By पं. नीलेश शर्मा
24वें तीर्थंकर का जन्म कल्याणक, 16 मांगलिक स्वप्न, पंच महाव्रत और अनेकांतवाद दर्शन

सनातन भारतीय कालगणना, जैन आगम ग्रंथों और श्रमण परंपरा में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर, अहिंसा के साक्षात अवतार भगवान महावीर स्वामी के 'जन्म कल्याणक' (Mahavira Janma Kalyanak) के रूप में संपूर्ण विश्व में अपार शांति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाता है। जैन दर्शन के अनुसार, किसी भी तीर्थंकर के जीवन में पांच अत्यंत पावन घटनाएं घटित होती हैं जिन्हें 'पंचकल्याणक' कहा जाता है-गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक। इनमें से चैत्र शुक्ल त्रयोदशी का दिन भगवान के जन्म कल्याणक का महापर्व है।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चैत्र शुक्ल त्रयोदशी वसंत ऋतु के चरमोत्कर्ष और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का वह संधिकाल है जब सूर्य देव अपनी परम उच्च राशि मेष के सन्निकट होते हैं और चंद्रमा उत्तराफाल्गुनी अथवा हस्त नक्षत्र में गोचर करता है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का स्वामी सूर्य है, जो आत्म-तेज, सत्य और त्याग का प्रतीक है। भगवान महावीर का जन्म ईसा पूर्व 599 (599 BCE) में त्रेता और द्वापर के उपरांत ऐतिहासिक कालखंड में बिहार के वैशाली गणराज्य के कुंडलपुर (कुंडलपुर/क्षत्रियकुंड) में इक्ष्वाकु वंश के राजा सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला (प्रियकारिणी) के आंगन में हुआ था। उनके जन्म लेते ही राज्य में धन, धान्य, शांति और वैभव की अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जिसके कारण उनका मूल नाम 'वर्धमान' (निरंतर बढ़ने वाला) रखा गया।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ऐतिहासिक व दार्शनिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | चैत्र मास, शुक्ल पक्ष |
| तिथि | त्रयोदशी तिथि (जन्म कल्याणक महापर्व) |
| ऐतिहासिक अवतार काल | 599 ईसा पूर्व (वीर निर्वाण संवत का आधार) |
| अवतार स्थल | कुंडलपुर / क्षत्रियकुंड (वैशाली गणराज्य, बिहार) |
| माता-पिता | महाराज सिद्धार्थ एवं महारानी त्रिशला (इक्ष्वाकु वंश) |
| नक्षत्र गोचर | उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र (सूर्य शासित, धर्म व त्याग का प्रतीक) |
| मुख्य उपाधियां | वर्धमान, महावीर, सन्मति, वीर, अतिवीर, जिन, केवली |
| मुख्य दार्शनिक स्तंभ | पंच महाव्रत (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) एवं अनेकांतवाद |
| प्रधान पारंपरिक अनुष्ठान | स्वर्ण-रजत कलशों से जन्माभिषेक, शांतिधारा, रथयात्रा |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | आत्म-शुद्धि, कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) का क्षय, केवलज्ञान की प्रेरणा |
भगवान महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक के इस पावन पर्व पर आत्म-कल्याण और प्राणी-मात्र के प्रति दया भाव जागृत करने हेतु प्रत्येक साधक को प्रातः काल से ही विशिष्ट आचार-संहिता का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
जैन श्वेतांबर और दिगंबर दोनों परंपराओं में तीर्थंकर के जन्म से पूर्व उनकी माता द्वारा देखे गए दिव्य स्वप्नों का अत्यंत विस्तृत और अलौकिक वर्णन मिलता है। दिगंबर परंपरा में 16 स्वप्न और श्वेतांबर परंपरा में 14 स्वप्न माने गए हैं। जब तीर्थंकर का जीव माता के गर्भ में प्रविष्ट होता है तब महारानी त्रिशला ने रात्रि के अंतिम प्रहर में निम्नलिखित 16 मांगलिक स्वप्न देखे:
| स्वप्न क्रम | स्वप्न का प्रतीक | अंतर्निहित आध्यात्मिक संकेत | वर्धमान के जीवन में प्रकटीकरण |
|---|---|---|---|
| १ से ४ | हाथी, बैल, सिंह, लक्ष्मी | महा-पराक्रम, धैर्य, निर्भयता, आत्मिक संपदा | 12 वर्षों का घोर मौन तप और सिंह जैसी निर्भीकता |
| ५ से ८ | माला, चंद्रमा, सूर्य, कलश | सुगंधित कीर्ति, परम शीतलता, केवलज्ञान, पूर्णत्व | सर्वज्ञता की प्राप्ति, समवसरण में दिव्य देशना |
| ९ से १२ | मत्स्य, सरोवर, समुद्र, सिंहासन | आनंद, निष्कलंकता, अनंत गुण, धर्म-चक्रवर्ती | कषायों का समूल नाश, धर्म-तीर्थ की स्थापना |
| १३ से १६ | विमान, पाताल, रत्न, अग्नि | देव-पूज्यता, त्रिलोक वंदनीय, सम्यक रत्नत्रय, कर्म-दहन | मोक्ष की प्राप्ति, पावापुरी से निर्वाण गमन |
प्रातः काल जब महाराज सिद्धार्थ ने राज-ज्योतिषियों और आचार्यों से इन स्वप्नों का फल पूछा, तो विद्वानों ने एक स्वर में उद्घोष किया: "हे राजन! आपके आंगन में कोई साधारण बालक नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड का तारणहार, तीनों लोकों का नाथ और 24वां तीर्थंकर अवतरित होने वाला है।"
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी की पावन बेला में वर्धमान का जन्म हुआ। स्वर्ग से देवराज इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर अयोध्या-कुंडलपुर पधारे और बालक को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर 1008 क्षीरसागर के कलशों से उनका जन्माभिषेक संपन्न किया।
राजकुमार वर्धमान का पालन-पोषण असीम ऐश्वर्य, दास-दासियों और राजसी वैभव के मध्य हुआ। उनका विवाह यशोदा नामक राजकुमारी से हुआ और उनकी प्रियदर्शना (अनवद्या) नाम की एक पुत्री हुई (दिगंबर परंपरा अनुसार वे बाल ब्रह्मचारी रहे)। परंतु सांसारिक सुख, आभूषण और राजमुकुट वर्धमान के वैरागी मन को बांध न सके।
30 वर्ष की आयु में जब उनके माता-पिता का देहावसान हो गया, तो उन्होंने अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से संन्यास की आज्ञा मांगी। बड़े भाई के अनुरोध पर उन्होंने दो वर्ष और प्रतीक्षा की और अंततः 30 वर्ष की अवस्था में राजवैभव, वस्त्र और आभूषणों का त्याग कर प्रव्रज्या (दीक्षा) अंगीकार कर ली।
संन्यास लेने के उपरांत अगले 12 वर्ष, 5 माह और 15 दिनों तक वर्धमान ने जो तपस्या की, वह मानवीय इतिहास में अतुलनीय है:
ऋजुबालिका नदी के तट पर, एक शाल वृक्ष के नीचे, गोदोहासन मुद्रा में ध्यानमग्न वर्धमान को वैशाख शुक्ल दशमी के दिन 'केवलज्ञान' (Absolute Omniscience) की प्राप्ति हुई। वे समस्त बंधनों, राग-द्वेष और अज्ञान को जीतकर 'जिन' (Conqueror) और 'महावीर' कहलाए।
भगवान महावीर ने केवल ज्ञान प्राप्त कर मौन रहना स्वीकार नहीं किया; उन्होंने समाज में फैले पाखंड, अंधविश्वास, पशु-बलि, छुआछूत और हिंसा के विरुद्ध एक अहिंसक वैचारिक क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने मानव जाति के कल्याण हेतु 'पंच महाव्रत' (साधुओं हेतु) और 'पंच अणुव्रत' (गृहस्थों हेतु) की आचार-संहिता प्रदान की:
अहिंसा परमो धर्मः।
| महाव्रत | दार्शनिक स्वरूप | व्यावहारिक आचरण (गृहस्थ हेतु) | आधुनिक वैश्विक प्रासंगिकता |
|---|---|---|---|
| अहिंसा | समस्त जीवों के प्रति समता भाव | शाकाहार, पर्यावरण रक्षा, जीवों पर दया | युद्धों की समाप्ति, जलवायु परिवर्तन से रक्षा |
| सत्य | वाणी की शुचिता, हित-मित-प्रिय | व्यापार में ईमानदारी, न्यायप्रियता | फेक न्यूज, धोखाधड़ी और अविश्वास का अंत |
| अस्तेय | अनाधिकृत वस्तु का पूर्ण त्याग | कर-चोरी न करना, उचित मूल्य लेना | भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों का निवारण |
| ब्रह्मचर्य | इंद्रिय संयम, वासना निग्रह | दांपत्य निष्ठा, चरित्र की शुचिता | सामाजिक अपराधों, विकृतियों व कलह का शमन |
| अपरिग्रह | इच्छाओं का परिसीमन | न्यूनतम साधनों में जीना, दानशीलता | आर्थिक असमानता, भूखमरी व संसाधनों की लूट का अंत |
भगवान महावीर का सबसे अनूठा बौद्धिक योगदान 'अनेकांतवाद' (Anekantavada) और 'स्याद्वाद' (Syadvada) है।
महावीर ने समझाया कि सत्य कभी एकांगी नहीं होता। जैसे छह अंधे व्यक्ति हाथी के अलग-अलग अंगों (पूंछ, कान, सूंड, पैर आदि) को छूकर उसे क्रमशः रस्सी, सूप, सांप और खंभा बताते हैं और आपस में लड़ने लगते हैं; ठीक उसी प्रकार संसार के विभिन्न धर्म, दर्शन और विचारधाराएं सत्य के केवल एक अंश को देखकर यह दावा करती हैं कि "केवल हम ही सही हैं और बाकी सब गलत हैं।"
यह दर्शन आधुनिक लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का सबसे सशक्त आधार है। यदि विश्व के राष्ट्र अनेकांतवाद को अपना लें, तो धार्मिक कट्टरता, वैचारिक आतंकवाद और युद्ध स्वतः समाप्त हो जाएंगे।
भगवान महावीर का सबसे प्रसिद्ध अमर सूत्र है: 'जीवेसु पमयं मा करेह' (समस्त जीवों पर दया करो) और 'जियो और जीने दो' (Live and Let Live)।
महावीर स्वामी ने उद्घोषित किया कि संसार का सबसे छोटा कीट भी अपने प्राणों से उतना ही प्रेम करता है जितना कि एक मनुष्य या चक्रवर्ती राजा। जिस प्रकार हमें अपने प्राण प्रिय हैं, उसी प्रकार प्रत्येक चींटी, मक्खी और पशु को भी अपना जीवन प्रिय है। अतः किसी भी जीव के जीने के अधिकार को छीनने का अधिकार किसी को नहीं है।
महावीर जयंती के अवसर पर प्रत्येक साधक प्राकृत भाषा के इस अमर क्षमा-मंत्र का अंतःकरण से उच्चारण करता है:
खामेमि सव्व जीवे सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्व भूएसु वेरं मज्झं न केणइ॥
अर्थात: "मैं संपूर्ण संसार के समस्त जीवों से क्षमा मांगता हूँ; संसार के समस्त जीव मुझे क्षमा करें। मेरी संपूर्ण प्राणियों के साथ आत्मीय मित्रता है; मेरा इस ब्रह्मांड में किसी के साथ भी कोई बैर या शत्रुता नहीं है।"
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन घर में और जिनालय में भगवान महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक को मनाने हेतु निम्नलिखित विधि का पालन किया जाता है:
भगवान महावीर जयंती का यह पावन पर्व हमें स्मरण कराता है कि महावीर कोई आकाश से टपके हुए ईश्वर नहीं थे; वे हमारे और आपके जैसे ही एक साधारण मनुष्य थे, जिन्होंने अपने पुरुषार्थ, तपस्या और आत्म-संयम से अपने भीतर के विकारों को जीतकर स्वयं को भगवान बना लिया।
जैन दर्शन कहता है: 'अप्पा सो परमप्पा'-प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की अनंत शक्ति विद्यमान है। यदि हम अपने भीतर के क्रोध, घमंड, छल-कपट और लालच रूपी आंतरिक शत्रुओं को जीत लें, तो हमारी अपनी आत्मा भी 'महावीर' बन सकती है।
आज जब संपूर्ण विश्व हिंसा, परमाणु युद्ध की धमकियों, पर्यावरण विनाश और मानसिक तनाव से त्रस्त है तब भगवान महावीर के विचार ही मानवता को विनाश की खाई से बचा सकते हैं। आइए इस चैत्र शुक्ल त्रयोदशी पर हम न केवल भगवान महावीर की जयकार करें, अपितु उनके पंचशील सिद्धांतों को अपनी जीवन-शैली में उतारें और पृथ्वी को शांति, प्रेम और अहिंसा का सुंदर स्वर्ग बनाएं।
भगवान महावीर स्वामी का जन्म किस तिथि और स्थान पर हुआ था?
भगवान महावीर का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को बिहार के वैशाली गणराज्य के कुंडलपुर (क्षत्रियकुंड) में हुआ था।
भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के कौन से तीर्थंकर थे?
भगवान महावीर जैन धर्म की 24 तीर्थंकरों की परंपरा में 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे; प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) थे।
भगवान महावीर के बचपन का नाम क्या था और उन्हें 'महावीर' क्यों कहा गया?
उनके बचपन का नाम 'वर्धमान' था; अपनी बाल्यावस्था में एक भयंकर विषैले नाग और एक मदमस्त हाथी को बिना किसी हिंसा के केवल अपने आत्मबल से शांत करने के कारण देवों ने उन्हें 'महावीर' नाम दिया।
भगवान महावीर द्वारा दिए गए पांच महाव्रत कौन-से हैं?
वे पांच महाव्रत हैं: अहिंसा (किसी को कष्ट न देना), सत्य (सत्य बोलना), अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इंद्रिय संयम) और अपरिग्रह (अनावश्यक संचय न करना)।
'मिच्छामि दुक्कडं' का क्या अर्थ है?
यह प्राकृत भाषा का पवित्र शब्द है, जिसका अर्थ है: "मेरे द्वारा मन, वचन अथवा कर्म से जाने-अनजाने में किए गए समस्त अपराध और भूलें निष्फल हों; मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ।"
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