By पं. सुव्रत शर्मा
बाणों की शय्या, इच्छा मृत्यु और सबके लिए खुला भीष्म तर्पण

माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भीष्म अष्टमी कहा जाता है। महाभारत के महान योद्धा पितामह भीष्म ने बाणों की शय्या पर लंबी प्रतीक्षा के बाद सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने योग बल से इसी तिथि को प्राण त्यागकर परम गति प्राप्त की थी, ऐसी परंपरागत मान्यता है। अंग्रेजी कैलेंडर में यह तिथि सामान्यतः जनवरी के अंत से फरवरी के बीच आती है। इस दिन पितामह भीष्म के निमित्त तर्पण और अर्घ्य देने का विशेष विधान है और शास्त्रीय परंपरा के अनुसार यह तर्पण कोई भी व्यक्ति कर सकता है, चाहे उसके माता पिता जीवित ही क्यों न हों।
| पर्व तत्व | विवरण |
|---|---|
| तिथि | माघ शुक्ल अष्टमी |
| स्मरण | पितामह भीष्म का निर्वाण दिवस |
| प्रमुख कर्म | भीष्म तर्पण, अर्घ्य, पवित्र स्नान और दान |
| तर्पण का अधिकार | सभी वर्गों के लोग, माता पिता जीवित होने पर भी |
| तर्पण सामग्री | जल, काले तिल, कुश और अक्षत |
| दिशा | दक्षिण की ओर मुख करके |
| विशेष पाठ | विष्णु सहस्रनाम |
| अपेक्षित फल | पितृ दोष से मुक्ति, आत्मबल और संतान सुख |
पितामह भीष्म का मूल नाम देवव्रत था। वे हस्तिनापुर के राजा शांतनु और देवी गंगा के पुत्र थे। पौराणिक मान्यता के अनुसार वे 8 वसुओं में से एक वसु के अवतार थे, जिन्हें एक श्राप के कारण मनुष्य रूप में जन्म लेना पड़ा था।
देवव्रत ने अपने पिता के सुख के लिए जो प्रतिज्ञा की, उसने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया। राजा शांतनु निषाद कन्या सत्यवती से विवाह करना चाहते थे, परंतु सत्यवती के पिता की शर्त थी कि उनकी पुत्री का पुत्र ही राजा बनेगा। पिता की इच्छा पूरी करने के लिए देवव्रत ने न केवल राज सिंहासन का त्याग किया बल्कि आजीवन ब्रह्मचारी रहने की कठोर प्रतिज्ञा भी ली, ताकि उनकी किसी संतान से भी भविष्य में कोई विवाद न हो। इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही वे भीष्म कहलाए।
उनके इस त्याग से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। इसका अर्थ था कि मृत्यु उन्हें तभी स्पर्श कर सकती थी जब वे स्वयं चाहें।
महाभारत युद्ध के 10वें दिन अर्जुन के बाणों से घायल होकर भीष्म रथ से गिर पड़े। उनका पूरा शरीर बाणों से इतना बिंधा हुआ था कि वे भूमि को स्पर्श भी नहीं कर रहे थे बल्कि बाणों की शय्या पर लेटे थे। उनका सिर नीचे लटक रहा था तब अर्जुन ने 3 बाण भूमि में चलाकर उनके लिए बाणों का तकिया बनाया। जब उन्हें प्यास लगी, तो अर्जुन ने भूमि में बाण चलाकर गंगा की धारा प्रकट की और उसका जल उनके मुख तक पहुंचाया।
इच्छा मृत्यु का वरदान होने के कारण भीष्म ने उसी समय देह नहीं त्यागी। उस समय सूर्य दक्षिणायन में थे। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और मोक्ष के लिए श्रेष्ठ काल माना गया है। भगवद्गीता में भी उत्तरायण में देह त्यागने वाले योगी की परम गति का वर्णन आता है। इसलिए भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। महाभारत के अनुसार वे 58 रातों तक बाणों की शय्या पर रहे।
बाणों की शय्या पर लेटे हुए भी भीष्म ने अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को लेकर उनके पास पहुंचे, ताकि वे राजधर्म का ज्ञान प्राप्त कर सकें। भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म का विस्तृत उपदेश दिया, जो महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व में संकलित है।
इसी उपदेश के दौरान युधिष्ठिर ने पूछा कि वह कौन सा एक देव है जिसकी स्तुति से मनुष्य का कल्याण होता है। उत्तर में भीष्म ने भगवान विष्णु के 1000 नामों का वर्णन किया, जिसे आज विष्णु सहस्रनाम के नाम से जाना जाता है। यह स्तोत्र आज भी करोड़ों लोगों की दैनिक उपासना का अंग है। इसीलिए भीष्म अष्टमी पर विष्णु सहस्रनाम का पाठ अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
सामान्यतः पितृ तर्पण का अधिकार उन लोगों को माना जाता है जिनके पिता का देहांत हो चुका हो। परंतु भीष्म अष्टमी पर यह नियम अलग है। शास्त्रीय परंपरा के अनुसार इस दिन सभी वर्गों के लोग, चाहे उनके माता पिता जीवित हों, पितामह भीष्म के निमित्त तर्पण और अर्घ्य दे सकते हैं।
इसका कारण अत्यंत भावपूर्ण है। भीष्म पितामह आजीवन ब्रह्मचारी रहे। उनका कोई पुत्र नहीं था जो उनका तर्पण कर सके। उन्होंने अपना पूरा जीवन पिता, परिवार और राज्य के लिए त्याग दिया। इसलिए परंपरा ने यह व्यवस्था की कि पूरा समाज उनकी संतान बनकर उन्हें जल अर्पित करे। वे पूरे भारत के पितामह बन गए।
इस तर्पण का एक और गहरा अर्थ है। मान्यता है कि भीष्म के निमित्त दिया गया जल उन सभी आत्माओं तक पहुंचता है जिनका कोई वंशज नहीं है, जिनका तर्पण करने वाला कोई नहीं बचा। इस प्रकार भीष्म तर्पण एक व्यक्ति का नहीं बल्कि समस्त निःसंतान और विस्मृत आत्माओं का तर्पण बन जाता है।
| चरण | विधि |
|---|---|
| स्नान | प्रातः पवित्र नदी में या गंगाजल मिले जल से स्नान करें |
| आसन | कुश के आसन पर दक्षिण की ओर मुख करके बैठें |
| सामग्री | तांबे के पात्र में जल, काले तिल, कुश और अक्षत लें |
| संकल्प | भीष्म पितामह की तृप्ति के लिए तर्पण का संकल्प लें |
| जनेऊ | जनेऊ धारण करने वाले इसे दाएं कंधे पर रखें |
| तर्पण | तर्पण मंत्र पढ़ते हुए अंगूठे और तर्जनी के बीच के पितृ तीर्थ से 3 बार जल अर्पित करें |
| अर्घ्य | इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर भीष्म के नाम से प्रणाम करें |
| पाठ | विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें |
| दान | अन्न, तिल, वस्त्र और दक्षिणा का दान करें |
परंपरा में भीष्म तर्पण के समय यह मंत्र पढ़ा जाता है।
"वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृत्यप्रवराय च। गंगापुत्राय भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे॥"
इसका भाव है कि वैयाघ्रपद गोत्र और सांकृत्य प्रवर वाले, गंगा के पुत्र और जन्म से ब्रह्मचारी भीष्म को यह जल अर्पित है। इसके बाद प्रार्थना की जाती है कि शांतनु के पुत्र, वीर, सत्यवादी और जितेंद्रिय भीष्म इस जल से वैसी ही तृप्ति प्राप्त करें जैसी पुत्र और पौत्र के द्वारा दिए गए जल से मिलती है। जो व्यक्ति संस्कृत मंत्र न पढ़ सके, वह भीष्म पितामह का नाम लेकर श्रद्धा से जल अर्पित कर सकता है।
भीष्म पितामह का जीवन केवल एक कथा नहीं बल्कि एक दर्पण है जिसमें हर मनुष्य अपने कर्तव्य और निर्णयों को देख सकता है।
| गुण | भीष्म के जीवन में उदाहरण | आज के जीवन के लिए संदेश |
|---|---|---|
| त्याग | पिता के सुख के लिए सिंहासन और गृहस्थ सुख का त्याग | परिवार के लिए व्यक्तिगत सुख का त्याग |
| वचन पालन | आजीवन प्रतिज्ञा का पालन | अपने वचन को निभाने की दृढ़ता |
| धैर्य | 58 रातों तक बाणों की शय्या पर प्रतीक्षा | कठिन समय में धैर्य |
| ज्ञान दान | अंतिम क्षणों तक युधिष्ठिर को उपदेश | अपने अनुभव और ज्ञान को अगली पीढ़ी को देना |
| आत्म नियंत्रण | इच्छा मृत्यु का सही समय पर प्रयोग | इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण |
भीष्म के जीवन में एक चेतावनी भी छिपी है। अपनी प्रतिज्ञा से बंधे होने के कारण वे द्रौपदी के अपमान के समय मौन रहे और अधर्म के पक्ष में युद्ध करना पड़ा। यह सिखाता है कि वचन पालन महत्वपूर्ण है, परंतु धर्म उससे भी ऊपर है। कोई भी प्रतिज्ञा ऐसी नहीं होनी चाहिए जो अन्याय के सामने मौन रहने को विवश करे।
वैदिक ज्योतिष में सूर्य पिता और पूर्वजों के कारक हैं और नवम भाव पितृ कृपा तथा भाग्य से जुड़ा होता है। जब सूर्य राहु या शनि से पीड़ित हो, या नवम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तब ज्योतिष में इसे पितृ दोष के संकेत के रूप में देखा जाता है। भीष्म अष्टमी उत्तरायण काल में आती है, जब सूर्य बलवान होने की ओर अग्रसर होते हैं। इसलिए इस दिन किया गया तर्पण सूर्य और पितरों दोनों की कृपा दिलाने वाला माना जाता है।
| समस्या | ज्योतिषीय संकेत | भीष्म अष्टमी पर उपाय |
|---|---|---|
| पितृ दोष | सूर्य का राहु या शनि से पीड़ित होना | भीष्म तर्पण और ब्राह्मण भोजन |
| संतान से जुड़ी बाधा | पंचम भाव पीड़ित | व्रत, तर्पण और विष्णु सहस्रनाम |
| भाग्य में रुकावट | नवम भाव पर पाप प्रभाव | सूर्य अर्घ्य और अन्न दान |
| आत्मविश्वास की कमी | कमजोर सूर्य | भीष्म के जीवन का स्मरण और आदित्य हृदय स्तोत्र |
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| भीष्म पितामह के निमित्त तर्पण करें | तर्पण को केवल औपचारिकता न मानें |
| विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें | इस दिन तामसिक भोजन न लें |
| अपने वचनों को निभाने का संकल्प लें | किसी को दिया वचन हल्के में न तोड़ें |
| निःसंतान वृद्धों की सेवा करें | बड़ों का अपमान न करें |
| अन्न, तिल और वस्त्र का दान करें | दान का प्रदर्शन न करें |
भीष्म अष्टमी उस महापुरुष का स्मरण है जिसने अपना सब कुछ दूसरों के लिए त्याग दिया और बदले में कुछ नहीं मांगा। उनके पास न पुत्र था, न राज्य, न गृहस्थ सुख। फिर भी वे पूरे राष्ट्र के पितामह बन गए। यह इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य की महानता उसके त्याग से मापी जाती है, उसकी संपत्ति से नहीं।
जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से भीष्म पितामह को जल अर्पित करता है, वह केवल एक योद्धा का तर्पण नहीं करता। वह उन सभी आत्माओं को तृप्त करता है जिन्हें कोई याद करने वाला नहीं बचा। और साथ ही वह अपने भीतर त्याग, वचन पालन और धैर्य के उन गुणों को जगाता है, जिनके बल पर भीष्म अमर हो गए।
भीष्म अष्टमी कब मनाई जाती है? भीष्म अष्टमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। परंपरागत मान्यता है कि इसी दिन पितामह भीष्म ने उत्तरायण में देह त्यागी थी।
क्या माता पिता जीवित होने पर भी भीष्म तर्पण कर सकते हैं? हां, शास्त्रीय परंपरा के अनुसार भीष्म अष्टमी पर सभी लोग पितामह भीष्म के निमित्त तर्पण कर सकते हैं, चाहे उनके माता पिता जीवित हों।
भीष्म पितामह कितने दिन बाणों की शय्या पर रहे? महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह 58 रातों तक बाणों की शय्या पर रहे और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते रहे।
भीष्म अष्टमी पर विष्णु सहस्रनाम क्यों पढ़ा जाता है? भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या से ही युधिष्ठिर को भगवान विष्णु के 1000 नाम सुनाए थे, इसलिए इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ विशेष फलदायी है।
भीष्म तर्पण से क्या लाभ होता है? भीष्म तर्पण को पितृ दोष से मुक्ति, आत्मबल की वृद्धि और संतान सुख देने वाला माना जाता है। यह निःसंतान आत्माओं की तृप्ति का भी माध्यम है।
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