माघ में हरे कृष्ण महामंत्र क्यों जपें?

By पं. संजीव शर्मा

कलि संतरण उपनिषद, 16 नामों का रहस्य और संकीर्तन की परंपरा

कलि संतरण उपनिषद और माघ मास में महामंत्र जप

कलि संतरण उपनिषद और महामंत्र एक दृष्टि में

कलि संतरण उपनिषद में वर्णन है कि कलियुग के दोषों और मानसिक अशांति से पार होने का सबसे सरल उपाय 16 नामों और 32 अक्षरों वाला महामंत्र है। माघ मास में, जब भगवान माधव इस मास के अधिष्ठाता देव माने जाते हैं, प्रतिदिन तुलसी की माला पर इस महामंत्र का जप या संकीर्तन करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। परंपरा में माना जाता है कि जैसे सूखी घास अग्नि में जल जाती है, वैसे ही श्रद्धा से किया गया नाम जप संचित कर्म बंधनों को भस्म कर देता है।

महामंत्र तत्व विवरण
स्रोत कलि संतरण उपनिषद
उपनिषद में क्रम हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥
प्रचलित कीर्तन क्रम हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
नामों की संख्या 16
अक्षरों की संख्या 32
जप की माला तुलसी की माला
जप के प्रकार वाचिक जप, उपांशु जप, मानसिक जप और सामूहिक संकीर्तन
अपेक्षित फल मन की शांति, पापों का क्षय और भक्ति की वृद्धि

महामंत्र जप के मूल सूत्र

  • प्रतिदिन एक निश्चित समय पर तुलसी की माला पर जप करें।
  • जप के समय प्रत्येक नाम को स्पष्ट सुनने का प्रयास करें।
  • जप की संख्या से अधिक महत्व भाव और एकाग्रता का है।
  • परिवार के साथ सामूहिक संकीर्तन करने से घर का वातावरण पवित्र होता है।
  • नाम जप के साथ सदाचार और करुणा को भी जीवन में अपनाएं।

कलि संतरण उपनिषद की कथा

कलि संतरण उपनिषद एक छोटा परंतु अत्यंत प्रभावशाली उपनिषद है, जो कृष्ण यजुर्वेद से जुड़ा माना जाता है। इसमें देवर्षि नारद और भगवान ब्रह्मा के बीच एक संवाद है। द्वापर युग के अंत में नारद जी ब्रह्मा जी के पास गए और पूछा कि पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए वे कलियुग के प्रभाव से कैसे पार हो सकते हैं।

ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया कि वे सभी वेदों का गुप्त रहस्य बताते हैं, जिससे कलियुग के प्रभाव से पार हुआ जा सकता है। वह रहस्य है आदि पुरुष भगवान नारायण के नाम का उच्चारण। इसके बाद ब्रह्मा जी ने 16 नामों वाला महामंत्र बताया। उपनिषद में कहा गया है कि ये 16 नाम उन 16 कलाओं के आवरण को नष्ट करते हैं जिनसे जीव ढका हुआ है। इसके बाद परब्रह्म का प्रकाश उसी प्रकार प्रकट होता है जैसे बादल हटने पर सूर्य की किरणें।

जब नारद जी ने इस मंत्र के जप की विधि पूछी, तो ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया कि इसकी कोई विशेष विधि नहीं है। कोई भी व्यक्ति, किसी भी समय, पवित्र या अपवित्र किसी भी अवस्था में इसका उच्चारण कर सकता है। यह इस महामंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है। यह सबके लिए, हर समय और हर स्थिति में सुलभ है।

उपनिषद में आगे कहा गया है कि जो व्यक्ति इस महामंत्र का साढ़े 3 करोड़ बार जप करता है, वह अनेक प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। यह संख्या साधक को जीवन भर निरंतर नाम जप की प्रेरणा देती है।

महामंत्र का अर्थ

महामंत्र में 3 नाम हैं: हरे, कृष्ण और राम। परंपरा में इन नामों के अर्थ इस प्रकार बताए गए हैं।

नाम अर्थ
हरे भगवान की आह्लादिनी शक्ति, अर्थात श्री राधा या माता लक्ष्मी का संबोधन और हरि का संबोधन रूप
कृष्ण सबको आकर्षित करने वाले, सर्व आकर्षक परमात्मा
राम योगियों के हृदय में रमण करने वाले, आनंद के स्रोत

इस प्रकार महामंत्र भगवान और उनकी शक्ति, दोनों को एक साथ पुकारने की प्रार्थना है। यह एक ऐसी पुकार है जिसमें साधक भगवान से उनकी सेवा में लगाने की प्रार्थना करता है। इसमें कोई सांसारिक मांग नहीं है, केवल प्रेम और समर्पण है।

मंत्र के दो प्रचलित क्रम

कलि संतरण उपनिषद में महामंत्र हरे राम से आरंभ होता है। परंतु श्री चैतन्य महाप्रभु और गौड़ीय वैष्णव परंपरा में प्रचलित कीर्तन में यह हरे कृष्ण से आरंभ होता है। दोनों ही क्रम श्रद्धा से जपे जाते हैं और दोनों में वही 16 नाम हैं। साधक अपनी परंपरा के अनुसार किसी भी क्रम से जप कर सकता है।

माघ मास में नाम जप का विशेष महत्व

माघ मास भगवान माधव का मास है और महामंत्र में भगवान कृष्ण और राम, दोनों नारायण के ही स्वरूप हैं। इसलिए इस मास में महामंत्र का जप माधव की उपासना का सबसे सरल और सुलभ मार्ग माना जाता है।

माघ की ठंडी और लंबी रातें भी नाम जप के अनुकूल हैं। इस समय बाहर की गतिविधियां कम होती हैं और मन सहजता से भीतर की ओर मुड़ता है। परंपरा में माना जाता है कि इस मास की सर्द रात्रियों में किया गया नाम जप आत्मा को दिव्य आनंद और गहरी शांति प्रदान करता है।

महामंत्र जप के नियम और विधि

यद्यपि उपनिषद में जप के लिए कोई कठोर नियम नहीं बताया गया है, फिर भी परंपरा में कुछ सुझाव दिए गए हैं जो जप को अधिक एकाग्र और प्रभावी बनाते हैं।

पक्ष सुझाव
समय ब्रह्म मुहूर्त सबसे उत्तम, परंतु किसी भी समय जप किया जा सकता है
माला तुलसी की 108 मनकों की माला
संख्या प्रतिदिन कम से कम 1 माला से आरंभ, धीरे धीरे बढ़ाएं
आसन शांत स्थान पर सीधे बैठकर
उच्चारण प्रत्येक नाम स्पष्ट और ध्यानपूर्वक
मन नाम की ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करें
माला संभालना माला को झोली या स्वच्छ वस्त्र में रखें और भूमि पर न रखें

जप के 4 प्रकार

  • वाचिक जप: ऊंचे स्वर में नाम का उच्चारण। यह आरंभ करने वालों के लिए सरल है।
  • उपांशु जप: होंठ हिलाते हुए धीमे स्वर में जप, जिसे केवल जप करने वाला सुन सके।
  • मानसिक जप: मन ही मन नाम का स्मरण। इसे सबसे गहरा माना गया है।
  • संकीर्तन: परिवार या समूह के साथ वाद्य यंत्रों सहित गाकर नाम का कीर्तन।

संकीर्तन की परंपरा

16वीं शताब्दी में श्री चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल और ओडिशा में सामूहिक हरिनाम संकीर्तन को एक महान आंदोलन के रूप में फैलाया। उन्होंने सिखाया कि कलियुग में भगवान के नाम का संकीर्तन ही सबसे श्रेष्ठ साधना है। उनके संकीर्तन में जाति, वर्ग और भेदभाव का कोई स्थान नहीं था। सभी लोग एक साथ मिलकर भगवान का नाम गाते थे।

आज भी यह परंपरा पूरे विश्व में फैली हुई है। माघ मास में परिवार के साथ मिलकर संध्या को कुछ समय संकीर्तन करना घर के वातावरण को पवित्र, शांत और आनंदमय बना देता है। बच्चों में भी इससे भक्ति और संस्कार के बीज पड़ते हैं।

नाम जप के आध्यात्मिक लाभ

  • मानसिक शांति: नाम की लय मन की चंचलता को शांत करती है और चिंता कम करती है।
  • पापों का क्षय: परंपरा में माना जाता है कि श्रद्धा से किया गया नाम जप संचित कर्म बंधनों को नष्ट करता है।
  • भक्ति की वृद्धि: नियमित जप से भगवान के प्रति प्रेम धीरे धीरे गहरा होता है।
  • सरलता: इसके लिए किसी विशेष सामग्री, स्थान या विधि की आवश्यकता नहीं।
  • पारिवारिक सौहार्द: सामूहिक संकीर्तन परिवार को एक सूत्र में बांधता है।
  • आंतरिक आनंद: नाम जप करने वाले साधक प्रायः बिना कारण के एक आंतरिक आनंद का अनुभव करते हैं।

ज्योतिष की दृष्टि से नाम जप

ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है और नाम जप मन को स्थिर करने का सबसे सरल उपाय है। भगवान विष्णु बृहस्पति के अधिष्ठाता माने जाते हैं, इसलिए उनके नाम का जप बृहस्पति के शुभ फल बढ़ाने वाला माना जाता है। परंपरा में यह भी माना जाता है कि राहु और केतु से उत्पन्न भय और भ्रम भगवान के नाम स्मरण से शांत होते हैं।

समस्या ज्योतिषीय संकेत नाम जप का उपाय
मानसिक अशांति पीड़ित चंद्रमा प्रतिदिन महामंत्र का मानसिक जप
भ्रम और अज्ञात भय अशुभ राहु संध्या को सामूहिक संकीर्तन
भाग्य और गुरु कृपा में कमी कमजोर बृहस्पति गुरुवार को अतिरिक्त माला जप
पारिवारिक कलह चतुर्थ भाव पीड़ित परिवार के साथ संकीर्तन

नाम जप में क्या करें और क्या न करें?

क्या करें क्या न करें
प्रतिदिन नियमित समय पर जप करें जप को केवल संख्या पूरी करने का कार्य न बनाएं
प्रत्येक नाम को ध्यान से सुनें जप के समय बातचीत या ध्यान भटकाने वाले काम न करें
तुलसी की माला का सम्मान करें माला को भूमि पर या अपवित्र स्थान पर न रखें
परिवार के साथ संकीर्तन करें दूसरों की परंपरा या क्रम की निंदा न करें
नाम जप के साथ सदाचार अपनाएं नाम जप के भरोसे बुरे कर्मों को उचित न ठहराएं

नाम की ध्वनि में घुलता हुआ कलियुग का अंधकार

कलि संतरण उपनिषद का संदेश अत्यंत सरल और करुणापूर्ण है। भगवान तक पहुंचने के लिए किसी कठिन तप, बड़े यज्ञ या विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। केवल प्रेम से उनका नाम लेना पर्याप्त है। यह मार्ग हर व्यक्ति के लिए खुला है, चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग या अवस्था का हो।

माघ मास की सर्द रातों में जब साधक तुलसी की माला पर यह महामंत्र जपता है या परिवार के साथ संकीर्तन करता है, तो उसके मन का शोर धीरे धीरे शांत होने लगता है। जैसे बादल हटने पर सूर्य का प्रकाश प्रकट होता है, वैसे ही नाम की ध्वनि से मन के आवरण हटने लगते हैं और भीतर का प्रकाश जाग उठता है। यही इस महामंत्र का सबसे बड़ा वरदान है।

FAQ

कलि संतरण उपनिषद में कौन सा मंत्र बताया गया है?
कलि संतरण उपनिषद में 16 नामों और 32 अक्षरों वाला महामंत्र बताया गया है, जिसमें हरे, राम और कृष्ण नामों का जप किया जाता है।

महामंत्र का सही क्रम क्या है?
उपनिषद में मंत्र हरे राम से आरंभ होता है, जबकि चैतन्य महाप्रभु की परंपरा के प्रचलित कीर्तन में यह हरे कृष्ण से आरंभ होता है। दोनों में वही 16 नाम हैं।

क्या महामंत्र जप के लिए कोई विशेष नियम है?
उपनिषद के अनुसार इसके लिए कोई कठोर विधि नहीं है। कोई भी व्यक्ति किसी भी समय इसका जप कर सकता है, परंतु नियमितता और एकाग्रता जप को प्रभावी बनाती है।

माघ मास में महामंत्र जप का क्या महत्व है?
माघ मास भगवान माधव का मास है और महामंत्र में उन्हीं के स्वरूपों के नाम हैं। इस मास की शांत रातों में नाम जप को विशेष पुण्यदायी माना गया है।

महामंत्र का जप किस माला पर करना चाहिए?
परंपरा में महामंत्र का जप तुलसी की 108 मनकों की माला पर करना उत्तम माना जाता है। माला को स्वच्छ झोली में रखें और भूमि पर न रखें।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ