मेष संक्रांति: सूर्य का अपनी उच्च राशि मेष में ऐतिहासिक प्रवेश और सौर नववर्ष का प्रारंभ

By पं. संजीव शर्मा

सूर्य का उच्च राशि प्रवेश, अखिल भारतीय सौर नववर्ष और घट-दान का विज्ञान

मेष संक्रांति: सौर नववर्ष, पूजा विधि, घट दान और 12 राशियां

सामग्री तालिका

पंचांग विवरण एवं मेष संक्रांति का खगोलीय संधिकाल

सनातन वैदिक कालगणना, सौर सिद्धांत और वेदांग ज्योतिष में 'मेष संक्रांति' (Mesha Sankranti) को संपूर्ण सौर वर्ष का सर्वाधिक तेजस्वी, निर्णायक और ऊर्जावान संधिकाल माना गया है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब ग्रहों के अधिपति, प्रत्यक्ष देव भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव गुरु की जल-तत्त्वीय राशि 'मीन' की अंतिम सीमा को पार कर मंगल की प्रथम अग्नि-तत्त्वीय राशि 'मेष' (Aries) में प्रविष्ट होते हैं तब इस महान संक्रमण को 'मेष संक्रांति' कहा जाता है।

खगोलीय दृष्टि से यह घटना सायन गणना के वसंत विषुव (Vernal Equinox) के सन्निकट और निरयण वैदिक प्रणाली के अनुसार सौर चक्र के नए वर्ष (Solar New Year) के प्रादुर्भाव का प्रतीक है। मेष भचक्र की सर्वप्रथम राशि है, जिसका प्रतीक 'मेष' (मेंढा) है जो अदम्य गतिशीलता, साहस, प्रारंभिक प्रेरणा और जीवन के नए अंकुरण को दर्शाता है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य देव मेष राशि के 10 अंश (डिग्री) पर 'परम उच्च' (Deeply Exalted) माने जाते हैं। सूर्य का यह गोचर पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में जीवन रस, प्रकाश, ऊष्मा और प्राणिक चेतना का ऐसा महा-संचार करता है जिससे प्रकृति की समस्त सुप्तावस्था समाप्त हो जाती है और नई फसलों के पकने का काल प्रारंभ होता है।

पंचांग व खगोलीय घटक शास्त्रीय, ज्योतिषीय व खगोलीय विवरण
सौर मास एवं संक्रमण मीन संक्रांति की समाप्ति एवं सौर वैशाख मास का आरंभ
राशि प्रवेश गुरु की मीन राशि (जल) से मंगल की मेष राशि (अग्नि) में
खगोलीय स्थिति सूर्य का राशि चक्र के 0° पर प्रवेश (निरयण सौर नववर्ष)
सूर्य का ज्योतिषीय बल उच्च राशि प्रवेश (10° पर सूर्य परम उच्च / Paramochha)
संक्रांति का पुण्यकाल संक्रांति काल से 16 घटी पूर्व तथा 16 घटी पश्चात का समय
प्रमुख अधिष्ठाता सत्ता भुवन भास्कर भगवान सूर्य नारायण, देवसेनापति मंगल
मुख्य तात्विक स्वरूप जल तत्त्व से अग्नि तत्त्व की ओर संक्रमण, आत्म-तेज प्रस्फुटन
अखिल भारतीय पर्व रूप बैसाखी (पंजाब), बिहू (असम), पोइला बैशाख (बंगाल), विषु (केरल), पुथंडु (तमिलनाडु)
मुख्य पारम्परिक भोग व दान सत्तू, गुड़, आम का पना, ताजे फल, जल से भरा घड़ा, जौ, पंखा
अभीष्ट आध्यात्मिक फल आत्म-बल संवर्धन, राज-सम्मान, पितृ-तृप्ति, खरमास मुक्ति

मेष संक्रांति के इस परम पावन पुण्यकाल पर सूर्य देव का अनुग्रह प्राप्त करने, शारीरिक व्याधियों से मुक्ति पाने और अपने भीतर के आत्म-तेज को जाग्रत करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से दो मुहूर्त पूर्व उठकर किसी पवित्र तीर्थ (गंगा, यमुना, नर्मदा आदि) में स्नान करना; अथवा सामान्य जल में गंगाजल, लाल चंदन और केसर मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के उपरांत तांबे के पात्र में शुद्ध जल, रोली, अक्षत, लाल पुष्प और थोड़ा सा गुड़ मिलाकर उदीयमान सूर्य नारायण को तीन बार अर्घ्य समर्पित करना।
  • अर्घ्य देते समय दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठाकर गिरती हुई जलधारा के मध्य से सूर्य देव के तेजस्वी बिंब का दर्शन करना।
  • भगवान सूर्य के सम्मुख बैठकर 'आदित्य हृदय स्तोत्र' (वाल्मीकि रामायणोक्त) अथवा 'गायत्री महामंत्र' का कम से कम 108 बार सस्वर पाठ करना।
  • संक्रांति के महापुण्य काल में किसी मिट्टी अथवा तांबे के घड़े में शीतल जल भरकर, उस पर खरबूजा, सत्तू, गुड़ और पंखा रखकर ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को दान करना।
  • इस दिन ग्रीष्म ऋतु के आगमन के सूचक के रूप में 'सत्तू और गुड़' का स्वयं भी सेवन करना और दूसरों को भी वितरित करना (इसे लोकभाषा में सतुआ संक्रांति भी कहा जाता है)।
  • तामसिक भोजन, मदिरा, प्याज, लहसुन, असत्य भाषण और अहंकार का सर्वथा त्याग करना।
  • सायंकाल के समय सूर्य देव के निमित्त शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित कर पितरों के नाम से जल का तर्पण करना।

अखिल भारतीय सौर नववर्ष: एक खगोलीय घटना, अनेक सांस्कृतिक रंग

मेष संक्रांति की सबसे अलौकिक विशेषता यह है कि यह किसी एक संप्रदाय अथवा प्रांत का पर्व नहीं है, अपितु यह संपूर्ण भारतवर्ष की भौगोलिक, कृषि और सांस्कृतिक एकता का साक्षात प्रमाण है। पूरे भारत में इस दिन फसलों की कटाई और सौर नववर्ष का स्वागत भिन्न-भिन्न नामों और अनूठी परंपराओं के साथ किया जाता है:

1. बैसाखी (पंजाब और हरियाणा)

उत्तर भारत, विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में, मेष संक्रांति को 'बैसाखी' के रूप में बड़े उल्लास से मनाया जाता है।

  • कृषि उत्सव: किसान अपनी पकी हुई सुनहरी गेहूं की फसल को देखकर झूम उठते हैं और भांगड़ा व गिद्दा नृत्य के साथ प्रकृति का आभार व्यक्त करते हैं।
  • खालसा पंथ की स्थापना: ऐतिहासिक दृष्टि से संवत 1756 (1699 ईस्वी) में इसी पावन दिन सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में 'खालसा पंथ' की स्थापना की थी और पंज प्यारों को अमृत छकाकर धर्म और राष्ट्र की रक्षा का अमर संकल्प लिया था।

2. बोहाग बिहू / रोंगाली बिहू (असम व पूर्वोत्तर भारत)

असम में मेष संक्रांति को 'बोहाग बिहू' अथवा 'रोंगाली बिहू' कहा जाता है। यह असमिया नववर्ष का प्रारंभ है। लोग नए वस्त्र धारण करते हैं, ढोल और पेपा (भैंस के सींग से बनी बांसुरी) की धुन पर बिहू नृत्य करते हैं तथा अपने बड़ों को पारंपरिक 'गमोसा' (अंगवस्त्र) भेंट कर आशीर्वाद लेते हैं।

3. पोइला बैशाख (पश्चिम बंगाल व त्रिपुरा)

पश्चिम बंगाल में यह दिन 'पोइला बैशाख' (नबबर्षो) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन व्यापारी अपने पुराने बही-खातों को बंद कर नए लाल रंग के खाता-पुस्तकों की 'हालखाता' पूजा करते हैं। लोग माँ काली और भगवान गणेश की पूजा कर एक-दूसरे को 'शुभ नबबर्षो' की शुभकामनाएं देते हैं।

4. विषु (केरल)

केरल में मेष संक्रांति को 'विषु' (Vishu) कहा जाता है।

  • विषुकणि दर्शन: इस दिन की सबसे दिव्य परंपरा 'विषुकणि' (Vishu Kani) है। गृहणियां एक दिन पूर्व रात्रि में ही कांसे के बड़े पात्र (उरुली) में भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति के सम्मुख खीरा, पीला कणीकोन्ना फूल (Cassia fistula), चावल, सोना, चांदी के सिक्के, सुपारी और शीशा सजाकर रखती हैं। प्रातः काल आंखें बंद करके सबसे पहले इसी पावन दृश्य का दर्शन किया जाता है ताकि पूरा वर्ष समृद्ध रहे।
  • विषु कैनीट्टम: घर के वरिष्ठ सदस्य छोटों को शुभ शगुन के रूप में धन (सिक्के) बांटते हैं जिसे 'विषु कैनीट्टम' कहा जाता है।

5. पुथंडु (तमिलनाडु)

तमिलनाडु में यह दिन 'पुथंडु' अथवा 'वरुष पिरप्पु' (तमिल नववर्ष) के रूप में मनाया जाता है। लोग अपने घरों के प्रवेश द्वार पर रंगोली (कोलम) बनाते हैं और 'मंगा पचड़ी' नामक विशेष व्यंजन बनाते हैं जिसमें नीम के फूल (कड़वा), गुड़ (मीठा), कच्चा आम (खट्टा) और लाल मिर्च (तीखा) मिलाया जाता है, जो यह सिखाता है कि जीवन में सुख-दुख के सभी स्वादों को समभाव से स्वीकार करना चाहिए।

राज्य / क्षेत्र पर्व का स्थानीय नाम मुख्य सांस्कृतिक परंपरा विशेष पारंपरिक आहार
पंजाब व हरियाणा बैसाखी भांगड़ा नृत्य, खालसा सृजना दिवस, गुरुद्वारा दर्शन मक्के की रोटी, सरसों का साग, मीठे पीले चावल
असम बोहाग बिहू (रोंगाली) बिहू नृत्य, गमोसा अर्पण, गो-पूजन पीठा, लारू (तिल के लड्डू), दही-चिवड़ा
पश्चिम बंगाल पोइला बैशाख हालखाता पूजन, काली घाट दर्शन, प्रभात फेरी रसगुल्ला, संदेश, लुची, छोलार दाल
केरल विषु विषुकणि दर्शन, विषु कैनीट्टम (सिक्का दान) विषु कांजी, थोरन, पायसम
तमिलनाडु पुथंडु कोलम सज्जा, पंचांग पठन, मंदिर दर्शन मंगा पचड़ी (षड्रस युक्त विशेष व्यंजन)
बिहार व पूर्वी उप्र सतुआ संक्रांति (जुड़शीतल) घड़े का जल दान, तुलसी पर घड़ा बांधना, सत्तू दान चना सत्तू, गुड़, कच्चे आम का पना

सूर्य का मेष राशि में उच्चत्व: 10 डिग्री का ज्योतिषीय विज्ञान

वैदिक ज्योतिष के आधारभूत ग्रंथ 'बृहत् पराशर होरा शास्त्र' और 'फलदीपिका' के अनुसार सूर्य देव को नवग्रहों की आत्मा (आत्मकारक) और जगत की आंख (जगतचक्षु) माना गया है।

सूर्य का विभिन्न राशियों में प्रभाव भिन्न होता है, परंतु मेष राशि में उनका संचरण सर्वश्रेष्ठ माना जाता है:

  • अग्नि तत्त्व का सामंजस्य: सूर्य साक्षात अग्नि तत्त्व के अधिष्ठाता हैं और मेष भी चर-अग्नि (Cardinal Fire) राशि है। जब अग्नि का स्वामी अग्नि की ही राशि में बैठता है, तो उसके भीतर की समस्त सृजनात्मक ऊर्जा पूर्ण शक्ति के साथ प्रस्फुटित होती है।
  • 10 अंश पर परम उच्च (Deep Exaltation): मेष राशि के 0° से 13°20' तक का क्षेत्र 'अश्विनी नक्षत्र' के अधीन होता है, जिसके अधिष्ठाता देव-चिकित्सक 'अश्विनी कुमार' हैं और ग्रह स्वामी केतु हैं। जब सूर्य मेष राशि के ठीक 10वें अंश पर पहुंचते हैं, तो वे अपनी सर्वोच्च शक्ति (Paramochha) को प्राप्त करते हैं। इस बिंदु पर सूर्य की किरणें पृथ्वी के समस्त प्राणियों में रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity), आत्मबल और ओज का संचार करती हैं।
  • पिता और राज-सत्ता का कारक: ज्योतिष में सूर्य पिता, पूर्वज, आत्मा, आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और राज-सम्मान (Government/Authority) के कारक हैं। जिन जातकों की कुंडली में सूर्य दुर्बल, नीच (तुला राशि में) अथवा राहु-केतु से पीड़ित होते हैं, उनके लिए मेष संक्रांति का दिन सूर्य की आराधना कर अपने आत्म-सम्मान और करियर को पुनर्जीवित करने का सर्वोत्तम अवसर होता है।

संक्रांति स्नान, महापुण्य काल और घट-दान का तात्विक विज्ञान

संक्रांति के समय सूर्य के राशि परिवर्तन के काल को अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। इस समय किए गए स्नान और दान का फल सामान्य दिनों की तुलना में कोटि गुना अधिक बताया गया है।

महापुण्य काल का गणितीय नियम

ज्योतिषीय संहिताओं के अनुसार, जिस क्षण सूर्य मेष राशि के शून्य अंश में प्रवेश करते हैं, उस क्षण से पूर्व की 16 घटी (लगभग 6 घंटे 24 मिनट) और पश्चात की 16 घटी का समय 'पुण्यकाल' कहलाता है। इसमें भी संक्रांति के ठीक निकट की 3-3 घटी का समय 'महापुण्य काल' माना जाता है। इस अवधि में किया गया जप और दान सीधे पितृलोक और सूर्यलोक को तृप्त करता है।

सतुआ संक्रांति और वैशाख घट-दान का विज्ञान

उत्तर भारत और बिहार में मेष संक्रांति को 'सतुआ संक्रांति' कहा जाता है। इस दिन किए जाने वाले दान का अत्यंत गहरा वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक आधार है:

  • सत्तू (Roasted Gram Flour): भुने हुए चने और जौ का सत्तू आयुर्वेद में परम पित्त-शामक, शीतल और तुरंत ऊर्जा देने वाला आहार माना गया है। मेष संक्रांति से ग्रीष्म ऋतु का प्रचंड ताप आरंभ होता है; अतः इस दिन सत्तू का सेवन और दान यह सुनिश्चित करता है कि शरीर में निर्जलीकरण (Dehydration) और लू का प्रभाव न हो।
  • घट-दान (मिट्टी का जल से भरा घड़ा): संक्रांति के पुण्यकाल में किसी कोरे मिट्टी के घड़े में शुद्ध शीतल जल भरकर, उस पर तांबे का सिक्का, खरबूजा और पंखा रखकर दान करने का विधान है। स्कंद पुराण में कहा गया है कि जो मनुष्य वैशाख और संक्रांति के समय प्यासे प्राणियों हेतु जल से भरे घड़े का दान करता है, उसके पितृ तृप्त होकर उसे दीर्घायु और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
दान की सामग्री आयुर्वेदिक व भौतिक स्वरूप सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रभाव अभीष्ट फल
मिट्टी का जल-घड़ा प्राकृतिक रूप से शीतल, खनिज-युक्त जल जल तत्त्व की शुद्धि, तृष्णा का शमन पितृ-दोष मुक्ति, अक्षय पुण्य, शीतलता
सत्तू व गुड़ सुपाच्य, प्रोटीन व इलेक्ट्रोलाइट्स युक्त जठराग्नि का संतुलन, पित्त-दोष शमन निरोगी काया, लू से रक्षा, जीवनी शक्ति
हाथ का पंखा (व्यजन) खस, ताड़ अथवा बांस से निर्मित पंखा वायु तत्त्व का संचरण, ताप निवारण जीवन की तपन का नाश, मानसिक शांति
मौसमी फल (खरबूजा/आम) जल व शर्करा से भरपूर रसदार फल शरीर की धातुओं का पोषण, तृप्ति संचित पापों का क्षय, पारिवारिक सुख

मेष संक्रांति की सम्पूर्ण शास्त्रीय पूजन विधि

मेष संक्रांति के पावन दिन घर में सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और राज-कृपा प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित क्रमबद्ध विधि से पूजन संपन्न करें:

  1. प्रातः कालीन शुद्धि एवं संकल्प: सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पावन नदी अथवा घर में गंगाजल मिले जल से स्नान करें। स्वच्छ लाल, पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, तांबे का सिक्का, लाल चंदन, अक्षत और तिल लेकर संकल्प करें:

    ॐ सूर्याय नमः। अद्य मेष संक्रांति पुण्यकाले, मम सकल कायिक-वाचिक-मानसिक पाप क्षयार्थं, सूर्य-प्रीतिकामनया, आत्म-बल समृद्धयर्थं संक्रांति स्नान-दान-पूजनमहं करिष्ये।

  2. सूर्य अर्घ्य समर्पण: तांबे के पात्र में जल भरें। उसमें थोड़ा सा लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत, लाल पुष्प और थोड़ा सा गुड़ डालें। पूर्व दिशा की ओर मुख करके दोनों भुजाओं को ऊपर उठाकर निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हुए तीन बार जल अर्पित करें:

    एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
    अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
    ॐ घृणिः सूर्याय नमः। ॐ आदित्याय नमः।

  3. सूर्य यंत्र व विग्रह पूजन: पूजा वेदी पर लाल वस्त्र बिछाएं। उस पर तांबे का सूर्य यंत्र अथवा भगवान सूर्यनारायण का चित्र स्थापित करें। यंत्र पर लाल चंदन का लेप लगाएं और लाल कनेर या गुलाब के पुष्प अर्पित करें। शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  4. आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ: घी के दीपक के सम्मुख बैठकर वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में अगस्त्य ऋषि द्वारा भगवान श्री राम को दिए गए 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का कम से कम 3 बार पाठ करें। यह स्तोत्र असाध्य रोगों को नष्ट करने और जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाने में अचूक है।
  5. सतुआ व घट पूजन: दान के लिए रखे गए मिट्टी के घड़े पर रोली से स्वस्तिक बनाएं, उस पर मौली बांधें और कंठ तक शीतल जल भरें। घड़े के मुख पर खरबूजा, सत्तू की पोटली और पंखा रखें। भगवान सूर्य को इनका नैवेद्य अर्पित करें।
  6. दान समर्पण: पूजन के उपरांत इस समस्त सामग्री को किसी योग्य ब्राह्मण, संन्यासी अथवा निर्धन व्यक्ति को ससम्मान दान करें।
  7. प्रसाद ग्रहण: परिवार के सभी सदस्य सूर्य नारायण को भोग लगाए गए सत्तू, गुड़ और आम के पने का सात्विक प्रसाद ग्रहण करें।

सभी 12 राशियों पर मेष संक्रांति का प्रभाव

सूर्य का मेष राशि में गोचर प्रत्येक राशि के जातकों के जीवन में विशिष्ट ऊर्जा और परिवर्तन लेकर आता है:

  • मेष राशि (प्रथम भाव): आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि, मान-सम्मान की प्राप्ति, परंतु स्वभाव में क्रोध और उग्रता से बचना होगा।
  • वृषभ राशि (द्वादश भाव): विदेश यात्रा के योग, धार्मिक कार्यों पर व्यय, नेत्रों और अनिद्रा के प्रति सतर्क रहें।
  • मिथुन राशि (एकादश भाव): आय के नवीन स्रोत, व्यापार में भारी लाभ, बड़े भाइयों और वरिष्ठ अधिकारियों से पूर्ण सहयोग।
  • कर्क राशि (दशम भाव): कार्यक्षेत्र में पदोन्नति, प्रशासनिक कार्यों में बड़ी सफलता, पिता के स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
  • सिंह राशि (नवम भाव): भाग्य का पूर्ण साथ, तीर्थ यात्राओं के योग, आध्यात्मिक साधना में उन्नति और यश-वृद्धि।
  • कन्या राशि (अष्टम भाव): स्वास्थ्य के प्रति अत्यंत सतर्कता की आवश्यकता, अचानक धन लाभ अथवा पैतृक संपत्ति के योग।
  • तुला राशि (सप्तम भाव): दांपत्य जीवन में अहं के टकराव से बचें, व्यापारिक साझेदारों के साथ तालमेल बनाए रखें।
  • वृश्चिक राशि (षष्ठ भाव): शत्रुओं और विरोधियों पर प्रचंड विजय, मुकदमों में राहत, पुरानी बीमारियों से मुक्ति।
  • धनु राशि (पंचम भाव): बुद्धि और निर्णय क्षमता का तीव्र विकास, संतान पक्ष से शुभ समाचार, उच्च शिक्षा में सफलता।
  • मकर राशि (चतुर्थ भाव): भूमि, भवन और वाहन सुख में वृद्धि, माता के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, कार्यस्थल पर प्रभाव।
  • कुंभ राशि (तृतीय भाव): पराक्रम और साहस में वृद्धि, छोटे भाई-बहनों का सहयोग, छोटी यात्राएं लाभकारी सिद्ध होंगी।
  • मीन राशि (द्वितीय भाव): संचित धन में वृद्धि, वाणी में प्रभाव और ओज, पारिवारिक कार्यों में नेतृत्व की भूमिका।

दार्शनिक संदेश: अज्ञान के अंधकार से आत्म-प्रकाश की ओर

मेष संक्रांति हमें सनातन जीवन दर्शन का यह अमर पाठ पढ़ाती है कि जब आत्मा (सूर्य) अपने दुर्बल विचारों को त्यागकर अपने उच्च स्वरूप (मेष) में प्रतिष्ठित होती है, तभी जीवन में वास्तविक प्रकाश का उदय होता है।

मीन राशि की शून्यता और जल-तत्त्व का त्याग कर मेष की अग्नि में प्रविष्ट होना यह दर्शाता है कि मनुष्य को अतीत के अवसाद, आलस्य और संशयों से बाहर निकलकर नव-सृजन के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए। सूर्य बिना किसी भेदभाव के संपूर्ण चराचर जगत को अपना प्रकाश और जीवन-ऊर्जा बांटते हैं।

मेष संक्रांति का यह पावन पर्व हमें स्मरण कराता है कि हम भी अपने भीतर के अज्ञान, संकीर्णता और हीनभावना को भस्म कर सूर्य के समान तेजस्वी, परोपकारी और कर्तव्यनिष्ठ बनें।


FAQ

मेष संक्रांति कब घटित होती है?
मेष संक्रांति प्रतिवर्ष अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 13 अथवा 14 अप्रैल के आसपास घटित होती है, जब सूर्य देव मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करते हैं।

सूर्य मेष राशि में कितने अंश पर परम उच्च के होते हैं?
वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य देव मेष राशि में ठीक 10 अंश (10 Degrees) पर परम उच्च (Deeply Exalted) माने जाते हैं।

मेष संक्रांति को सौर नववर्ष क्यों कहा जाता है?
राशि चक्र की प्रथम राशि मेष होने के कारण जब सूर्य इस राशि में प्रवेश करते हैं, तो सौर कैलेंडर (निरयण गणना) के नए वर्ष का शुभारंभ होता है, इसलिए इसे सौर नववर्ष कहा जाता है।

मेष संक्रांति के दिन मिट्टी के घड़े और सत्तू का दान क्यों किया जाता है?
यह ग्रीष्म ऋतु के आगमन का दिन है; मिट्टी का घड़ा प्यास बुझाता है और सत्तू शरीर को शीतलता व पोषण देता है, अतः इनका दान स्वास्थ्य और पितृ-तृप्ति की दृष्टि से सर्वोत्तम माना गया है।

पंजाब में मेष संक्रांति को बैसाखी के रूप में क्यों मनाया जाता है?
पंजाब में इस दिन पकी हुई गेहूं की फसल का उत्सव मनाया जाता है और इसी पावन दिन संवत 1756 (1699 ईस्वी) में गुरु गोविंद सिंह जी ने 'खालसा पंथ' की स्थापना की थी।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

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