रामचरितमानस और चैत्र नवमी: गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी के अमर महाकाव्य की शुरुआत

By पं. सुव्रत शर्मा

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी महाकाव्य की शुरुआत, 7 सोपान और नवाह्न पारायण

रामचरितमानस और चैत्र नवमी: इतिहास, सात कांड और नवाह्न पारायण

पंचांग विवरण एवं संवत 1631 की ऐतिहासिक खगोलीय स्थिति

सनातन धर्म और भारतीय वांग्मय के इतिहास में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि केवल मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अवतरण का ही दिन नहीं है, अपितु यह विश्व-साहित्य के अप्रतिम ग्रंथ 'श्री रामचरितमानस' के प्रस्फुटन का पावन संधिकाल भी है। विक्रम संवत 1631 (ईस्वी सन् 1574) में ठीक इसी तिथि को गोस्वामी तुलसीदास जी ने अयोध्या जी में सरयू के पावन तट पर इस अमर महाकाव्य का लेखन प्रारंभ किया था।

वैदिक ज्योतिष और पंचांग गणना के अनुसार उस दिन वही दुर्लभ खगोलीय संयोजन उपस्थित था जो त्रेतायुग में भगवान श्री राम के प्राकट्य के समय बना था। गोस्वामी जी ने स्वयं मानस के बालकांड में उस विशिष्ट दिन के पंचांगीय घटकों को लिपिबद्ध किया है:

नौमी भौम वार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं॥

अर्थात: चैत्र (मधु) मास, शुक्ल पक्ष, नवमी तिथि और मंगलवार (भौमवार) के दिन अयोध्यापुरी में इस पावन चरित का प्राकट्य हुआ। यह वही तिथि है जिसे वेद श्री राम के जन्म का दिन गाते हैं और इस दिन ब्रह्मांड के समस्त तीर्थ अयोध्या में उपस्थित होकर उस काव्य-यज्ञ के साक्षी बने थे।

पंचांग व ऐतिहासिक घटक शास्त्रीय, ज्योतिर्विज्ञान व साहित्यिक विवरण
मास एवं पक्ष चैत्र मास, शुक्ल पक्ष
तिथि एवं वार नवमी तिथि, भौमवार (मंगलवार)
ऐतिहासिक संवत्सर विक्रम संवत 1631 (1574 ईस्वी)
लेखन प्रारंभ स्थल अयोध्या जी, श्री राम जन्मभूमि परिसर / सरयू तट
मुख्य रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी (महर्षि वाल्मीकि के कलियुगी अवतार)
काव्य भाषा एवं छंद साहित्यिक अवधी (दोहा, चौपाई, सोरठा, हरिगीतिका, छन्द)
रचना काल की अवधि 2 वर्ष, 7 माह, 26 दिन (संवत 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को पूर्ण)
मुख्य दार्शनिक आधार अद्वैत वेदांत, विशिष्टाद्वैत, भक्ति योग और मर्यादा का समन्वय
अभीष्ट आध्यात्मिक फल कलि-मल नाश, राम-भक्ति की प्राप्ति, पारिवारिक मर्यादा और मोक्ष

इस पावन स्मृति दिवस पर रामचरितमानस के स्वाध्याय और पारायण का संकल्प लेने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय आचार नियमों का पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व शैया का त्याग कर सरयू अथवा गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करना।
  • स्वच्छ पीत वर्ण (पीले रंग) के वस्त्र धारण कर पूर्वाभिमुख बैठकर भगवान श्री राम, माता जानकी और तुलसीदास जी का ध्यान करना।
  • गृह मंदिर में श्री रामचरितमानस की पोथी को लाल अथवा पीले रेशमी वस्त्र पर विराजमान कर अक्षत, पुष्प, चंदन और धूप-दीप से अर्चन करना।
  • मानस के बालकांड में वर्णित मंगलाचरण "वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि..." का सस्वर पाठ करना।
  • मानस के नवाह्न पारायण (नौ दिवसीय पाठ) अथवा अखण्ड रामायण पाठ का विधिपूर्वक संकल्प लेना।
  • दिनभर 'श्री राम जय राम जय जय राम' अथवा 'सियाराम मय सब जग जानी' की भावना से अंतःकरण को शांत रखना।
  • सायंकाल के समय रामचरितमानस की आरती उतारना और निर्धनों में मीठे फल व हलवा वितरित करना।

गोस्वामी तुलसीदास जी की साधना और हनुमान जी की कृपा

श्री रामचरितमानस की रचना कोई साधारण साहित्यिक प्रयास नहीं था, अपितु यह वर्षों की कठोर तपस्या, वैराग्य और साक्षात ईश्वरीय कृपा का परिणाम था। गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म संवत 1554 में बांदा जिले के राजापुर में हुआ था। जन्म लेते ही उनके मुख से 'राम' नाम निकला, जिससे उनका नाम 'रामबोला' पड़ा।

माता-पिता द्वारा त्याग दिए जाने के उपरांत स्वामी नरहरिदास ने उन्हें संरक्षण दिया और उन्हें 'रामकथा' की दीक्षा दी:

मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥

कालांतर में पत्नी रत्नावली के एक उपदेश-"अस्थि चर्म मय देह यह, तासों ऐसी प्रीति। नेकु जो होती राम महं, तो नहिं भव-भीति॥"-ने तुलसीदास जी के भीतर वैराग्य की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। वे गृह त्याग कर काशी आ गए और कठोर साधना में लीन हो गए।

प्रेत, हनुमान जी और भगवान श्री राम के दर्शन

काशी में गंगा पार शौच के पश्चात जलपात्र का बचा हुआ जल वे एक सूखे बबूल के वृक्ष की जड़ में डाल दिया करते थे। उस जल से तृप्त होकर एक प्रेत प्रकट हुआ। तुलसीदास जी ने उससे भगवान श्री राम के दर्शन कराने की प्रार्थना की। प्रेत ने कहा: "यह मेरे सामर्थ्य में नहीं है, परंतु मैं तुम्हें श्री राम के परम भक्त हनुमान जी का पता बता सकता हूं। कर्णघंटा के समीप कुष्ठ रोगी के रूप में जो वृद्ध सबसे अंत में कथा सुनने आता है और सबसे पहले जाता है, वही साक्षात पवनपुत्र हैं।"

तुलसीदास जी ने उस कुष्ठरोगी के चरण पकड़ लिए। हनुमान जी ने अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उन्हें चित्रकूट जाने का आदेश दिया:

चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर।
तुलसिदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥

संवत 1607 की मौनी अमावस्या को चित्रकूट के मंदाकिनी तट पर तुलसीदास जी को साक्षात भगवान श्री राम और लक्ष्मण के दर्शन हुए। हनुमान जी ने तोते का रूप धरकर यह दोहा पढ़ा ताकि तुलसीदास जी प्रभु को पहचान सकें। इस साक्षात साक्षात्कार के उपरांत हनुमान जी की ही आज्ञा से तुलसीदास जी अयोध्या पधारे और संवत 1631 की चैत्र शुक्ल नवमी को रामचरितमानस का लेखन प्रारंभ किया।

साधना सोपान ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक घटना काव्य-रचना पर प्रभाव
सूकरखेत में दीक्षा गुरु नरहरिदास द्वारा रामकथा का श्रवण मूल बीज और कथा-प्रवाह की समझ
काशी में वैराग्य पत्नी रत्नावली के उपदेश से गृह-त्याग सांसारिक वासनाओं का राम-प्रेम में रूपांतरण
हनुमान जी की कृपा कर्णघंटा पर साक्षात मारुति के दर्शन भक्ति की पराकाष्ठा और काव्य का सूक्ष्म मार्गदर्शन
चित्रकूट में साक्षात्कार मंदाकिनी तट पर प्रभु श्री राम का तिलक प्रत्यक्ष ईश्वरीय अनुभूति और काव्य में जीवंतता
भगवान शिव की आज्ञा काशी के विश्वनाथ मंदिर में स्वप्नादेश लोकभाषा (अवधी) में ग्रंथ लिखने की दैवीय अनुमति

संस्कृत से अवधी की क्रांति: लोकभाषा में वेदों का अवतरण

16वीं शताब्दी में भारत का सामाजिक और धार्मिक परिदृश्य अत्यंत जटिल था। एक ओर विदेशी आक्रांताओं के कारण सांस्कृतिक पहचान संकट में थी, तो दूसरी ओर समाज जाति-पांति के संकीर्ण बंधनों और संस्कृत के पंडितों के भाषाई एकाधिकार में जकड़ा हुआ था। उस समय आध्यात्मिक ज्ञान केवल संस्कृत भाषा में आबद्ध था, जिसे सामान्य जन, महिलाएं और समाज के वंचित वर्ग पढ़ या समझ नहीं सकते थे।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब 'अवधी' (जन-सामान्य की बोलचाल की भाषा) में रामकथा लिखना प्रारंभ किया, तो काशी के रूढ़िवादी विद्वानों ने उनका घोर विरोध किया। उनका तर्क था कि देवभाषा संस्कृत के पावन ज्ञान को एक प्राकृत लोकभाषा में लिखकर तुलसीदास जी ने वेदों का अपमान किया है।

परंतु तुलसीदास जी का दृष्टिकोण स्पष्ट था:

का भाषा का संसकृत प्रेम चाहि पाचीन।
काम जो आवै कामरी का लै करै कुमीन॥

अर्थात: भाषा चाहे संस्कृत हो या अवधी, मुख्य वस्तु तो ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम है। जाड़े में जब एक साधारण कंबल (कांबरी) ठंड दूर कर सकता है, तो बहुमूल्य रेशमी वस्त्र (कुमीन) की क्या आवश्यकता?

काशी विश्वनाथ की मुहर: 'सत्यं शिवं सुंदरम्'

विद्वानों ने रामचरितमानस की परीक्षा लेने के लिए काशी के श्री विश्वनाथ मंदिर में एक कठोर निर्णय लिया। रात्रि के समय गर्भगृह में सबसे नीचे तुलसीदास जी की मानस की प्रति रखी गई, उसके ऊपर पुराण, उसके ऊपर उपनिषद और सबसे ऊपर चारों वेद रखे गए। मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए।

अगले दिन प्रातः काल जब कपाट खोले गए, तो एक अलौकिक चमत्कार हुआ:

  • तुलसीदास जी की रामचरितमानस सबसे ऊपर विराजमान थी और वेद उसके नीचे थे!
  • ग्रंथ के मुखपृष्ठ पर साक्षात देवाधिदेव महादेव शिव के हस्ताक्षर अंकित थे: 'सत्यं शिवं सुंदरम्' और साथ में भगवान शिव की साक्षी मुहर लगी हुई थी।

भगवान शिव के इस प्रत्यक्ष समर्थन ने समस्त संशयों को शांत कर दिया। तुलसीदास जी ने वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, भुशुंडि रामायण और उपनिषदों के समस्त गूढ़ ज्ञान को सात सोपानों (कांडों)-बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड-में विभाजित कर जन-जन की जिह्वा पर स्थापित कर दिया।


रामचरितमानस के सात सोपान: चेतना की सात भूमिकाएं

रामचरितमानस के सात कांड केवल सात ऐतिहासिक अध्याय नहीं हैं, अपितु वे मानव चेतना के मूलाधार से सहस्रार तक की आध्यात्मिक यात्रा के सात सोपान हैं:

  1. बालकांड (भक्ति और श्रद्धा का बीजारोपण): यह संपूर्ण ग्रंथ की आधारशिला है। इसमें नाम-महिमा, शिव-पार्वती विवाह और श्री राम का बाल-चरित्र है। यह साधक के भीतर श्रद्धा और विश्वास को जन्म देता है।
  2. अयोध्याकांड (त्याग, नीति और विवेक की परीक्षा): इसे मानस का हृदय कहा जाता है। इसमें पारिवारिक मर्यादा, राजधर्म, भरत का त्याग और कैकेयी का प्रलोभन है। यह सिखाता है कि संकट के समय कर्तव्य का पालन कैसे किया जाए।
  3. अरण्यकांड (इंद्रिय संयम और वासना से संघर्ष): वनवास का यह कालखंड काम (शूर्पणखा) और लोभ (स्वर्ण मृग) के खतरों को दर्शाता है। यहाँ जटायु का आत्म-बलिदान और शबरी की नवधा भक्ति चित्त को पावन बनाती है।
  4. किष्किंधाकांड (मैत्री और संगठन शक्ति): सुग्रीव के साथ मित्रता और बालि-वध यह सिखाता है कि जीवन में अधर्म का साथ देने वाले का त्याग और धर्म के पक्षधर का संबल बनना ही नीति है।
  5. सुंदरकांड (संकल्प, सेवा और निर्भयता): हनुमान जी का लंका गमन, सीता की खोज और विभीषण की शरणागति। यह कांड साधक के भीतर असीम आत्मबल और दास-भाव की भक्ति का संचार करता है।
  6. लंकाकांड (अहंकार और आसुरी प्रवृत्तियों का समूल नाश): धर्म और अधर्म का महायुद्ध। रावण के दस सिर (काम, क्रोध आदि विकार) राम-रूपी विवेक के बाणों से भस्म होते हैं।
  7. उत्तरकांड (ज्ञान, वैराग्य और रामराज्य की पराकाष्ठा): कागभुशुंडि-गरुड़ संवाद और कलि-धर्म का विशद वर्णन। यह सोपान ज्ञान और भक्ति के समन्वय से 'रामराज्य' (परम शांति) की स्थापना करता है।
सोपान (कांड) मुख्य घटनाक्रम यौगिक / दार्शनिक तत्त्व साधक के जीवन में रूपांतरण
बालकांड राम-अवतार, शिव-चरित, धनुष-भंग मूलाधार (श्रद्धा व नाम-स्मरण) संशय का नाश, भक्ति-बीज का अंकुरण
अयोध्याकांड वनवास गमन, दशरथ मरण, भरत मिलाप स्वाधिष्ठान (भावनाओं का शोधन) स्वार्थ का त्याग, संबंधों की पवित्रता
अरण्यकांड शूर्पणखा प्रसंग, स्वर्ण मृग, शबरी भक्ति मणिपुर (इंद्रिय दमन व तप) वासनाओं पर विजय, नवधा भक्ति प्राप्ति
किष्किंधाकांड सुग्रीव सख्य, बालि वध, तारा विलाप अनाहत (हृदय की उदारता व मित्रता) संकीर्णता का त्याग, सद्गुणों का संगठन
सुंदरकांड समुद्र लंघन, लंका दहन, विभीषण शरण विशुद्ध (वाक्-सिद्धि व सेवा) असाध्य कार्यों की सिद्धि, निर्भयता
लंकाकांड सेतु निर्माण, रावण संहार, मंदोदरी विलाप आज्ञा चक्र (अहंकार का विनाश) आंतरिक असुरों का दहन, धर्म विजय
उत्तरकांड राम राज्याभिषेक, भुशुंडि संवाद, कलि महिमा सहस्रार (परम ज्ञान व अद्वैत बोध) संपूर्ण मुक्ति, शाश्वत आनंद व शांति

राम नवमी पर नवाह्न पारायण और अखंड पाठ का विधान

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नव संवत्सर) से प्रारंभ होकर चैत्र शुक्ल नवमी (श्री राम नवमी) तक संपन्न होने वाले रामचरितमानस के नौ दिवसीय पाठ को 'नवाह्न पारायण' (Navahna Parayana) कहा जाता है।

नवाह्न पारायण की नौ दिवसीय समय-सारणी

तुलसीदास जी ने स्वयं मानस में नौ दिनों के विश्राम स्थल (विश्राम) निर्धारित किए हैं:

  • प्रथम दिवस (प्रतिपदा): बालकांड के आरंभ से लेकर शिव-चरित्र और सती-मोह प्रसंग तक (विश्राम १)।
  • द्वितीय दिवस (द्वितीया): मनु-शतरूपा तप से लेकर श्री राम जन्म और बाल-लीला तक (विश्राम २)।
  • तृतीय दिवस (तृतीया): विश्वामित्र आगमन, धनुष-यज्ञ से लेकर श्री सीता-राम विवाह तक (विश्राम ३)।
  • चतुर्थ दिवस (चतुर्थी): परशुराम संवाद और अयोध्याकांड में श्री राम वनवास की तैयारी तक (विश्राम ४)।
  • पंचम दिवस (पंचमी): श्री राम का वन गमन, केवट प्रसंग से लेकर चित्रकूट निवास तक (विश्राम ५)।
  • षष्ठ दिवस (षष्ठी): दशरथ मरण, भरत आगमन से लेकर अयोध्याकांड की समाप्ति तक (विश्राम ६)।
  • सप्तम दिवस (सप्तमी): संपूर्ण अरण्यकांड और संपूर्ण किष्किंधाकांड का पाठ (विश्राम ७)।
  • अष्टम दिवस (अष्टमी): संपूर्ण सुंदरकांड और लंकाकांड में कुंभकर्ण-मेघनाद वध तक (विश्राम ८)।
  • नवम दिवस (नवमी): रावण वध, श्री राम का अयोध्या प्रत्यागमन, राज्याभिषेक और संपूर्ण उत्तरकांड की पूर्णाहुति (विश्राम ९)।

पारायण के कड़े शास्त्रीय नियम

  • पाठ प्रारंभ करने से पूर्व गणेश जी, शिव-पार्वती, वाल्मीकि जी, हनुमान जी और तुलसीदास जी का विधिवत आवाहन करें।
  • पाठ के मध्य में व्यर्थ वार्तालाप, मोबाइल का प्रयोग अथवा उठकर जाना वर्जित है; यदि अनिवार्य हो, तो किसी दोहे के समापन पर ही विश्राम लें।
  • प्रत्येक दोहे के पश्चात 'श्री राम जय राम जय जय राम' अथवा 'मंगल भवन अमंगल हारी' का संपुट लगाना पाठ को अत्यंत ऊर्जावान बना देता है।
  • नवमी तिथि के दोपहर 12:00 बजे जब बालकांड के "भए प्रगट कृपाला..." का पाठ आए, तो पाठ को रोककर आरती उतारें, शंख बजाएं और धनिया पंजीरी का भोग लगाएं।

कलयुग में रामचरितमानस की प्रासंगिकता और दार्शनिक संदेश

गोस्वामी तुलसीदास जी ने उत्तरकांड में कलयुग के जिस भयानक, पतनोन्मुख और नैतिक रूप से भ्रष्ट स्वरूप का वर्णन किया है, वह आज अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रहा है:

कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥

कलयुग में न तो सतयुग जैसी घोर तपस्या संभव है, न त्रेता जैसे महायज्ञ किए जा सकते हैं और न ही द्वापर जैसी कठिन मंदिर-पूजा सुलभ है। कलयुग में मनुष्य अल्पायु, दुर्बल और निरंतर मानसिक तनावों से घिरा हुआ है। ऐसी विषम परिस्थिति में 'श्री रामचरितमानस' एक ऐसी नौका है जो साधारण से साधारण गृहस्थ को भी भवसागर से पार उतारने में सक्षम है।

रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, अपितु यह जीवन प्रबंधन (Life Management), समाजशास्त्र और मनोविज्ञान का सर्वोच्च दर्शन है। यह ग्रंथ एक आदर्श पुत्र (श्री राम), एक आदर्श भाई (भरत-लक्ष्मण), एक आदर्श मित्र (गुह-सुग्रीव), एक आदर्श सेवक (हनुमान) और एक आदर्श राजा के स्वरूप को प्रस्तुत कर समाज को टूटने से बचाता है।

चैत्र शुक्ल नवमी के इस पावन दिवस पर रामचरितमानस की यह अमर गूंज हमें स्मरण कराती है कि जब तक सूर्य और चंद्रमा का अस्तित्व रहेगा तब तक तुलसी की यह अवधी मंदाकिनी मानव चेतना को पावन करती रहेगी।


FAQ

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस का लेखन किस संवत और तिथि को प्रारंभ किया था?
तुलसीदास जी ने विक्रम संवत 1631 की चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि (मंगलवार) को अयोध्या में रामचरितमानस का लेखन प्रारंभ किया था।

रामचरितमानस को पूर्ण होने में कितना समय लगा था?
रामचरितमानस को पूर्ण होने में कुल 2 वर्ष, 7 महीने और 26 दिन का समय लगा था; यह संवत 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी (विवाह पंचमी) को पूर्ण हुई थी।

तुलसीदास जी को रामकथा लिखने की प्रेरणा किससे प्राप्त हुई थी?
उन्हें साक्षात भगवान शिव और माता पार्वती ने काशी में स्वप्न में आदेश दिया था कि वे अयोध्या जाकर जन-भाषा (अवधी) में काव्य रचना करें।

रामचरितमानस में कुल कितने कांड (सोपान) हैं?
रामचरितमानस में कुल सात कांड हैं: बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड।

नवाह्न पारायण किसे कहते हैं?
चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक प्रतिदिन निर्धारित अंशों में संपूर्ण रामचरितमानस का जो क्रमबद्ध पाठ किया जाता है, उसे नवाह्न पारायण कहते हैं।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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