By पं. संजीव शर्मा
तारा अर्घ्य, चांदी की अहोई और संतान मंगल की पूजा विधि

अहोई अष्टमी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला संतान मंगल पर्व है। वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर, रविवार को रखा जाएगा। दिल्ली आधारित पंचांग गणना के अनुसार अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट से प्रारंभ होकर 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी।
अहोई माता की पूजा सामान्यतः संध्या समय की जाती है। वर्ष 2026 में पूजा का समय लगभग शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक बताया गया है। तारों के दर्शन लगभग शाम 6 बजे के आसपास हो सकते हैं। कुछ परिवार तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में चंद्रमा को भी अर्घ्य दिया जाता है। स्थानीय सूर्यास्त, तारा दर्शन और परिवार की परंपरा के अनुसार अंतिम समय तय करना चाहिए।
अहोई अष्टमी का व्रत प्रायः माताएं संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, बुद्धि और सुखी जीवन के लिए रखती हैं। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपती भी अहोई माता का स्मरण कर सकते हैं। निर्जला व्रत एक कठोर साधना है। गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, बीमार या नियमित औषधि लेने वाली स्त्रियों को स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह के बिना ऐसा व्रत नहीं रखना चाहिए।
| विवरण | अहोई अष्टमी 2026 की जानकारी |
|---|---|
| पर्व | अहोई अष्टमी या अहोई आठें |
| तिथि | 1 नवंबर 2026, रविवार |
| पक्ष | कार्तिक कृष्ण पक्ष |
| तिथि आरंभ | 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट |
| तिथि समाप्त | 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट |
| पूजा मुहूर्त | शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट |
| तारा दर्शन | लगभग शाम 6 बजे, स्थान अनुसार |
| व्रत अवधि | प्रातः से तारा दर्शन तक, परंपरा अनुसार |
| मुख्य पूजा | अहोई माता, गणेश और संतान मंगल |
| विशेष सामग्री | अहोई चित्र, करवा, जल, रोली, अक्षत और पुष्प |
| विशेष परंपरा | चांदी की अहोई या अहोई माला |
| व्रत पारण | तारों को अर्घ्य देने के बाद, परिवार की परंपरा अनुसार |
• प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें
• अहोई माता का चित्र या प्रतीक स्थापित करें
• दिनभर संयम, सत्य और शांत व्यवहार रखें
• शाम को पूजा और अहोई कथा सुनें
• तारों को जल अर्पित करें
• बच्चों के स्वास्थ्य और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें
• निर्जला व्रत केवल स्वास्थ्य की अनुमति होने पर रखें
• तारा दर्शन के बाद धीरे धीरे व्रत खोलें
अहोई शब्द का संबंध अनहोनी को टालने और संकट से रक्षा करने की लोक भावना से जोड़ा जाता है। अहोई माता को मातृशक्ति, संतान रक्षा और परिवार के मंगल की देवी के रूप में पूजा जाता है।
अहोई माता का स्वरूप मुख्य रूप से उत्तर भारत की लोक परंपराओं में दिखाई देता है। अलग अलग क्षेत्रों में उनके चित्र में कांटेदार जीव, साही या अन्य प्रतीक बनाए जाते हैं। इन प्रतीकों का संबंध उस कथा से है जिसमें एक स्त्री से अनजाने में किसी जीव के बच्चे को नुकसान पहुंच जाता है और उसे संतान संबंधी कष्ट का सामना करना पड़ता है।
अहोई माता की पूजा का गहरा भाव केवल संतान की रक्षा नहीं है। इसमें पशु जीवों के प्रति करुणा, भूल के लिए प्रायश्चित, मातृ हृदय की चिंता और परिवार के प्रति जिम्मेदारी भी शामिल है।
अहोई अष्टमी की कथा के कई क्षेत्रीय रूप प्रचलित हैं। एक लोकप्रिय कथा के अनुसार एक साहूकार की पत्नी अपने बच्चों के साथ घर बनवाने या मिट्टी खोदने के लिए गई। मिट्टी खोदते समय उसके हाथ से अनजाने में साही या किसी वन्य जीव के बच्चे को चोट लग गई। उस घटना के बाद उसके बच्चों पर संकट आने लगा।
स्त्री दुखी होकर अहोई माता की शरण में गई। उसने पश्चाताप किया, व्रत रखा और माता से क्षमा मांगी। उसकी सच्ची प्रार्थना और पश्चाताप से माता प्रसन्न हुईं और संतान रक्षा का आशीर्वाद दिया।
कथा का उद्देश्य किसी माता को भयभीत करना नहीं है। इसका नैतिक संदेश यह है कि प्रकृति और जीवों को नुकसान पहुंचाना गंभीर कर्म है। अनजानी भूल हो जाए तो उसे स्वीकार करना, क्षमा मांगना और भविष्य में सावधानी रखना आवश्यक है।
यह कथा मातृत्व की चिंता को भी व्यक्त करती है। जब संतान पर संकट आता है तब माता अपनी सुविधा, भोजन और विश्राम तक का त्याग करने को तैयार हो जाती है। अहोई अष्टमी इसी त्याग को प्रार्थना, अनुशासन और करुणा के रूप में दिशा देती है।
करवा चौथ में चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। अहोई अष्टमी में अनेक परिवार तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं। तारों का आकाश अनंतता, संरक्षण और दिव्य साक्षी का प्रतीक माना जा सकता है।
तारा दर्शन का आध्यात्मिक भाव यह है कि संतान का जीवन केवल माता पिता के प्रयासों से नहीं चलता। उसमें प्रकृति, समाज, संस्कार, समय और ईश्वर की भी भूमिका होती है। तारों को जल अर्पित करते समय माता अपनी संतान के लिए लंबी आयु, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती है।
शाम की पूजा पूरी करें
करवा या तांबे के पात्र में स्वच्छ जल लें
जल में अक्षत और पुष्प डालें
आकाश में दिखाई देने वाले तारों का सम्मानपूर्वक स्मरण करें
दोनों हाथों से जल अर्पित करें
संतान के स्वास्थ्य और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें
अहोई माता का मंत्र या नाम स्मरण करें
परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत खोलें
तारों को अर्घ्य देते समय जल बिजली के तारों, सड़क या किसी व्यक्ति पर न गिराएं। नदी या खुले जल स्रोत को पूजा सामग्री से प्रदूषित न करें।
कुछ क्षेत्रों में चांदी की अहोई बनवाकर या चांदी की अहोई माला रखकर पूजा की जाती है। इसे अहोई माता का प्रतीक माना जाता है। अहोई माला में चांदी की आकृति के साथ मोती या छोटे दाने जोड़े जा सकते हैं। कई परिवार संतान की संख्या या पारिवारिक परंपरा के अनुसार माला में दानों की संख्या रखते हैं।
चांदी का संबंध चंद्रमा, शीतलता, मातृत्व, भावनात्मक सुरक्षा और मन से जोड़ा जाता है। इसलिए चांदी की अहोई को संतान रक्षा और मानसिक शांति का प्रतीक माना जाता है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि चांदी की अहोई हर परिवार के लिए अनिवार्य नहीं है। यह क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपरा है। आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करके चांदी बनवाना आवश्यक नहीं। मिट्टी, कागज या स्वच्छ कपड़े पर बनाया गया अहोई चित्र भी श्रद्धा से पूजित किया जा सकता है।
• अहोई को स्वच्छ स्थान पर रखें
• पूजा के बाद सुरक्षित डिब्बे में रखें
• चांदी की वस्तु को दिखावे का माध्यम न बनाएं
• संतान बाधा के नाम पर महंगी वस्तु खरीदने का दबाव न लें
• परिवार की परंपरा में दानों की संख्या हो तो उसका सम्मान करें
• अहोई को अपवित्र स्थान पर न रखें
अहोई अष्टमी की पूजा शाम को की जाती है। पूजा स्थल पर अहोई माता का चित्र बनाया या स्थापित किया जाता है। चित्र में माता के साथ साही या अन्य लोक प्रतीक बनाए जा सकते हैं।
प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें
पूजा स्थल को साफ करें
दीवार या चौकी पर अहोई माता का चित्र बनाएं या रखें
अहोई माता के साथ संतान संबंधी प्रतीक बनाएं
गणेश जी का स्मरण करें
दीपक और धूप जलाएं
रोली, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें
करवा में स्वच्छ जल भरें
अहोई माता की कथा पढ़ें या सुनें
संतान के स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना करें
तारों को अर्घ्य दें
परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत खोलें
बच्चों को प्रसाद दें
अहोई चित्र या चांदी की अहोई को सुरक्षित रखें
पूजा की सामग्री में स्वच्छता और सरलता रखें। महंगी सामग्री से अधिक महत्वपूर्ण मातृभाव और संयम है।
अहोई अष्टमी में कई परिवार स्थानीय परंपरा के अनुसार अहोई माता के नाम, कथा और लोकगीतों का स्मरण करते हैं। संतान के लिए सरल प्रार्थना की जा सकती है।
अहोई माता, मेरी संतान को स्वास्थ्य, सद्बुद्धि, दीर्घायु और धर्मपूर्ण जीवन का आशीर्वाद दें। परिवार में प्रेम, सुरक्षा और शांति बनाए रखें।
संतान गोपाल मंत्र का जप भी कुछ परिवारों में किया जाता है।
ॐ देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।
इसका अर्थ है, हे देवकी पुत्र कृष्ण, हे वासुदेव, हे जगत के स्वामी, शरण में आए भक्त को संतान का आशीर्वाद दें।
मंत्र का जप श्रद्धा से करें। संतान प्राप्ति को निश्चित परिणाम बताने या किसी रोग का उपचार मानने से बचना चाहिए।
वैदिक ज्योतिष में संतान सुख के लिए पंचम भाव, पंचमेश, गुरु, चंद्रमा, शुक्र और सप्तम भाव का अध्ययन किया जाता है। पंचम भाव संतान, बुद्धि, पूर्व पुण्य और सृजनात्मकता से जुड़ा है। गुरु संतान का प्रमुख कारक माना जाता है। चंद्रमा मातृत्व, पोषण और भावनात्मक संबंधों का संकेत देता है।
| ज्योतिषीय तत्व | संतान संबंधी संकेत |
|---|---|
| पंचम भाव | संतान और पूर्व पुण्य |
| पंचमेश | संतान योग की दिशा |
| गुरु | संतान कारक और आशीर्वाद |
| चंद्रमा | मातृत्व और पोषण |
| शुक्र | प्रजनन शक्ति और दांपत्य |
| सप्तम भाव | विवाह और पारिवारिक विस्तार |
| नवांश | संबंधों की गहराई |
| दशा और गोचर | घटना का समय |
संतान बाधा का निर्णय केवल राशि देखकर नहीं किया जा सकता। पंचम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव, पंचमेश की स्थिति, गुरु की शक्ति, दशा और गोचर का समग्र अध्ययन आवश्यक है।
ज्योतिषीय उपायों का उद्देश्य मानसिक सहारा, आध्यात्मिक अनुशासन और शुभ कर्मों को बढ़ाना होना चाहिए। संतान संबंधी कठिनाई में चिकित्सा परामर्श और आवश्यक उपचार को प्राथमिकता दें।
• गुरुवार को पीली दाल या पीले वस्त्र का दान
• भगवान विष्णु और बाल गोपाल की पूजा
• संतान गोपाल मंत्र का जप
• अहोई अष्टमी पर अन्न और फल दान
• किसी बालक की शिक्षा में सहायता
• गौ या पशु सेवा
• माता पिता और बुजुर्गों का सम्मान
• गर्भवती स्त्री की सहायता
• पंचम भाव के स्वामी से संबंधित मंत्र का जप, यदि कुंडली अनुसार उचित हो
• दंपती द्वारा तनाव कम करने और स्वास्थ्य सुधार का संकल्प
रत्न धारण, विशेष पूजा या यज्ञ किसी योग्य ज्योतिषी और चिकित्सक की सलाह से ही करें। संतान प्राप्ति में विलंब को केवल पितृ दोष या ग्रह दोष बताकर भय पैदा करना अनुचित है।
अहोई अष्टमी में कई माताएं सूर्योदय से तारा दर्शन तक निर्जला व्रत रखती हैं। यह कठिन व्रत है। कुछ परिवार फलाहार या जल ग्रहण के साथ व्रत रखते हैं। दोनों में श्रद्धा हो सकती है।
निम्न स्थितियों में निर्जला व्रत से बचना चाहिए या चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
• गर्भावस्था
• स्तनपान
• मधुमेह
• रक्तचाप
• गुर्दे की बीमारी
• हृदय रोग
• माइग्रेन
• रक्ताल्पता
• बार बार चक्कर आना
• नियमित औषधि सेवन
यदि व्रत में बेहोशी, भ्रम, अत्यधिक कमजोरी, सांस लेने में कठिनाई या सीने में दर्द हो तो तुरंत जल और चिकित्सा सहायता लें। संतान की लंबी आयु के लिए रखा गया व्रत माता के स्वास्थ्य को खतरे में डालकर पूरा नहीं किया जाना चाहिए।
मातृत्व में चिंता और प्रेम दोनों होते हैं। संतान स्वस्थ हो, सुरक्षित रहे और जीवन में आगे बढ़े, यही माता की स्वाभाविक इच्छा होती है। अहोई अष्टमी इस चिंता को भय में बदलने के बजाय प्रार्थना और अनुशासन में बदलती है।
दिनभर का व्रत माता को अपनी संतान के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करा सकता है। शाम की पूजा परिवार को एक साथ लाती है। तारा दर्शन संतान के जीवन को अनंत आकाश से जोड़ता है। कथा माता को यह याद दिलाती है कि करुणा केवल मनुष्यों के लिए नहीं, पशु और प्रकृति के लिए भी होनी चाहिए।
मनोवैज्ञानिक रूप से यह पर्व निम्न भावों को मजबूत कर सकता है।
• संतान के प्रति जागरूकता
• परिवार में भावनात्मक संवाद
• मातृ भूमिका के प्रति सम्मान
• प्रार्थना और आशा
• पशु जीवों के प्रति करुणा
• बच्चों के साथ सामूहिक धार्मिक अनुभव
फिर भी माता को संतान के लिए अत्यधिक भय में नहीं जीना चाहिए। स्वस्थ अनुशासन, चिकित्सा, सुरक्षा और खुला संवाद संतान की वास्तविक रक्षा करते हैं।
अहोई अष्टमी में तारे को अर्घ्य देने की परंपरा के कारण इसे तारा साधना से जोड़ा जाता है। यहां तारा मुख्य रूप से आकाश में दिखाई देने वाले तारों का प्रतीक है। कुछ साधक देवी तारा का भी स्मरण करते हैं, जो संकट से पार लगाने वाली शक्ति मानी जाती हैं।
तारा का आध्यात्मिक भाव है।
• अंधकार में दिशा
• भय में साहस
• संकट में संरक्षण
• अज्ञान में ज्ञान
• अस्थिरता में मार्गदर्शन
यदि कोई व्यक्ति देवी तारा की विशेष तांत्रिक साधना करना चाहता है तो गुरु मार्गदर्शन आवश्यक है। सामान्य गृहस्थ के लिए तारों को अर्घ्य, अहोई माता की पूजा, संतान गोपाल मंत्र और सात्विक दान पर्याप्त सरल मार्ग हैं।
अहोई माता की कथा का सबसे महत्वपूर्ण नैतिक संदेश जीवों के प्रति करुणा है। मिट्टी खोदते समय किसी जीव के बच्चे को नुकसान पहुंचने का प्रसंग यह याद दिलाता है कि मनुष्य की छोटी असावधानी भी किसी प्राणी के जीवन को प्रभावित कर सकती है।
इस दिन निम्न संकल्प लिए जा सकते हैं।
• पशु पक्षियों को कष्ट नहीं देंगे
• जल स्रोतों को गंदा नहीं करेंगे
• बच्चों को जीवों के प्रति दयालु बनाएंगे
• अनावश्यक पेड़ पौधे नष्ट नहीं करेंगे
• घायल पशु की सहायता करेंगे
• भोजन और जल व्यर्थ नहीं करेंगे
संतान की रक्षा की प्रार्थना के साथ सभी जीवों की रक्षा का भाव जोड़ना अहोई पूजा को व्यापक बनाता है।
कुछ परिवार चांदी की अहोई माला में मोती या दाने रखते हैं। यह संतान, परिवार और पीढ़ी की निरंतरता का प्रतीक माना जा सकता है। कुछ स्थानों पर विवाह, संतान संख्या या परिवार की परंपरा के अनुसार दाने जोड़े जाते हैं।
इसका कोई एक सार्वभौमिक नियम नहीं है। चांदी की अहोई में दानों की संख्या को लेकर स्थानीय प्रथाएं अलग हो सकती हैं। इसे शुभ प्रतीक मानें, बाध्यता नहीं।
यदि परिवार में पहले से अहोई माला है तो उसे हर वर्ष पूजा के समय सम्मानपूर्वक निकाला जा सकता है। पूजा के बाद उसे स्वच्छ कपड़े में लपेटकर सुरक्षित स्थान पर रखें।
तारा दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा कई परिवारों में है। कुछ परिवार चंद्रमा को भी अर्घ्य देते हैं। व्रत पारण का समय और विधि परिवार की परंपरा के अनुसार हो सकती है।
तारों या चंद्रमा को अर्घ्य दें
अहोई माता से क्षमा और आशीर्वाद मांगें
बच्चों को प्रसाद दें
पहले जल ग्रहण करें
हल्का फल या भोजन लें
बहुत तला और भारी भोजन तुरंत न लें
शरीर की कमजोरी हो तो विश्राम करें
व्रत के बाद धीरे धीरे भोजन करना चाहिए। लंबे समय तक खाली रहने के बाद अत्यधिक भोजन करने से पेट में परेशानी हो सकती है।
अहोई अष्टमी में श्रद्धा के साथ विवेक भी आवश्यक है।
• बीमारी में निर्जला व्रत न रखें
• संतानहीन दंपती को दोषी या अशुभ न कहें
• ग्रह दोष के नाम पर महंगे अनुष्ठान के लिए भय न दिखाएं
• चांदी की अहोई को अनिवार्य न बताएं
• पूजा के लिए जीवों को नुकसान न पहुंचाएं
• तारा दर्शन के लिए असुरक्षित स्थान पर न जाएं
• बच्चों के सामने अंधविश्वास आधारित भय की बातें न करें
• व्रत को माताओं के बीच प्रतियोगिता न बनाएं
• संतान के स्वास्थ्य लक्षणों को केवल पूजा के भरोसे न छोड़ें
धार्मिक परंपरा जीवन का सहारा है। चिकित्सा, शिक्षा, सुरक्षा और जिम्मेदार पालन पोषण भी संतान मंगल के आवश्यक अंग हैं।
अहोई अष्टमी में माता अपनी संतान के लिए व्रत रखती है, लेकिन संतान के लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद केवल पूजा से नहीं आता। वह सुरक्षित घर, पौष्टिक भोजन, शिक्षा, भावनात्मक उपलब्धता, चिकित्सा और अच्छे संस्कार से आता है।
अहोई माता की पूजा माता को यह संकल्प दे सकती है कि वह अपनी संतान को भय से नहीं, प्रेम और समझ से मार्गदर्शन देगी। बच्चे को हर समय नियंत्रित करने के बजाय उसकी बात सुनना भी संतान रक्षा का एक रूप है।
संतान की दीर्घायु की प्रार्थना के साथ यह भी प्रार्थना होनी चाहिए कि बच्चा सत्य, करुणा, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी के साथ जीवन जिए।
अहोई अष्टमी 2026 में 1 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। संध्या पूजा और तारा दर्शन के समय माताएं अहोई माता से संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करेंगी। चांदी की अहोई, अहोई माला और तारा अर्घ्य इस पर्व को भावनात्मक गहराई देते हैं।
इस व्रत का सबसे सुंदर संदेश यह है कि मातृ प्रेम केवल अपनी संतान तक सीमित न रहे। वह पशु, प्रकृति, परिवार और समाज के प्रति करुणा में बदल जाए। अहोई माता की कथा भूल, पश्चाताप और सुधार की कहानी है। तारे आकाश की अनंतता का स्मरण कराते हैं। व्रत मन को संयम सिखाता है। दान हृदय को विस्तार देता है।
जब अहोई अष्टमी श्रद्धा, स्वास्थ्य, करुणा और विवेक के साथ मनाई जाती है तब यह केवल संतान की लंबी आयु की प्रार्थना नहीं रहती। यह आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित, संस्कारित और प्रेमपूर्ण संसार बनाने का मातृ संकल्प बन जाती है।
अहोई अष्टमी 2026 में कब मनाई जाएगी?
अहोई अष्टमी 2026 में रविवार, 1 नवंबर को मनाई जाएगी। यह कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है।
अहोई अष्टमी 2026 में पूजा का समय क्या है?
पूजा का समय लगभग शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक बताया गया है। स्थानीय पंचांग और सूर्यास्त के अनुसार समय में अंतर हो सकता है।
अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य कैसे दें?
पूजा के बाद स्वच्छ जल, अक्षत और पुष्प लेकर दिखाई देने वाले तारों को अर्घ्य दें। संतान के स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना करें और परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत खोलें।
चांदी की अहोई का क्या महत्व है?
चांदी की अहोई को अहोई माता का प्रतीक माना जाता है। चांदी चंद्रमा, शीतलता और मातृभाव से जुड़ी है। यह हर परिवार के लिए अनिवार्य नहीं बल्कि क्षेत्रीय परंपरा है।
क्या अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत सभी माताएं रख सकती हैं?
नहीं। गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, रोगी और नियमित औषधि लेने वाली माताओं को निर्जला व्रत से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
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