By पं. नरेंद्र शर्मा
दसमहाविद्याओं में द्वितीय शक्ति, हलाहल विष और मातृत्व का वात्सल्य, नील सरस्वती और वाक्-सिद्धि

सनातन शाक्त आगम, तांत्रिक संहिताओं और रुद्रयामल तंत्र में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की संधिकाल रात्रि को दसमहाविद्याओं की द्वितीय महाविद्या-भगवती माँ तारा-का प्राकट्य दिवस माना जाता है। काल गणना के अनुसार जहाँ दिन का मध्याह्न काल मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अवतरण का साक्षी बनता है, वहीं नवमी और दशमी तिथि का मध्यवर्ती संधिकाल रात्रि-साधना में परात्पर शक्ति तारा के आविर्भाव की पीठिका बनता है।
तारा का शाब्दिक अर्थ है-'तारयति इति तारा', अर्थात जो जीवात्मा को जन्म-मरण के भवसागर, दारुण अज्ञान, आर्थिक दरिद्रता, घोर विपत्तियों और हलाहल विष के संताप से 'तारती' (उद्धार करती) हैं। खगोलीय दृष्टिकोण से यह रात्रि अंतरिक्ष में अग्नि और जल तत्त्व के संक्रमण की वह वेला है जहाँ सूर्य देव मेष के उच्चांशों की ओर अग्रसर होते हैं और चंद्र कलाएं अपने पूर्णत्व के समीप पहुंचती हैं। इस रात्रि की गई अंतर्मुखी साधना सीधे मूलाधार से आज्ञा और सहस्रार चक्र तक प्राणिक ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी करती है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, आगमिक व तांत्रिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | चैत्र मास, शुक्ल पक्ष |
| तिथि | नवमी तिथि (संधिकाल रात्रि, नवमी-दशमी संचरण) |
| अधिष्ठात्री महाविद्या | भगवती माँ तारा (दसमहाविद्याओं में द्वितीय शक्ति) |
| भैरव विग्रह | भगवान अक्षोभ्य शिव (जिन्होंने हलाहल विष पिया) |
| मुख्य तात्विक स्वरूप | वाक्-तत्त्व, ज्ञान, मोक्ष, तारक शक्ति, आकाश व जल समन्वय |
| प्रमुख त्रिविध स्वरूप | उग्रतारा, नील सरस्वती, एकजटा |
| विशिष्ट साधना वेला | निशीथ काल (मध्यरात्रि: 11:45 PM से 12:45 AM) |
| बीज मंत्र | 'स्त्रीं' (Striim) एवं 'ह्रीं स्त्रीं हुं फट्' |
| संबंधित ज्योतिषीय ग्रह | देवगुरु बृहस्पति (ज्ञान, विवेक) एवं छाया ग्रह केतु (मोक्ष) |
| अभीष्ट फल | वाक्-सिद्धि, अपार मेधा, दारिद्र्य विमोचन, हलाहल संताप नाश |
तारा जयंती के इस दुर्लभ संधिकाल पर माँ भगवती का वात्सल्य और ज्ञान-आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से लेकर निशीथ काल तक कड़े आचार-सदाचार का पालन करना चाहिए।
कालिका पुराण, बृहन्नील तंत्र और स्वतंत्र तंत्र में माँ तारा के प्राकट्य का अत्यंत मार्मिक और गूढ़ आख्यान प्राप्त होता है।
सृष्टि के आरंभ में जब देवों और दानवों ने क्षीरसागर का मंथन किया, तो उसमें से चौदह रत्नों से पूर्व कालकूट (हलाहल) नामक अत्यंत भयानक विष प्रकट हुआ। उस विष की ज्वाला इतनी संहारक थी कि उसकी ऊष्मा से तीनों लोक जलने लगे। समस्त देवता, ऋषि और प्राणी त्राहि-त्राहि करते हुए देवाधिदेव महादेव शिव की शरण में पहुंचे।
संसार की रक्षा हेतु भगवान शिव ने उस संपूर्ण हलाहल विष को अपनी हथेली पर रखकर पी लिया और अपने कंठ में रोक लिया, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए। परंतु विष की तीव्र दाहक शक्ति इतनी प्रचंड थी कि भगवान शिव के शरीर का तापमान असहनीय रूप से बढ़ गया, उनकी चेतना लुप्त होने लगी और वे अचेत होकर पृथ्वी पर गिरने लगे।
| घटनाक्रम सोपान | पौराणिक एवं आगमिक विवरण | अंतर्निहित दार्शनिक रहस्य |
|---|---|---|
| हलाहल विष का प्राकट्य | समुद्र मंथन से संहारक विष का उगलना | संसार में अमृत से पूर्व वासनाओं का विष उभरता है |
| शिव का विषपान | लोक-कल्याण हेतु विष को कंठ में रोकना | त्याग और वैराग्य ही संताप को धारण कर सकता है |
| शिव की अचेतनावस्था | विष के तीव्र दाह से चेतना का क्षीण होना | जब ज्ञान-तत्त्व संताप से आक्रांत हो जाए |
| माँ तारा का प्राकट्य | आकाश से मातृत्व स्वरूपा भगवती का अवतरण | परब्रह्म की रक्षा केवल परा-प्रकृति ही कर सकती है |
| अमृतमयी दुग्धपान | तारा द्वारा शिव को शिशु बनाकर स्तनपान कराना | वात्सल्य और ममता ही हलाहल को शांत कर सकती है |
| अक्षोभ्य शिव की पदवी | शिव का पुनः स्वस्थ व शांत (अक्षोभ्य) होना | जो क्षोभ से रहित हो जाए, वही अक्षोभ्य है |
जब संपूर्ण ब्रह्मांड शिव को अचेत देखकर स्तब्ध रह गया, उसी समय आकाशगंगा से माँ भगवती 'तारा' साक्षात प्रकट हुईं। उन्होंने देखा कि उनके आराध्य और स्वामी शिव विष की ज्वाला में जल रहे हैं। माँ तारा ने तत्काल वात्सल्य रस से ओतप्रोत होकर भगवान शिव को एक अबोध शिशु के रूप में अपनी गोद में उठा लिया।
माँ भगवती ने शिव के मुख में अपना अमृतमयी स्तन दे दिया। देवी के स्तन के दिव्य दुग्ध का पान करते ही शिव के शरीर का समस्त दाह, विष-विकार और संताप क्षणभर में शांत हो गया। शिव पुनः चेतन हो उठे। भगवान शिव के मस्तक पर विद्यमान क्षोभ शांत हो जाने के कारण वे 'अक्षोभ्य' कहलाए और माँ तारा उनकी शाश्वत शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। इसी कारण माँ तारा के प्रत्येक विग्रह के मस्तक पर अक्षोभ्य शिव नाग के रूप में विराजमान रहते हैं।
आगम शास्त्रों में माँ तारा के तीन प्रमुख स्वरूपों का विशद विश्लेषण मिलता है, जो साधक की भिन्न-भिन्न चेतना स्तरों और आवश्यकताओं के अनुसार फल प्रदान करते हैं:
| स्वरूप का नाम | प्रमुख गुण व वर्ण | धारित आयुध / प्रतीक | साधक के जीवन में प्रतिफल |
|---|---|---|---|
| उग्रतारा | घोर उग्र, कृष्ण-नील | खड्ग, खप्पर, कैंची, कमल | असाध्य बाधा नाश, शत्रु शमन, प्राण-रक्षा |
| नील सरस्वती | सौम्य, नीलाभ कांति | वीणा, पोथी, अक्षमाला, वरद | वाक्-सिद्धि, अपार मेधा, परीक्षा व शास्त्र में विजय |
| एकजटा | ध्यानमग्न, धूसर-नील | एकल जटा, त्रिशूल, नरकपाल | चित्त एकाग्रता, अद्वैत सिद्धि, मोक्ष की प्राप्ति |
वैदिक परंपरा में जो स्थान श्वेतवर्णा माँ सरस्वती का है, तंत्र परंपरा में वही स्थान नीले वर्ण वाली 'माँ तारा' (नील सरस्वती) का है।
वाक्-सिद्धि का अर्थ केवल धाराप्रवाह बोलना नहीं है, अपितु इसका अर्थ है-व्यक्ति की जिह्वा से निकले प्रत्येक शब्द का ब्रह्मांडीय सत्य में रूपांतरित हो जाना। जब साधक तारा साधना द्वारा अपनी विशुद्ध नाड़ी (कंठ चक्र) को जाग्रत कर लेता है, तो उसकी वाणी में सम्मोहन, सत्य और सृष्टि को रचने का सामर्थ्य आ जाता है:
चैत्र शुक्ल नवमी की संधिकाल रात्रि में गृहस्थ साधकों को किसी भी प्रकार की उग्र तांत्रिक क्रिया से बचते हुए विशुद्ध सात्विक भाव से पूजन संपन्न करना चाहिए:
ॐ विष्णवे नमः। अद्य चैत्र मासे शुक्ल पक्षे नवमी-दशमी संधिकाल वेलायां, माँ तारा जयंती अवसरे, नील सरस्वती रूपेण मम वाक्-शुद्धि, मेधा-वृद्धि, दारिद्र्य-निवारणार्थं च सात्विक पूजनमहं करिष्ये।
ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्॥
अथवा अत्यंत सौम्य सरस्वती मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं असौः सदा क्लीं सौः ऐं नीलसरस्वत्यै नमः॥
माँ तारा जयंती का पावन पर्व मानव जीवन को यह अमर संदेश देता है कि जीवन में आने वाले संकट, अपमान और पीड़ा वास्तव में हलाहल विष के समान हैं; यदि हम उनसे घबराकर टूट जाएंगे, तो हमारा विनाश निश्चित है।
परंतु यदि हम भगवान शिव की भांति उस विष को धैर्यपूर्वक अपने कंठ में धारण कर लें और माँ तारा रूपी श्रद्धा व वात्सल्य की शरण लें, तो वही विष परा-चेतना के अमृत में बदल जाता है। माँ तारा केवल एक देवी नहीं हैं, वे उस आंतरिक तारक-शक्ति का प्रतीक हैं जो हर मनुष्य के भीतर घोर निराशा के अंधकार में आशा की एक दिव्य किरण बनकर उदित होती हैं।
माँ तारा जयंती किस तिथि को मनाई जाती है?
माँ तारा जयंती प्रतिवर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि (श्री राम नवमी) की संधिकाल रात्रि को मनाई जाती है।
माँ तारा को दसमहाविद्याओं में कौन सा स्थान प्राप्त है?
माँ तारा दसमहाविद्याओं में द्वितीय (दूसरी) महाविद्या के रूप में प्रतिष्ठित हैं; प्रथम महाविद्या माँ काली हैं।
भगवान शिव को 'अक्षोभ्य' क्यों कहा गया है?
समुद्र मंथन का हलाहल विष पीने के बाद जब माँ तारा ने शिवजी को अमृतमयी दुग्धपान कराया, तो उनका समस्त संताप और क्षोभ शांत हो गया, जिससे वे अक्षोभ्य कहलाए।
गृहस्थ साधकों को माँ तारा के किस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए?
गृहस्थों को सदैव माँ तारा के सौम्य रूप 'नील सरस्वती' की ही पूजा करनी चाहिए, जो ज्ञान, वाक्-सिद्धि और बुद्धि प्रदान करती हैं।
माँ तारा का मुख्य एकाक्षरी बीज मंत्र क्या है?
माँ तारा का मुख्य और सर्वसमर्थ एकाक्षरी बीज मंत्र 'स्त्रीं' (Striim) है।
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