By पं. नीलेश शर्मा
चार महीने के संयम, साधना और विष्णु जागरण का फल

चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलने वाला धार्मिक अनुशासन काल है। वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई, शनिवार को मनाई गई और इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना गया। देवउठनी एकादशी की गणना 20 नवंबर, शुक्रवार या कुछ परंपराओं में 21 नवंबर के रूप में की जा सकती है। सूर्योदय और एकादशी तिथि के नियम के कारण स्थानीय पंचांग से पुष्टि आवश्यक है।
इस अवधि में भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने की मान्यता है। चातुर्मास का उद्देश्य विवाह और अन्य मांगलिक कार्य रोकना मात्र नहीं है। यह चार महीने शरीर, वाणी, आहार, इंद्रियों और मन को अनुशासित करने का समय है।
चातुर्मास में लिए गए व्रत का उद्यापन देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह या परिवार की परंपरा के अनुसार किया जा सकता है। उद्यापन का अर्थ व्रत को सम्मानपूर्वक पूर्ण करना, दान देना और आगे भी उसके अच्छे प्रभाव को जीवन में बनाए रखना है।
| विवरण | चातुर्मास 2026 की जानकारी |
|---|---|
| आरंभ | 25 जुलाई 2026, देवशयनी एकादशी |
| समापन | 20 नवंबर 2026, देवउठनी एकादशी, स्थानीय मत अनुसार 21 नवंबर |
| अवधि | लगभग चार महीने |
| मुख्य देवता | भगवान विष्णु, तुलसी और शिव |
| मुख्य अनुशासन | आहार, वाणी, ब्रह्मचर्य और इंद्रिय संयम |
| प्रमुख साधना | जप, स्नान, दीपदान, दान और सेवा |
| सामान्य निषेध | विवाह, गृह प्रवेश और बड़े मांगलिक आयोजन |
| उद्यापन समय | देवउठनी एकादशी या परिवार परंपरा अनुसार |
| मुख्य भाव | आत्मशुद्धि, जागरण और धर्मपूर्ण जीवन |
• अपनी क्षमता के अनुसार एक आहार नियम लें
• मांस, मदिरा और नशे से बचें
• वाणी में सत्य और संयम रखें
• ब्रह्मचर्य या दांपत्य मर्यादा का पालन करें
• नियमित विष्णु, शिव या इष्ट देव साधना करें
• दान और सेवा जारी रखें
• अनावश्यक यात्रा और विलास कम करें
• स्वास्थ्य के विरुद्ध कठोर व्रत न रखें
चातुर्मास में भगवान विष्णु के क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाने की मान्यता है। देवशयनी एकादशी पर भगवान विश्राम में जाते हैं और देवउठनी एकादशी पर जागते हैं।
इस कथा को प्रतीकात्मक रूप से समझना चाहिए। परमात्मा वास्तव में निष्क्रिय नहीं होते। यह अवधि साधक को बाहरी उत्सव से हटाकर भीतर की साधना की ओर ले जाती है। वर्षा ऋतु में यात्रा कठिन होती थी, नदियां उफनती थीं, स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ते थे और कृषि जीवन व्यस्त रहता था। इसलिए प्राचीन समाज में बड़े विवाह और मांगलिक आयोजन रोककर साधना को प्राथमिकता दी जाती थी।
देवशयनी का अर्थ है भीतर जाना। देवउठनी का अर्थ है धर्मपूर्ण कर्म के लिए फिर जागना।
चातुर्मास में भोजन संबंधी नियम क्षेत्र और परिवार के अनुसार बदलते हैं। कुछ परंपराओं में सावन में पत्तेदार सब्जियों से बचते हैं। भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में कुछ दाल या भारी भोजन से बचने की परंपरा मिलती है।
इन नियमों को कठोर चिकित्सा आदेश न मानें। मौसम, शरीर की प्रकृति और स्थानीय भोजन को देखते हुए आहार चुनें।
| अनुशासन | संभावित भाव |
|---|---|
| मांस और मदिरा त्याग | अहिंसा और मन की शांति |
| सीमित भोजन | इंद्रिय संयम |
| ताजा भोजन | पाचन और स्वच्छता |
| एक समय भोजन | इच्छा अनुशासन |
| फलाहार | सरलता और व्रत |
| मौसमी भोजन | प्रकृति के साथ संतुलन |
गर्भवती स्त्रियां, स्तनपान कराने वाली माताएं, बच्चे, बुजुर्ग और रोगी कठोर आहार नियम न लें। चिकित्सा की आवश्यकता में डॉक्टर की सलाह सर्वोच्च है।
चातुर्मास में केवल भोजन नहीं, वाणी का भी व्रत रखा जाता है। निंदा, झूठ, अपशब्द, चुगली और व्यर्थ विवाद से बचना साधना का हिस्सा है।
ब्रह्मचर्य का अर्थ हर व्यक्ति के लिए संन्यास नहीं है। गृहस्थ के लिए इसका अर्थ दांपत्य मर्यादा, दृष्टि संयम, वासना पर नियंत्रण और संबंधों में निष्ठा हो सकता है।
• सच बोलें, लेकिन कठोरता से नहीं
• दूसरों की अनुपस्थिति में निंदा न करें
• क्रोध में संदेश या निर्णय न लें
• परिवार में क्षमा का अभ्यास करें
• सामाजिक माध्यमों पर झूठ न फैलाएं
• संबंध में निष्ठा रखें
• पराई स्त्री या पुरुष के प्रति गलत दृष्टि न रखें
• साथी की गरिमा का सम्मान करें
• इच्छा और मर्यादा का संतुलन रखें
• मतभेद को संवाद से सुलझाएं
परंपरा में चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन, मुंडन और बड़े मांगलिक कार्यों को टालने की सलाह दी जाती है। कारण भगवान विष्णु का योगनिद्रा में होना, वर्षा ऋतु और सामाजिक सुविधा माना गया है।
यह निषेध आवश्यक चिकित्सा, शिक्षा, नौकरी, कानूनी कार्य या आपात स्थिति पर लागू नहीं होता। जीवन की अनिवार्य जिम्मेदारियां केवल मुहूर्त के भय से नहीं रोकनी चाहिए।
| कार्य | चातुर्मास में सामान्य परंपरा |
|---|---|
| विवाह | सामान्यतः स्थगित |
| गृह प्रवेश | सामान्यतः स्थगित |
| उपनयन | परिवार और परंपरा अनुसार |
| नया व्यवसाय | कुछ परंपराओं में स्थगित |
| चिकित्सा | आवश्यकता अनुसार तुरंत |
| शिक्षा | जारी रखें |
| नौकरी | जारी रखें |
| पूजा और व्रत | सामान्य रूप से जारी |
चातुर्मास में साधक एक ही नियम पूरे चार महीने रख सकता है या हर महीने अलग अनुशासन ले सकता है।
देवशयनी एकादशी पर संकल्प लें। विष्णु पूजा, तुलसी सेवा और नियमित दीपदान आरंभ करें।
आहार संयम और वाणी शुद्धि पर ध्यान दें। सप्ताह में एक दिन दान करें।
साधना में जप, पाठ और ध्यान जोड़ें। क्रोध और निंदा पर विशेष काम करें।
कार्तिक में दीपदान, स्नान, विष्णु सहस्रनाम, तुलसी पूजा और सेवा बढ़ाएं।
देवउठनी एकादशी पर व्रत का उद्यापन करें। लिए गए नियमों की समीक्षा करें और अच्छे अनुशासन को आगे भी जारी रखें।
उद्यापन केवल पूजा समाप्त करना नहीं है। यह व्रत के प्रति कृतज्ञता और पूर्णता का संस्कार है। यदि किसी व्यक्ति ने चार महीने प्याज लहसुन त्याग, एक समय भोजन, मौन, जप या ब्रह्मचर्य का नियम लिया था तो देवउठनी पर वह भगवान को धन्यवाद देता है।
उद्यापन में निम्न भाव रखें।
• व्रत में हुई भूल के लिए क्षमा
• भगवान विष्णु का आभार
• दान और सेवा
• परिवार के सहयोग की स्वीकृति
• अच्छे नियमों को आगे जारी रखने का संकल्प
उद्यापन में खर्च दिखावे के लिए न करें। सामर्थ्य अनुसार सरल पूजा भी पूर्ण मानी जा सकती है।
दान उद्यापन का महत्वपूर्ण अंग है। दान से व्रत का फल समाज तक पहुंचता है। दान का चयन व्यक्ति की क्षमता और जरूरत के अनुसार करें।
| दान | भाव |
|---|---|
| अन्न | जीवन और पोषण |
| पीली दाल | गुरु और ज्ञान |
| वस्त्र | सम्मान और सुरक्षा |
| कंबल | ठंड से रक्षा |
| दीप और तेल | प्रकाश |
| पुस्तक | विद्या |
| औषधि | स्वास्थ्य |
| गौ चारा | पशु सेवा |
| दक्षिणा | कृतज्ञता और सहयोग |
प्राप्तकर्ता का सम्मान रखें। खराब वस्तु देकर उद्यापन पूरा करना उचित नहीं है।
देवउठनी एकादशी के बाद तुलसी विवाह की परंपरा कई क्षेत्रों में होती है। तुलसी को वधू और शालिग्राम को भगवान विष्णु का वर स्वरूप मानकर विवाह कराया जाता है।
कुछ परिवार एकादशी की शाम विवाह करते हैं। अनेक परिवार द्वादशी को मुख्य विवाह मानते हैं। 2026 में 21 नवंबर को तुलसी विवाह करने की परंपरा कई पंचांगों में दिखाई देती है।
तुलसी विवाह चातुर्मास के अंत और गृहस्थ जीवन के शुभ आरंभ का प्रतीक है। यह विवाह बाधा का निश्चित उपचार नहीं, लेकिन संबंधों में पवित्रता और आशा का आध्यात्मिक संस्कार है।
चातुर्मास में शनि, गुरु, चंद्रमा और विष्णु तत्त्व का प्रतीकात्मक संबंध देखा जा सकता है। संयम शनि को, ज्ञान गुरु को, भक्ति चंद्रमा को और संरक्षण विष्णु को दर्शाता है।
| ग्रह या तत्त्व | चातुर्मास का भाव |
|---|---|
| गुरु | धर्म, ज्ञान और आशीर्वाद |
| शनि | अनुशासन, श्रम और धैर्य |
| चंद्रमा | व्रत, मन और भक्ति |
| विष्णु | संरक्षण और संतुलन |
| शुक्र | विवाह और गृहस्थ सौम्यता |
| सूर्य | संकल्प और आत्मबल |
कुंडली के ग्रह दोष का निर्णय केवल व्रत से नहीं किया जा सकता। ग्रहों की दशा, गोचर और जन्म कुंडली का समग्र विचार आवश्यक है।
• स्वास्थ्य के विरुद्ध निर्जला व्रत न करें
• व्रत को प्रदर्शन न बनाएं
• परिवार पर कठोर नियम न थोपें
• भोजन में कुपोषण न आने दें
• चिकित्सा बंद न करें
• विवाह निषेध के नाम पर आवश्यक कार्य न रोकें
• दान में अनुपयोगी वस्तु न दें
• झूठ, निंदा और हिंसा से बचें
• उद्यापन को महंगे प्रदर्शन में न बदलें
चातुर्मास व्यक्ति को रोककर देखने का समय देता है। वह पूछता है कि भोजन पर कितना नियंत्रण है, वाणी में कितनी शुद्धता है, संबंधों में कितनी निष्ठा है और जीवन में कितना समय ईश्वर तथा सेवा के लिए है।
देवशयनी से देवउठनी तक का काल भीतर की नींद से जागने की यात्रा है। पहले व्यक्ति कुछ छोड़ता है, फिर भीतर स्थान बनाता है। अंत में वह जागकर धर्मपूर्ण कर्म की ओर लौटता है।
चातुर्मास का पूर्ण फल किसी जादुई वरदान की तरह नहीं आता। वह शांत मन, संयमित व्यवहार, स्वच्छ शरीर, सरल जीवन और जिम्मेदार कर्म के रूप में दिखाई देता है।
चातुर्मास 2026 की शुरुआत 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी से हुई और इसका समापन 20 नवंबर की देवउठनी एकादशी पर माना जा रहा है। कुछ पंचांगों में एकादशी के सूर्योदय नियम के कारण 21 नवंबर का मत भी मिल सकता है।
उद्यापन उसी दिन करें जब स्थानीय पंचांग देवउठनी एकादशी को मान्य बताए। व्रत के नियम समाप्त करते समय संयम को पूरी तरह न छोड़ें। चातुर्मास का उद्देश्य चार महीने तक कठोर रहना नहीं बल्कि आगे के जीवन को अधिक धर्मपूर्ण बनाना है।
जब भगवान विष्णु के जागरण के साथ व्यक्ति की विवेक चेतना भी जागती है तब चातुर्मास का फल प्रकट होता है। व्रत समाप्त होता है, लेकिन सत्य, सेवा, संयम और करुणा की यात्रा आगे चलती रहती है।
चातुर्मास 2026 कब से कब तक है?
चातुर्मास 2026 में 25 जुलाई, देवशयनी एकादशी से शुरू हुआ और देवउठनी एकादशी तक चलता है। समापन 20 या 21 नवंबर माना जा सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखें।
चातुर्मास में कौन से कार्य वर्जित होते हैं?
विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन और बड़े मांगलिक कार्यों को सामान्यतः टाला जाता है। चिकित्सा, शिक्षा, नौकरी और आवश्यक कानूनी कार्यों को नहीं रोकना चाहिए।
चातुर्मास में कौन से नियम रखे जा सकते हैं?
सात्विक आहार, नशा त्याग, वाणी संयम, ब्रह्मचर्य, जप, दीपदान, तुलसी सेवा, दान और नियमित स्नान के नियम रखे जा सकते हैं।
चातुर्मास का उद्यापन कैसे करें?
देवउठनी एकादशी पर विष्णु पूजा, तुलसी पूजन, मंत्र पाठ, भोजन, दान और क्षमा प्रार्थना करके व्रत का उद्यापन किया जा सकता है।
क्या चातुर्मास के नियम सभी लोगों के लिए समान हैं?
नहीं। नियम परिवार, संप्रदाय, स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार बदलते हैं। रोगी, गर्भवती, बच्चे और वृद्ध कठोर नियम न रखें।
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