दीपावली 2026 लक्ष्मी पूजन

By पं. अमिताभ शर्मा

प्रदोष काल, स्थिर लग्न, श्रीसूक्त और कनकधारा पाठ

दीपावली 2026: लक्ष्मी पूजन मुहूर्त और श्रीसूक्त विधि

सामग्री तालिका

अमावस्या की रात में प्रकाश का महापर्व

दीपावली कार्तिक अमावस्या की रात्रि को मनाया जाने वाला प्रकाश, समृद्धि और शुभ आरंभ का महापर्व है। वर्ष 2026 में दीपावली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन लक्ष्मी गणेश पूजन, दीपदान, घर की सफाई, परिवार का मिलन और श्रीसूक्त तथा कनकधारा स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

नई दिल्ली की उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार अमावस्या तिथि 7 नवंबर को प्रातः लगभग 10 बजकर 47 मिनट से प्रारंभ होकर 8 नवंबर को प्रातः लगभग 11 बजकर 27 मिनट तक रहेगी। लक्ष्मी पूजन उसी दिन किया जाता है जब अमावस्या प्रदोष काल में उपलब्ध हो। 2026 में प्रदोष काल लगभग शाम 5 बजकर 31 मिनट से 8 बजकर 9 मिनट तक रहेगा।

लक्ष्मी पूजन का श्रेष्ठ समय स्थिर लग्न में माना जाता है। वृषभ लग्न स्थिर लग्न है और लक्ष्मी को घर में ठहराने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। नई दिल्ली में वृषभ लग्न लगभग शाम 5 बजकर 56 मिनट से 7 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। यही काल लक्ष्मी गणेश पूजन का प्रमुख मुहूर्त माना जा रहा है।

विवरण दीपावली 2026 की जानकारी
पर्व दीपावली, दीवाली, लक्ष्मी पूजन
तिथि 8 नवंबर 2026, रविवार
पक्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष
तिथि अमावस्या
अमावस्या आरंभ 7 नवंबर को प्रातः लगभग 10 बजकर 47 मिनट
अमावस्या समाप्त 8 नवंबर को प्रातः लगभग 11 बजकर 27 मिनट
प्रदोष काल शाम लगभग 5 बजकर 31 मिनट से 8 बजकर 9 मिनट
लक्ष्मी पूजन मुहूर्त शाम लगभग 5 बजकर 56 मिनट से 7 बजकर 52 मिनट
स्थिर लग्न वृषभ लग्न
महानिशीथ काल रात्रि लगभग 11 बजकर 39 मिनट से 12 बजकर 31 मिनट
मुख्य पूजा लक्ष्मी, गणेश, कुबेर और सरस्वती
विशेष पाठ श्रीसूक्त और कनकधारा स्तोत्र
मूल भाव प्रकाश, समृद्धि, स्वच्छता और स्थिर लक्ष्मी

दीपावली के प्राथमिक नियम

• दिन में घर, आंगन और पूजा स्थान की पूर्ण सफाई करें

• मुख्य द्वार पर दीप, रंगोली और शुभ चिह्न लगाएं

• प्रदोष काल में स्थिर लग्न देखकर लक्ष्मी गणेश पूजन करें

• गणेश जी का पूजन लक्ष्मी से पहले करें

• श्रीसूक्त या कनकधारा स्तोत्र का पाठ श्रद्धा से करें

• तिजोरी, बहीखाता और धन स्थान को स्वच्छ रखें

• अग्नि सुरक्षा और बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखें

• पूजा के बाद अन्न, वस्त्र या स्वास्थ्य सहायता का दान करें

दीपावली का आध्यात्मिक अर्थ

दीपावली केवल दीप जलाने का पर्व नहीं है। अमावस्या की घनी रात में प्रकाश फैलाना अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक माना जाता है। जहां बाहर दीपक जलता है, वहां भीतर भी लोभ, क्रोध, ईर्ष्या और आलस्य को कम करने का संकल्प होना चाहिए।

दीपावली से कई कथाएं जुड़ी हैं। उत्तर भारत में भगवान राम के अयोध्या आगमन का स्मरण किया जाता है। वैष्णव परंपरा में देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा का भाव प्रमुख है। जैन परंपरा में भगवान महावीर के निर्वाण का स्मरण होता है। सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस का महत्व है। ये सभी धाराएं प्रकाश, मुक्ति और शुभता की ओर ले जाती हैं।

दीपावली का सबसे व्यावहारिक संदेश यह है कि समृद्धि स्वच्छता, अनुशासन, ईमानदार कर्म और कृतज्ञता के साथ आती है।

प्रदोष काल क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का पवित्र समय माना जाता है। दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के लिए प्रदोष काल इसलिए चुना जाता है क्योंकि अमावस्या की तिथि उसी सांध्यकाल में सक्रिय रहती है और दिन की व्यस्तता के बाद मन पूजा के लिए शांत होता है।

स्थिर लग्न का महत्व इसलिए है कि चर लग्न में की गई पूजा से लक्ष्मी अस्थिर रह सकती है, ऐसी पारंपरिक मान्यता है। वृषभ लग्न पृथ्वी तत्त्व और स्थिरता से जुड़ा है। इसी कारण उसे स्थिर लक्ष्मी के लिए श्रेष्ठ माना गया।

काल समय भाव उपयोग
प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद मुख्य लक्ष्मी पूजन
वृषभ लग्न स्थिर लग्न लक्ष्मी को स्थिर करने का मुहूर्त
महानिशीथ मध्य रात्रि के निकट विशेष साधना, काली उपासना परंपरा
सामान्य दीपदान शाम से रात्रि घर और द्वार का प्रकाश

महानिशीथ काल कुछ शाक्त और साधना परंपराओं में विशेष माना जाता है। सामान्य गृहस्थ के लिए प्रदोष काल और वृषभ लग्न पर्याप्त तथा सुरक्षित मुहूर्त हैं। जटिल तांत्रिक साधना गुरु मार्गदर्शन के बिना नहीं करनी चाहिए।

लक्ष्मी गणेश पूजन सामग्री

पूजा से पहले सामग्री व्यवस्थित कर लें।

सामग्री उपयोग
गणेश और लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापना
कुबेर चित्र धन संरक्षण भाव
कलश पूर्णता और शुभ आरंभ
लाल या पीला वस्त्र आसन
रोली, अक्षत, हल्दी तिलक और अर्पण
पुष्प, विशेषकर कमल या गुलाब देवी अर्पण
दीपक और घी या तेल प्रकाश
धूप और अगरबत्ती सुगंध
मिठाई, फल, पान नैवेद्य
सिक्के, तिजोरी या बहीखाता लक्ष्मी कुबेर भाव
श्रीसूक्त या स्तोत्र पुस्तक पाठ
जल और पंचामृत अभिषेक

सामग्री उपलब्ध न हो तो स्वच्छ जल, दीप, पुष्प और श्रद्धा से भी पूजा संभव है। महंगी सामग्री से अधिक महत्वपूर्ण भाव और स्वच्छता हैं।

लक्ष्मी गणेश पूजा विधि

दीपावली की पूजा में गणेश जी का स्मरण पहले किया जाता है क्योंकि वे विघ्न हर्ता और शुभ आरंभ के अधिष्ठाता हैं। इसके बाद लक्ष्मी, कुबेर और परिवार की परंपरा के अनुसार सरस्वती का पूजन होता है।

सरल पूजा क्रम

  1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  2. पूजा स्थान पर चौकी और वस्त्र बिछाएं
  3. गणेश, लक्ष्मी और कुबेर की स्थापना करें
  4. कलश स्थापित करें
  5. गणेश जी को जल, अक्षत, पुष्प और मोदक अर्पित करें
  6. लक्ष्मी जी को जल, अक्षत, कुमकुम, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें
  7. तिजोरी, सिक्के या बहीखाता पूजा में रखें
  8. श्रीसूक्त या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें
  9. लक्ष्मी और गणेश मंत्र का जप करें
  10. आरती करें
  11. क्षमा प्रार्थना करें
  12. प्रसाद वितरित करें
  13. घर के द्वार और आंगन में दीप जलाएं
  14. जरूरतमंद को अन्न या वस्त्र दें

पूजा के समय परिवार को एक साथ बैठना शुभ माना जाता है। बच्चों को भी सरल मंत्र और दीपदान सिखाया जा सकता है।

गणेश और लक्ष्मी मंत्र

गणेश मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः

इसका अर्थ है गणपति को नमस्कार। यह विघ्न निवारण और शुभ आरंभ का मंत्र है।

लक्ष्मी मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

इसका अर्थ है महालक्ष्मी को नमस्कार। श्रीं बीज समृद्धि और शुभता का संकेत देता है।

संयुक्त भाव प्रार्थना

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद।
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।

इस प्रार्थना का भाव कमल निवासिनी महालक्ष्मी से कृपा और प्रसन्नता की याचना करना है।

जप संख्या 11, 21 या 108 रखी जा सकती है। संख्या से अधिक उच्चारण की शुद्धता और मन की एकाग्रता आवश्यक है।

श्रीसूक्त पाठ के नियम

श्रीसूक्त ऋग्वेद से जुड़ा देवी लक्ष्मी का पवित्र सूक्त माना जाता है। इसमें लक्ष्मी को समृद्धि, यश, अन्न, पशु, संतति और शुभता की अधिष्ठात्री के रूप में स्मरण किया गया है। दीपावली पर श्रीसूक्त का पाठ विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

श्रीसूक्त पाठ की सरल विधि

  1. पूजा स्थान स्वच्छ रखें
  2. स्नान के बाद पूर्वाभिमुख या उत्तर की ओर बैठें
  3. दीप जलाएं
  4. लक्ष्मी जी का ध्यान करें
  5. श्रीसूक्त का स्पष्ट उच्चारण करें
  6. प्रत्येक मंत्र के बाद पुष्प या अक्षत अर्पित कर सकते हैं
  7. पाठ के अंत में क्षमा प्रार्थना करें
  8. प्रसाद ग्रहण करें

यदि पूरा श्रीसूक्त याद न हो तो प्रामाणिक पुस्तक से धीरे धीरे पढ़ें। गलत उच्चारण के भय से पाठ छोड़ने के बजाय सरल लक्ष्मी मंत्र का जप भी किया जा सकता है।

श्रीसूक्त का भाव केवल धन मांगना नहीं है। उसमें यश, सदाचार, परिवार की स्थिरता और जीवन में शुभता की प्रार्थना भी है। जो व्यक्ति अन्याय से धन चाहता है वह श्रीसूक्त के मूल भाव से दूर चला जाता है।

कनकधारा स्तोत्र का महत्व

कनकधारा स्तोत्र आदि शंकराचार्य से जुड़ी परंपरा में देवी लक्ष्मी की स्तुति है। कनकधारा का अर्थ स्वर्ण की धारा है। कथा के अनुसार एक निर्धन स्त्री की निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर शंकराचार्य ने लक्ष्मी स्तुति की और कृपा का प्रवाह हुआ।

दीपावली पर कनकधारा स्तोत्र पढ़ने का भाव यह है कि धन करुणा, दान और सद्भावना के साथ आए। केवल संग्रह की इच्छा से पाठ करना अधूरा है।

कनकधारा पाठ के नियम

• स्वच्छ वस्त्र और शांत मन से पढ़ें

• लक्ष्मी चित्र या दीप के सामने बैठें

• पाठ से पहले गणेश स्मरण करें

• पूरा स्तोत्र एक बैठक में पढ़ने का प्रयास करें

• यदि समय कम हो तो नियमित रूप से कुछ श्लोक नित्य पढ़ें

• पाठ के बाद जरूरतमंद की सहायता करें

• धन के दुरुपयोग से बचने का संकल्प लें

स्थिर लग्न और स्थिर लक्ष्मी

ज्योतिष में चर, स्थिर और द्विस्वभाव लग्न होते हैं। स्थिर लग्न में की गई स्थापना और पूजा दीर्घकालिक फल देने वाली मानी जाती है। वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ स्थिर राशियां हैं। दीपावली की सांध्या में प्रायः वृषभ लग्न उपलब्ध होता है, इसलिए उसे लक्ष्मी पूजन के लिए चुना जाता है।

स्थिर लक्ष्मी का अर्थ केवल बैंक बैलेंस नहीं है। इसका अर्थ है।

• आय का स्थायित्व

• खर्च का अनुशासन

• परिवार में सहयोग

• स्वास्थ्य की रक्षा

• ईमानदार व्यवसाय

• ऋण का नियंत्रण

• दान और सेवा का भाव

यदि पूजा स्थिर लग्न में हो और जीवन अव्यवस्थित रहे तो बाहरी मुहूर्त का लाभ सीमित रह जाता है। मुहूर्त द्वार खोलता है, चलना साधक को पड़ता है।

दीपावली पर घर और दिशा व्यवस्था

लक्ष्मी स्वच्छ, प्रकाशित और शांत घर में रमती हैं, ऐसी मान्यता है। मुख्य द्वार खुला, स्वच्छ और सुसज्जित होना चाहिए। टूटे दीपक, कचरा और अंधेरे कोने साफ करें।

स्थान क्या करें
मुख्य द्वार रंगोली, तोरण और दीप
पूजा स्थान गणेश लक्ष्मी स्थापना
तिजोरी सफाई और हल्दी अक्षत
रसोई अन्नपूर्णा भाव से स्वच्छता
आंगन दीपमाला
तुलसी दीप और जल
शयन कक्ष अत्यधिक अव्यवस्था न रखें

उत्तर और पूर्व दिशा के स्वच्छ भाग में दीप रखना कई परिवारों में शुभ माना जाता है। फिर भी अग्नि सुरक्षा हर दिशा से ऊपर है।

पांच दिवसीय दीपावली क्रम

दीपावली अकेले एक दिन का पर्व नहीं, पांच दिवसीय श्रृंखला का केंद्र है।

दिन पर्व भाव
प्रथम धनतेरस स्वास्थ्य और धन आरंभ
द्वितीय नरक चतुर्दशी शुद्धि और यम दीप
तृतीय दीपावली लक्ष्मी गणेश पूजन
चतुर्थ गोवर्धन पूजा प्रकृति और अन्न सम्मान
पंचम भाई दूज परिवार स्नेह

2026 में धनतेरस 6 नवंबर, नरक चतुर्दशी का संध्या भाव 7 नवंबर और मुख्य दीपावली 8 नवंबर को मानी जा रही है। स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दीपावली

अमावस्या की रात वर्ष की सबसे अंधेरी रातों में गिनी जाती है। उसी रात दीप जलाना मन को यह संदेश देता है कि परिस्थिति कितनी भी कठिन हो, एक छोटा प्रकाश आरंभ करने योग्य होता है। परिवार का साथ, घर की सफाई, मिठाई और प्रार्थना मिलकर आशा और सामाजिक जुड़ाव बढ़ाते हैं।

व्यापारियों के लिए नई बही और नए संकल्प का समय है। गृहस्थों के लिए कृतज्ञता और परिवार प्रेम का समय है। साधकों के लिए अंतरात्मा के अंधकार को देखने और प्रकाश चुनने का समय है।

क्या करें और क्या न करें

करें

• घर की सफाई

• स्थिर लग्न में पूजा

• गणेश लक्ष्मी का संयुक्त पूजन

• श्रीसूक्त या कनकधारा पाठ

• दीपदान

• सात्विक भोजन

• दान

• परिवार से मधुर संवाद

न करें

• अव्यवस्थित और गंदा घर छोड़ना

• केवल दिखावे की खरीदारी

• पूजा के समय झगड़ा

• असुरक्षित पटाखे

• नशा

• जरूरतमंद का अपमान

• लक्ष्मी को केवल धन तक सीमित समझना

• पर्यावरण को प्रदूषित करना

ज्योतिषीय संकेत

दीपावली पर चंद्रमा अमावस्या में सूर्य के साथ होता है। यह संयोग मन और आत्मा के मिलन, पुराने बोझ की समाप्ति और नए संकल्प का संकेत देता है। शुक्र समृद्धि और सौंदर्य से, गुरु धर्म और विस्तार से, बुध व्यापार और गणना से जुड़ा माना जाता है।

ग्रह दीपावली भाव
सूर्य आत्मबल और प्रकाश
चंद्रमा मन और गृहस्थ सुख
शुक्र लक्ष्मी, सौंदर्य, सुविधा
गुरु धर्म, दान, स्थिरता
बुध व्यापार, लेखा, बुद्धि
शनि अनुशासन और कर्म

व्यक्तिगत धन योग का निर्णय केवल दीपावली मुहूर्त से नहीं होता। जन्म कुंडली और कर्म का समग्र विचार आवश्यक है।

दीप से समृद्धि तक

दीपावली 2026 में 8 नवंबर को प्रदोष काल और वृषभ स्थिर लग्न लक्ष्मी गणेश पूजन के लिए विशेष रूप से अनुकूल माने जा रहे हैं। श्रीसूक्त और कनकधारा स्तोत्र देवी कृपा का वाचिक माध्यम बन सकते हैं। लेकिन सच्ची समृद्धि तब स्थिर होती है जब घर स्वच्छ हो, आय न्यायपूर्ण हो, खर्च संयमित हो, स्वास्थ्य सुरक्षित हो और हृदय में दान का भाव हो।

अमावस्या की रात याद दिलाती है कि अंधकार स्थायी नहीं है। एक दीप भी दिशा बदल सकता है। जब वह दीप विवेक, भक्ति और परिवार के प्रेम से जलता है तब लक्ष्मी केवल तिजोरी में नहीं, जीवन की हर व्यवस्था में बसती हैं।

FAQ

दीपावली 2026 में कब है?

दीपावली 2026 में रविवार, 8 नवंबर को मनाई जाएगी। लक्ष्मी पूजन उसी दिन प्रदोष काल में किया जाएगा।

दीपावली 2026 का लक्ष्मी पूजन मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली में लक्ष्मी पूजन का श्रेष्ठ समय लगभग शाम 5 बजकर 56 मिनट से 7 बजकर 52 मिनट तक माना जा रहा है। यह प्रदोष काल का वृषभ स्थिर लग्न है।

स्थिर लग्न में लक्ष्मी पूजा क्यों की जाती है?

स्थिर लग्न में की गई पूजा से लक्ष्मी स्थिर रहने की पारंपरिक मान्यता है। वृषभ लग्न स्थिरता और स्थायी समृद्धि का संकेत देता है।

दीपावली पर श्रीसूक्त कैसे पढ़ें?

स्नान के बाद स्वच्छ स्थान पर दीप जलाकर लक्ष्मी का ध्यान करें और श्रीसूक्त का स्पष्ट उच्चारण करें। अंत में क्षमा प्रार्थना और प्रसाद ग्रहण करें।

कनकधारा स्तोत्र दीपावली पर क्यों पढ़ा जाता है?

कनकधारा स्तोत्र देवी लक्ष्मी की स्तुति है। इसका पाठ समृद्धि, करुणा और सद्भावना के साथ धन आने की प्रार्थना के लिए किया जाता है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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