवन भास्कर सूर्य देव अपनी परम उच्च राशि 'मेष' (अग्नि-तत्त्व) के प्रारंभिक अंशों में स्थित होकर ब्रह्मांड को जीवन-ऊर्जा प्रदान करते हैं। दूसरी ओर, मन और औषधियों के अधिष्ठाता चंद्रमा अपनी पूर्ण 16 कलाओं से युक्त होकर आकाशगंगा के सबसे चमकीले और तेजस्वी 'चित्रा' नक्षत्र में गोचर करते हैं। चित्रा नक्षत्र के स्वामी पराक्रमी, आग्नेय और ऊर्जावान ग्रह 'मंगल' (Mars) हैं। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान जी का प्राकट्य चैत्र पूर्णिमा, चित्रा नक्षत्र, मेष लग्न और मंगलवार के पावन योग में ठीक अरुणोदय वेला (सूर्योदय के समय) हुआ था। ज्योतिष शास्त्र में शनि, राहु, केतु और मंगल की पीड़ाओं को शांत करने का एकमात्र अमोघ आश्रय महाबली हनुमान जी की शरण माना गया है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व ऐतिहासिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | चैत्र मास, शुक्ल पक्ष |
| तिथि | पूर्णिमा तिथि (संवत्सर की प्रथम पूर्णिमा) |
| पर्व का शास्त्रीय नाम | हनुमान जयंती, हनुमत् प्राकट्योत्सव, चैत्री पूनम |
| ऐतिहासिक अवतार काल | त्रेतायुग (भगवान श्री राम के अवतार के समकालिक) |
| अवतार लग्न एवं नक्षत्र | मेष लग्न (Aries Ascendant), चित्रा नक्षत्र (मंगल शासित) |
| अवतार वेला | अरुणोदय काल (सूर्योदय से पूर्व का स्वर्णिम संधिकाल) |
| मुख्य अधिष्ठाता सत्ता | एकादश रुद्रावतार भगवान हनुमान (पवनपुत्र, केसरीनंदन) |
| माता-पिता | माता अंजना एवं वानरराज केसरी (क्षेत्रीय पिता: वायु देव) |
| संबद्ध ज्योतिषीय ग्रह | मंगल (शौर्य), शनि (न्याय), राहु-केतु (संकट निवारण) |
| प्रधान पारंपरिक नैवेद्य | बूंदी के लड्डू, इमरती, पंचमेवा, रोट (मीठी रोटी), मीठा पान |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | भय-मुक्ति, ग्रह दोष शांति, अकाल मृत्यु निवारण, ब्रह्मचर्य सिद्धि |
हनुमान जयंती के इस पावन पर्व पर महाबली संकटमोचन की असीम कृपा प्राप्त करने, भूत-प्रेत और तंत्र बाधाओं से मुक्ति पाने तथा अपने जीवन में अदम्य साहस और ज्ञान का संचार करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड, शिव पुराण के शतरुद्र संहिता, स्कंद पुराण और पराशर संहिता में भगवान हनुमान जी के प्राकट्य का अत्यंत विस्तृत, गूढ़ और वैज्ञानिक आख्यान प्राप्त होता है।
जब त्रेतायुग में रावण ने ब्रह्मा जी से वरदान पाकर संपूर्ण त्रिलोकी, देवताओं और ऋषियों पर भयंकर अत्याचार प्रारंभ किया तब भगवान विष्णु ने मानव रूप में श्री राम बनकर अवतार लेने का निश्चय किया। उस समय देवाधिदेव महादेव शिव ने विचार किया कि जब मेरे आराध्य प्रभु श्री हरि स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर लीला करेंगे, तो मैं उनके चरणों की सेवा किए बिना कैसे रह सकता हूँ?
भगवान शिव ने अपने एकादश (11वें) रुद्र अंश से हनुमान रूप में अवतार लेने का संकल्प किया:
अंजनागर्भसम्भूतो वायुपुत्रो महाबलः।
रामेष्टः सर्वलोकानां संकटापहरो हरिः॥
अयोध्या में जब महाराज दशरथ ने महर्षि ऋष्यशृंग के आचार्यत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न कराया तब अग्नि देव ने स्वर्ण पात्र में दिव्य चरु (खीर) प्रदान किया। उस खीर के अंश से जब कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को भाग दिया जा रहा था, उसी समय भगवान शिव की प्रेरणा से एक चील (गरुड़ पक्षी का रूप) उस खीर का एक छोटा सा अंश अपनी चोंच में दबाकर उड़ गया।
उसी समय सुमेरु पर्वत पर वानरराज केसरी की पत्नी माता अंजना (पूर्वजन्म की पुंजिकस्थला अप्सरा) भगवान शिव को पुत्र रूप में पाने के लिए घोर तपस्या में लीन थीं। पवन देव (वायु देव) ने उस दिव्य खीर के अंश को चील की चोंच से लेकर माता अंजना की खुली हथेलियों में स्थापित कर दिया। माता अंजना ने उसे भगवान शिव का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लिया। उस दिव्य पायस और पवन देव के तेज से चैत्र पूर्णिमा के पावन दिन साक्षात एकादश रुद्र ने वानर शिशु के रूप में जन्म लिया।
| प्राकट्य सोपान | पौराणिक एवं आध्यात्मिक विवरण | अंतर्निहित दार्शनिक संदेश |
|---|---|---|
| शिव का संकल्प | प्रभु श्री राम की सेवा हेतु दास रूप धारण करना | परम सत्ता भी प्रेम और सेवा में स्वयं को विस्मृत कर देती है |
| माता अंजना का तप | सुमेरु पर्वत पर शिव पुत्र प्राप्ति हेतु घोर साधना | मातृत्व की पवित्रता से ही अलौकिक शक्ति का अवतरण संभव है |
| दिव्य पायस का आगमन | अयोध्या के पुत्रकामेष्टि यज्ञ से खीर के अंश का संचरण | राम और हनुमान के जन्म का अटूट, समकालिक आध्यात्मिक संबंध |
| वायु देव का संचरण | पवन देव द्वारा अंजना के गर्भ में तेज का प्रवेश | प्राण वायु ही समस्त चेतना और बल का आधार स्तंभ है |
| एकादश रुद्र का तेज | ग्यारहवें रुद्र का साक्षात वानर रूप में प्राकट्य | काम, क्रोध आदि 11 इंद्रियों पर पूर्ण विजय का प्रतीक |
| सूर्य का ग्रास | बाल रूप में सूर्य को मीठा फल समझकर निगलना | असीम ज्ञान और आत्म-प्रकाश को अपनी चेतना में समाहित करना |
बाल रूप में जब हनुमान जी ने आकाश में चमकते हुए सूर्य देव को एक स्वादिष्ट, लाल, पका हुआ फल समझा, तो वे एक ही छलांग में सूर्यमंडल की ओर उड़ चले। उसी दिन अमावस्या थी और राहु सूर्य को ग्रसने आया था। हनुमान जी को देखकर राहु भयभीत होकर देवराज इंद्र के पास भागा। इंद्र ने क्रोध में आकर अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर बालक पर 'वज्र' से प्रहार कर दिया।
वज्र के आघात से बालक की बाईं हनु (ठोड़ी) टूट गई और वे मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। अपने पुत्र को आहत देखकर पवन देव कुपित हो गए और उन्होंने संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड में वायु का संचरण रोक दिया। श्वास रुकने से समस्त देवता, गंधर्व और प्राणी तड़पने लगे।
अंततः ब्रह्मा जी समस्त देवताओं के साथ प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने बालक का स्पर्श कर उन्हें पुनः जीवित किया और उनकी हनु (ठोड़ी) टेढ़ी हो जाने के कारण उनका नाम 'हनुमान' रखा। उस समय समस्त देवताओं ने उन्हें अद्वितीय वरदान दिए:
कालांतर में हनुमान जी ने सूर्य देव को अपना गुरु स्वीकार किया। सूर्य देव निरंतर अपने रथ पर चलते रहते थे, अतः हनुमान जी ने सूर्य के रथ के सम्मुख पीछे की ओर उड़ते हुए उल्टे मुख से समस्त चारों वेदों, छहों वेदांगों, अठारह पुराणों और संपूर्ण संस्कृत व्याकरण की शिक्षा मात्र कुछ ही दिनों में पूर्ण कर ली। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में लिखा है कि हनुमान जी के समान व्याकरण का ज्ञाता, मधुर वक्ता और नीतिवान इस संपूर्ण संसार में कोई दूसरा नहीं है।
हनुमान जी के विग्रह पर नारंगी सिंदूर (Vermilion) और चमेली के तेल (Jasmine Oil) का चोला चढ़ाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन, वैज्ञानिक और तांत्रिक है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, लंका विजय के उपरांत जब माता सीता अयोध्या के राजमहल में अपनी मांग में चुटकी भर लाल सिंदूर भर रही थीं तब हनुमान जी ने कौतूहलवश पूछा: "हे माता! आप अपने मस्तक पर यह लाल चूर्ण क्यों लगाती हैं?"
माता सीता ने मुस्कुराते हुए कहा: "हे पुत्र! इसे लगाने से तुम्हारे प्रभु श्री राम दीर्घायु होते हैं, उनका स्वास्थ्य उत्तम रहता है और वे मुझ पर अत्यंत प्रसन्न होते हैं।"
हनुमान जी ने विचार किया कि यदि चुटकी भर सिंदूर लगाने से प्रभु इतने प्रसन्न होते हैं और दीर्घायु होते हैं, तो क्यों न मैं अपने संपूर्ण शरीर पर ही सिंदूर लगा लूं! उन्होंने बाजार से सेरों सिंदूर मंगाकर अपने पूरे शरीर पर लेप लिया और राजसभा में जा पहुंचे। भगवान श्री राम ने जब हनुमान जी का यह निष्कपट, भोला और अनन्य प्रेम देखा, तो वे भावविभोर हो गए। उन्होंने हनुमान जी को गले से लगा लिया और वरदान दिया:
"हे कपीश! जो भी भक्त मंगलवार अथवा चैत्र पूर्णिमा को तुम्हारे शरीर पर चमेली के तेल युक्त सिंदूर का चोला चढ़ाएगा, उसके जीवन के समस्त संकट, अकाल मृत्यु का भय और ग्रह दोष उसी क्षण भस्म हो जाएंगे।"
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, हनुमान जी एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनके स्मरण मात्र से नवग्रहों के क्रूरतम ग्रह भी शांत हो जाते हैं।
रामायण के अनुसार जब लंका में रावण ने नवग्रहों को अपने पैरों तले दबाकर बंदी बना रखा था तब लंका दहन के समय हनुमान जी ने शनि देव को रावण के बंधन से मुक्त कराया था।
मुक्त होने के उपरांत शनि देव ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा: "हे मारुतिनंदन! आपने मेरी रक्षा की है। मैं आपको वचन देता हूं कि जो भी प्राणी आपकी शरण में रहेगा, आपकी चालीसा पढ़ेगा अथवा आपके नाम का स्मरण करेगा, उसे मेरी साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा महादशा में कभी कोई कष्ट नहीं होगा।"
मंगल ग्रह पराक्रम, रक्त, क्रोध और भूमि का स्वामी है। हनुमान जी का वर्ण और स्वरूप विशुद्ध मंगल का प्रतीक है। जिन जातकों की कुंडली में मांगलिक दोष हो, वे चैत्र पूर्णिमा के दिन हनुमान जी को लाल लंगोट, सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें। इससे मंगल की आक्रामकता शांत होकर सकारात्मक शौर्य में बदल जाती है।
| ग्रह दोष | जीवन में दिखने वाले लक्षण | हनुमान जयंती पर अचूक निवारक उपाय |
|---|---|---|
| शनि की साढ़ेसाती / ढैय्या | अत्यधिक मानसिक तनाव, निरंतर आर्थिक हानि | तेल-सिंदूर का चोला, 108 तुलसी पत्र पर राम नाम लिखकर अर्पण |
| उग्र मांगलिक दोष | वैवाहिक विलंब, रक्त विकार, अत्यधिक क्रोध | लाल त्रिकोणीय ध्वजा मंदिर में लगाना, सुंदरकांड पाठ |
| राहु-केतु जनित प्रेत बाधा | अनिद्रा, बुरे स्वप्न, अज्ञात भय, भ्रम | 'ॐ हं हनुमते नमः' मंत्र की 11 माला, पंचमुखी हनुमान कवच |
| कालसर्प योग व दुर्घटनाएं | कार्यों में अचानक अवरोध, मृत्यु तुल्य कष्ट | दक्षिण मुखी हनुमान जी के सम्मुख चमेली के तेल का चौमुखी दीपक |
गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में उद्घोषित किया है: "अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥" माता जानकी ने अशोक वाटिका में हनुमान जी की अनन्य निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें समस्त आठों सिद्धियों और नौ निधियों का स्वामी बना दिया था।
हनुमान जी इन समस्त सिद्धियों के स्वामी होकर भी अपने आपको केवल 'रामदूत' और 'प्रभु का दास' ही कहते हैं। यह दर्शाता है कि सिद्धियां अहंकार का कारण नहीं, अपितु ईश्वर की सेवा का साधन होनी चाहिए।
चैत्र पूर्णिमा के दिन घर में अथवा देवालय में हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित क्रमबद्ध विधि से पूजन संपन्न करें:
ॐ विष्णवे नमः। अद्य चैत्र मासे शुक्ल पक्षे पूर्णिमा तिथौ, चित्रा नक्षत्रे, हनुमत् प्राकट्योत्सवे, मम सकल ग्रह-पीडा, शत्रु-बाधा, भूत-प्रेत भय निवारणार्थं, आत्म-बल संवर्धनार्थं, श्री हनुमान प्रीतये पूजनमहं करिष्ये।
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
इसके पश्चात अपनी ही जगह पर तीन बार प्रदक्षिणा करें और साष्टांग प्रणाम कर चरणों का सिंदूर अपने मस्तक पर लगाएं।
हनुमान जी का संपूर्ण जीवन संपूर्ण मानव जाति को यह अमर संदेश देता है कि बल का वास्तविक सौन्दर्य 'विनम्रता' में है और ज्ञान का वास्तविक फल 'सेवा' में है।
आज का मनुष्य थोड़ा सा धन, पद अथवा विद्या पाकर अहंकार से भर जाता है। परंतु हनुमान जी के पास असीम बल, अष्ट सिद्धियां, अतुलित तेज और संपूर्ण वेदों का ज्ञान था, फिर भी जब लंका में रावण ने उनसे पूछा कि "तुम कौन हो?", तो उन्होंने अपना कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं दिया; उन्होंने केवल गर्व से कहा: 'रामदूत मैं मातु जानकी'।
हनुमान जी सिखाते हैं कि जब मनुष्य अपने व्यक्तिगत अहंकार को मिटाकर अपने जीवन को किसी उच्चतर, दैवीय उद्देश्य (श्री राम) के चरणों में समर्पित कर देता है, तो समुद्र लांघना, लंका जलाना और संजीवनी पर्वत उठाना उसके लिए एक खेल बन जाता है। जहां निष्काम भक्ति है, वहां असंभव भी संभव हो जाता है।
आइए इस पावन चैत्र पूर्णिमा पर हम संकटमोचन श्री हनुमान जी के पावन चरणों में शीश नवाएं, अपने भीतर के आलस्य, भय और वासनाओं को भस्म करें और प्रार्थना करें: 'हे पवनसुत! हमारे अंतःकरण में ज्ञान, बुद्धि और बल का संचार करें और हमें निष्काम राम-भक्ति का अमर वरदान प्रदान करें।'
हनुमान जयंती किस तिथि और नक्षत्र में मनाई जाती है?
हनुमान जयंती प्रतिवर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को चित्रा नक्षत्र और मेष लग्न में मनाई जाती है।
हनुमान जी को किस देवता का अवतार माना गया है?
हनुमान जी को साक्षात देवाधिदेव महादेव शिव का एकादश (11वां) रुद्रावतार माना गया है।
हनुमान जी को सिंदूर का चोला क्यों चढ़ाया जाता है?
माता सीता द्वारा मांग में सिंदूर लगाने के प्रसंग से प्रेरित होकर प्रभु श्री राम की प्रसन्नता और उनकी दीर्घायु हेतु हनुमान जी ने पूरे शरीर पर सिंदूर लगाया था; अतः उन्हें सिंदूर अत्यंत प्रिय है।
हनुमान जी की पूजा में किस तेल का प्रयोग सर्वोत्तम माना गया है?
हनुमान जी की पूजा और सिंदूर लेपन में शुद्ध 'चमेली के तेल' (Jasmine Oil) का प्रयोग सर्वोत्तम और शास्त्र-सम्मत माना गया है।
शनि देव की साढ़ेसाती से मुक्ति के लिए हनुमान जी की पूजा क्यों अचूक मानी जाती है?
रावण के बंधन से मुक्त कराने के उपरांत शनि देव ने हनुमान जी को वचन दिया था कि जो भी प्राणी उनकी शरण में रहेगा, उसे शनि कभी कष्ट नहीं पहुंचाएंगे।
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