By पं. नरेंद्र शर्मा
कलिंद नंदिनी का प्राकट्य, यमुनाष्टकम् पाठ, चुनरी मनोरथ और जल शुद्धि

सनातन वैदिक कालगणना में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान भुवन भास्कर सूर्य देव की परम प्रिय पुत्री, मृत्यु के देवता यमराज की सहोदरा बहन तथा कर्मफलदाता शनि देव की भगिनी माँ यमुना के प्राकट्योत्सव-'यमुना छठ' (Yamuna Chhath) अथवा 'यमुना जयंती'-के रूप में मनाया जाता है। यह पावन पर्व वासंती नवरात्रि के षष्ठ दिवस पर घटित होता है। यह दिन एक ओर जहां आदिशक्ति माँ कात्यायनी और देवसेनापति कार्तिकेय (स्कंद षष्ठी) की आराधना का साक्षी बनता है, वहीं दूसरी ओर साक्षात प्रेम-स्वरूपा, पापनाशिनी और ब्रज मंडल की प्राण-रेखा कलिंद नंदिनी माँ यमुना के जल-तत्त्वीय प्राकट्य का महा-महोत्सव है।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चैत्र शुक्ल षष्ठी ऋतुराज वसंत और ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल पर जल-तत्त्व के संरक्षण का चरम संदेश देती है। इस समय सूर्य देव मीन राशि के अंतिम अंशों से मेष राशि के प्रचंड आग्नेय क्षेत्र की ओर अग्रसर होते हैं। इस संक्रमण काल में पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है और जल स्रोतों का संरक्षण अत्यंत अनिवार्य हो जाता है। ज्योतिष शास्त्र में यमुना जी का प्रत्यक्ष संबंध सूर्य (पिता), शनि (सहोदर भ्राता) और यमराज (मृत्यु-अधिपति) से है। सूर्य आत्मा है, शनि कर्म है और यम धर्मराज हैं। यमुना जी इन तीनों के मध्य वात्सल्य, करुणा और पापनाशनी अमृत-धारा का संतुलन स्थापित करती हैं। जिन जातकों की कुंडली में सूर्य-शनि का दृष्टि संबंध, शनि की साढ़ेसाती, अकाल मृत्यु का भय अथवा कालसर्प जनित मानसिक अशांति हो, उनके लिए चैत्र शुक्ल षष्ठी को माँ यमुना का पूजन और यमुनाष्टकम का पाठ अमोघ रक्षा कवच सिद्ध होता है।
| पंचांग व खगोलीय घटक | शास्त्रीय, ज्योतिषीय व पौराणिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | चैत्र मास, शुक्ल पक्ष |
| तिथि | षष्ठी तिथि (वासंती नवरात्रि का छठा दिन) |
| पर्व का शास्त्रीय नाम | यमुना छठ, यमुना जयंती, कलिंद नंदिनी प्राकट्योत्सव |
| उद्गम तीर्थ | कलिंद पर्वत (यमुनोत्री हिमानी, उत्तरकाशी, हिमालय) |
| माता-पिता एवं सहोदर | पिता: भुवन भास्कर सूर्य, माता: संज्ञा (छाया), भ्राता: यमराज व शनि |
| आध्यात्मिक स्वरूप | भगवान श्री कृष्ण की परम प्रेयसी पटरानी, वैकुंठ की अमृत रसधारा |
| संबद्ध ज्योतिषीय ग्रह | सूर्य देव (पिता), शनि देव (भ्राता) और चंद्र देव (जल-तत्त्व) |
| मुख्य भोग व अर्पण | चुनरी (मनोरथ), माखन-मिश्री, मखाने की खीर, नीले व पीले पुष्प |
| मुख्य भौगोलिक केंद्र | मथुरा (विश्राम घाट), वृंदावन (केशी घाट), गोकुल, बटेश्वर, प्रयागराज |
| अभीष्ट आध्यात्मिक फल | यम यातना से मुक्ति, शनि पीड़ा शमन, अंतःकरण शुद्धि, कृष्ण-भक्ति |
यमुना जयंती के इस पावन पर्व पर माँ कलिंद नंदिनी का अनुग्रह प्राप्त करने, यम-भय से मुक्त होने और अपने जीवन में निर्मल भक्ति का संचार करने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
श्रीमद्भागवत महापुराण, पद्म पुराण के पाताल खंड और गर्ग संहिता में माँ यमुना के दिव्य प्राकट्य और उनके अलौकिक आध्यात्मिक संबंधों का अत्यंत विशद और हृदयस्पर्शी वर्णन प्राप्त होता है।
सूर्य देव की धर्मपत्नी संज्ञा (विश्वकर्मा की पुत्री) भगवान सूर्य के प्रचंड ताप को सहन करने में असमर्थ थीं। उसी अवधि में संज्ञा के गर्भ से दो संतानों का जन्म हुआ: प्रथम पुत्र 'यमराज' (धर्मराज) और द्वितीय कन्या 'यमुना' (यमी)। कालांतर में संज्ञा की छाया से शनि देव और ताप्ती नदी का जन्म हुआ। इस प्रकार यमुना जी यमराज और शनि देव दोनों की सगी बहन हैं।
कलिंद पर्वत (कालिंदी) से प्रकट होने के कारण इनका एक प्रसिद्ध नाम 'कालिंदी' पड़ा। जब यमुना जी पर्वतराज कलिंद से उतरकर मैदानी भागों में बहने लगीं, तो उनके श्याम (नीले-काले) जल ने संपूर्ण ब्रज मंडल को अपनी पावन गोद में समेट लिया।
| संबंध एवं पद | पौराणिक व आध्यात्मिक आधार | मानव चेतना पर प्रभाव |
|---|---|---|
| सूर्य पुत्री (अर्क सुता) | भुवन भास्कर सूर्य के तेज और जीवन-ऊर्जा का जलीय विस्तार | आत्मा के अहंकार का शमन और आत्मिक तेज की प्राप्ति |
| यमराज की सहोदरा (यमी) | मृत्यु के देवता यमराज को बांधने वाली वात्सल्यमयी शक्ति | अकाल मृत्यु के भय और यमलोक की यातनाओं से पूर्ण मुक्ति |
| शनि देव की भगिनी | न्यायदाता शनि देव को शीतल करने वाली अमृत-धारा | शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और क्रूर दृष्टि की शांति |
| श्री कृष्ण की पटरानी | अष्टभार्याओं में चतुर्थ पटरानी, वैकुंठ की रस-स्वरूपा धारा | निष्काम प्रेमा-भक्ति, चित्त की निर्मलता और कृष्ण-सान्निध्य |
| ब्रज की जीवन-रेखा | गोकुल, मथुरा, वृंदावन में बाल-लीलाओं की साक्षी वेदी | आध्यात्मिक विश्रांति, मानसिक अवसाद और संताप का नाश |
पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, यमुना जी अपने भाई यमराज से अत्यंत स्नेह करती थीं। वे निरंतर यमराज को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित करती थीं, परंतु यमराज अपने कार्यभार के कारण जा नहीं पाते थे। एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया (यम द्वितीया/भाई दूज) के दिन यमराज अचानक अपनी बहन यमुना के घर पहुंचे।
यमुना जी ने अत्यंत हर्षित होकर अपने भाई का आदर-सत्कार किया, उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया और उनके मस्तक पर मंगल तिलक लगाया। यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा: "हे बहन! मांगो, तुम जो वरदान मांगना चाहती हो।"
यमुना जी ने अत्यंत करुणा भाव से संपूर्ण संसार के कल्याण के लिए वरदान मांगा:
"हे भ्राता! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि जो भी प्राणी मेरे जल में स्नान करेगा, वह आपके यमदूतों के त्रास और यमलोक की दारुण यातनाओं से सदा के लिए मुक्त हो जाए!"
यमराज ने भावुक होकर कहा: "तथास्तु! जो मनुष्य चैत्र शुक्ल षष्ठी अथवा कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन तुम्हारे पवित्र जल में स्नान और आचमन करेगा, उसे कभी नरक का मुख नहीं देखना पड़ेगा; वह सीधे वैकुंठ लोक का अधिकारी बनेगा।"
यमुना जी केवल एक भौतिक नदी नहीं हैं, अपितु वे साक्षात भगवान श्री कृष्ण के दिव्य प्रेम रस की द्रवीभूत मूर्ति हैं। गर्ग संहिता में कहा गया है कि वैकुंठ में जो परमानंद रस प्रवाहित होता है, वही रस भूतल पर माँ यमुना के रूप में अवतरित हुआ है।
पुष्टिमार्ग (शुद्धाद्वैत दर्शन) के प्रवर्तक जगद्गुरु महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्य जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग माँ यमुना से जुड़ा हुआ है।
विक्रम संवत 1549 में जब वल्लभाचार्य जी ब्रज मंडल में पधारे, तो उन्होंने गोकुल के गोविंद घाट पर विश्राम किया। उस समय उन्हें यह चिंता थी कि कलियुग के दोषों से घिरे हुए जीवों का भगवान श्री कृष्ण से संबंध कैसे जोड़ा जाए?
उसी समय मध्यरात्रि में साक्षात माँ यमुना प्रकट हुईं और उन्होंने वल्लभाचार्य जी को दर्शन देकर 'ब्रह्मसंबंध' का मार्ग दिखाया। माँ यमुना के साक्षात दर्शन पाकर महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का अंतःकरण भक्ति-रस से भर गया और उनके मुख से संस्कृत भाषा के नौ अत्यंत अलौकिक छंद स्वतः प्रस्फुटित हुए, जिन्हें आज संपूर्ण विश्व में 'यमुनाष्टकम्' (Yamunashtakam) के नाम से जाना जाता है।
नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा,
मुरारि पद पंकज स्फुरदमन्द रेणुत्कटाम्।
तटस्थ नव कानन प्रकट मोद पुष्पाम्बुना,
सुरासुर सुसूपितैः स्तव शतैरभिष्टुताम्॥ १॥
वैदिक ज्योतिष में सूर्य और शनि पिता-पुत्र होने के उपरांत भी परस्पर परम शत्रु माने गए हैं। जब कुंडली में सूर्य और शनि एक साथ बैठे हों या एक-दूसरे को देख रहे हों, तो जातक के जीवन में निम्नलिखित बाधाएं आती हैं:
माँ यमुना सूर्य की पुत्री और शनि की सगी बहन हैं। वे पिता और भ्राता दोनों को परम प्रिय हैं। यही कारण है कि चैत्र शुक्ल षष्ठी (यमुना जयंती) के दिन किया गया अनुष्ठान सूर्य और शनि के इस भयंकर द्वंद्व को शांत करने का सर्वोत्तम ज्योतिषीय उपाय है।
| ज्योतिषीय ग्रह दोष | जीवन में दिखने वाले लक्षण | यमुना जयंती पर अचूक निवारक उपाय |
|---|---|---|
| सूर्य-शनि युति दोष | पिता से कलह, करियर में रुकावट, बदनामी | यमुना जल से सूर्य को अर्घ्य व शनि हेतु दीपदान |
| शनि की साढ़ेसाती / ढैय्या | मानसिक अवसाद, भारी आर्थिक घाटा, दुर्घटनाएं | यमुना जी में काले तिल प्रवाहित करना, यमुनाष्टकम पाठ |
| यम-बाधा व अकाल भय | बुरे स्वप्न, स्वास्थ्य का अचानक गिरना, भय | षष्ठी के दिन यमुना जल आचमन व यम तर्पण |
| कालसर्प / राहु पीड़ा | अनिद्रा, अज्ञात भय, पारिवारिक अशांति | चांदी की छोटी मछली अथवा नीले वस्त्र का यमुना में अर्पण |
चैत्र शुक्ल षष्ठी के दिन घर पर अथवा यमुना तट पर सुख-शांति, स्वास्थ्य और कृष्ण-कृपा प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित क्रमबद्ध विधान का पालन करना चाहिए:
1.प्रातः कालीन शुद्धि एवं संकल्प: सूर्योदय से पूर्व उठकर यमुना जल युक्त जल से स्नान करें। स्वच्छ श्वेत, नीले अथवा पीले वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, नीले पुष्प, अक्षत और सिक्का लेकर संकल्प करें:
ॐ विष्णवे नमः। अद्य चैत्र मासे शुक्ल पक्षे षष्ठ्यां तिथौ, कलिंद नंदिनी यमुना प्राकट्योत्सवे, मम सकल यम-बाधा, शनि-दोष शमनार्थं, श्री कृष्ण प्रेमाभक्ति प्राप्त्यर्थं यमुना देव्याः पूजनमहं करिष्ये। 2.कलश स्थापना एवं आवाहन: पूजा वेदी पर पीला या नीला वस्त्र बिछाएं। उस पर तांबे अथवा मिट्टी का कलश स्थापित करें, जिसमें यमुना का पावन जल भरें। कलश में इत्र, अक्षत, सुपारी और पुष्प डालें। हाथ जोड़कर माँ यमुना का ध्यान करें: कालिन्दि त्वं यमभगिनी सूर्यपुत्री सुरार्चिता।
पापं हर ममानन्तं देहि मे परमां गतिम्॥ 3.षोडशोपचार पूजन: कलश पर कुमकुम, चंदन और अष्टगंध लगाएं। माँ यमुना को नीले कमल, लाल गुलाब और चमेली के पुष्प अर्पित करें। धूप और गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। 4.चुनरी मनोरथ (Chunri Manorath): ब्रज मंडल में माँ यमुना को चुनरी ओढ़ाने का विशेष महत्व है। यदि नदी तट पर हों, तो नावों के माध्यम से नदी के दोनों तटों के आर-पार लंबी रेशमी चुनरी बांधी जाती है। घर में पूजा करते समय एक सुंदर नीली अथवा लाल जरीदार चुनरी कलश पर अर्पित करें। 5.नैवेद्य अर्पण: माँ यमुना को ताजे माखन-मिश्री, मखाने की खीर, बेसन के लड्डू, मालपुआ और ऋतु फलों (विशेष रूप से खरबूजा और ककड़ी) का भोग लगाएं। 6.यमुनाष्टकम् पाठ एवं दीपदान: पूजा के उपरांत वल्लभाचार्य कृत 'यमुनाष्टकम्' का 7 बार सस्वर पाठ करें। सायंकाल के समय नदी के जल में दोने में रखकर 11, 21 अथवा 108 आटे के दीपक प्रज्वलित कर प्रवाहित करें।
मथुरा, वृंदावन और गोकुल में यमुना छठ का उत्सव किसी राजसी विवाह समारोह से कम नहीं होता:
यमुना जयंती का पर्व केवल पूजा-पाठ और आरती तक सीमित नहीं है, अपितु यह सनातन संस्कृति के उस सर्वोच्च मूल्य का स्मरण कराता है जो प्रकृति और नदियों को साक्षात 'माता' के रूप में स्वीकार करता है।
ऋग्वेद के नदी सूक्त में नदियों को जीवनदायिनी, मोक्षप्रदाता और राष्ट्र की जननी कहा गया है। आज जब हमारी पावन यमुना आधुनिक औद्योगिक अपशिष्टों, प्लास्टिक और रासायनिक कचरे के कारण मैली हो रही है तब यमुना छठ का पर्व हमें यह आत्म-मंथन करने का आह्वान करता है कि हम अपनी नदियों के साथ क्या कर रहे हैं?
माँ यमुना का पूजन तब तक अधूरा है जब तक हम उनके जल को स्वच्छ रखने का संकल्प नहीं लेते।
यमुना छठ हमें जीवन का यह अमर पाठ पढ़ाती है कि सच्चा समर्पण और प्रेम वही है जो अहंकार को धोकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ दे।
गंगा जी ज्ञान की धारा हैं, जो वैराग्य और मोक्ष की ओर ले जाती हैं; परंतु यमुना जी विशुद्ध प्रेम और भक्ति की धारा हैं, जो मनुष्य को भगवान श्री कृष्ण के सानिध्य में ले जाकर नृत्य कराती हैं। ज्ञान मनुष्य को विचारवान बनाता है, परंतु प्रेम मनुष्य को सहृदय और अमर बनाता है।
जब साधक माँ यमुना के चरणों में अपने संचित पापों, संकीर्णताओं और अहंकार को समर्पित कर देता है, तो उसका अंतःकरण यमुना के जल की भांति निर्मल हो जाता है। यमराज का दंड केवल उन पर चलता है जो अधर्म के मार्ग पर हैं; जो प्रेम और धर्म की यमुना में अवगाहन कर लेते हैं, उनके लिए मृत्यु का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
आइए इस यमुना जयंती पर हम माँ कलिंद नंदिनी के पावन चरणों में शीश नवाएं, उनके जल को स्वच्छ रखने का संकल्प लें और प्रार्थना करें: 'हे माँ कालिंदी! हमारे अंतःकरण के समस्त विकारों को बहा ले जाओ और हमें भगवान श्री कृष्ण की निष्काम प्रेमा-भक्ति का वरदान प्रदान करो।'
यमुना छठ (यमुना जयंती) किस तिथि को मनाई जाती है?
यमुना जयंती प्रतिवर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को वासंती नवरात्रि के छठे दिन मनाई जाती है।
माँ यमुना के माता-पिता और भाई कौन हैं?
माँ यमुना के पिता भुवन भास्कर सूर्य देव, माता संज्ञा (छाया) हैं तथा मृत्यु के देवता यमराज और कर्मफलदाता शनि देव इनके सगे भाई हैं।
यमुना जी के जल में स्नान करने से किस भय से मुक्ति मिलती है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार यमुना जी के जल में स्नान और आचमन करने से अकाल मृत्यु का भय और यमलोक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है।
'यमुनाष्टकम्' की रचना किसने की थी और इसका क्या फल है?
यमुनाष्टकम् की रचना पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक जगद्गुरु महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्य जी ने की थी; इसके पाठ से चित्त के दोष दूर होते हैं और श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति मिलती है।
यमुना जी को भगवान श्री कृष्ण की क्या माना गया है?
यमुना जी को भगवान श्री कृष्ण की अष्ट पटरानियों में चतुर्थ पटरानी और वैकुंठ के दिव्य प्रेम रस की साक्षात मूर्ति माना गया है।
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