By पं. अमिताभ शर्मा
भगवान दामोदर की पूजा, 12 दीपकों का दीपदान और पितरों की तृप्ति

जया एकादशी के ठीक अगले दिन माघ शुक्ल द्वादशी को भीष्म द्वादशी कहा जाता है। इसे तिल द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के दामोदर स्वरूप की पूजा की जाती है और उन्हें तिल का विशेष भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि पितामह भीष्म के निर्वाण के उपरांत उनकी आत्मिक शांति के लिए पांडवों ने इसी द्वादशी पर महर्षि वेदव्यास के मार्गदर्शन में तर्पण और दान कर्म संपन्न किए थे। अंग्रेजी कैलेंडर में यह तिथि सामान्यतः जनवरी के अंत से फरवरी के बीच आती है।
| पर्व तत्व | विवरण |
|---|---|
| तिथि | माघ शुक्ल द्वादशी |
| अन्य नाम | तिल द्वादशी |
| प्रमुख आराध्य | भगवान विष्णु का दामोदर स्वरूप |
| स्मरण | पितामह भीष्म और पांडवों द्वारा किए गए कर्म |
| प्रमुख कर्म | तिल स्नान, तिल भोग, तर्पण, 12 दीपकों का दीपदान और तिल दान |
| दीपदान का स्थान | नदी का तट या घर का पूजा स्थान |
| मुख्य मंत्र | ॐ दामोदराय नमः और भगवान के 12 नाम |
| एकादशी पारण | जया एकादशी का पारण भी इसी दिन होता है |
| अपेक्षित फल | पितृ तृप्ति, वंश वृद्धि, दीर्घायु और मनोकामना सिद्धि |
माघ मास का शुक्ल पक्ष भीष्म पितामह की स्मृति से गहराई से जुड़ा है। अष्टमी को भीष्म ने देह त्यागी, एकादशी को जया एकादशी का व्रत आता है और द्वादशी को भीष्म द्वादशी के रूप में उनकी आत्मिक शांति के लिए किए गए कर्मों का स्मरण होता है। यह क्रम बताता है कि सनातन परंपरा में किसी महापुरुष का स्मरण केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहता बल्कि कई दिनों तक श्रद्धा के साथ चलता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार भीष्म के निर्वाण के बाद युधिष्ठिर और उनके भाई गहरे शोक में थे। महर्षि वेदव्यास ने उन्हें शोक त्यागकर कर्तव्य निभाने का उपदेश दिया और भीष्म की आत्मिक शांति के लिए तर्पण, दान और पूजा का विधान बताया। पांडवों ने द्वादशी के दिन यह सब कर्म संपन्न किए। इसी स्मृति में यह तिथि भीष्म द्वादशी कहलाई।
इस दिन भगवान विष्णु के दामोदर स्वरूप की पूजा का विशेष विधान है। दामोदर शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। दाम का अर्थ है रस्सी और उदर का अर्थ है पेट। यह नाम भगवान श्रीकृष्ण की एक मधुर बाल लीला से जुड़ा है।
श्रीमद्भागवत पुराण की कथा के अनुसार एक बार बाल कृष्ण ने माता यशोदा के मक्खन के मटके फोड़ दिए और मक्खन बंदरों को खिलाने लगे। उनकी शरारत से परेशान होकर माता यशोदा ने उन्हें रस्सी से ओखली में बांधने का प्रयास किया। परंतु हर बार रस्सी 2 अंगुल छोटी पड़ जाती थी। माता ने कई रस्सियां जोड़ीं, फिर भी रस्सी छोटी ही रही। अंत में जब माता थककर पसीने से भीग गईं तब भगवान ने उनके प्रेम से द्रवित होकर स्वयं को बंधने दिया। उदर पर रस्सी से बंधने के कारण वे दामोदर कहलाए।
यह लीला बताती है कि जो भगवान पूरे ब्रह्मांड को धारण करते हैं, उन्हें कोई शक्ति नहीं बांध सकती। परंतु भक्त का निश्छल प्रेम उन्हें भी बांध लेता है। भीष्म द्वादशी पर दामोदर की पूजा इसी प्रेम और समर्पण का स्मरण है। भीष्म पितामह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे और उनकी अंतिम घड़ी में भगवान स्वयं उनके सामने उपस्थित थे।
माघ मास में तिल का विशेष महत्व है। कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी से आरंभ हुई तिल की परंपरा शुक्ल पक्ष की इस द्वादशी पर अपने पूर्ण रूप में दिखाई देती है। इस दिन तिल से स्नान, तिल का भोग, तिल से तर्पण, तिल से हवन और तिल का दान किया जाता है। इसीलिए इसे तिल द्वादशी कहा जाता है।
| तिल प्रयोग | विधि | आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|
| तिल स्नान | स्नान के जल में काले तिल मिलाना | शरीर और मन की शुद्धि |
| तिल भोग | भगवान दामोदर को तिल के लड्डू अर्पित करना | भगवान की प्रसन्नता |
| तिल तर्पण | काले तिल मिले जल से पितरों का तर्पण | पितृ तृप्ति |
| तिल हवन | तिल और घी से आहुति | वातावरण और मन की शुद्धि |
| तिल दान | तिल से भरा पात्र ब्राह्मण या जरूरतमंद को देना | अक्षय पुण्य और शनि शांति |
भीष्म द्वादशी पर किसी नदी के तट पर या घर के पूजा स्थान पर 12 घी के दीपक जलाकर पितरों का स्मरण करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे पूर्वज परम तृप्त होते हैं और अपने कुल को वंश वृद्धि और दीर्घायु का वरदान देते हैं।
12 दीपकों का संबंध कई प्रकार से जोड़ा जाता है। द्वादशी स्वयं 12वीं तिथि है। वर्ष में 12 मास होते हैं और 12 आदित्य होते हैं। वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु के 12 प्रमुख नाम बताए गए हैं, जिन्हें केशवादि द्वादश नाम कहा जाता है। प्रत्येक दीपक को एक नाम के साथ जलाना इस दीपदान को और भी पवित्र बना देता है।
| दीपक | भगवान का नाम | मंत्र |
|---|---|---|
| 1 | केशव | ॐ केशवाय नमः |
| 2 | नारायण | ॐ नारायणाय नमः |
| 3 | माधव | ॐ माधवाय नमः |
| 4 | गोविंद | ॐ गोविन्दाय नमः |
| 5 | विष्णु | ॐ विष्णवे नमः |
| 6 | मधुसूदन | ॐ मधुसूदनाय नमः |
| 7 | त्रिविक्रम | ॐ त्रिविक्रमाय नमः |
| 8 | वामन | ॐ वामनाय नमः |
| 9 | श्रीधर | ॐ श्रीधराय नमः |
| 10 | हृषीकेश | ॐ हृषीकेशाय नमः |
| 11 | पद्मनाभ | ॐ पद्मनाभाय नमः |
| 12 | दामोदर | ॐ दामोदराय नमः |
इन 12 नामों में अंतिम नाम दामोदर है। भीष्म द्वादशी पर इस क्रम से दीपदान करना विशेष रूप से अर्थपूर्ण है, क्योंकि यह दिन स्वयं दामोदर की उपासना का दिन है।
| समय | कर्म |
|---|---|
| प्रातः | तिल मिले जल से स्नान और स्वच्छ पीले वस्त्र |
| पारण | जया एकादशी का व्रत रखा हो तो शुभ समय में पारण |
| पूजा | भगवान दामोदर को पंचामृत स्नान, पीले पुष्प, तुलसी दल और चंदन अर्पित करें |
| भोग | तिल के लड्डू, तिल और गुड़ से बने पदार्थ और मौसमी फल |
| तर्पण | दक्षिण की ओर मुख करके काले तिल मिले जल से पितरों का तर्पण |
| पाठ | विष्णु सहस्रनाम या दामोदराष्टकम का पाठ |
| दान | तिल से भरा पात्र, अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान |
| संध्या | 12 घी के दीपक जलाकर भगवान के 12 नामों के साथ पितरों का स्मरण |
दामोदराष्टकम भगवान दामोदर की प्रसिद्ध स्तुति है, जिसमें माता यशोदा द्वारा बांधे गए बाल कृष्ण के सौंदर्य और प्रेम का वर्णन है। भीष्म द्वादशी पर इसका पाठ मन को भक्ति से भर देता है।
वैदिक ज्योतिष में द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। तिल का संबंध शनि से है और दीपक का संबंध सूर्य तथा अग्नि तत्व से। माघ मास में सूर्य शनि की राशि में होते हैं, इसलिए तिल और दीपक का यह मेल सूर्य और शनि दोनों के संतुलन का प्रतीक है। पितरों के कारक सूर्य हैं और नवम भाव पितृ कृपा से जुड़ा होता है।
| समस्या | ज्योतिषीय संकेत | भीष्म द्वादशी पर उपाय |
|---|---|---|
| पितृ दोष | पीड़ित सूर्य या नवम भाव | तिल तर्पण और 12 दीपकों का दीपदान |
| संतान से जुड़ी बाधा | पीड़ित पंचम भाव | दामोदर पूजन और दामोदराष्टकम पाठ |
| शनि से जुड़े कष्ट | साढ़ेसाती या ढैय्या | तिल से भरे पात्र का दान |
| परिवार में अशांति | चतुर्थ भाव पीड़ित | संध्या को घर में दीपदान और विष्णु नाम जप |
| भाग्य में रुकावट | कमजोर बृहस्पति | विष्णु सहस्रनाम और पीले पुष्प अर्पण |
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| तिल मिले जल से स्नान करें | द्वादशी को तुलसी के पत्ते न तोड़ें |
| एकादशी का पारण सही समय पर करें | हरि वासर में पारण न करें |
| पितरों के निमित्त तर्पण और दीपदान करें | पितरों का अनादर या उपहास न करें |
| तिल और अन्न का दान करें | दान में खराब वस्तु न दें |
| दामोदर की प्रेमपूर्वक पूजा करें | इस दिन मांस, मदिरा और तामसिक भोजन न लें |
भीष्म द्वादशी वह संध्या है जब 12 दीपकों की पंक्ति में पूर्वजों की स्मृतियां जगमगा उठती हैं। यह दिन सिखाता है कि जिन्होंने अपने वंशजों के लिए अपना सब कुछ दिया, उन्हें याद रखना और उनके प्रति कृतज्ञ रहना केवल धर्म नहीं बल्कि मनुष्यता का मूल है। पांडवों ने अपने पितामह के लिए जो कर्म किए, वे आज भी हर परिवार को अपने बड़ों के सम्मान की प्रेरणा देते हैं।
जो व्यक्ति इस दिन भगवान दामोदर की प्रेमपूर्वक पूजा करता है, पितरों को तिल मिला जल अर्पित करता है और संध्या को 12 दीपकों से उनका स्मरण करता है, उसके घर में दीपकों की लौ केवल अंधेरे को नहीं मिटाती। वह पूर्वजों के आशीर्वाद की ऐसी ज्योति बन जाती है जो पीढ़ियों तक कुल का मार्ग प्रकाशित करती रहती है।
भीष्म द्वादशी कब मनाई जाती है?
भीष्म द्वादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को, जया एकादशी के अगले दिन मनाई जाती है। इसे तिल द्वादशी भी कहा जाता है।
भीष्म द्वादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु के दामोदर स्वरूप की पूजा होती है। उन्हें तिल का भोग, तुलसी दल और पीले पुष्प अर्पित किए जाते हैं।
भीष्म द्वादशी को तिल द्वादशी क्यों कहते हैं?
इस दिन तिल से स्नान, तिल का भोग, तिल से तर्पण, तिल से हवन और तिल का दान किया जाता है, इसलिए इसे तिल द्वादशी कहा जाता है।
भीष्म द्वादशी पर 12 दीपक क्यों जलाए जाते हैं?
द्वादशी 12वीं तिथि है और भगवान विष्णु के केशवादि 12 नाम हैं। पितरों के स्मरण में 12 घी के दीपक जलाने से पूर्वज तृप्त होते हैं, ऐसी मान्यता है।
भीष्म द्वादशी का क्या फल मिलता है?
मान्यता है कि इस दिन के तर्पण, दीपदान और तिल दान से पितृ तृप्ति, वंश वृद्धि, परिवार की दीर्घायु और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
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