By पं. नरेंद्र शर्मा
अभ्यंग की शास्त्रीय विधि, धूप सेवन और हड्डियों की मजबूती

माघ मास की सर्द सुबह में शरीर पर तिल के तेल या सरसों के तेल से मालिश करना, जिसे आयुर्वेद में अभ्यंग कहा जाता है और उसके बाद सुबह की कोमल धूप में बैठना एक अचूक प्राकृतिक चिकित्सा मानी गई है। शिशिर ऋतु की ठंडी और शुष्क हवाएं शरीर में वात दोष बढ़ाती हैं, जिससे त्वचा फटती है, जोड़ों में दर्द होता है और शरीर में जकड़न आती है। तेल की स्निग्धता और सूर्य की ऊष्मा मिलकर इन सभी समस्याओं का सबसे सरल और प्रभावी समाधान बनती हैं।
| अभ्यंग तत्व | विवरण |
|---|---|
| श्रेष्ठ समय | प्रातः स्नान से पहले |
| उपयुक्त तेल | तिल का तेल सर्वश्रेष्ठ, सरसों का तेल भी उपयुक्त |
| तेल की अवस्था | हल्का गुनगुना |
| मालिश की अवधि | 15 से 20 मिनट |
| विशेष ध्यान | सिर, कान और पैरों के तलवे |
| मालिश के बाद | 15 से 30 मिनट का अंतराल, फिर गुनगुने जल से स्नान |
| धूप सेवन | प्रातः 15 से 20 मिनट कोमल धूप |
| प्रमुख लाभ | वात शमन, त्वचा की कांति, हड्डियों की मजबूती और अच्छी नींद |
आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ अष्टांग हृदयम में दिनचर्या का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्यक्ति को प्रतिदिन अभ्यंग करना चाहिए। इस ग्रंथ के अनुसार अभ्यंग बुढ़ापे के लक्षणों, थकान और वात दोष को दूर करता है। यह दृष्टि को स्पष्ट करता है, शरीर को पुष्ट करता है, आयु बढ़ाता है, अच्छी नींद देता है, त्वचा को सुंदर बनाता है और शरीर में दृढ़ता लाता है।
आयुर्वेद में माना गया है कि जैसे सूखी लकड़ी तेल लगाने पर मजबूत और लचीली हो जाती है और जैसे चमड़ा तेल से कोमल और टिकाऊ बनता है, वैसे ही मनुष्य का शरीर भी नियमित अभ्यंग से दृढ़, कोमल और स्वस्थ बनता है। परंपरा में यह भी माना जाता है कि नियमित अभ्यंग से तेल का पोषण धीरे धीरे शरीर की गहरी धातुओं तक पहुंचता है और सातों धातुओं को पोषण देता है।
| अभ्यंग का लाभ | शरीर पर प्रभाव |
|---|---|
| वात शमन | जोड़ों की जकड़न, दर्द और रूखेपन में कमी |
| त्वचा की कांति | त्वचा में नमी, कोमलता और प्राकृतिक चमक |
| झुर्रियों में कमी | त्वचा की लोच बनी रहना |
| अच्छी नींद | तंत्रिका तंत्र को शांति |
| थकान का नाश | मांसपेशियों को आराम |
| दृष्टि की स्पष्टता | विशेष रूप से पैरों के तलवों की मालिश से |
| रक्त संचार | पूरे शरीर में रक्त प्रवाह में सुधार |
आयुर्वेद में अभ्यंग करते समय 3 अंगों पर विशेष ध्यान देने का निर्देश है: सिर, कान और पैर।
| चरण | विधि |
|---|---|
| तेल तैयार करना | तिल या सरसों के तेल को हल्का गुनगुना करें, इतना कि त्वचा पर सहज लगे |
| सिर से आरंभ | सिर पर थोड़ा तेल लगाकर उंगलियों के पोरों से गोलाकार मालिश करें |
| चेहरा और कान | चेहरे पर हल्के हाथ से और कानों के बाहरी भाग पर मालिश करें |
| गर्दन और कंधे | ऊपर से नीचे की ओर मालिश करें |
| हाथ और पैर | लंबी हड्डियों पर लंबे स्ट्रोक और जोड़ों पर गोलाकार स्ट्रोक |
| छाती और पेट | छाती पर हल्के गोलाकार स्ट्रोक और पेट पर घड़ी की दिशा में मालिश |
| पीठ | संभव हो तो किसी की सहायता से पीठ की मालिश |
| तलवे | अंत में पैरों के तलवों की अच्छी तरह मालिश |
| प्रतीक्षा | 15 से 30 मिनट तक तेल को शरीर में रहने दें |
| स्नान | गुनगुने जल से स्नान, आवश्यकता हो तो बेसन या उबटन से तेल हटाएं |
पेट पर घड़ी की दिशा में मालिश करने का कारण यह है कि बड़ी आंत में भोजन का प्रवाह इसी दिशा में होता है। इससे पाचन और मल त्याग में सहायता मिलती है।
| तेल | गुण | माघ मास में उपयोग |
|---|---|---|
| तिल का तेल | उष्ण, स्निग्ध और वात नाशक | शिशिर ऋतु के लिए सर्वश्रेष्ठ |
| सरसों का तेल | अधिक उष्ण और तीक्ष्ण | उत्तर भारत में प्रचलित, कफ और ठंड में लाभकारी |
| नारियल का तेल | शीतल | शिशिर में कम उपयोगी, पित्त प्रकृति वालों के लिए सीमित मात्रा में |
| औषधीय तेल | जैसे महानारायण तेल | जोड़ों के दर्द में वैद्य की सलाह से |
अभ्यंग के बाद या उससे पहले सुबह की कोमल धूप में बैठना माघ मास की सबसे सरल और लाभकारी साधना है। आयुर्वेद और ज्योतिष दोनों में सूर्य को आरोग्य का देवता माना गया है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि सुबह की धूप शरीर में विटामिन डी के निर्माण में सहायक होती है, जो हड्डियों की मजबूती और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक है।
तेल मालिश के बाद धूप में बैठने से तेल त्वचा में अच्छी तरह अवशोषित होता है और शरीर में ऊष्मा आती है। परंतु धूप में बैठने के बाद स्नान से पहले शरीर को सामान्य तापमान पर आने देना चाहिए।
अभ्यंग के बाद स्नान का भी विशेष नियम है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर पर गुनगुने जल से स्नान करना चाहिए, परंतु सिर पर अत्यधिक गर्म जल नहीं डालना चाहिए, क्योंकि इससे बालों और नेत्रों को हानि हो सकती है।
| स्नान नियम | कारण |
|---|---|
| शरीर पर गुनगुना जल | ठंड से रक्षा और मांसपेशियों को आराम |
| सिर पर सामान्य या हल्का गुनगुना जल | बालों और नेत्रों की रक्षा |
| तेल हटाने के लिए बेसन या उबटन | त्वचा की प्राकृतिक नमी बनी रहती है |
| स्नान के तुरंत बाद ठंडी हवा से बचाव | सर्दी और जुकाम से रक्षा |
ज्योतिषीय दृष्टि से तेल शनि का द्रव्य माना गया है और धूप सूर्य का प्रत्यक्ष तेज है। सूर्य और शनि को परस्पर शत्रु माना जाता है। माघ मास में सूर्य शनि की राशि मकर में होते हैं। जब मनुष्य धूप में बैठकर तेल मालिश करता है, तो प्रतीकात्मक रूप से वह सूर्य और शनि दोनों को एक साथ शांत करता है।
शनि हड्डियों, जोड़ों, नसों और त्वचा के कारक हैं, जबकि सूर्य हड्डियों की मजबूती, आरोग्य और जीवन शक्ति के कारक हैं। ज्योतिषीय परंपरा में माना जाता है कि इन दोनों का संतुलन हड्डियों के दर्द, गठिया और नसों की कमजोरी में राहत देता है। शनिवार को तिल के तेल से मालिश करना शनि की शांति का प्रचलित उपाय है।
| ग्रह | माध्यम | संबंधित अंग | लाभ |
|---|---|---|---|
| शनि | तिल का तेल | जोड़, नसें, त्वचा | जकड़न और दर्द में कमी |
| सूर्य | सुबह की धूप | हड्डियां, नेत्र, जीवन शक्ति | मजबूती और ऊर्जा |
| दोनों का संतुलन | तेल मालिश के साथ धूप सेवन | पूरा शरीर | आरोग्य और स्थिरता |
अभ्यंग अत्यंत लाभकारी है, परंतु कुछ स्थितियों में इसे टालना या सावधानी से करना चाहिए।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| गुनगुने तिल या सरसों के तेल से मालिश करें | ठंडा तेल प्रयोग न करें |
| सिर, कान और तलवों पर विशेष ध्यान दें | भोजन के तुरंत बाद मालिश न करें |
| सुबह की कोमल धूप लें | दोपहर की तेज धूप में देर तक न बैठें |
| मालिश के बाद गुनगुने जल से स्नान करें | सिर पर बहुत गर्म जल न डालें |
| स्नान के बाद शरीर को ढककर रखें | बुखार या अपच में मालिश न करें |
माघ मास की ठंडी सुबह में गुनगुने तेल की मालिश और कोमल धूप का स्पर्श केवल शरीर की देखभाल नहीं बल्कि अपने प्रति प्रेम और सम्मान का भाव है। आयुर्वेद में अभ्यंग शब्द स्नेह से जुड़ा है और स्नेह का अर्थ तेल भी है और प्रेम भी। जब व्यक्ति अपने शरीर पर स्नेहपूर्वक तेल लगाता है, तो वह उस शरीर का आभार व्यक्त करता है जो जीवन भर उसकी सेवा करता है।
जो व्यक्ति पूरे माघ मास में नियमित अभ्यंग और धूप सेवन को अपनी दिनचर्या का अंग बना लेता है, उसके शरीर में शिशिर की कठोरता टिक नहीं पाती। उसकी त्वचा में कांति, हड्डियों में मजबूती, जोड़ों में लचीलापन और मन में शांति आती है। यही वह साधारण सी साधना है जो पूरे वर्ष के स्वास्थ्य की नींव रखती है।
माघ मास में तेल मालिश क्यों करनी चाहिए?
माघ मास में शिशिर ऋतु की ठंडी और शुष्क हवाएं वात दोष बढ़ाती हैं। तेल मालिश वात को शांत करती है, त्वचा को नमी देती है और जोड़ों के दर्द में राहत देती है।
अभ्यंग के लिए कौन सा तेल सबसे अच्छा है?
शिशिर ऋतु में तिल का तेल सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह उष्ण, स्निग्ध और वात नाशक है। सरसों का तेल भी ठंड में उपयुक्त है।
धूप सेवन का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
सूर्योदय के बाद से प्रातः लगभग 10 बजे तक की कोमल धूप में 15 से 20 मिनट बैठना सबसे लाभकारी माना जाता है।
तेल मालिश के कितनी देर बाद स्नान करना चाहिए?
मालिश के बाद 15 से 30 मिनट तक तेल को शरीर में रहने दें, फिर गुनगुने जल से स्नान करें। सिर पर बहुत गर्म जल न डालें।
किन स्थितियों में तेल मालिश नहीं करनी चाहिए?
बुखार, अपच, भोजन के तुरंत बाद, अत्यधिक कफ और त्वचा पर घाव या संक्रमण की स्थिति में अभ्यंग नहीं करना चाहिए।
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