माघ में गायत्री पुरश्चरण कैसे करें?

By पं. अभिषेक शर्मा

लघु अनुष्ठान, न्यास, हवन और मेधा शक्ति का जागरण

माघ मास में गायत्री पुरश्चरण: विधि और नियम

माघ मास में गायत्री साधना एक दृष्टि में

माघ मास की शांत, गंभीर और शीतल रात्रियां तथा भोर के क्षण योगियों और गायत्री साधकों के लिए अमृत बेला माने जाते हैं। परंपरा में माना जाता है कि इस मास में वातावरण में सात्विक तरंगें सबसे अधिक होती हैं। प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में और संध्या समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके माला से गायत्री महामंत्र का कम से कम 5 या 11 माला जप साधक के आभामंडल को शुद्ध करने वाला माना गया है। जो साधक इस मास में 24,000 गायत्री मंत्रों का लघु अनुष्ठान करते हैं, उनकी मेधा शक्ति, निर्णय क्षमता और वाणी की शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, ऐसी मान्यता है।

साधना तत्वविवरण
मंत्रॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
श्रेष्ठ समयब्रह्म मुहूर्त और संध्या काल
दिशाप्रातः पूर्व की ओर और संध्या को उत्तर या पश्चिम की ओर
मालारुद्राक्ष, तुलसी या चंदन की 108 मनकों की माला
दैनिक जपकम से कम 5 या 11 माला
लघु अनुष्ठान24,000 मंत्र, सामान्यतः 9 दिनों में
पूर्ण पुरश्चरण24 लाख मंत्र, दीर्घ अवधि में
समापनहवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन

गायत्री साधना के मूल नियम

  • प्रतिदिन एक ही समय, एक ही स्थान और एक ही आसन पर जप करें।
  • जप के दिनों में सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य और संयमित वाणी का पालन करें।
  • मंत्र का उच्चारण शुद्ध हो, इसके लिए किसी जानकार से मार्गदर्शन लें।
  • जप के समय मन में सविता देव के प्रकाश का ध्यान करें।
  • अनुष्ठान का संकल्प लिया हो तो उसे बीच में न छोड़ें।

गायत्री महामंत्र का अर्थ और महिमा

गायत्री मंत्र ऋग्वेद का मंत्र है, जिसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं। इसे वेदों की माता कहा गया है। मंत्र में सविता देव की उपासना है। सविता का अर्थ है प्रेरणा देने वाला और वैदिक परंपरा में सूर्य को ही सविता के रूप में पूजा जाता है।

मंत्र का भाव इस प्रकार है। भू, भुवः और स्वः, अर्थात पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग, तीनों लोकों में व्याप्त उस सविता देव के श्रेष्ठ और दिव्य तेज का ध्यान किया जाता है, जो सबकी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं। इस मंत्र में धन, वैभव या सांसारिक सुख की मांग नहीं है। इसमें केवल यह प्रार्थना है कि बुद्धि शुद्ध हो और सही दिशा में चले। यही इस मंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है, क्योंकि शुद्ध बुद्धि से ही जीवन की हर समस्या का समाधान निकलता है।

मंत्र का भागअर्थ
ॐपरमात्मा का प्रतीक आदि नाद
भूर्भुवः स्वःपृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग, तीनों लोक
तत्सवितुर्वरेण्यंउन सविता देव का वरण करने योग्य श्रेष्ठ
भर्गो देवस्य धीमहिदिव्य तेज के ध्यान का साधक का संकल्प
धियो यो नः प्रचोदयात्जो बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें

माघ मास में गायत्री साधना क्यों विशेष है?

गायत्री मंत्र सविता अर्थात सूर्य की उपासना का मंत्र है और माघ मास सूर्य उपासना का सर्वश्रेष्ठ मास माना जाता है। इस समय सूर्य उत्तरायण में होते हैं और उनका तेज धीरे धीरे बढ़ता है। इसी कारण परंपरा में माघ मास को गायत्री साधना के लिए विशेष रूप से अनुकूल माना गया है।

माघ की ठंडी और लंबी रातें भी साधना के अनुकूल हैं। इस समय प्रकृति शांत होती है, बाहरी गतिविधियां कम होती हैं और मन सहजता से भीतर की ओर मुड़ता है। वसंत पंचमी पर माँ सरस्वती की उपासना और गायत्री की उपासना, दोनों बुद्धि और ज्ञान से जुड़ी हैं, इसलिए यह मास विद्यार्थियों और ज्ञान साधकों के लिए विशेष रूप से फलदायी है।

लघु अनुष्ठान और पुरश्चरण का अंतर

पुरश्चरण का अर्थ है किसी मंत्र को सिद्ध करने के लिए उसका एक निश्चित संख्या में विधिपूर्वक जप करना। परंपरा में किसी मंत्र के पुरश्चरण के लिए उस मंत्र के अक्षरों की संख्या के बराबर लाख जप का विधान है। गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं, इसलिए उसका पूर्ण पुरश्चरण 24 लाख जप का होता है। यह एक लंबी और कठोर साधना है।

गृहस्थ और विद्यार्थियों के लिए परंपरा में लघु अनुष्ठान का विधान है, जिसमें 24,000 मंत्रों का जप किया जाता है। इसे सामान्यतः 9 दिनों में पूरा किया जाता है, अर्थात प्रतिदिन लगभग 27 माला।

साधनाजप संख्यासामान्य अवधिकिसके लिए
दैनिक उपासना5 या 11 माला प्रतिदिननियमितसभी साधक
लघु अनुष्ठान24,000 मंत्रलगभग 9 दिनगृहस्थ और विद्यार्थी
मध्यम अनुष्ठान1 लाख 25 हजार मंत्रलगभग 40 दिनअनुभवी साधक
पूर्ण पुरश्चरण24 लाख मंत्रदीर्घ अवधिगुरु मार्गदर्शन में समर्पित साधक

पुरश्चरण के 5 अंग

परंपरा में पुरश्चरण के 5 अंग बताए गए हैं। प्रत्येक अगला अंग पिछले का दशांश अर्थात दसवां भाग होता है।

अंगविवरण24,000 जप पर संख्या
जपमंत्र का विधिपूर्वक जप24,000
हवनजप का दशांश हवन2,400 आहुतियां
तर्पणहवन का दशांश तर्पण240 बार
मार्जनतर्पण का दशांश मार्जन अर्थात जल छिड़काव24 बार
ब्राह्मण भोजनसामर्थ्य अनुसार ब्राह्मण या जरूरतमंदों को भोजनश्रद्धा अनुसार

जो साधक हवन न कर सके, उसके लिए परंपरा में हवन की संख्या के बराबर अतिरिक्त जप करने का विकल्प भी बताया गया है।

न्यास विधि का सरल परिचय

न्यास का अर्थ है मंत्र के अक्षरों और शक्तियों को शरीर के विभिन्न अंगों में स्थापित करने की भावना। इससे साधक का शरीर मंत्र की शक्ति के योग्य बनता है। गृहस्थ साधक के लिए सरल न्यास पर्याप्त माना जाता है।

  • कर न्यास: दोनों हाथों की उंगलियों और हथेलियों को मंत्र के भाव से स्पर्श करना।
  • अंग न्यास: हृदय, सिर, शिखा, नेत्र और पूरे शरीर को क्रम से स्पर्श करते हुए मंत्र की शक्ति की स्थापना की भावना करना।
  • ध्यान: जप से पहले माँ गायत्री या सविता देव के तेजस्वी स्वरूप का ध्यान करना।

न्यास की विस्तृत विधि गायत्री उपासना की पुस्तकों में दी गई है। इसे किसी जानकार या गुरु से सीखना उत्तम है।

लघु अनुष्ठान की संपूर्ण विधि

चरणविधि
संकल्पपहले दिन शुभ मुहूर्त में स्नान करके 24,000 जप का संकल्प लें
स्थानघर का शांत पूजा स्थान, जहां प्रतिदिन बैठना संभव हो
आसनकुश या ऊनी आसन, पूरे अनुष्ठान में एक ही आसन
दीपकघी का दीपक जलाएं
आचमन और प्राणायामआचमन करके कुछ प्राणायाम से मन को शांत करें
न्यास और ध्यानसरल न्यास करके सविता देव का ध्यान करें
जपप्रतिदिन लगभग 27 माला जप, एक ही समय पर
समापनअंतिम दिन हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन
क्षमा प्रार्थनाअनुष्ठान में हुई भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना

गायत्री साधना के कड़े नियम

नियमविवरण
ब्रह्मचर्यअनुष्ठान के दिनों में पूर्ण ब्रह्मचर्य
आहारसात्विक भोजन, संभव हो तो एक समय भोजन
शयनसंभव हो तो भूमि पर शयन
वाणीकटु वचन, झूठ और निंदा से पूर्ण परहेज
नियमितताजप का समय, स्थान और आसन न बदलें
शुद्धतास्नान के बाद ही जप और स्वच्छ वस्त्र
मन की स्थितिजप के समय मन को मंत्र के अर्थ पर केंद्रित रखें
गोपनीयताअनुष्ठान और अनुभवों का प्रचार न करें

गायत्री साधना के लाभ

परंपरा और अनुभव दोनों यह बताते हैं कि नियमित गायत्री साधना से साधक के जीवन में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

  • मेधा शक्ति: गायत्री बुद्धि को प्रेरित करने का मंत्र है, इसलिए इसे स्मरण शक्ति और समझ बढ़ाने वाला माना गया है।
  • निर्णय क्षमता: शांत और एकाग्र मन सही निर्णय लेने में सक्षम होता है।
  • वाणी की शक्ति: नियमित जप से वाणी में स्पष्टता और प्रभाव आता है।
  • प्राण संवर्धन: जप के साथ किया गया प्राणायाम शरीर में ऊर्जा और स्फूर्ति बढ़ाता है।
  • आत्मिक जागरण: नियमित साधना से व्यक्ति अपने भीतर की शांति और शक्ति को अनुभव करने लगता है।
  • मानसिक शांति: मंत्र की लय मन की चंचलता को शांत करती है।

ज्योतिष की दृष्टि से गायत्री साधना

ज्योतिष में सूर्य आत्मा और तेज के कारक हैं, बुध बुद्धि और वाणी के और बृहस्पति ज्ञान के। गायत्री मंत्र सविता अर्थात सूर्य की उपासना है और इसका उद्देश्य बुद्धि का शुद्धिकरण है। इसलिए ज्योतिषीय परंपरा में गायत्री साधना को सूर्य, बुध और गुरु तीनों के शुभ फलों को बढ़ाने वाला माना जाता है। कमजोर सूर्य के कारण आत्मविश्वास की कमी या पढ़ाई में बाधा अनुभव करने वाले जातकों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी है।

गायत्री साधना में क्या करें और क्या न करें?

क्या करेंक्या न करें
शुद्ध उच्चारण सीखकर जप करेंगलत उच्चारण के साथ जल्दबाजी में जप न करें
प्रतिदिन एक ही समय पर जप करेंअनुष्ठान का संकल्प लेकर बीच में न छोड़ें
सात्विक आहार और संयम रखेंतामसिक भोजन और व्यसन न करें
जप के साथ अर्थ का चिंतन करेंकेवल संख्या पूरी करने पर ध्यान न दें
कठिन साधना से पहले गुरु से मार्गदर्शन लेंअपने अनुभवों का प्रचार न करें

मंत्र के प्रकाश में खिलती हुई बुद्धि

गायत्री मंत्र भारत की आध्यात्मिक परंपरा का हृदय है। इसमें न कोई सांसारिक मांग है, न कोई भय। केवल एक विनम्र प्रार्थना है कि बुद्धि प्रकाशित हो। माघ मास की शांत भोर में जब साधक इस मंत्र का जप करता है, तो उसके भीतर धीरे धीरे वही प्रकाश जागने लगता है जिसकी वह प्रार्थना करता है।

जो साधक इस मास में नियम, श्रद्धा और धैर्य के साथ गायत्री साधना करता है, उसके लिए यह मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं रहता। वह जीवन का मार्गदर्शक बन जाता है, जो हर कठिन मोड़ पर सही दिशा दिखाता है। यही गायत्री साधना का सबसे बड़ा वरदान है।

FAQ

गायत्री का लघु अनुष्ठान क्या है? लघु अनुष्ठान में गायत्री मंत्र का 24,000 बार जप किया जाता है, जो सामान्यतः 9 दिनों में प्रतिदिन लगभग 27 माला जप करके पूरा होता है।

गायत्री मंत्र का पूर्ण पुरश्चरण कितने जप का होता है? गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं, इसलिए परंपरा में इसका पूर्ण पुरश्चरण 24 लाख जप का माना जाता है। यह गुरु मार्गदर्शन में की जाने वाली दीर्घ साधना है।

पुरश्चरण के 5 अंग कौन से हैं? पुरश्चरण के 5 अंग जप, हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन हैं। प्रत्येक अगला अंग पिछले का दशांश अर्थात दसवां भाग होता है।

माघ मास में गायत्री साधना क्यों विशेष है? गायत्री मंत्र सविता अर्थात सूर्य की उपासना है और माघ मास सूर्य उपासना का श्रेष्ठ मास है। साथ ही इस मास का शांत वातावरण साधना के अनुकूल है।

गायत्री जप के लिए कौन सी माला उत्तम है? गायत्री जप के लिए रुद्राक्ष, तुलसी या चंदन की 108 मनकों की माला उत्तम मानी जाती है। पूरे अनुष्ठान में एक ही माला का प्रयोग करें।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

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