By पं. अभिषेक शर्मा
तारों का अर्घ्य, मंत्र और संतान सुख के ज्योतिषीय उपाय

अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला संतान मंगल पर्व है। इस दिन माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि और उज्ज्वल भविष्य के लिए व्रत रखती हैं। अनेक परिवारों में व्रत सूर्योदय से लेकर संध्या समय तारों के दर्शन और अर्घ्य तक रखा जाता है।
वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी 1 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। दिल्ली आधारित उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर लगभग 2 बजकर 51 मिनट से प्रारंभ होकर 2 नवंबर को दोपहर लगभग 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। पूजा का समय लगभग शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक बताया गया है। तारों के दर्शन का समय स्थान, सूर्यास्त और मौसम के अनुसार बदल सकता है।
तारों को अर्घ्य देने की परंपरा को संतान के भाग्य और बुद्धि से जोड़ा जाता है। यह ज्योतिषीय प्रतीक है, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध ऊर्जा उपचार नहीं। बच्चे के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के लिए पूजा के साथ चिकित्सा, पौष्टिक आहार, शिक्षा और भावनात्मक सहारा भी आवश्यक हैं।
| विवरण | अहोई अष्टमी 2026 की जानकारी |
|---|---|
| पर्व | अहोई अष्टमी या अहोई आठें |
| तिथि | 1 नवंबर 2026, रविवार |
| पक्ष | कार्तिक कृष्ण पक्ष |
| अष्टमी आरंभ | 1 नवंबर को दोपहर लगभग 2 बजकर 51 मिनट |
| अष्टमी समाप्त | 2 नवंबर को दोपहर लगभग 1 बजकर 10 मिनट |
| पूजा मुहूर्त | शाम लगभग 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट |
| तारा अर्घ्य | तारे दिखाई देने के बाद |
| मुख्य पूजा | अहोई माता, गणेश और संतान मंगल |
| मुख्य सामग्री | अहोई चित्र, करवा, जल, रोली, अक्षत, पुष्प |
| विशेष साधना | तारा दर्शन, अर्घ्य और संतान प्रार्थना |
| व्रत पारण | तारा अर्घ्य के बाद, परिवार परंपरा अनुसार |
• प्रातः स्नान करके संतान मंगल का संकल्प लें
• अहोई माता का चित्र या प्रतीक स्थापित करें
• दिनभर संयम और शांत व्यवहार रखें
• शाम को कथा और अहोई पूजा करें
• तारे दिखाई देने पर जल से अर्घ्य दें
• संतान के स्वास्थ्य और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें
• निर्जला व्रत स्वास्थ्य की अनुमति होने पर ही रखें
• तारों को अर्घ्य देने के बाद धीरे धीरे व्रत खोलें
अहोई माता को संतान रक्षा और परिवार के मंगल की देवी माना जाता है। तारा मंडल आकाश की अनंतता, दिव्य साक्षी और जीवन की व्यापक व्यवस्था का प्रतीक है। माता जब तारों को अर्घ्य देती है तो वह अपनी प्रार्थना को केवल घर की सीमा में नहीं रखती। वह आकाश, प्रकृति और ईश्वर को संतान के जीवन का साक्षी मानती है।
तारों की रोशनी दूर है, लेकिन उसका प्रतीक मन के लिए निकट है। वह बताती है कि बच्चे का जीवन केवल माता पिता की इच्छा से नहीं बनता। उसमें संस्कार, समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रकृति और समय की भूमिका भी रहती है।
| तारक प्रतीक | संतान जीवन में भाव |
|---|---|
| आकाश | अनंत संभावना |
| तारे | मार्गदर्शन और आशा |
| प्रकाश | बुद्धि और स्पष्टता |
| दूरी | स्वतंत्र विकास |
| समूह | परिवार और समाज |
| अर्घ्य | कृतज्ञता और प्रार्थना |
वैदिक ज्योतिष में संतान के लिए पंचम भाव, पंचमेश, गुरु, चंद्रमा और शुक्र का अध्ययन किया जाता है। पंचम भाव संतान, बुद्धि, पूर्व पुण्य और सृजन क्षमता से जुड़ा है। गुरु संतान का प्रमुख कारक माना जाता है। चंद्रमा मातृत्व, पोषण और भावनात्मक सुरक्षा का संकेत देता है।
| ज्योतिषीय तत्व | संतान संबंधी भाव |
|---|---|
| पंचम भाव | संतान, बुद्धि और पूर्व पुण्य |
| पंचमेश | संतान योग की दिशा |
| गुरु | संतान कारक और आशीर्वाद |
| चंद्रमा | मातृत्व और पालन |
| शुक्र | प्रजनन शक्ति और दांपत्य |
| नवम भाव | भाग्य और आशीर्वाद |
| एकादश भाव | इच्छा पूर्ति और सहयोग |
| दशा गोचर | घटनाओं का समय |
किसी बच्चे के भाग्य का निर्णय केवल जन्म राशि से नहीं किया जा सकता। माता पिता की कुंडली, संतान की कुंडली, दशा, गोचर और वास्तविक परिस्थिति को साथ देखना आवश्यक है।
अहोई अष्टमी पर तारे दिखाई देने के बाद अर्घ्य दिया जाता है। कुछ परिवार करवा या तांबे के पात्र से जल अर्पित करते हैं।
तारों को अर्घ्य देते समय जल सड़क, बिजली के तार या किसी व्यक्ति पर न गिराएं। नदी या जल स्रोत को पूजा सामग्री से दूषित न करें।
ॐ ऐं अहोई मातायै नमः
इसका भाव अहोई माता को ज्ञान, रक्षा और मातृशक्ति के रूप में प्रणाम करना है।
अहोई माता नमः।
संतान रक्षा करो माता, दीर्घायु और सुख दो माता।
यह लोक प्रार्थना है। इसे सरल भाव से जपा जा सकता है।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।
संतान के स्वास्थ्य और रोग मुक्ति की प्रार्थना में इसका जप किया जा सकता है। यह चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
ॐ देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।
इसका भाव भगवान कृष्ण से संतान और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करना है।
मंत्र का जप 11, 21 या 108 बार किया जा सकता है। जप संख्या से अधिक स्पष्ट उच्चारण और श्रद्धा महत्वपूर्ण है।
अहोई अष्टमी पर कुछ परिवार ज्योतिषीय और धार्मिक उपाय करते हैं। इन्हें निश्चित फल देने वाले अचूक उपाय न मानें।
• अहोई माता को दूध भात का भोग लगाएं
• सात अनाज अर्पित करें
• संतान के नाम से अन्न दान करें
• किसी बच्चे की पुस्तक या शिक्षा में सहायता करें
• तुलसी के पास घी का दीप जलाएं
• गुरु से संबंधित पीली दाल या पीले वस्त्र का दान करें
• बाल गोपाल की पूजा करें
• माता पिता और बुजुर्गों का आशीर्वाद लें
• संतान के स्वास्थ्य की नियमित जांच कराएं
• बच्चों के साथ प्रेमपूर्ण संवाद रखें
दान या पूजा से किसी संतानहीन दंपती को दोषी या अशुभ कहना अनुचित है। संतान संबंधी कठिनाई में चिकित्सकीय सहायता, परामर्श और भावनात्मक सहयोग आवश्यक हैं।
अहोई माता की लोककथा में एक स्त्री से अनजाने में साही या वन्य जीव के बच्चे को चोट पहुंचने का प्रसंग आता है। उसके बाद संतान पर संकट आता है। स्त्री पश्चाताप करती है, अहोई माता की पूजा करती है और जीवों के प्रति करुणा का संकल्प लेती है।
इस कथा में तारा साधना का गहरा संदेश छिपा है। तारे आकाश के जीवंत साक्षी हैं। माता जब उन्हें जल अर्पित करती है तो वह कहती है कि संतान की रक्षा केवल इच्छा से नहीं, करुणा और जिम्मेदारी से होगी।
• जीवों को नुकसान न पहुंचाएं
• गलती होने पर क्षमा मांगें
• प्रकृति का सम्मान करें
• संतान पर अत्यधिक भय न डालें
• बच्चों को दया और संवेदना सिखाएं
• परिवार में संवाद बनाए रखें
अहोई अष्टमी पर निर्जला व्रत की परंपरा प्रसिद्ध है। लेकिन निर्जला व्रत सभी माताओं के लिए सुरक्षित नहीं है।
इन स्थितियों में चिकित्सकीय सलाह लें।
• गर्भावस्था
• स्तनपान
• मधुमेह
• रक्तचाप
• गुर्दे या हृदय रोग
• रक्ताल्पता
• माइग्रेन
• बार बार चक्कर आना
• नियमित औषधि सेवन
यदि अत्यधिक कमजोरी, भ्रम, बेहोशी, सीने में दर्द या सांस की कठिनाई हो तो तुरंत जल और चिकित्सा सहायता लें। संतान की दीर्घायु के लिए रखा गया व्रत माता के स्वास्थ्य को संकट में डालकर पूरा नहीं किया जाना चाहिए।
तारों को ज्ञान और दिशा के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। संतान की बुद्धि के लिए ज्योतिष में पंचम भाव और बुध गुरु का अध्ययन किया जाता है। अहोई अष्टमी पर पुस्तक दान, शिक्षा सहायता और बालक को अच्छे संस्कार देना तारों की साधना से अधिक व्यावहारिक उपाय हैं।
माता पिता निम्न संकल्प ले सकते हैं।
• बच्चे को रोज कुछ समय ध्यान से सुनेंगे
• शिक्षा में तुलना के बजाय प्रोत्साहन देंगे
• स्क्रीन और नींद का संतुलन रखेंगे
• पौष्टिक भोजन देंगे
• अध्ययन के लिए शांत वातावरण देंगे
• प्रतिभा के अनुसार मार्गदर्शन देंगे
• गलती पर अपमान के बजाय समझाएंगे
बच्चे का बौद्धिक विकास केवल ग्रहों से निर्धारित नहीं होता। घर का वातावरण, शिक्षा, नींद, पोषण और भावनात्मक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हैं।
कुछ परिवार चांदी की अहोई या अहोई माला की पूजा करते हैं। चांदी का संबंध चंद्रमा, मन, मातृत्व और शीतलता से जोड़ा जाता है। इसे संतान सुरक्षा और मानसिक शांति का प्रतीक माना जा सकता है।
चांदी की अहोई अनिवार्य नहीं है। मिट्टी, कपड़े या कागज पर बनाया गया अहोई चित्र भी श्रद्धा से पूजित किया जा सकता है। आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने की आवश्यकता नहीं।
तारों को अर्घ्य देने के बाद कुछ माताएं शांत बैठकर संतान के नाम का स्मरण करती हैं। इस समय दीपक के सामने मंत्र जप या मौन ध्यान किया जा सकता है।
सरल साधना क्रम।
यह मानसिक अभ्यास माता की चिंता कम कर सकता है। गंभीर चिंता या बच्चे की बीमारी में विशेषज्ञ सहायता आवश्यक है।
• बीमारी में निर्जला व्रत न रखें
• तारों की ऊर्जा को निश्चित चिकित्सा न मानें
• बच्चे की बीमारी को केवल ग्रह दोष न कहें
• महंगे तांत्रिक अनुष्ठानों के दबाव में न आएं
• संतानहीन दंपती को दोष न दें
• असुरक्षित स्थान पर तारा दर्शन न करें
• बच्चों को डरावनी कथा से भयभीत न करें
• तिलक या मंत्र को जीवन की जिम्मेदारी का विकल्प न बनाएं
अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य देने की रस्म मातृ प्रेम को आकाश की विशालता से जोड़ती है। तारा मंडल संतान के लिए अनंत संभावना, बुद्धि और दिशा का प्रतीक बनता है। अहोई माता की कथा करुणा और प्रायश्चित सिखाती है। व्रत आत्मसंयम देता है। मंत्र मन को स्थिर करता है। दान समाज के प्रति जिम्मेदारी जगाता है।
जब यह पूजा स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और प्रेम के साथ जुड़ती है तब संतान की वास्तविक रक्षा होती है। तारे दूर हैं, लेकिन उनकी ओर उठे हाथ माता के भीतर आशा और धैर्य जगाते हैं।
अहोई अष्टमी 2026 में कब मनाई जाएगी?
अहोई अष्टमी 2026 में रविवार, 1 नवंबर को मनाई जाएगी। यह कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है।
अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
तारों को अर्घ्य देना संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु, बुद्धि और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना का प्रतीक है। इसे निश्चित ज्योतिषीय ऊर्जा उपचार नहीं माना जा सकता।
संतान सुख के लिए अहोई अष्टमी पर कौन सा मंत्र पढ़ें?
ॐ ऐं अहोई मातायै नमः, अहोई माता नमः और संतान गोपाल मंत्र का जप किया जा सकता है। महामृत्युंजय मंत्र भी स्वास्थ्य प्रार्थना में पढ़ा जा सकता है।
क्या अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत सभी माताएं रख सकती हैं?
नहीं। गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, रोगी और औषधि लेने वाली माताओं को चिकित्सकीय सलाह के बिना निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए।
क्या अहोई अष्टमी के उपायों से संतान की सभी बाधाएं दूर होती हैं?
पूजा और उपाय आध्यात्मिक सहारा दे सकते हैं। संतान के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य के लिए चिकित्सा, पोषण, सुरक्षा, संस्कार और भावनात्मक सहयोग भी आवश्यक हैं।
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