By पं. अभिषेक शर्मा
धन की देवी का पूजन, श्री सूक्त साधना और व्यापार विस्तार के गुप्त सूत्र

सनातन वैदिक कालगणना में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को 'लक्ष्मी पंचमी' अथवा 'श्री पंचमी' (Lakshmi Panchami / Sri Panchami) के नाम से जाना जाता है। यह पावन पर्व वासंती नवरात्रि के पंचम दिवस घटित होता है, जिस दिन एक ओर आदिशक्ति के ममतामयी स्वरूप माँ स्कंदमाता की आराधना की जाती है, वहीं दूसरी ओर चराचर जगत के भौतिक व आध्यात्मिक ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री भगवती महालक्ष्मी का विशेष पूजन संपन्न होता है। यह तिथि नव संवत्सर (नए हिन्दू वर्ष) के प्रथम पक्ष की पंचमी होने के कारण वर्षभर की आर्थिक समृद्धि, वित्तीय स्थायित्व और व्यापारिक विस्तार का आधार स्तंभ मानी गई है।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से यह तिथि अत्यंत शुभ संयोगों का निर्माण करती है। इस समय भुवन भास्कर सूर्य देव मीन राशि के अंतिम चरण से मेष राशि के अग्नि-तत्वीय क्षेत्र की ओर गमन करते हैं, जबकि चंद्रमा वृषभ अथवा मिथुन राशि के शुभ नक्षत्रों (रोहिणी या मृगशिरा) में गोचर करता है। रोहिणी नक्षत्र चंद्रमा का परम प्रिय और उच्च क्षेत्र है, जो धन, धान्य, सौंदर्य और आकर्षण का प्रत्यक्ष कारक है। कालपुरुष सिद्धांत के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी देवशिल्पी व नागराज माने जाते हैं और इसके तत्वीय अधिपति बुध एवं शुक्र ग्रह हैं। शुक्र ऐश्वर्य व भोग का कारक है और बुध व्यापार व वाणिज्य का। अतः इस दिन की गई साधना से दरिद्रता का समूल नाश होता है और अवरुद्ध धन का प्रवाह पुनः प्रारंभ होता है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व तात्विक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | चैत्र मास, शुक्ल पक्ष |
| तिथि | पंचमी तिथि (वासंती नवरात्रि का पंचम दिवस) |
| पर्व का शास्त्रीय नाम | लक्ष्मी पंचमी, श्री पंचमी, कल्पदि पंचमी |
| मुख्य अधिष्ठात्री देवी | भगवती महालक्ष्मी (कमलवासिनी, विष्णुप्रिया) |
| समकालिक नवरात्रि देवी | माँ स्कंदमाता (विशुद्ध चक्र अधिष्ठात्री) |
| संबद्ध ज्योतिषीय ग्रह | शुक्र देव (ऐश्वर्य), बुध देव (व्यापार) एवं चंद्रमा (समृद्धि) |
| मुख्य तात्विक स्वरूप | पृथ्वी एवं जल तत्त्व का संतुलन, स्थिर लक्ष्मी आकर्षण |
| प्रधान पूजा सामग्री | श्वेत/रक्त कमल, कमलगट्टा, कौड़ियां, गोमती चक्र, खीर, अष्टगंध |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | दारिद्र्य दहन, ऋण मुक्ति, व्यापारिक विस्तार, अखंड श्री-प्राप्ति |
लक्ष्मी पंचमी के इस परम पावन दिवस पर माँ महालक्ष्मी की अहैतुकी अनुकंपा प्राप्त करने और अपने गृह व व्यापार में स्थायी समृद्धि स्थापित करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
सनत्कुमार संहिता, स्कंद पुराण और विष्णु पुराण में लक्ष्मी पंचमी के प्राकट्य और महात्म्य से जुड़ी एक अत्यंत शिक्षाप्रद और दिव्य कथा प्राप्त होती है।
प्राचीन काल में एक बार देवराज इंद्र को अपने वैभव, अमरावती के ऐश्वर्य और त्रिलोकी के आधिपत्य का अत्यधिक अहंकार हो गया। अहंकार के मद में चूर होकर जब वे अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर जा रहे थे तब मार्ग में महर्षि दुर्वासा ने उन्हें भगवान विष्णु की एक दिव्य पारिजात पुष्पों की माला भेंट की। इंद्र ने उस पवित्र माला का अनादर करते हुए उसे ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने तीव्र गंध और भौरों से व्याकुल होकर उस माला को पृथ्वी पर गिरा दिया और अपने पैरों तले कुचल दिया।
महर्षि दुर्वासा ने जब साक्षात भगवती लक्ष्मी के प्रसादमयी माला का यह घोर अपमान देखा, तो वे क्रोध से प्रज्वलित हो उठे। उन्होंने तत्काल इंद्र को शाप दिया: "रे इंद्र! तूने ऐश्वर्य के मद में आकर साक्षात 'श्री' का तिरस्कार किया है। अतः तेरा यह त्रिलोक अभी इसी क्षण 'श्री-हीन' (लक्ष्मी-विहीन) हो जाए!"
| घटनाक्रम सोपान | पौराणिक एवं आध्यात्मिक विवरण | अंतर्निहित दार्शनिक संदेश |
|---|---|---|
| ऐश्वर्य का अभिमान | देवराज इंद्र द्वारा पारिजात माला का तिरस्कार | धन और सत्ता से उत्पन्न अहंकार पतन का मूल कारण है |
| महर्षि दुर्वासा का शाप | त्रिलोकी का तत्काल 'श्री-हीन' हो जाना | दैवीय कृपा के अनादर से समस्त समृद्धि नष्ट हो जाती है |
| लक्ष्मी जी का तिरोभाव | माता महालक्ष्मी का देवताओं को त्यागकर क्षीरसागर में विलीन होना | जहाँ धर्म और विनय नहीं, वहाँ लक्ष्मी का वास नहीं रहता |
| देवताओं की दारुण अवस्था | असुरों का स्वर्ग पर अधिकार, देवों का दरिद्र होना | बिना लक्ष्मी के ज्ञान, बल और सत्ता सब व्यर्थ हो जाते हैं |
| चैत्र शुक्ल पंचमी का तप | देवताओं द्वारा घोर तपस्या, श्री सूक्त व कनकधारा अनुष्ठान | पश्चाताप और सच्ची साधना से खोया वैभव पुनः प्राप्त होता है |
शाप के प्रभाव से माता महालक्ष्मी समस्त देवताओं, स्वर्ग लोक और पृथ्वी को त्यागकर पाताल के अगाध क्षीरसागर में विलीन हो गईं। लक्ष्मी के चले जाते ही संपूर्ण सृष्टि में अंधकार, दरिद्रता, रोग, अकाल और नैतिक पतन छा गया। दैत्यों ने अवसर पाकर स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को सिंहासन से च्युत कर दिया।
दरिद्र और असहाय होकर समस्त देवता परमपिता ब्रह्मा जी और देवाधिदेव महादेव शिव को आगे कर भगवान वैकुंठनाथ श्रीहरि विष्णु की शरण में पहुंचे। भगवान विष्णु ने देवताओं को अपनी भूल का बोध कराते हुए कहा: "हे देवगण! लक्ष्मी केवल भौतिक धन नहीं है, वह त्याग, शुचिता और धर्म की अधिष्ठात्री हैं। यदि तुम पुनः उनका अनुग्रह चाहते हो, तो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को व्रत रखकर 'श्री सूक्त' की ऋचाओं से उनका आह्वान करो।"
देवताओं ने चैत्र शुक्ल पंचमी के दिन कठोर व्रत धारण किया। उन्होंने श्वेत कमल के पुष्पों और बिल्व फलों की समिधा बनाकर अग्नि में आहुतियां दीं और कनकधारा स्तोत्र व श्री सूक्त का पाठ कर देवी की स्तुति की। देवताओं की निष्कपट प्रार्थना और पश्चाताप से प्रसन्न होकर भगवती महालक्ष्मी पुनः क्षीरसागर के जल से कमल के पुष्प पर प्रकट हुईं और उन्होंने देवताओं को उनका खोया हुआ ऐश्वर्य, अमरत्व और स्वर्ग का आधिपत्य पुनः प्रदान किया। इसी कारण यह पावन तिथि 'लक्ष्मी पंचमी' अथवा 'श्री पंचमी' के नाम से अमर हो गई।
तंत्र शास्त्र और आगम संहिताओं में लक्ष्मी पंचमी को धन के स्थायी आकर्षण (Wealth Attraction) और व्यापारिक बाधाओं के समूल नाश की 'सिद्ध रात्रि' स्वीकार किया गया है। जो जातक निरंतर घाटे से जूझ रहे हैं, जिनका व्यापार बंध गया हो अथवा जिन पर भारी ऋण का बोझ हो, उनके लिए इस दिन किए जाने वाले निम्नलिखित शास्त्रीय प्रयोग साक्षात कल्पवृक्ष के समान फल प्रदान करते हैं:
श्रीयंत्र को संपूर्ण ब्रह्मांड और साक्षात महालक्ष्मी का ज्यामितीय शरीर माना गया है।
| प्रयोग घटक | प्रयुक्त तांत्रिक द्रव्य | अनुष्ठान विधि | अभीष्ट वित्तीय व व्यापारिक प्रभाव |
|---|---|---|---|
| श्रीयंत्र कमलगट्टा साधना | स्फटिक श्रीयंत्र, 108 कमलगट्टे, केसर | श्री सूक्त पाठ सहित अभिषेक व मंत्रार्चन | अनवरत धन-प्रवाह, व्यापारिक प्रतिष्ठा, ऋण मुक्ति |
| पीली कौड़ी धन-पोटली | 11 पीली कौड़ियां, 7 गोमती चक्र, हल्दी | पंचामृत स्नान उपरांत लाल वस्त्र बंधन | स्थिर लक्ष्मी वास, संचित धन की रक्षा, लाभ वृद्धि |
| एकाक्षी नारियल स्थापन | एकाक्षी नारियल, लाल सिंदूर, मौली | लक्ष्मी बीज मंत्र जप सहित तिजोरी वास | व्यापारिक आकर्षण, ग्राहकों की वृद्धि, दरिद्रता नाश |
| बिल्व पत्र होम प्रयोग | 108 बिल्व पत्र, शुद्ध गोघृत, शहद | हवन कुंड में आहुति समर्पण | असाध्य आर्थिक संकटों का शमन, राज-सम्मान |
चैत्र शुक्ल पंचमी के दिन घर और कार्यस्थल पर सुख-समृद्धि की स्थायी स्थापना हेतु निम्नलिखित क्रमबद्ध शास्त्रोक्त विधि का अनुपालन करना चाहिए:
1.पूजा स्थल की शुद्धि एवं मंडप निर्माण: पूजा कक्ष की उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा को स्वच्छ कर गाय के गोबर अथवा हल्दी-मिश्रित जल से पवित्र करें। लकड़ी की एक साफ चौकी पर लाल अथवा पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी पर कच्चे चावल (अक्षत) से अष्टदल कमल का निर्माण करें। 2.कलश एवं विग्रह स्थापना: अष्टदल कमल के मध्य में तांबे अथवा मिट्टी का कलश स्थापित करें। कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का, हल्दी की गांठ और दुर्वा डालें। कलश के मुख पर आम के पल्लव रखकर उस पर चावल से भरा पूर्णपात्र रखें और लाल वस्त्र में लिपटा श्रीफल स्थापित करें। कलश के बाईं ओर भगवान श्री हरि विष्णु और दाईं ओर माता महालक्ष्मी के विग्रह अथवा चित्र को विराजमान करें। 3.ध्यान एवं आवाहन: दोनों हाथ जोड़कर कमल के आसन पर विराजमान, स्वर्ण के समान कांति वाली, चतुर्भुजा माता महालक्ष्मी का ध्यान करें:
नमस्ते सर्वगेवानां वरदासि हरिप्रिये।
या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात् त्वदर्चनात्॥ 4.षोडशोपचार पूजन:
लक्ष्मी साधना में ऋग्वेद के खिल-भाग में वर्णित 'श्री सूक्त' (Sri Sukta) और आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'कनकधारा स्तोत्र' (Kanakadhara Stotra) को सर्वाधिक जाग्रत और अचूक माना गया है।
श्री सूक्त केवल कुछ संस्कृत श्लोकों का संग्रह नहीं है, अपितु यह 16 दिव्य बीजाक्षरों का एक वैज्ञानिक ध्वनि-जाल (Sound Matrix) है। इसके प्रथम मंत्र का उच्चारण ही अंतरिक्ष में स्थित स्वर्णमयी किरणों को आकर्षित करने लगता है:
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
जब जगद्गुरु आदि शंकराचार्य एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मणी के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुंचे, तो उस ब्राह्मणी के पास देने के लिए केवल एक सूखा आंवला था। उसने अत्यंत संकोच और अश्रुपूरित नेत्रों से वह आंवला शंकराचार्य की झोली में डाल दिया। ब्राह्मणी की इस परम त्याग भावना से द्रवित होकर शंकराचार्य ने उसी क्षण माता महालक्ष्मी की स्तुति में 'कनकधारा स्तोत्र' की रचना की। प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने उस निर्धन ब्राह्मणी के घर में स्वर्ण के आंवलों की वर्षा कर दी थी। लक्ष्मी पंचमी के दिन कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से घर में अचानक आने वाले वित्तीय संकट टल जाते हैं।
व्यापारी वर्ग, उद्यमियों और वित्तीय क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों के लिए लक्ष्मी पंचमी का दिन दीपावली के समान ही महत्वपूर्ण होता है। सनातन परंपरा में चैत्र मास के नव संवत्सर के आरंभ में अपने व्यावसायिक अभिलेखों को पवित्र करने की परंपरा सदियों पुरानी है।
लक्ष्मी पंचमी हमें सनातन जीवन दर्शन का यह सर्वोच्च रहस्य सिखाती है कि धन केवल उपभोग की वस्तु नहीं है, अपितु वह धर्म का संबल है।
शास्त्रों में दो प्रकार की शक्तियों का वर्णन है: 'लक्ष्मी' और 'अलक्ष्मी'।
माता महालक्ष्मी का वाहन उल्लू (अंधकार और चंचलता का प्रतीक) भी है और वे भगवान विष्णु के गरुड़ (ज्ञान और विवेक के प्रतीक) के साथ भी विराजमान होती हैं। जो मनुष्य केवल उल्लू की भांति भौतिक धन के पीछे भागता है, वह अंततः अज्ञान के अंधकार में भटक जाता है; परंतु जो मनुष्य धन के साथ विवेक और धर्म (विष्णु) को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करता है, उसके घर में भगवती महालक्ष्मी 'स्थिर लक्ष्मी' बनकर सदा के लिए वास करती हैं।
आइए इस लक्ष्मी पंचमी पर हम केवल बाह्य धन की ही कामना न करें, अपितु अपने विचारों, अपने संस्कारों और अपने आचरण को भी इतना उदार और पवित्र बनाएं कि साक्षात महालक्ष्मी हमारे अंतःकरण को अपना स्थाई निवास बना लें।
लक्ष्मी पंचमी किस तिथि को मनाई जाती है?
लक्ष्मी पंचमी प्रतिवर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वासंती नवरात्रि के पांचवें दिन मनाई जाती है।
लक्ष्मी पंचमी को 'श्री पंचमी' क्यों कहा जाता है?
'श्री' माता महालक्ष्मी का ही वेदोक्त नाम है; देवताओं द्वारा क्षीरसागर से लक्ष्मी जी को पुनः प्रसन्न कर अपना खोया वैभव प्राप्त करने के कारण इसे श्री पंचमी कहा जाता है।
लक्ष्मी पंचमी के दिन किन मंत्रों का पाठ सर्वाधिक फलदायी माना गया है?
इस दिन ऋग्वैदिक 'श्री सूक्त', आदि शंकराचार्य रचित 'कनकधारा स्तोत्र' और लक्ष्मी बीज मंत्र 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं नमः' का पाठ सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
व्यापार विस्तार के लिए लक्ष्मी पंचमी पर क्या विशेष उपाय करना चाहिए?
इस दिन स्फटिक श्रीयंत्र का केसर-दूध से अभिषेक कर 108 कमलगट्टे अर्पित करना और नए बही-खातों पर स्वस्तिक बनाकर पूजन करना अत्यंत लाभकारी है।
माता महालक्ष्मी को कौन सा नैवेद्य (भोग) सर्वाधिक प्रिय है?
माता महालक्ष्मी को गाय के दूध से बनी मखाने की खीर, ताजे लाल/गुलाबी कमल के पुष्प, बताशे, नारियल और सफेद मिष्ठान्न अत्यंत प्रिय हैं।
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