पद्म पुराण के अनुसार माघ माहात्म्य: प्रयागराज त्रिवेणी संगम पर कल्पवास और अमृत स्नान

By पं. सुव्रत शर्मा

तीर्थराज प्रयाग का अमृत योग, कल्पवास के 21 नियम और त्रिवेणी स्नान का आध्यात्मिक विज्ञान

पद्म पुराण माघ माहात्म्य: प्रयागराज कल्पवास और त्रिवेणी स्नान

सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में पद्म पुराण का 'उत्तरखंड' तीर्थों की महिमा, आध्यात्मिक अनुष्ठानों, व्रत-पर्वों और काल-गणना के गूढ़ रहस्यों का सर्वाधिक प्रामाणिक एवं विस्तृत शास्त्र माना गया है। पद्म पुराण के माघ माहात्म्य में महर्षि वेदव्यास यह स्पष्ट उद्घोष करते हैं कि तीर्थराज प्रयाग में पुण्यतोया गंगा, श्यामल वर्णा कालिंदी (यमुना) और अंतःसलिला अदृश्य सरस्वती के पावन त्रिवेणी संगम पर माघ मास के पूरे तीस दिनों तक तीनों लोकों के तैंतीस कोटि देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और सप्तर्षि सूक्ष्म रूप से जल एवं वायु में साक्षात वास करते हैं। इस विशिष्ट कालखंड में जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव मकर राशि में संचरण करते हुए उत्तरायण होते हैं तब प्रयागराज के संगम तट पर बालू की रेतीली भूमि पर पर्णकुटियों (तंबुओं) में रहकर एक मास तक अखंड, एकाग्र और कठोर तपस्या करने को सनातन परंपरा में 'कल्पवास' कहा जाता है।

कल्पवास केवल नदी के तट पर सामान्य रूप से निवास करने या कोई धार्मिक पिकनिक मनाने की परिपाटी नहीं है बल्कि यह जीवात्मा को देह की नश्वर आसक्तियों, सामाजिक उपाधियों, भौतिक प्रपंचों और संचित प्रारब्ध-कर्मों से मुक्त करके परम ब्रह्म में विलीन करने का एक अत्यंत वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और यौगिक अनुष्ठान है। कल्पवासी प्रतिदिन कड़ाके की भीषण ठंड में ब्रह्म मुहूर्त के समय त्रिवेणी के शीतल जल में तीन बार डुबकी लगाते हैं, कुश अथवा पुआल बिछाकर नंगी भूमि पर शयन करते हैं, दिन के तीसरे पहर में केवल एक बार अपने हाथों से पकाया हुआ हविष्यान्न भोजन ग्रहण करते हैं और मनसा, वाचा, कर्मणा पूर्ण सत्य व अहिंसा का व्रत धारण करते हैं। पद्म पुराण की मान्यता है कि इस प्रकार किए गए कल्पवास से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संचित पाप जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक को जन्म-मरण के सांसारिक चक्र से सदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है। इस लेख में कल्पवास के शास्त्रीय नियमों, प्रयाग के अमृत स्नान के वैज्ञानिक रहस्यों, 21 अनिवार्य व्रतों और इसके आत्मिक फल का विशद और प्रामाणिक आख्यान प्रस्तुत किया गया है।

कल्पवास एवं स्नान घटकशास्त्रीय नियम और स्वरूपआध्यात्मिक, यौगिक व तात्विक प्रभाव
प्रधान साधना कालपौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा (संपूर्ण एक माह)एक 'कल्प' (4.32 अरब वर्ष) के समतुल्य तपस्या का फल
मुख्य तीर्थ स्थलप्रयागराज त्रिवेणी संगम (गंगा, यमुना, सरस्वती)तीनों नाड़ियों (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना) का आध्यात्मिक संगम
प्रमुख स्नान वेलाप्रातःकाल अरुणोदय वेला (ब्रह्म मुहूर्त)ओज, तेज और सहस्रार चक्र पर अमृत वर्षा का अनुभव
दैनिक भोजन नियमएकभुक्त व्रत (दिन में केवल एक बार हविष्यान्न)आंतों का शोधन, जठराग्नि संतुलन और मन की एकाग्रता
शयन विधानभूमि-शयन (कुश, पुआल या साधारण कंबल पर)मूलाधार चक्र का स्थिरीकरण और देहाभिमान का विसर्जन
मुख्य देव आराधनाभगवान माधव, वेणी माधव और गंगा पूजनजन्म-जन्मांतर के संचित प्रारब्ध कर्मों का क्षय
आचरण संहिता21 कठिन व्रतों का पालन, काम-क्रोध का त्यागसूक्ष्म शरीर (आभामंडल) का पूर्ण रूपांतरण व मोक्ष प्राप्ति

पद्म पुराण का माघ माहात्म्य: प्रयाग का अमृत योग

पद्म पुराण के उत्तरखंड में महर्षि भृगु और महाराज आयु के मध्य हुए ज्ञान-संवाद में माघ मास के प्रयाग स्नान की महिमा का विशद और भावपूर्ण वर्णन मिलता है। पौराणिक इतिहास के अनुसार, जब देवताओं और असुरों द्वारा क्षीरसागर का मंथन किया गया था तब समुद्र से प्रकट हुए दिव्य अमृत कलश की रक्षा करते समय भगवान धन्वंतरि के हाथों से अमृत की कुछ पावन बूंदें पृथ्वी के चार प्रमुख स्थलों पर गिरी थीं। इनमें से तीर्थराज प्रयाग का त्रिवेणी संगम सबसे प्रमुख माना गया है। माघ मास के दौरान जब चंद्रमा पुष्य और मघा नक्षत्र से गुजरता है और सूर्य नारायण उत्तरायण होकर मकर राशि में संचरण करते हैं तब विशिष्ट खगोलीय और गुरुत्वाकर्षण बलों के खिंचाव से प्रयागराज के जल में वही पौराणिक अमृत तत्व पुनः सूक्ष्म रूप से जाग्रत हो उठता है।

पद्म पुराण का यह अमर श्लोक इस महिमा को अत्यंत सुंदरता से प्रतिपादित करता है:

"माघे प्रयागे च गमिष्यतीति गङ्गां च यो वा स्मरतीह मर्त्यः। स पापैर्विमुक्तो हरिमाप्नुयात् स किं पुनर्ये सलिले निमग्नाः॥"

अर्थात, जो मनुष्य माघ मास के दिनों में केवल मन से भी यह संकल्प या स्मरण कर लेता है कि 'मैं प्रयाग जाऊंगा' अथवा जो केवल गंगा के पवित्र नाम का स्मरण करता है, वह भी अपने समस्त पापों से मुक्त होकर श्रीहरि के परम पद को प्राप्त करता है; फिर जो पुण्यात्मा प्रत्यक्ष रूप से संगम के शीतल जल में अपनी देह को डुबोते हैं, उनके द्वारा अर्जित अक्षय पुण्य का वर्णन करने में तो साक्षात चतुर्मुख ब्रह्मा जी भी समर्थ नहीं हैं। प्रयागराज की इस रेती पर बहने वाली वायु भी अपने भीतर कोटि-कोटि संतों के तपोबल को समाहित किए रहती है, जिसका स्पर्श मात्र मनुष्य की आंतरिक वृत्तियों को सात्विक बना देता है।

कल्पवास का दार्शनिक और व्युत्पत्तिगत अर्थ

'कल्पवास' शब्द संस्कृत के दो अत्यंत गूढ़ शब्दों के मेल से बना है-'कल्प' और 'वास'। वैदिक काल-गणना के अनुसार एक 'कल्प' ब्रह्मा जी के एक अहोरात्र (दिन) के बराबर होता है, जिसकी कालावधि 4.32 अरब सौर वर्ष मानी गई है। शास्त्रों के अनुसार माघ मास में प्रयागराज के संगम तट पर नियमपूर्वक पूरे एक महीने तक निवास करने से जीवात्मा को एक कल्प तक स्वर्ग, तपोलोक और अंत में वैकुंठ लोक में वास करने का आध्यात्मिक अधिकार प्राप्त होता है।

इसका दूसरा अत्यंत व्यावहारिक और दार्शनिक अर्थ है-'कल्प' अर्थात 'कायाकल्प' अथवा स्वयं के संपूर्ण व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण। जिस प्रकार किसी अशुद्ध धातु को धधकती हुई भट्ठी में तपाकर शुद्ध स्वर्ण में रूपांतरित किया जाता है, ठीक उसी प्रकार कल्पवासी अपने स्थूल भौतिक शरीर, सूक्ष्म प्राण और कारण शरीर को संगम की पावन रेती पर शीत, भूख, प्यास, मौन और सादगी की अग्नि में तपाकर अपने संपूर्ण अस्तित्व का आध्यात्मिक कायाकल्प कर लेता है। यह मृत्यु से पूर्व 'जीवन-मुक्ति' (जीवित रहते हुए भी समस्त सांसारिक बंधनों से पूर्ण स्वतंत्रता) प्राप्त करने का एक प्राचीन, प्रामाणिक और वैज्ञानिक वैदिक अभ्यास है।

कल्पवास के 21 अनिवार्य शास्त्रीय नियम

पद्म पुराण, मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण में कल्पवासियों के लिए इक्कीस अत्यंत कठोर, गंभीर एवं अनुल्लंघनीय नियमों का विधान किया गया है। इन नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने पर ही कल्पवास का संपूर्ण फल प्राप्त होता है:

  1. सत्य भाषण का अखंड व्रत: पूरे मास में कभी भी असत्य, कटु वचन, द्वेषपूर्ण बातें या छल-कपट का तनिक भी आश्रय न लेना।
  2. त्रिविध अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी भी जीवित प्राणी, पशु-पक्षी, कीट-पतंग अथवा मनुष्य को लेशमात्र भी कष्ट न पहुंचाना।
  3. इंद्रिय-निग्रह: अपनी सभी दसों इंद्रियों (पांच ज्ञानेंद्रिय और पांच कर्मेंद्रिय) पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना और भोगों से विमुख रहना।
  4. सर्वभूत दया: संगम तट पर आने वाले प्रत्येक असहाय, निर्धन, रोगी, वृद्ध और दीन-दुखी जीव के प्रति असीम करुणा व सेवा का भाव रखना।
  5. पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन: मनसा, वाचा, कर्मणा अर्थात विचारों, वचनों और शारीरिक क्रियाओं में पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना।
  6. त्रिकाल संगम स्नान: प्रतिदिन प्रातः अरुणोदय वेला (सूर्योदय पूर्व), मध्याह्न काल और सायंकाल गोधूलि वेला में संगम के त्रिवेणी जल में तीन बार स्नान करना।
  7. भूमि-शयन विधान: पलंग, चारपाई, तख्त अथवा गद्दे का पूर्ण त्याग कर सीधे बालू या भूमि पर कुश, पुआल अथवा एक साधारण कंबल बिछाकर सोना।
  8. संन्यासवत सादा जीवन: सांसारिक बहुमूल्य वस्त्रों, चमकीले आभूषणों, इत्र और श्रृंगार का त्याग कर सादे, बिना सिले श्वेत अथवा पीत सूती वस्त्र धारण करना।
  9. प्राकृतिक अग्नि-साधना: भीषण शीत से बचने के लिए किसी भी आधुनिक कृत्रिम हीटर का प्रयोग न करना; शरीर रक्षा हेतु केवल गाय के सूखे उपले या लकड़ी की अल्प आंच का सहारा लेना।
  10. एकभुक्त व्रत का अनुष्ठान: 24 घंटे की पूरी अवधि में केवल एक बार दिन के तीसरे पहर में भोजन ग्रहण करना, रात को पूर्ण निराहार रहना।
  11. हविष्यान्न सात्विक आहार: भोजन में केवल बिना छौंक और बिना तीखे मसालों का सात्विक अन्न (जौ, तिल, मूंग की दाल, सेंधा नमक, गाय का घी और नया चावल) ग्रहण करना।
  12. स्वयंपाकी नियम का निर्वाह: कल्पवासी किसी होटल, ढाबे अथवा किसी अन्य व्यक्ति के हाथ का बना भोजन न करे; वह केवल स्वयं अपने हाथों से भोजन बनाकर भगवान को भोग लगाकर पाए।
  13. नित्य त्रिकाल देव-पूजन: प्रातः और संध्या काल में भगवान वेणी माधव, श्रीहरि नारायण, भगवान शिव और माता त्रिवेणी का पंचोपचार अथवा षोडशोपचार विधि से अर्चन करना।
  14. श्रीमद्भागवत एवं रामकथा श्रवण: प्रतिदिन संगम तट पर संत-महात्माओं द्वारा होने वाले सत्संग में बैठकर श्रीमद्भागवत महापुराण अथवा रामकथा का अनिवार्य रूप से श्रवण करना।
  15. तुलसी महारानी की सेवा: अपनी पर्णकुटी के सम्मुख एक स्वच्छ गमले में तुलसी का पौधा स्थापित करना, नित्य जल देना और संध्या समय गाय के घी का दीपक जलाना।
  16. अतिथि एवं साधु सत्कार: अपनी कुटिया के द्वार पर आने वाले किसी भी भूखे भिक्षुक, साधु, संन्यासी या तीर्थयात्री को बिना अन्न-जल कराए कभी विदा न करना।
  17. नित्य सामर्थ्यानुसार दान: प्रतिदिन अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार आटा, दाल, चावल, तिल, गुड़, ऊनी वस्त्र अथवा तांबे के सिक्कों का योग्य पात्र को दान करना।
  18. पितृ तर्पण एवं पिंडदान: नित्य दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों, गुरुओं और समस्त दिवंगत आत्माओं के निमित्त तिल-जल से तर्पण करना।
  19. क्रोध और ईर्ष्या का समूल नाश: किसी भी विपरीत परिस्थिति अथवा विवाद में अपने चित्त को शांत रखना, क्रोध न करना और किसी के प्रति मन में ईर्ष्या न पालना।
  20. परनिंदा और प्रपंच का पूर्ण निषेध: किसी भी व्यक्ति, धर्म, संप्रदाय, जाति अथवा साधु की बुराई, निंदा, आलोचना या व्यर्थ की राजनीति चर्चा से कोसों दूर रहना।
  21. अखंड नाम-संकीर्तन: उठते-बैठते, चलते-फिरते और सांस लेते हुए निरंतर अपने इष्ट मंत्र, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' अथवा गायत्री महामंत्र का मानसिक जप जारी रखना।

त्रिवेणी स्नान का वैज्ञानिक व जैव-ऊर्जात्मक रहस्य

प्रयागराज में गंगा का मटमैला व तीव्र वेगयुक्त प्रवाह, यमुना का शांत, गहरा व श्यामल जल और अंतःसलिला अदृश्य सरस्वती का मिलन केवल एक भौगोलिक या भूगर्भीय घटना नहीं है। यौगिक शरीर-विज्ञान (Yogic Physiology) के अनुसार यह संगम मानव शरीर के भीतर प्रवाहित होने वाली तीन प्रमुख ऊर्जा नाड़ियों का साक्षात पार्थिव प्रकटीकरण है:

  • यमुना जी: मानव शरीर की बायीं ओर स्थित चंद्र स्वर अर्थात 'इड़ा नाड़ी' का प्रतीक हैं, जो मन, शीतलता और अंतर्मुखी वृत्तियों का संचालन करती हैं।
  • गंगा जी: शरीर की दायीं ओर स्थित सूर्य स्वर अर्थात 'पिंगला नाड़ी' का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो प्राण, पाचन, कर्म और बाह्य ऊर्जा का नियंत्रण करती हैं।
  • अदृश्य सरस्वती जी: मेरुदंड के मध्य में स्थित 'सुषुम्ना नाड़ी' की प्रतीक हैं, जो कुंडलिनी जागरण, आध्यात्मिक ज्ञान और समाधि का द्वार खोलती हैं।

जनवरी और फरवरी की कंपकंपाने वाली ठंड में जब कल्पवासी प्रातःकाल 4 बजे संगम के जल में अपनी देह को उतारता है, तो शीतल जल का पहला स्पर्श त्वचा की परिधीय रक्त वाहिकाओं (Peripheral Blood Vessels) को तेजी से संकुचित करता है। इससे रक्त का प्रवाह त्वचा से हटकर तुरंत शरीर के आंतरिक महत्वपूर्ण अंगों-हृदय, यकृत, वृक्क और मस्तिष्क-की ओर दौड़ता है। इसके पश्चात जब साधक जल में तीन बार पूर्ण गोता लगाता है, तो रीढ़ की हड्डी के भीतर स्थित सुषुम्ना नाड़ी में एक तीव्र विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा का संचार होता है।

पद्म पुराण में इसे 'अमृत स्नान' इसलिए कहा गया है क्योंकि इस समय संगम के जल में घुले हुए हिमालयी दुर्लभ खनिजों, गंगोत्री व यमुनोत्री की जड़ी-बूटियों के अर्क और सूर्य की उत्तरायण किरणों के कोण का ऐसा अद्भुत प्राकृतिक योग बनता है जो मानव शरीर के संपूर्ण आभामंडल (Bio-magnetic Aura) को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करके पुनः दिव्य प्राण-शक्ति से चार्ज कर देता है।

कल्पवास का आध्यात्मिक फल: पुनर्जन्म से मुक्ति

पद्म पुराण के अनुसार, जो मनुष्य प्रयागराज की पावन रेती पर पूरे एक महीने तक इन शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए कल्पवास पूर्ण करता है, उसके करोड़ों जन्मों के तीनों प्रकार के पाप भस्म हो जाते हैं:

  1. कायिक पाप: जो अज्ञानवश इस स्थूल शरीर, इंद्रियों और शारीरिक चेष्टाओं द्वारा किए गए हों।
  2. वाचिक पाप: जो कठोर वाणी, असत्य भाषण, गाली-गलौज अथवा परनिंदा द्वारा अर्जित किए गए हों।
  3. मानसिक पाप: जो मन के भीतर छिपी ईर्ष्या, कामुकता, द्वेष और दूसरों का अहित सोचने से उत्पन्न हुए हों।

ये समस्त पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे सूखी घास का विशाल ढेर अग्नि की एक छोटी सी चिंगारी से जलकर भस्म हो जाता है। कल्पवास के समापन पर माघ पूर्णिमा के दिन कल्पवासी अपनी सामर्थ्य अनुसार साधु-संतों और वेदपाठी ब्राह्मणों को शय्या दान, गोदान, तिल-पात्र दान और वस्त्र दान देकर अपने व्रत की पूर्णाहुति करते हैं। इस अनुष्ठान के प्रभाव से साधक को न केवल इस लोक में दीर्घायु, निरोगी काया, मानसिक शांति, यश और पारिवारिक समृद्धि प्राप्त होती है बल्कि देहावसान के उपरांत उसे यमलोक की यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता और वह सीधे भगवान विष्णु के परम धाम वैकुंठ को प्राप्त होता है।

कल्पवास परंपरा का अमर सामाजिक व सांस्कृतिक संदेश

कल्पवास भारत की उस प्राचीन, लोकतांत्रिक, समतावादी और सनातन संस्कृति का साक्षात दर्शन कराता है जहाँ राजा और रंक, धनी उद्योगपति और निर्धन किसान, प्रकांड विद्वान और साधारण जन सभी एक ही धरातल पर, एक जैसी फूस की कुटिया में, बिना किसी सामाजिक भेदभाव के एक साथ निवास करते हैं। संगम की रेती पर कोई स्वामी नहीं होता और कोई सेवक नहीं होता; वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति केवल और केवल भगवान माधव का एक विनम्र शरणागत साधक होता है।

यह महान परंपरा आज के आपाधापी भरे आधुनिक युग को यह अमर संदेश देती है कि जीवन की वास्तविक शांति भौतिक सुख-साधनों और विलासिता के अंबार में नहीं है बल्कि वह न्यूनतम आवश्यकताओं, कठोर आत्म-अनुशासन, प्रकृति के साथ सहज सामंजस्य और अंतःकरण की पवित्रता में निहित है। माघ मास में प्रयागराज का यह कल्पवास हमें अपनी संकीर्ण 'अहं' और स्वार्थ की सीमाओं से बाहर निकालकर 'विराट' समष्टि चेतना और ईश्वर के साथ जोड़ने का एक अमर, अखंड और कल्याणकारी सनातन मार्ग है।

FAQ

कल्पवास का शास्त्रीय समय कब से कब तक माना गया है?
शास्त्रीय पंचांग विधान के अनुसार कल्पवास का मुख्य आरंभ पौष पूर्णिमा के पवित्र स्नान से होता है और इसका विधिवत समापन माघ पूर्णिमा के महास्नान एवं दान-पुण्य के साथ संपन्न होता है। कुछ परंपराओं में साधक मकर संक्रांति से लेकर कुंभ संक्रांति तक भी पूरे एक माह का कल्पवास निष्ठापूर्वक करते हैं।

क्या गृहस्थ व्यक्ति भी कल्पवास कर सकता है अथवा यह केवल संन्यासियों के लिए है?
कल्पवास का मुख्य विधान और अधिकार ही गृहस्थों के लिए बनाया गया है। संन्यासी तो स्वभाव से ही आजीवन त्यागी होते हैं, परंतु गृहस्थ अपने सांसारिक प्रपंचों और जिम्मेदारियों से एक महीने का पूर्ण अवकाश लेकर संगम तट पर रहकर अपने मन और शरीर का शोधन करते हैं। पति-पत्नी दोनों एक साथ रहकर भी कल्पवास के नियमों और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इसे संपन्न कर सकते हैं।

कल्पवास में एकभुक्त भोजन का क्या नियम है और उसमें क्या खाया जाता है?
एकभुक्त का अर्थ है 24 घंटे में केवल एक बार भोजन करना। कल्पवासी दोपहर के तीसरे पहर में स्वयं अपने हाथों से लकड़ी या कंडे की आंच पर भोजन बनाते हैं, जिसे शास्त्रों में 'हविष्यान्न' कहा जाता है। इसमें जौ का आटा, नया चावल, मूंग की छिलके वाली दाल, सेंधा नमक, तिल और गाय का शुद्ध घी मुख्य रूप से शामिल होता है। लहसुन, प्याज, सरसों का तेल और तीखे मसालों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित होता है।

यदि कोई व्यक्ति प्रयागराज न जा सके तो क्या वह घर पर कल्पवास कर सकता है?
हाँ। यदि कोई व्यक्ति शारीरिक दुर्बलता, वृद्धावस्था या पारिवारिक कारणों से प्रयागराज नहीं जा सकता, तो वह अपने घर में ही एक शांत कक्ष में जमीन पर सादा बिस्तर बिछाकर, प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में गंगाजल मिले जल से स्नान करके, दिन में एक बार सात्विक भोजन लेकर और निरंतर विष्णु-सूर्य की आराधना करते हुए 'मानसिक कल्पवास' कर सकता है। इससे भी कल्पवास का यथेष्ट पुण्य प्राप्त होता है।

कल्पवास के समापन पर कौन से दान करने अनिवार्य माने गए हैं?
माघ पूर्णिमा पर कल्पवास की पूर्णाहुति के समय अपनी सामर्थ्य अनुसार तिल से भरा तांबे का पात्र, ऊनी वस्त्र, कंबल, खड़ाऊं (पादुका), शय्या (बिस्तर) और गोदान (अथवा गो-मूल्य) किसी सुयोग्य, वेदपाठी ब्राह्मण या संन्यासी को श्रद्धापूर्वक दान करना अनिवार्य माना गया है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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