By पं. नरेंद्र शर्मा
खरमास समाप्ति, त्रिबल शुद्धि, विवाह मुहूर्त, मुंडन-जनेऊ नियम और गृह प्रवेश वास्तु

सनातन वैदिक कालगणना, मुहूर्त चिंतामणि, निर्णयसिंधु, संस्कार गणपति और धर्मसिंधु में मानव जीवन को जन्म से लेकर मोक्ष पर्यंत सुसंस्कृत, मर्यादित एवं सात्विक बनाने के लिए 'षोडश संस्कारों' (16 संस्कारों) की स्थापना की गई है। सौर कालगणना के अनुसार जब भुवन भास्कर सूर्य देव देवगुरु बृहस्पति की राशियों (धनु अथवा मीन) में गोचर करते हैं तब उस एक मास की अवधि को 'खरमास' (मलमास) कहा जाता है। इस अवधि में सूर्य का आत्म-तेज गुरु के ज्ञान-गांभीर्य के सम्मुख विनीत व शांत रहता है, जिसके कारण सभी प्रकार के बड़े मांगलिक कार्यों एवं संस्कारों पर एक माह का पूर्ण विराम लग जाता है।
चैत्र मास के उत्तरार्ध में, ठीक मेष संक्रांति के पावन क्षण, जैसे ही सूर्य देव मीन राशि के जल-तत्त्वीय बंधनों को समाप्त कर मंगल की चर-अग्नि राशि मेष में 0° पर प्रविष्ट होते हैं, खरमास समाप्त हो जाता है। सूर्य के अपनी उच्च राशि मेष में पहुंचते ही चराचर जगत में ओज, प्राणिक शक्ति, तेज और मांगलिक ऊर्जा का संचार होता है। इसके साथ ही सनातन धर्म के प्रमुख संस्कारों-विशेषकर विवाह, चूड़ाकर्म (मुंडन), उपनयन (यज्ञोपवीत), कर्णवेध और गृह प्रवेश-के लिए शुभ मुहूर्तों के कपाट पुनः उन्मुक्त हो जाते हैं। संस्कारों का यह पुनरारंभ केवल सामाजिक उत्सव नहीं है बल्कि व्यक्ति की चेतना को ब्रह्मांडीय शुभ स्पंदनों से जोड़ने का खगोलीय महा-अभियान है।
| पंचांग व मुहूर्तिक घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व संस्कार विवरण |
|---|---|
| संधिकाल क्षण | मेष संक्रांति (सूर्य का 0° मेष में प्रवेश, सौर वैशाख आरंभ) |
| खरमास निवृत्ति काल | प्रतिवर्ष 13/14 अप्रैल (चैत्र शुक्ल पक्ष के संधिकाल में) |
| पुनरारंभ होने वाले मुख्य संस्कार | विवाह, उपनयन (जनेऊ), चूड़ाकर्म (मुंडन), गृहप्रवेश, कर्णवेध |
| अनिवार्य खगोलीय शुद्धि | त्रिबल शुद्धि (सूर्य, गुरु, चंद्र बल) एवं शुक्र-गुरु का उदित स्वरूप |
| वर्जित स्थितियां | गुरु अथवा शुक्र का अस्त (तारा डूबना), बाण दोष, भद्रा, ग्रहण वेध |
| आगामी प्रमुख मांगलिक मास | वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ (देवशयनी एकादशी तक) |
| मुख्य अधिष्ठाता देव | भुवन भास्कर सूर्य, देवगुरु बृहस्पति, भगवान प्रजापति ब्रह्मा |
| सर्वश्रेष्ठ अबूझ मुहूर्त | अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया), भड़ली नवमी (आषाढ़ शुक्ल) |
| अभीष्ट फल | कुल-वृद्धि, दांपत्य स्थिरता, द्विजात्व प्राप्ति, वास्तु-शांति, दीर्घायु |
खरमास की समाप्ति के उपरांत अपने परिवार में मांगलिक संस्कारों के आयोजन, तिथियों के चयन और निर्विघ्न कार्य सिद्धि हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय आचार नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
सनातन परंपरा में मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत केवल प्राकृतिक प्राणी नहीं रहता बल्कि वह संस्कारों द्वारा परिष्कृत होकर 'देव-तुल्य' बनता है: "जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत् द्विजः"।
खरमास के समाप्त होते ही जिन प्रमुख संस्कारों के मार्ग खुलते हैं, उनका विस्तृत शास्त्रीय विभाजन निम्नलिखित है:
| संस्कार का नाम | जीवन का पड़ाव | शास्त्रीय उद्देश्य एवं तात्विक रहस्य | खरमास बाद मुहूर्त चयन के नियम |
|---|---|---|---|
| गर्भाधान | गर्भाधान काल | तेजस्वी, धार्मिक व कुलदीपक संतान की उत्पत्ति | ऋतुकाल के शुद्ध दिवस, शुभ नक्षत्र, रिक्ता तिथियों का त्याग |
| पुंसवन | गर्भ का तृतीय मास | गर्भस्थ शिशु के शारीरिक व मानसिक बल का संवर्धन | पुं-नक्षत्र (पुष्य, हस्त, मूल), चंद्रमा का शुभ गोचर |
| सीमंतोन्नयन | गर्भ का ६ठा/८वां मास | गर्भवती माता के चित्त की शुद्धि व गर्भ-रक्षा | शुक्ल पक्ष, शुभ वार (गुरु, शुक्र, बुध), क्रूर ग्रहों का टलना |
| जातकर्म | शिशु जन्म के समय | स्वर्ण शलाका से मधु-घृत चटाना, मेधा का बीजारोपण | नाल-छेदन से पूर्व, पिता द्वारा अशौच-मुक्त होकर संकल्प |
| नामकरण | १०वां, ११वां या १२वां दिन | बालक के आभामंडल व सामाजिक पहचान की प्रतिष्ठा | स्थिर व चर नक्षत्र, शुभ तिथि, चंद्र राशि अनुसार नामाक्षर |
| निष्क्रमण | चतुर्थ मास | शिशु को प्रथम बार गृह से बाहर सूर्य-चंद्र दर्शन कराना | तृतीय, पंचमी, सप्तमी तिथि, शुभ लग्न, दिन का समय |
| अन्नप्राशन | षष्ठ मास | प्रथम बार स्वर्ण/चांदी से अन्न (खीर) का प्राशन | षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी वर्जित; सम/विषम मास नियम |
| चूड़ाकर्म (मुंडन) | प्रथम या तृतीय वर्ष | गर्भकालीन अशुद्ध केशों का त्याग, कपाल शुद्धि | खरमास बाद सर्वाधिक अनुशंसित, शुभ उत्तरायण, शुभ नक्षत्र |
| कर्णवेध | ६ठा, ७वां अथवा ८वां माह | स्नायु तंत्र का संतुलन, अंधापन व हर्निया से रक्षा | शुक्ल पक्ष, सूर्योदय के बाद, हस्त, चित्रा, स्वाति नक्षत्र |
| उपनयन (जनेऊ) | ८वें से १२वें वर्ष तक | गायत्री दीक्षा, ब्रह्मचर्य का संकल्प, विद्या-अधिकार | सूर्य-गुरु का बलवान होना अनिवार्य, फाल्गुन-वैशाख श्रेष्ठ |
| वेदारंभ | उपनयन के तुरंत बाद | गुरु के चरणों में बैठकर वेदों-शास्त्रों का अध्ययन | बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार; शुभ नक्षत्र व लग्न |
| केशांत (गोदान) | १६वें वर्ष की आयु में | ब्रह्मचर्य काल में प्रथम बार दाढ़ी-मूंछ का मुंडन | उत्तरायण काल, ज्येष्ठ संतान हेतु ज्येष्ठ नक्षत्र वर्जित |
| समावर्तन | विद्या पूर्ण होने पर | स्नातक दीक्षांत समारोह, गृहस्थ में प्रवेश की तैयारी | शुभ वार व नक्षत्र, गुरु-दक्षिणा समर्पण |
| विवाह संस्कार | युवावस्था | दो आत्माओं का एकात्म होना, गृहस्थ धर्म का आधार | त्रिबल शुद्धि, गुरु-शुक्र उदय, १० महादोष रहित लग्न |
| आवसथाधान | विवाह के उपरांत | गृहस्थ आश्रम में प्रतिदिन पंच महायज्ञों की स्थापना | शुभ तिथि, अमावस्या-पूर्णिमा संधिकाल |
| अंत्येष्टि | मृत्यु के उपरांत | पंचतत्व में विलीन होना, आत्मा की सद्गति | देहावसान के तुरंत बाद, पंचक शुद्धि का विशेष ध्यान |
16 संस्कारों में गृहस्थ आश्रम का प्रवेश द्वार 'विवाह संस्कार' है। खरमास समाप्त होते ही वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ के प्रथम पक्ष तक विवाह की शहनाइयां गूंजने लगती हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी भी शुद्ध विवाह मुहूर्त के निर्धारण के लिए 'त्रिबल शुद्धि' (Three-fold Planetary Strength) और 'लग्न शुद्धि' सबसे अनिवार्य कसौटी है:
विवाह तय करते समय वर और कन्या दोनों की जन्म राशि से तीन प्रमुख ग्रहों के गोचर का सूक्ष्म परीक्षण किया जाता है:
विवाह के लिए केवल खरमास का बीतना ही पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना अनिवार्य है कि ज्ञान के कारक देवगुरु बृहस्पति और दांपत्य सुख व काम के कारक शुक्र देव आकाश में उदित हों। यदि इनमें से कोई भी ग्रह सूर्य के सन्निकट आकर 'अस्त' (Combust) हो जाता है, तो उसे 'तारा डूबना' कहते हैं। तारा डूबे रहने तक विवाह संस्कार संपन्न नहीं किए जा सकते।
| विवाह घटक | विहित (स्वीकार्य) स्थितियां | त्याज्य (वर्जित) स्थितियां |
|---|---|---|
| शुभ तिथियां | द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, एकादशी, त्रयोदशी | रिक्ता तिथियां (४, ९, १४), अमावस्या, पूर्णिमा |
| शुभ नक्षत्र | रोहिणी, मृगशिरा, मघा, तीनों उत्तरा, हस्त, अनुराधा, स्वाति, मूल, रेवती | आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, भरणी, कृत्तिका, शतभिषा |
| लग्न शुद्धि | लग्न से ७वें व ८वें भाव में कोई क्रूर ग्रह न हो, ८वां भाव रिक्त हो | लग्न भंग, अष्टमस्थ मंगल, राहु या शनि |
| १० महादोष | लता, पात, युति, वेध, जामित्र, बाण, विष्टि (भद्रा) से सर्वथा मुक्त | भद्रा काल, ग्रहण वेध, क्रांति साम्य महादोष |
खरमास की समाप्ति के उपरांत वैशाख मास में बच्चों के मुंडन और बालकों के जनेऊ संस्कार की बाढ़ आ जाती है। इन दोनों संस्कारों के लिए शास्त्रों में अत्यंत कठोर नियम निर्धारित किए गए हैं:
मुंडन संस्कार का उद्देश्य बालक के जन्मकालीन अपवित्र केशों को काटकर उसके मस्तिष्क के क्रेनियल नर्व्स (Cranial Nerves) को शुद्ध करना और स्मरण शक्ति को बढ़ाना है।
उपनयन का अर्थ है 'गुरु के समीप ले जाना'। यह बालक के बौद्धिक और आध्यात्मिक पुनर्जन्म (द्विजत्व) का दिन होता है।
खरमास समाप्त होते ही नए मकान, खरीदे गए फ्लैट अथवा जीर्णोद्धार किए गए भवन में प्रवेश के मुहूर्त खुल जाते हैं। वास्तु शास्त्र में गृह प्रवेश को तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
| गृह प्रवेश घटक | शास्त्रीय विधान | त्याज्य स्थितियां (दोष) |
|---|---|---|
| विहित मास | वैशाख, ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन (उत्तरायण मास) | चैत्र (खरमास भाग), आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, क्वार |
| विहित तिथियां | शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी | अमावस्या, पूर्णिमा, रिक्ता (४, ९, १४) तिथियां |
| विहित नक्षत्र | रोहिणी, मृगशिरा, तीनों उत्तरा, हस्त, अनुराधा, रेवती | भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, आश्लेषा, विशाखा, मघा |
| वर्जित वार | मंगलवार एवं रविवार (अग्नि कारक वार) | शनिवार को भी सामान्यतः नवीन प्रवेश टाला जाता है |
खरमास के उपरांत आने वाले दो मास मांगलिक कार्यों के स्वर्णिम कालखंड होते हैं। यदि किसी जातक की कुंडली में त्रिबल शुद्धि में थोड़ी बाधा आ रही हो अथवा सामान्य मुहूर्त न मिल रहे हों, तो शास्त्रों ने कुछ ऐसी तिथियां निर्धारित की हैं जो स्वयं-सिद्ध मानी जाती हैं:
सनातन परंपरा का सबसे बड़ा 'अबूझ मुहूर्त'। इस दिन पंचांग के किसी भी दोष का विचार किए बिना विवाह, गृह प्रवेश, स्वर्ण क्रय, व्यापार आरंभ और बड़े अनुष्ठान निर्बाध रूप से संपन्न किए जा सकते हैं। इस दिन किया गया कोई भी शुभ कर्म कभी क्षय (नष्ट) नहीं होता।
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की ये पावन तिथियां विद्यारंभ, उपनयन और नए प्रतिष्ठानों के उद्घाटन के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती हैं।
देवशयनी एकादशी से ठीक दो दिन पूर्व आने वाली भड़ली नवमी विवाह का अंतिम अबूझ मुहूर्त होती है। इसके पश्चात भगवान श्री हरि विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा (चातुर्मास) में चले जाते हैं, जिसके कारण अगले चार महीनों तक समस्त मांगलिक संस्कारों पर पुनः पूर्ण विराम लग जाता है।
खरमास की समाप्ति और 16 संस्कारों का यह पुनरारंभ हमें सनातन जीवन दर्शन का यह सर्वोच्च संदेश देता है कि मानव जीवन केवल भौतिक सुखों का उपभोग करने के लिए नहीं है, अपितु यह आत्मा को संस्कारों की अग्नि में तपाकर कुंदन बनाने की एक पवित्र यात्रा है।
जिस प्रकार एक खदान से निकला हुआ बेडौल पत्थर मूर्तिकार की छेनी और हथौड़ी की मार खाकर देवालय की पूज्य प्रतिमा बनता है, उसी प्रकार एक साधारण मनुष्य 16 संस्कारों की पावन मर्यादा से गुजरकर समाज, राष्ट्र और धर्म के लिए एक आदर्श व्यक्तित्व बनता है। विवाह केवल दो शरीरों का भोग-विलास नहीं बल्कि धर्म की संयुक्त साधना है। उपनयन केवल धागा पहनना नहीं बल्कि इंद्रिय-संयम और ज्ञान का संकल्प है।
आइए खरमास की समाप्ति पर हम केवल बाह्य उत्सवों और तड़क-भड़क में न खोएं बल्कि इन संस्कारों की आंतरिक पवित्रता, ऋषि-ऋण और कुल-मर्यादा को अपने हृदय में धारण कर एक अनुशासित और तेजस्वी जीवन की शुरुआत करें।
खरमास कब समाप्त होता है और इसके तुरंत बाद कौन से संस्कार शुरू होते हैं?
खरमास प्रतिवर्ष 13 या 14 अप्रैल को मेष संक्रांति के दिन समाप्त होता है; इसके समाप्त होते ही विवाह, मुंडन, जनेऊ, कर्णवेध और गृह प्रवेश जैसे सभी 16 संस्कार पुनः शुरू हो जाते हैं।
विवाह के लिए 'त्रिबल शुद्धि' क्या होती है?
त्रिबल शुद्धि में वर के लिए सूर्य का बल, कन्या के लिए देवगुरु बृहस्पति का बल और दोनों के लिए चंद्रमा के गोचर का शुभ होना अनिवार्य रूप से परखा जाता है।
यदि गुरु अथवा शुक्र तारा अस्त हो तो क्या विवाह हो सकता है?
नहीं; यदि गुरु या शुक्र में से कोई भी ग्रह अस्त (तारा डूबा हुआ) हो, तो खरमास समाप्त होने के बाद भी विवाह और उपनयन जैसे बड़े मांगलिक कार्य पूर्णतः वर्जित रहते हैं।
खरमास समाप्ति के बाद विवाह का सबसे बड़ा अबूझ मुहूर्त कौन सा है?
खरमास के बाद वैशाख शुक्ल तृतीया को आने वाली 'अक्षय तृतीया' विवाह और गृह प्रवेश का सबसे बड़ा स्वयंसिद्ध अबूझ मुहूर्त मानी जाती है।
नए मकान में गृह प्रवेश के समय सर्वप्रथम क्या उबालने का नियम है?
गृह प्रवेश के दिन नए घर की रसोई में नए बर्तन में ताजे गाय के दूध को उबालकर उफनाया जाता है, जो घर में अखंड लक्ष्मी और अन्नपूर्णा के वास का प्रतीक है।
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