By अपर्णा पाटनी
चित्रा नक्षत्र, मेष संक्रांति, उज्जैन मंगलनाथ भात पूजा, परिहार और 7 अचूक उपाय

वैदिक ज्योतिष, फलित संहिताओं, पराशर होरा शास्त्र और भृगु संहिता में 'मांगलिक दोष' (Manglik Dosha / भौम दोष) को वैवाहिक जीवन, रक्त विकार, दुर्घटनाओं और आंतरिक कलह का एक प्रमुख ज्योतिषीय कारण माना गया है। सनातन पंचांग के समस्त बारह मासों में से चैत्र मास को मांगलिक दोष के निवारण और मंगल ग्रह की उग्रता को शांत करने का सर्वोत्तम, अचूक और स्वर्णिम कालखंड माना गया है।
इसके पीछे अत्यंत गहन खगोलीय और तात्विक कारण विद्यमान हैं:
खगोलीय दृष्टि से जब नक्षत्र मंडल (चित्रा) और सौर मंडल (मेष संक्रांति) दोनों एक साथ मंगल के तत्त्वों को सक्रिय करते हैं, तो उस समय पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में मंगल की लाल रश्मियों (Infrared & Thermal Frequencies) का विशेष स्पंदन होता है। सामान्यतः यह समय मंगल की उग्रता को बढ़ा सकता है, परंतु तांत्रिक और शास्त्रीय नियमों के अनुसार "विषस्य विषमौषधम्" (विष ही विष की औषधि है)। जिस समय जो ग्रह अपनी चरम अवस्था में होता है, उसी समय की गई उसकी शांति साधना सर्वाधिक प्रभावशाली और स्थायी फल प्रदान करती है। अतः चैत्र मास में की गई मंगल शांति जातक के जीवन से विवाह में लगातार होने वाले विलंब, रक्त दोष, क्रोधाग्नि और भूमि-विवादों को समूल नष्ट कर देती है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व तात्विक विवरण |
|---|---|
| मास एवं सौर संक्रमण | चैत्र मास, चित्रा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा व मेष संक्रांति संधिकाल |
| अधिष्ठाता ग्रह | मंगल ग्रह (भौम, अंगारक, भूमिपुत्र, लोहितांग) |
| मुख्य तात्विक स्वरूप | अग्नि तत्त्व, पित्त प्रकृति, रक्त धातु, साहस व पराक्रम |
| प्रमुख ज्योतिर्लिंग व तीर्थ | अंगारेश्वर महादेव एवं मंगलनाथ मंदिर (उज्जैन, मध्य प्रदेश) |
| मांगलिक दोष के भाव | लग्न (1), चतुर्थ (4), सप्तम (7), अष्टम (8) एवं द्वादश (12) भाव |
| प्रमुख शांति सामग्रियां | लाल चंदन, रक्त चंदन का इत्र, लाल मसूर की दाल, लाल कनेर, तांबा, गुड़ |
| अधिष्ठाता देव | भगवान कार्तिकेय (स्कंद), महाबली हनुमान एवं ऋणमुक्तेश्वर शिव |
| अभीष्ट फल | मांगलिक दोष का पूर्ण परिहार, शीघ्र विवाह, दांपत्य सामंजस्य, रक्त शुद्धि |
चैत्र मास में मांगलिक दोष की शांति और मंगल देव की कृपा प्राप्त करने हेतु साधक अथवा जातक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय आचार नियमों का पालन करना चाहिए।
वैदिक ज्योतिष के प्रमाणिक ग्रंथ 'बृहत् पराशर होरा शास्त्र' और 'मुहूर्त चिंतामणि' में मांगलिक दोष का श्लोक इस प्रकार मिलता है:
लग्ने व्यये च पाताले यामित्रे चाष्टमे कुजे।
स्त्रीणां भर्तृविनाशाय भर्तॄणां स्त्रीविनाशनम्॥
अर्थात: जन्मकुंडली के लग्न (प्रथम), द्वादश (बारहवें), चतुर्थ (चौथे), सप्तम (सातवें) अथवा अष्टम (आठवें) भाव में यदि मंगल (कुज) स्थित हो, तो यह प्रबल मांगलिक दोष निर्मित करता है। दक्षिण भारतीय ज्योतिष (केरल पद्धति) में द्वितीय भाव के मंगल को भी दोष माना जाता है।
| मांगलिक भाव | दृष्टि संबंध | जीवन में दिखने वाले प्रत्यक्ष लक्षण | चैत्र मास में विशेष प्रभाव |
|---|---|---|---|
| प्रथम भाव (लग्न) | चतुर्थ, सप्तम, अष्टम भाव | अत्यधिक क्रोध, सिर में चोट, दांपत्य तनाव | स्वभाव में आक्रामकता चरम पर होती है |
| चतुर्थ भाव | सप्तम, दशम, एकादश भाव | पारिवारिक क्लेश, माता का खराब स्वास्थ्य | घर के भीतर असंतोष व अशांति |
| सप्तम भाव | दशम, लग्न, द्वितीय भाव | विवाह में अत्यधिक विलंब, अलगाव, कटु संवाद | विवाह वार्ता अचानक टूट जाना |
| अष्टम भाव | एकादश, द्वितीय, तृतीय भाव | जीवनसाथी को गंभीर रोग, अकाल भय, कर्ज | रक्त विकार व गुप्त चिंताएं |
| द्वादश भाव | तृतीय, षष्ठ, सप्तम भाव | शय्या सुख में कमी, अत्यधिक व्यय, अनिद्रा | व्यर्थ की भागदौड़ व अवसाद |
प्रत्येक कुंडली में मंगल के इन भावों में होने मात्र से व्यक्ति का जीवन नष्ट नहीं होता। शास्त्रों में मांगलिक दोष के अनेक 'परिहार' (Cancellations) बताए गए हैं, जिन्हें जाने बिना किसी को मांगलिक घोषित करना ज्योतिषीय अपराध है:
मध्य प्रदेश के पावन तीर्थ उज्जैन (अवंतिका नगरी) को संपूर्ण ब्रह्मांड का नाभि-केंद्र माना गया है। मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण के अवंतिका खंड के अनुसार, भगवान शिव और अंधकासुर के युद्ध के समय महादेव के ललाट से गिरी पसीने की बूंद से यहीं पर मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई थी।
मंगलनाथ मंदिर में मांगलिक दोष के निवारण हेतु 'भात पूजा' (पके हुए चावलों से अभिषेक) का विधान है, जो चैत्र मास में सर्वाधिक फलदायी होता है:
| तीर्थ व अनुष्ठान | तात्विक विश्लेषण | क्रिया विधि | प्राप्त होने वाला आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|---|
| मंगलनाथ (उज्जैन) | पृथ्वी का नाभि केंद्र, मंगल जन्मस्थली | 108 कलशों से पंचामृत, भात लेपन, कुमकुम अर्चन | मांगलिक दोष का समूल निवारण, शीघ्र विवाह |
| अंगारेश्वर महादेव | क्षिप्रा तट स्थित स्वयंभू शिव ज्योतिर्लिंग | लाल गुलाल, बिल्वपत्र, गन्ने के रस से रुद्राभिषेक | असाध्य कर्जों से मुक्ति, रक्त विकार शांति |
| कुंभ/अर्क विवाह | प्रतीकात्मक विवाह संस्कार | कन्या का घड़े (कुंभ) अथवा वर का मदार (अर्क) से विवाह | वैधव्य दोष व प्रथम विवाह विच्छेद का नाश |
यदि किसी कारणवश उज्जैन जाना संभव न हो, तो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के किसी भी मंगलवार अथवा मेष संक्रांति के दिन घर पर ही निम्नलिखित 7 अचूक शास्त्रीय उपाय संपन्न करने से मांगलिक दोष पूरी तरह शांत हो जाता है:
चैत्र के महीने में प्रतिदिन प्रातः तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें दो चुटकी लाल चंदन पाउडर, थोड़ी सी रोली, अक्षत और लाल कनेर का फूल डालें। पूर्व दिशा में मुख करके 'ॐ अं अंगारकाय नमः' बोलते हुए अर्घ्य दें।
मंगलवार के दिन 108 ताजे तुलसी पत्रों पर सफेद चंदन से 'श्री राम' लिखें। इसकी माला बनाकर हनुमान जी के गले में पहनाएं और उनके चरणों से थोड़ा सा सिंदूर लेकर अपने मस्तक पर लगाएं। हनुमान जी मंगल के परम नियंत्रक हैं।
चैत्र शुक्ल पक्ष के मंगलवार को सवा पाव अथवा सवा किलो साबुत लाल मसूर की दाल, एक तांबे का सिक्का और थोड़ा सा गुड़ लाल कपड़े में बांधकर किसी मंदिर के पुजारी अथवा किसी जरूरतमंद श्रमिक को दान करें।
यदि कुंडली में मंगल लग्नेश, पंचमेश अथवा नवमेश होकर शुभ भावों का स्वामी है परंतु केवल मांगलिक दोष बना रहा है, तो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के मंगलवार को सोने अथवा तांबे की अंगूठी में सवा सात रत्ती का इतालवी त्रिकोणीय लाल मूंगा (Red Coral) गंगाजल व कच्चे दूध से अभिमंत्रित कर दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में धारण करें। (नोट: यदि मंगल मारक या अष्टमेश हो, तो मूंगा न पहनें; केवल दान करें)।
स्कंद पुराण में वर्णित 'ऋणमोचन मंगल स्तोत्र' का नित्य 11 बार पाठ करने से मांगलिक दोष के कारण वैवाहिक वार्ता में आने वाले अड़ंगे तत्काल समाप्त हो जाते हैं।
मंगल के अग्नि-तत्त्व को शांत करने के लिए चंद्रमा का जल-तत्त्व सबसे शक्तिशाली है। चांदी चंद्रमा की धातु है। एक छोटा सा ठोस चांदी का चौकोर टुकड़ा सदैव अपनी जेब अथवा पर्स में रखने से मंगल की आक्रामकता नियंत्रित रहती है।
मंगलवार के दिन गेहूं के आटे में गुड़ मिलाकर तंदूर में मीठी रोटियां बनवाएं और उन्हें आवारा कुत्तों अथवा गौमाता को खिलाएं। यह उपाय लाल किताब का अत्यंत प्रामाणिक और चमत्कारी उपाय है।
मांगलिक दोष केवल एक खगोलीय घटना नहीं है बल्कि यह एक गहरा मनोवैज्ञानिक स्वभाव (Psychological Temperament) है।
मांगलिक जातक में ऊर्जा, जीवन-शक्ति, महत्वाकांक्षा और कार्य करने की क्षमता सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक होती है:
मांगलिक जातकों को अपने वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने हेतु दो सूत्र सदा याद रखने चाहिए: पहला-संवाद में धीरज रखना (Listen before reacting) और दूसरा-अपने साथी पर अपने विचार न थोपना। जब मंगल की यह ऊर्जा आध्यात्मिक साधना, खेलकूद अथवा करियर के निर्माण में लगा दी जाती है, तो वही मांगलिक जातक संसार का सबसे सफल और समर्पित जीवनसाथी सिद्ध होता है।
संस्कृत भाषा में मंगल का अर्थ है-'जो सबका मंगल (कल्याण) करे'।
मंगल ग्रह स्वभाव से पापी नहीं है; वह तो साक्षात ऊर्जा का पुंज है। ऊर्जा कभी अच्छी या बुरी नहीं होती; उसका उपयोग तय करता है कि वह क्या परिणाम देगी। जिस अग्नि से भोजन पकता है और जीवन चलता है, उसी अग्नि से यदि असावधानी बरती जाए तो घर भी जल सकता है।
मांगलिक दोष का वास्तविक निवारण पत्थरों, अंगूठियों और कर्मकांडों तक सीमित नहीं है; इसका वास्तविक निवारण अपने भीतर की क्रोधाग्नि को 'करुणा और प्रेम' में बदलने में है। जब मनुष्य अपने अहंकार को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर देता है और अपने पराक्रम को समाज की सेवा में लगा देता है, तो उसका समस्त भौम दोष भस्म हो जाता है और उसका जीवन सचमुच 'मंगलमय' बन जाता है।
मांगलिक दोष किन-किन भावों में मंगल के बैठने से बनता है?
जन्मकुंडली के 1, 4, 7, 8 अथवा 12वें भाव में मंगल के स्थित होने पर मांगलिक दोष (भौम दोष) का निर्माण होता है।
चैत्र मास को मांगलिक दोष निवारण के लिए स्वर्णिम काल क्यों कहा जाता है?
चैत्र मास का नामकरण मंगल के नक्षत्र 'चित्रा' पर हुआ है और इसी मास में सूर्य मंगल की उच्च राशि मेष में प्रवेश करते हैं; अतः मंगल की सक्रियता के कारण इस समय की गई शांति सर्वाधिक प्रभावशाली होती है।
मांगलिक दोष शांति के लिए कौन सा तीर्थ विश्व प्रसिद्ध है?
मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित 'मंगलनाथ मंदिर' को मंगल की जन्मस्थली माना गया है, जहाँ 'भात पूजा' (चावल अभिषेक) द्वारा इस दोष का अचूक निवारण किया जाता है।
क्या 28 वर्ष की आयु के बाद मांगलिक दोष स्वतः समाप्त हो जाता है?
28 वर्ष की आयु के पश्चात मंगल की प्राकृतिक आक्रामकता परिपक्वता में बदल जाती है, जिससे दोष का तीव्र प्रभाव काफी हद तक मंद और निष्प्रभावी हो जाता है।
मांगलिक दोष शांति का सबसे सरल दैनिक मंत्र कौन सा है?
"ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः" अथवा "ॐ भौमाय नमः" का नित्य 108 बार जप करना सबसे सरल और शक्तिशाली उपाय है।
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