माघ मास का पंचांग कैसे समझें?

By पं. अमिताभ शर्मा

30 तिथियां, दोनों पक्षों के पर्व, पंचांग के 5 अंग और समयावधि

माघ मास का पंचांग: तिथियां, पर्व और समयावधि

माघ मास का पंचांग एक दृष्टि में

माघ मास में धार्मिक अनुष्ठानों, महास्नानों और पर्वों की एक लंबी श्रृंखला होती है, जो अंग्रेजी कैलेंडर में सामान्यतः जनवरी के मध्य से फरवरी के मध्य तक चलती है। सकट चौथ, षटतिला एकादशी, मौनी अमावस्या, माघ गुप्त नवरात्रि, वसंत पंचमी, रथ सप्तमी, भीष्म अष्टमी, जया एकादशी, भीष्म द्वादशी, कुंभ संक्रांति और माघ पूर्णिमा, यह पूरा महीना उत्सवों से भरा हुआ है। यह लेख माघ मास की सभी 30 तिथियों और उन पर आने वाले पर्वों को क्रम से प्रस्तुत करता है और साथ ही पंचांग को पढ़ने की सरल विधि भी बताता है।

पंचांग तत्व विवरण
मास क्रम हिन्दू वर्ष का 11वां मास
पूर्णिमांत पद्धति में आरंभ पौष पूर्णिमा के अगले दिन से
अमांत पद्धति में आरंभ पौष अमावस्या के अगले दिन से
अंग्रेजी कैलेंडर में सामान्यतः जनवरी के मध्य से फरवरी के मध्य तक, हर वर्ष कुछ अंतर के साथ
कुल तिथियां 30, दोनों पक्षों में 15 और 15
ऋतु शिशिर
सूर्य का गोचर प्रायः मकर राशि, मास के अंत के आसपास कुंभ राशि
पूर्णिमा का नक्षत्र प्रायः मघा

पंचांग पढ़ने के मूल सूत्र

  • हिन्दू पंचांग चंद्र और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है।
  • तिथियों की अंग्रेजी तारीखें हर वर्ष बदलती हैं, इसलिए उस वर्ष का पंचांग अवश्य देखें।
  • एक ही दिन में कभी कभी 2 तिथियां आ जाती हैं और कभी कोई तिथि 2 दिन तक रहती है।
  • व्रत और पर्व का निर्णय सूर्योदय के समय की तिथि, प्रदोष काल या चंद्रोदय के नियमों से होता है।
  • स्थानीय पंचांग देखना आवश्यक है, क्योंकि सूर्योदय और चंद्रोदय का समय हर स्थान पर अलग होता है।

पंचांग के 5 अंग

पंचांग शब्द का अर्थ है 5 अंगों वाला। हिन्दू पंचांग में समय की गणना 5 मुख्य अंगों के आधार पर की जाती है।

अंग अर्थ संख्या
तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच 12 अंश की दूरी का एक खंड 30 तिथियां
वार सप्ताह का दिन 7 वार
नक्षत्र चंद्रमा जिस तारामंडल में होता है 27 नक्षत्र
योग सूर्य और चंद्रमा के अंशों के योग पर आधारित 27 योग
करण तिथि का आधा भाग 11 करण, जिनमें 4 स्थिर और 7 चर

तिथि पंचांग का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि अधिकांश व्रत और पर्व तिथि के आधार पर ही मनाए जाते हैं। नक्षत्र, योग और करण प्रतिदिन बदलते हैं और मुहूर्त निकालने में इनका विशेष उपयोग होता है।

पूर्णिमांत और अमांत पद्धति

भारत में 2 प्रकार की पंचांग पद्धतियां प्रचलित हैं। उत्तर भारत में पूर्णिमांत पद्धति चलती है, जिसमें मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है। दक्षिण और पश्चिम भारत में अमांत पद्धति चलती है, जिसमें मास अमावस्या पर समाप्त होता है।

इसका परिणाम यह होता है कि शुक्ल पक्ष दोनों पद्धतियों में एक ही मास में आता है, परंतु कृष्ण पक्ष का नाम अलग हो जाता है। उदाहरण के लिए, जिसे पूर्णिमांत पद्धति में माघ कृष्ण पक्ष कहा जाता है, उसे अमांत पद्धति में पौष कृष्ण पक्ष कहा जाता है। पर्वों की तिथियां दोनों में एक ही रहती हैं, केवल मास के नाम में अंतर होता है। इस लेख में पूर्णिमांत पद्धति का प्रयोग किया गया है।

माघ कृष्ण पक्ष की तिथियां और पर्व

क्रम तिथि प्रमुख पर्व या महत्व
1 कृष्ण प्रतिपदा माघ मास और माघ स्नान का आरंभ, कल्पवास जारी
2 कृष्ण द्वितीया माघ स्नान और दान
3 कृष्ण तृतीया माघ स्नान और दान
4 कृष्ण चतुर्थी सकट चौथ, तिलकुटा चौथ, संकष्टी चतुर्थी
5 कृष्ण पंचमी माघ स्नान और दान
6 कृष्ण षष्ठी माघ स्नान और दान
7 कृष्ण सप्तमी सूर्य उपासना
8 कृष्ण अष्टमी देवी उपासना
9 कृष्ण नवमी माघ स्नान और दान
10 कृष्ण दशमी एकादशी व्रत की तैयारी, सात्विक भोजन
11 कृष्ण एकादशी षटतिला एकादशी
12 कृष्ण द्वादशी षटतिला एकादशी का पारण
13 कृष्ण त्रयोदशी प्रदोष व्रत
14 कृष्ण चतुर्दशी मासिक शिवरात्रि
15 अमावस्या मौनी अमावस्या, पितृ तर्पण और महास्नान

माघ शुक्ल पक्ष की तिथियां और पर्व

क्रम तिथि प्रमुख पर्व या महत्व
1 शुक्ल प्रतिपदा माघ गुप्त नवरात्रि का आरंभ, घटस्थापना
2 शुक्ल द्वितीया गुप्त नवरात्रि साधना
3 शुक्ल तृतीया गुप्त नवरात्रि साधना
4 शुक्ल चतुर्थी माघी गणेश जयंती, तिल चतुर्थी
5 शुक्ल पंचमी वसंत पंचमी, सरस्वती पूजा, विद्यारंभ
6 शुक्ल षष्ठी गुप्त नवरात्रि साधना
7 शुक्ल सप्तमी रथ सप्तमी, अचला सप्तमी, सूर्य जयंती
8 शुक्ल अष्टमी भीष्म अष्टमी, भीष्म तर्पण
9 शुक्ल नवमी महानंदा नवमी, गुप्त नवरात्रि का समापन
10 शुक्ल दशमी एकादशी व्रत की तैयारी
11 शुक्ल एकादशी जया एकादशी
12 शुक्ल द्वादशी भीष्म द्वादशी, तिल द्वादशी, जया एकादशी का पारण
13 शुक्ल त्रयोदशी प्रदोष व्रत
14 शुक्ल चतुर्दशी माघ पूर्णिमा की तैयारी
15 पूर्णिमा माघ पूर्णिमा, कल्पवास समापन, संत रविदास जयंती, ललिता जयंती

सौर पर्व: मकर और कुंभ संक्रांति

कुछ पर्व तिथि पर नहीं बल्कि सूर्य के राशि परिवर्तन पर आधारित होते हैं। इन्हें सौर पर्व कहा जाता है। माघ मास के आसपास 2 प्रमुख संक्रांतियां आती हैं।

संक्रांति घटना सामान्य अंग्रेजी तारीख महत्व
मकर संक्रांति सूर्य का धनु से मकर राशि में प्रवेश 14 या 15 जनवरी के आसपास उत्तरायण का आरंभ और खरमास की समाप्ति
कुंभ संक्रांति सूर्य का मकर से कुंभ राशि में प्रवेश 12 से 14 फरवरी के आसपास पुण्य स्नान और दान

चूंकि संक्रांति सूर्य पर और तिथि चंद्रमा पर आधारित है, इसलिए मकर संक्रांति कभी पौष मास के अंत में और कभी माघ मास के आरंभ में पड़ती है। कुंभ संक्रांति सामान्यतः माघ मास के उत्तरार्ध में या फाल्गुन मास के आरंभ में आती है।

किसी पर्व की सही तारीख कैसे जानें?

यह लेख तिथियों और पर्वों का स्थायी क्रम बताता है, परंतु प्रत्येक वर्ष इन तिथियों की अंग्रेजी तारीखें बदल जाती हैं। किसी भी पर्व की सही तारीख और मुहूर्त जानने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें।

  • वर्ष का पंचांग: उस वर्ष का प्रामाणिक पंचांग देखें।
  • उदया तिथि: अधिकांश व्रतों में सूर्योदय के समय उपस्थित तिथि मान्य होती है।
  • चंद्रोदय व्रत: सकट चौथ जैसे व्रतों में चंद्रोदय के समय की तिथि देखी जाती है।
  • प्रदोष व्रत: प्रदोष काल अर्थात सूर्यास्त के आसपास की त्रयोदशी देखी जाती है।
  • स्थानीय समय: अपने नगर के सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के समय के अनुसार निर्णय लें।
  • नक्षत्र और योग: प्रतिदिन का नक्षत्र, योग और करण पंचांग में देखें, क्योंकि ये हर वर्ष अलग होते हैं।

तिथि वृद्धि और तिथि क्षय

कभी कभी कोई तिथि 2 सूर्योदयों तक चलती है, जिसे तिथि वृद्धि कहा जाता है। और कभी कोई तिथि 2 सूर्योदयों के बीच ही आरंभ होकर समाप्त हो जाती है, जिसे तिथि क्षय कहा जाता है। इसी कारण कई बार एक ही पर्व अलग अलग पंचांगों में अलग अलग दिन बताया जाता है। ऐसी स्थिति में अपने क्षेत्र की परंपरा और स्थानीय विद्वान के निर्णय का पालन करना उचित है।

ज्योतिष की दृष्टि से माघ का पंचांग

माघ मास में सूर्य प्रायः मकर राशि में होते हैं, जो शनि की राशि है। पूर्णिमा पर चंद्रमा प्रायः मघा नक्षत्र में होता है, जिसके स्वामी केतु और देवता पितर हैं। इसलिए इस मास के पंचांग में सूर्य, शनि, केतु और पितरों का प्रभाव विशेष रूप से देखा जाता है। यही कारण है कि इस मास में सूर्य उपासना, तिल दान, पितृ तर्पण और संयम का विशेष महत्व है।

पंचांग के प्रयोग में क्या करें और क्या न करें?

क्या करें क्या न करें
उस वर्ष का प्रामाणिक पंचांग देखें पिछले वर्ष की तारीखों पर भरोसा न करें
अपने नगर के सूर्योदय और चंद्रोदय का समय देखें किसी दूसरे नगर के समय से निर्णय न लें
तिथि वृद्धि और क्षय में स्थानीय विद्वान से पूछें अलग पंचांगों के अंतर से भ्रमित न हों
पूर्णिमांत और अमांत का अंतर समझें मास के नाम के अंतर को तिथि का अंतर न समझें
पर्वों की सूची परिवार में साझा करें महत्वपूर्ण व्रतों की तैयारी अंतिम समय पर न छोड़ें

समय के चक्र में बंधी हुई पर्वों की माला

माघ मास का पंचांग केवल तारीखों की सूची नहीं बल्कि पर्वों की एक सुंदर माला है। कृष्ण पक्ष में सकट चौथ की मातृ करुणा, षटतिला एकादशी का दान और मौनी अमावस्या का मौन आता है। शुक्ल पक्ष में गुप्त नवरात्रि की शक्ति, वसंत पंचमी का ज्ञान, रथ सप्तमी का प्रकाश, भीष्म अष्टमी का त्याग और माघ पूर्णिमा की पूर्णता आती है। हर तिथि जीवन के किसी न किसी गुण की साधना का अवसर देती है।

जो व्यक्ति इस पंचांग को समझकर पूरे मास की योजना बनाता है, वह किसी भी महत्वपूर्ण पर्व से वंचित नहीं होता। पंचांग उसके लिए समय का मानचित्र बन जाता है, जो उसे दिन प्रतिदिन साधना, सेवा और आनंद की ओर ले जाता है।

FAQ

माघ मास अंग्रेजी कैलेंडर में कब होता है?
माघ मास सामान्यतः जनवरी के मध्य से फरवरी के मध्य तक होता है। चंद्र मास होने के कारण इसकी तारीखें हर वर्ष कुछ बदलती हैं।

पंचांग के 5 अंग कौन से हैं?
पंचांग के 5 अंग तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण हैं। इनमें 30 तिथियां, 7 वार, 27 नक्षत्र, 27 योग और 11 करण होते हैं।

माघ मास के प्रमुख पर्व कौन से हैं?
सकट चौथ, षटतिला एकादशी, मौनी अमावस्या, गुप्त नवरात्रि, वसंत पंचमी, रथ सप्तमी, भीष्म अष्टमी, जया एकादशी, भीष्म द्वादशी और माघ पूर्णिमा प्रमुख पर्व हैं।

पूर्णिमांत और अमांत पद्धति में क्या अंतर है?
पूर्णिमांत में मास पूर्णिमा पर और अमांत में अमावस्या पर समाप्त होता है। इससे कृष्ण पक्ष के मास का नाम बदलता है, पर पर्वों की तिथियां वही रहती हैं।

किसी पर्व की सही तारीख कैसे जानें?
उस वर्ष का प्रामाणिक स्थानीय पंचांग देखें और अपने नगर के सूर्योदय, सूर्यास्त तथा चंद्रोदय के समय के अनुसार व्रत का निर्णय लें।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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