By पं. नरेंद्र शर्मा
रोहिणी नक्षत्र, शिव योग और चंद्र पूजा का शास्त्रीय विधान

करवा चौथ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाने वाला दांपत्य पर्व है। वर्ष 2026 में करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। नई दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को रात्रि 1 बजकर 6 मिनट से प्रारंभ होकर उसी दिन रात्रि 10 बजकर 9 मिनट तक रहेगी।
इस दिन व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक रखा जाता है। नई दिल्ली में सूर्योदय लगभग सुबह 6 बजकर 31 मिनट पर और चंद्रोदय लगभग रात 8 बजकर 11 मिनट पर माना जा रहा है। करवा चौथ पूजा का सामान्य समय शाम 5 बजकर 38 मिनट से 6 बजकर 56 मिनट तक बताया गया है। शहर के अनुसार चंद्रोदय और पूजा समय में अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत खोलने के लिए अपने स्थानीय पंचांग का चंद्रोदय समय ही मानना चाहिए।
2026 में रोहिणी नक्षत्र और शिव योग को लेकर विशेष चर्चा है। कुछ पंचांग गणनाओं में रोहिणी नक्षत्र दिन के पहले भाग तक और शिव योग चंद्रोदय के आसपास तक माना गया है। पंचांग पद्धति और स्थान के अनुसार योग तथा नक्षत्र की समाप्ति में अंतर संभव है। इसलिए इस संयोग को शुभ आध्यात्मिक वातावरण के रूप में समझना चाहिए, वैवाहिक जीवन की निश्चित गारंटी के रूप में नहीं।
| विवरण | करवा चौथ 2026 की जानकारी |
|---|---|
| पर्व | करवा चौथ या करक चतुर्थी |
| तिथि | 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार |
| पक्ष | कार्तिक कृष्ण पक्ष |
| तिथि | चतुर्थी |
| तिथि आरंभ | 29 अक्टूबर को रात्रि 1 बजकर 6 मिनट |
| तिथि समाप्त | 29 अक्टूबर को रात्रि 10 बजकर 9 मिनट |
| व्रत अवधि | सूर्योदय से चंद्रोदय तक |
| नई दिल्ली सूर्योदय | लगभग सुबह 6 बजकर 31 मिनट |
| नई दिल्ली चंद्रोदय | लगभग रात 8 बजकर 11 मिनट |
| पूजा मुहूर्त | शाम 5 बजकर 38 मिनट से 6 बजकर 56 मिनट |
| विशेष नक्षत्र | रोहिणी, स्थान और पंचांग अनुसार |
| विशेष योग | शिव योग, स्थान और गणना अनुसार |
| मुख्य पूजा | गौरी, गणेश, शिव, कार्तिकेय और चंद्रमा |
| व्रत पारण | चंद्र दर्शन, अर्घ्य और प्रार्थना के बाद |
| मुख्य नियम | स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखें |
• सूर्योदय से पहले सर्गी या पूर्वाहार लें
• सूर्योदय के बाद व्रत का संकल्प करें
• निर्जला व्रत केवल स्वास्थ्य और परंपरा की अनुमति होने पर रखें
• दिन में करवा चौथ कथा और गौरी पूजा करें
• शाम को पूजा मुहूर्त में करवा पूजन करें
• चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें
• गर्भवती, रोगी, वृद्ध और औषधि लेने वाली स्त्रियां चिकित्सकीय सलाह लें
• व्रत को पति पत्नी के पारस्परिक सम्मान और प्रेम से जोड़ें
करवा चौथ को केवल पति की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत मानना इसके व्यापक भाव को सीमित कर देता है। यह पर्व दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास, संयम, संवाद और पारस्परिक जिम्मेदारी का स्मरण कराता है।
करवा मिट्टी का पात्र है। मिट्टी पृथ्वी का प्रतीक है। पृथ्वी धैर्य, धारण शक्ति और स्थिरता देती है। करवा चौथ का करवा दांपत्य जीवन की उस क्षमता का प्रतीक माना जा सकता है जिसमें दो व्यक्ति सुख और कठिनाई दोनों को धैर्य से धारण करते हैं।
चंद्रमा मन, भावनाओं और शीतलता का प्रतिनिधि है। पूरे दिन के व्रत के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है। यह मन को शांत करने, संबंधों में कोमलता लाने और परिवार के जीवन में भावनात्मक संतुलन बनाए रखने का संकल्प भी है।
सर्गी सूर्योदय से पहले लिया जाने वाला भोजन है। परंपरा में सास अपनी बहू को सर्गी देती हैं। इसमें फल, मेवे, मिठाई, फेनियां, दूध, मठरी और अन्य पौष्टिक पदार्थ शामिल हो सकते हैं। आधुनिक जीवन में सर्गी का स्वरूप परिवार, स्वास्थ्य और उपलब्धता के अनुसार बदला जा सकता है।
सर्गी का उद्देश्य पूरे दिन के व्रत के लिए शरीर को तैयार करना है। बहुत अधिक तला हुआ, बहुत मीठा या बहुत नमकीन भोजन लेने से दिन में प्यास, अम्लता और कमजोरी बढ़ सकती है।
• पर्याप्त जल या नारियल पानी
• मौसमी फल
• दूध या दही, यदि शरीर को अनुकूल हो
• थोड़े मेवे
• हल्का और पौष्टिक भोजन
• जटिल कार्बोहाइड्रेट का उचित स्रोत
• सीमित मिठाई
सर्गी के बाद पर्याप्त नींद लेना भी आवश्यक है। रात भर जागकर सर्गी लेना शरीर को कमजोर कर सकता है।
करवा चौथ में निर्जला व्रत की परंपरा प्रसिद्ध है। निर्जला का अर्थ भोजन और जल दोनों का त्याग है। यह व्रत कठोर है और हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं है।
धार्मिक दृष्टि से निर्जला व्रत संकल्प, तप और प्रेम का प्रतीक है। स्वास्थ्य की दृष्टि से लंबे समय तक जल न लेने से निर्जलीकरण, सिरदर्द, कमजोरी, चक्कर, रक्तचाप में बदलाव और रक्त शर्करा की समस्या हो सकती है।
निम्न स्थितियों में निर्जला व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है।
• गर्भावस्था
• स्तनपान
• मधुमेह
• रक्तचाप की समस्या
• गुर्दे या हृदय की बीमारी
• माइग्रेन
• बार बार चक्कर आना
• नियमित औषधि सेवन
• बुखार या संक्रमण
यदि व्रत के दौरान बेहोशी, सांस लेने में कठिनाई, बहुत अधिक कमजोरी, भ्रम, सीने में दर्द या लगातार उल्टी हो तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें। व्रत का उद्देश्य शरीर को संकट में डालना नहीं है। फलाहार या जल ग्रहण के साथ रखा गया सरल व्रत भी श्रद्धापूर्ण हो सकता है।
रोहिणी नक्षत्र चंद्रमा का प्रिय नक्षत्र माना जाता है। इसका संबंध सौंदर्य, सृजन, पोषण, आकर्षण, भावनात्मक कोमलता और भौतिक समृद्धि से जोड़ा जाता है। चंद्रमा का रोहिणी से संबंध करवा चौथ के चंद्र दर्शन को विशेष भाव दे सकता है।
रोहिणी का प्रतीक रथ या विकास की गति से जुड़ा माना जाता है। यह जीवन में बढ़ने, पोषित होने और सुंदर रूप लेने का संकेत देता है। दांपत्य जीवन में रोहिणी का भाव प्रेम, देखभाल और भावनात्मक सुरक्षा के रूप में देखा जा सकता है।
फिर भी किसी नक्षत्र का संयोग अकेले पूरे वैवाहिक जीवन का निर्णय नहीं करता। जन्म कुंडली में सप्तम भाव, शुक्र, गुरु, चंद्रमा, नवांश और दांपत्य दशा का विचार आवश्यक होता है।
शिव योग को पंचांग के 27 योगों में एक माना जाता है। शिव शब्द कल्याण, शांति, परिवर्तन और मंगलकारी चेतना का संकेत देता है। करवा चौथ के अवसर पर शिव योग का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के दांपत्य आदर्श से जोड़ा जा सकता है।
शिव और पार्वती का संबंध केवल प्रेम का प्रतीक नहीं है। यह तप, संवाद, समानता, धैर्य और आध्यात्मिक साझेदारी का भी प्रतीक है। इसलिए शिव योग के समय की गई दांपत्य प्रार्थना में केवल पति की दीर्घायु नहीं बल्कि दोनों के स्वास्थ्य, सम्मान और परस्पर विश्वास की कामना होनी चाहिए।
पंचांग में योग की अवधि स्थान के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसी एक स्रोत से मिले योग समय को सभी शहरों पर लागू नहीं करना चाहिए।
करवा चौथ की पूजा के लिए घर की महिलाएं प्रायः सुंदर पूजा थाली सजाती हैं। थाली में करवा, दीपक, रोली, अक्षत, छलनी, मिठाई और जल रखा जाता है।
| सामग्री | उपयोग |
|---|---|
| करवा या मिट्टी का पात्र | जल अर्घ्य और परंपरागत पूजा |
| दीपक | प्रकाश और मंगल |
| रोली और कुमकुम | तिलक और सौभाग्य |
| अक्षत | पूर्णता और संकल्प |
| पुष्प | देवी को अर्पण |
| धूप | पूजा वातावरण |
| छलनी | चंद्र दर्शन और पति दर्शन |
| मिठाई | प्रसाद और पारण |
| जल | चंद्रमा को अर्घ्य |
| फल | व्रत समापन |
| लाल या सुहाग सामग्री | गौरी पूजन |
पूजा सामग्री में प्लास्टिक और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली वस्तुओं का उपयोग कम करना चाहिए। मिट्टी का करवा स्थानीय कारीगरों से लेना परंपरा और सेवा दोनों से जुड़ सकता है।
करवा चौथ की पूजा शाम के समय शुभ मुहूर्त में की जाती है। परिवार की परंपरा के अनुसार गौरी, गणेश, शिव, कार्तिकेय और करवा माता का पूजन किया जाता है।
दिनभर व्रत का पालन करें
शाम को स्नान करके स्वच्छ या उत्सव के वस्त्र पहनें
पूजा स्थल पर चौकी और स्वच्छ वस्त्र रखें
गौरी और गणेश जी की स्थापना करें
करवा में स्वच्छ जल भरें
रोली, अक्षत, पुष्प और दीप अर्पित करें
करवा चौथ की कथा सुनें या पढ़ें
गौरी माता से दांपत्य सुख और परिवार की शांति की प्रार्थना करें
पूजा के बाद चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा करें
चंद्र दर्शन होने पर छलनी से चंद्रमा को देखें
चंद्रमा को जल और अक्षत अर्पित करें
पति का दर्शन करके उनका आशीर्वाद लें
पति या परिवार के किसी सदस्य से जल ग्रहण करें
प्रसाद लेकर व्रत खोलें
कई परिवारों में पति पत्नी एक साथ पूजा करते हैं। यह परंपरा व्रत को एकतरफा त्याग के बजाय पारस्परिक प्रेम और सहयोग का उत्सव बना सकती है।
चंद्र दर्शन करवा चौथ का मुख्य चरण है। चंद्रमा दिखाई देने के बाद व्रती स्त्री छलनी से चंद्रमा का दर्शन करती है। इसके बाद उसी छलनी से पति का चेहरा देखने की परंपरा है।
• करवा या तांबे के पात्र में स्वच्छ जल लें
• जल में अक्षत और पुष्प डालें
• चंद्रमा की ओर मुख करके हाथ जोड़ें
• चंद्रमा को जल अर्पित करें
• चंद्र मंत्र का स्मरण करें
• परिवार और पति के स्वास्थ्य की प्रार्थना करें
• पति का दर्शन करके आशीर्वाद लें
• जल या प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें
चंद्रमा को अर्घ्य देते समय जल सड़क, बिजली के तार या लोगों पर न गिराएं। पूजा के बाद सामग्री को स्वच्छ तरीके से रखें।
ॐ सोमाय नमः
इसका अर्थ है सोम स्वरूप चंद्रमा को नमस्कार। चंद्रमा मन, शीतलता और भावनात्मक संतुलन के प्रतीक हैं।
कई बार बादल, धुंध या स्थानीय मौसम के कारण चंद्रमा दिखाई नहीं देता। ऐसी स्थिति में परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग का पालन करें। केवल सामाजिक दबाव में बहुत देर तक निर्जला व्रत जारी रखना स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है।
कुछ परिवार पंचांग में दिए चंद्रोदय समय के बाद चंद्रमा का मानसिक स्मरण करके पूजा पूर्ण करते हैं। कुछ लोग किसी सुरक्षित स्थान या मंदिर से चंद्र दर्शन करते हैं। यदि चिकित्सा संबंधी आवश्यकता हो तो व्रत को सरल रूप से पूर्ण किया जा सकता है।
धार्मिक परंपराओं में मतभेद हो सकते हैं। किसी एक पद्धति को सभी परिवारों पर अनिवार्य नियम की तरह लागू नहीं करना चाहिए।
करवा चौथ से जुड़ी कई लोक कथाएं प्रचलित हैं। सावित्री, वीरवती और करवा की कथाएं अलग अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में सुनाई जाती हैं। इन कथाओं का केंद्र प्रेम, निष्ठा, साहस, बुद्धिमत्ता और संकट में स्थिरता है।
लोक कथाओं को ऐतिहासिक घटना की तरह नहीं बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा के रूप में समझना अधिक उचित है। वीरवती की कथा में जल्दबाजी और भावनात्मक कमजोरी से सीख मिलती है। सावित्री की कथा में बुद्धि, सत्य और अडिग संकल्प की शक्ति सामने आती है। करवा की कथा में वैवाहिक निष्ठा और न्याय के लिए साहस दिखाई देता है।
इन सभी कथाओं का साझा संदेश है कि संबंध केवल भावनाओं से नहीं बल्कि धैर्य, सत्य और जिम्मेदारी से टिकते हैं।
परंपरागत रूप से करवा चौथ का व्रत विवाहित स्त्रियों से जुड़ा है। आधुनिक समय में कई पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं या कम से कम उस दिन भोजन, जल और घरेलू कार्यों में सहयोग करते हैं।
यह परिवर्तन परंपरा का अपमान नहीं है। इसका उद्देश्य दांपत्य में पारस्परिकता बढ़ाना है। यदि पत्नी दिनभर व्रत रखती है और पति उसकी थकान, जल की आवश्यकता, बच्चों की जिम्मेदारी और घरेलू कार्यों में सहायता करता है तो व्रत का प्रेम भाव अधिक गहरा होता है।
करवा चौथ को इस प्रकार मनाया जा सकता है।
• दोनों एक दूसरे के स्वास्थ्य की चिंता करें
• पति पत्नी एक दूसरे को सम्मान दें
• पुराने विवाद शांतिपूर्वक सुलझाएं
• आर्थिक निर्णय साथ मिलकर लें
• एक दूसरे के श्रम को स्वीकार करें
• व्रत को दबाव या प्रतियोगिता न बनाएं
• प्रेम को केवल एक दिन नहीं, पूरे वर्ष व्यवहार में रखें
करवा चौथ में चंद्रमा, शुक्र, सप्तम भाव, सप्तमेश, गुरु और नवांश का महत्व देखा जा सकता है। चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतिनिधि है। शुक्र दांपत्य, प्रेम और आकर्षण से जुड़ा है। सप्तम भाव विवाह और साझेदारी का क्षेत्र है। गुरु स्त्री की कुंडली में पति और वैवाहिक संरक्षण के संकेतों से जोड़ा जाता है, जबकि शुक्र पुरुष की कुंडली में दांपत्य संबंधों का प्रमुख कारक माना जाता है।
| ज्योतिषीय तत्व | करवा चौथ में संकेत |
|---|---|
| चंद्रमा | मन, भावनात्मक सुरक्षा और चंद्र दर्शन |
| शुक्र | प्रेम, दांपत्य और सौंदर्य |
| गुरु | आशीर्वाद, धर्म और वैवाहिक संरक्षण |
| सप्तम भाव | विवाह और साझेदारी |
| सप्तमेश | दांपत्य जीवन की दिशा |
| नवांश | विवाह की गहराई और स्थायित्व |
| रोहिणी | पोषण, सौंदर्य और प्रेम |
| शिव योग | कल्याण, धैर्य और मंगल भाव |
कुंडली में किसी ग्रह की स्थिति को केवल व्रत से बदलने का दावा उचित नहीं है। व्रत मन और संबंधों को अनुशासित करता है। ग्रह फल का अध्ययन अलग से करना चाहिए।
करवा चौथ पर दांपत्य सुख और मानसिक शांति के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं।
• गौरी माता को लाल पुष्प अर्पित करें
• चंद्रमा को जल अर्पित करें
• ॐ सोमाय नमः मंत्र का जप करें
• पति पत्नी मिलकर शिव पार्वती का स्मरण करें
• किसी सुहागिन स्त्री को श्रृंगार सामग्री दें
• जरूरतमंद महिला को भोजन या वस्त्र दें
• माता पिता और सास ससुर का आशीर्वाद लें
• घर में कटु वाणी और विवाद से बचें
• व्रत के बाद जरूरतमंद को अन्न दान करें
उपाय का उद्देश्य किसी व्यक्ति को नियंत्रित करना नहीं बल्कि संबंधों में प्रेम और सम्मान बढ़ाना होना चाहिए।
करवा चौथ के दिन उत्साह में कुछ लोग स्वास्थ्य और सुरक्षा की उपेक्षा कर देते हैं। इन गलतियों से बचना चाहिए।
• बीमारी में जबरन निर्जला व्रत न रखें
• दूसरों पर व्रत का दबाव न डालें
• चंद्रमा दिखने में विलंब होने पर स्वास्थ्य संकट न बढ़ाएं
• बहुत अधिक तला और मीठा भोजन लेकर सर्गी न करें
• पूजा के समय अपशब्द और विवाद से बचें
• चंद्र दर्शन से पहले छिपकर भोजन करने को अपराध न मानें यदि स्वास्थ्य संकट हो
• व्रत को पति की लंबी आयु की निश्चित गारंटी न समझें
• चंद्रमा को अर्घ्य देते समय सड़क या नदी को गंदा न करें
व्रत की पवित्रता करुणा और विवेक से बनी रहती है। स्वास्थ्य की रक्षा भी धर्म का हिस्सा है।
करवा चौथ में अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है। सौभाग्य का अर्थ केवल पति की दीर्घायु या वैवाहिक स्थिति नहीं है। इसमें दोनों जीवनसाथियों का स्वास्थ्य, सम्मान, मानसिक शांति, विश्वास और सुरक्षित परिवार भी शामिल है।
यदि दांपत्य में संवाद नहीं है, निर्णयों में समानता नहीं है और एक दूसरे के श्रम का सम्मान नहीं है तो केवल बाहरी पूजा से सौभाग्य पूर्ण नहीं होता। करवा चौथ का सच्चा संदेश है कि दांपत्य को प्रतिदिन प्रेम और जिम्मेदारी से सींचा जाए।
चंद्र दर्शन से पहले रखा गया व्रत मन को प्रतीक्षा और संयम सिखाता है। छलनी से चंद्रमा को देखना मन की अशांति को एकाग्र करने का प्रतीक है। उसी छलनी से पति का चेहरा देखना संबंध को चंद्रमा की शीतलता और प्रकाश से जोड़ता है।
यह प्रतीक तभी सुंदर बनता है जब पति पत्नी एक दूसरे को समान सम्मान दें। एक का त्याग और दूसरे की उदासीनता दांपत्य का संतुलन नहीं बनाती। करवा चौथ का चंद्रमा दोनों को याद दिलाता है कि प्रेम में प्रकाश तभी रहता है जब दोनों ओर से विश्वास और सहयोग हो।
करवा चौथ 2026 में रोहिणी नक्षत्र और शिव योग की चर्चा वैवाहिक प्रेम, सौंदर्य और मंगल भावना को बल देने वाली मानी जा सकती है। लेकिन किसी भी योग का फल व्यक्ति की कुंडली, कर्म, संबंध और व्यवहार से जुड़ा होता है।
सर्गी से चंद्र अर्घ्य तक यह व्रत एक लंबी प्रतीक्षा है। इस प्रतीक्षा में शरीर संयम सीखता है, मन प्रार्थना सीखता है और संबंध कृतज्ञता सीखते हैं। जब चंद्रमा दिखाई देता है तब व्रत केवल भोजन से नहीं खुलता। वह प्रेम, संवाद, आशीर्वाद और साझा जीवन के संकल्प से पूर्ण होता है।
करवा चौथ का वास्तविक आशीर्वाद यही है कि दंपती एक दूसरे के जीवन में चंद्रमा जैसी शीतलता, सूर्य जैसी स्पष्टता और पृथ्वी जैसी स्थिरता बनें।
करवा चौथ 2026 में कब है?
करवा चौथ 2026 में 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। यह कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि है।
करवा चौथ 2026 में चंद्रोदय कितने बजे होगा?
नई दिल्ली में चंद्रोदय लगभग रात 8 बजकर 11 मिनट पर माना जा रहा है। शहर के अनुसार चंद्रोदय का समय बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखें।
करवा चौथ 2026 का पूजा मुहूर्त क्या है?
नई दिल्ली के लिए सामान्य पूजा मुहूर्त शाम 5 बजकर 38 मिनट से 6 बजकर 56 मिनट तक बताया गया है। स्थानीय पंचांग में थोड़ा अंतर हो सकता है।
क्या करवा चौथ 2026 में रोहिणी नक्षत्र और शिव योग है?
कुछ पंचांग गणनाओं में रोहिणी नक्षत्र और शिव योग का संयोग बताया गया है। नक्षत्र और योग की अवधि स्थान तथा गणना पद्धति के अनुसार बदल सकती है।
क्या करवा चौथ का निर्जला व्रत सभी महिलाएं रख सकती हैं?
नहीं। गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, मधुमेह, रक्तचाप, हृदय या गुर्दे की समस्या वाली स्त्रियों को निर्जला व्रत से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
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