रथ सप्तमी सूर्य जयंती क्यों कहलाती है?

By पं. नीलेश शर्मा

सात अश्वों का रथ, अचला सप्तमी की कथा और आरोग्य का वरदान

रथ सप्तमी: सूर्य जयंती की पूजा विधि और महत्व

रथ सप्तमी की तिथि, स्नान और पूजा का सार

माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रथ सप्तमी कहा जाता है। इसे अचला सप्तमी, आरोग्य सप्तमी, सूर्य जयंती और माघ सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। यदि यह तिथि रविवार को पड़े तो इसे भानु सप्तमी भी कहते हैं, जो और भी अधिक शुभ मानी जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर में यह पर्व सामान्यतः जनवरी के अंत से फरवरी के बीच आता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी पावन तिथि पर भगवान सूर्य नारायण सात घोड़ों वाले दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर प्रकट हुए थे।

पर्व तत्व विवरण
तिथि माघ शुक्ल सप्तमी
अन्य नाम अचला सप्तमी, आरोग्य सप्तमी, सूर्य जयंती, भानु सप्तमी
प्रमुख आराध्य भगवान सूर्य नारायण
स्नान का श्रेष्ठ समय अरुणोदय काल, अर्थात सूर्योदय से ठीक पहले
विशेष स्नान आक के 7 पत्तों के साथ स्नान
अर्घ्य सामग्री तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन, अक्षत और लाल पुष्प
प्रमुख पाठ आदित्य हृदय स्तोत्र और सूर्य के 12 नाम
प्रमुख दान गुड़, गेहूं, लाल वस्त्र, तांबा और तिल
अपेक्षित फल आरोग्य, दीर्घायु, तेज और दरिद्रता का नाश

इस दिन के मूल नियम

  • सूर्योदय से पहले उठकर किसी नदी में या घर पर स्नान करें।
  • स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाएं और संभव हो तो आक के पत्तों के साथ स्नान करें।
  • उगते सूर्य को तांबे के लोटे से अर्घ्य दें।
  • आदित्य हृदय स्तोत्र या सूर्य के 12 नामों का पाठ करें।
  • सामर्थ्य के अनुसार गुड़, गेहूं और लाल वस्त्र का दान करें।

सूर्य देव का प्राकट्य और रथ का रहस्य

पौराणिक परंपरा के अनुसार भगवान सूर्य महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र हैं। अदिति के पुत्र होने के कारण उन्हें आदित्य कहा जाता है। मान्यता है कि माघ शुक्ल सप्तमी के दिन ही सूर्य देव ने अपने दिव्य स्वर्ण रथ पर आरूढ़ होकर संपूर्ण जगत को प्रकाशित करना आरंभ किया था। इसीलिए इस दिन को सूर्य जयंती कहा जाता है।

सूर्य देव के रथ का वर्णन अत्यंत प्रतीकात्मक है। उनका रथ एक पहिये वाला बताया गया है, जो काल चक्र अर्थात समय के निरंतर घूमते पहिये का प्रतीक है। रथ को 7 घोड़े खींचते हैं और सारथी अरुण हैं, जो उषा काल की लालिमा के प्रतीक हैं।

रथ का अंग प्रतीक
एक पहिया काल चक्र, जो निरंतर घूमता है
7 घोड़े 7 वैदिक छंद, सप्ताह के 7 दिन और प्रकाश के 7 रंग
सारथी अरुण भोर की लालिमा, जो सूर्योदय से पहले आती है
स्वर्ण रथ तेज, ऐश्वर्य और जीवन शक्ति

परंपरा में सूर्य के 7 घोड़ों के नाम 7 वैदिक छंदों पर बताए गए हैं: गायत्री, बृहती, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुभ, अनुष्टुभ और पंक्ति। यह सुंदर संबंध बताता है कि सूर्य का प्रकाश और वेद की वाणी एक ही दिव्य व्यवस्था के अंग हैं। आधुनिक दृष्टि से भी यह रोचक है कि सूर्य का श्वेत प्रकाश 7 रंगों से मिलकर बना होता है, जिन्हें इंद्रधनुष में देखा जा सकता है।

मान्यता है कि रथ सप्तमी से सूर्य अपने रथ को पूर्ण वेग से उत्तर दिशा की ओर बढ़ाते हैं। मकर संक्रांति से उत्तरायण आरंभ हो चुका होता है और रथ सप्तमी तक आते आते दिन स्पष्ट रूप से बड़े होने लगते हैं, धूप में गर्माहट आने लगती है और वसंत का आगमन अनुभव होने लगता है।

अचला सप्तमी की कथा

भविष्य पुराण में अचला सप्तमी की एक प्रसिद्ध कथा आती है। प्राचीन काल में इंदुमती नाम की एक स्त्री थी, जिसने जीवन भर कोई धर्म कार्य नहीं किया था। वृद्धावस्था में उसे अपने कर्मों की चिंता होने लगी। वह महर्षि वशिष्ठ के पास गई और उनसे मुक्ति का मार्ग पूछा।

महर्षि वशिष्ठ ने उसे माघ शुक्ल सप्तमी का व्रत करने का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि इस दिन अरुणोदय काल में स्नान करके सूर्य देव की पूजा और दान करने से जीवन भर के पाप नष्ट हो जाते हैं। इंदुमती ने श्रद्धा से यह व्रत किया। इसके प्रभाव से उसे शांति और उत्तम गति प्राप्त हुई। तभी से इस सप्तमी को अचला सप्तमी कहा जाने लगा, अर्थात वह सप्तमी जिसका पुण्य अचल और स्थायी रहता है।

साम्ब की कथा और आरोग्य का वरदान

सूर्य उपासना से आरोग्य प्राप्ति की एक और प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार साम्ब को एक श्राप के कारण कुष्ठ रोग हो गया था। अनेक उपायों के बाद भी जब रोग दूर नहीं हुआ तब उन्होंने चंद्रभागा नदी के तट पर सूर्य देव की कठोर उपासना की। सूर्य देव की कृपा से वे रोग मुक्त हो गए।

यही कारण है कि सूर्य को आरोग्य का देवता कहा जाता है और रथ सप्तमी को आरोग्य सप्तमी। ओडिशा में कोणार्क के सूर्य मंदिर के पास माघ शुक्ल सप्तमी पर प्रसिद्ध चंद्रभागा मेला लगता है, जहां हजारों श्रद्धालु भोर में स्नान करके उगते सूर्य की पूजा करते हैं। कोणार्क का सूर्य मंदिर स्वयं सूर्य के रथ के आकार में बना है, जिसमें पत्थर के विशाल पहिये और घोड़े बनाए गए हैं।

रथ सप्तमी की संपूर्ण पूजा विधि

चरण विधि
अरुणोदय स्नान सूर्योदय से ठीक पहले नदी में या घर पर गंगाजल मिले जल से स्नान करें
आक पत्र स्नान संभव हो तो आक के 7 पत्तों को शरीर पर रखकर स्नान करें
वस्त्र स्नान के बाद लाल या केसरिया स्वच्छ वस्त्र पहनें
रंगोली आंगन या पूजा स्थान पर 7 घोड़ों वाले रथ और सूर्य की रंगोली बनाएं
अर्घ्य तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन, अक्षत और लाल पुष्प डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य दें
मंत्र अर्घ्य के समय ॐ घृणि सूर्याय नमः या ॐ सूर्याय नमः का जप करें
दीपदान घी का दीपक जलाकर सूर्य देव की आरती करें
पाठ आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें
भोग गुड़, गेहूं या चावल की खीर और मौसमी फल अर्पित करें
दान गुड़, गेहूं, लाल वस्त्र, तांबे का पात्र और तिल का दान करें

सूर्य के 12 नाम

परंपरा में सूर्य नमस्कार के साथ सूर्य के 12 नामों का जप किया जाता है। रथ सप्तमी पर इन नामों का स्मरण अत्यंत शुभ माना जाता है।

क्रम मंत्र
1 ॐ मित्राय नमः
2 ॐ रवये नमः
3 ॐ सूर्याय नमः
4 ॐ भानवे नमः
5 ॐ खगाय नमः
6 ॐ पूष्णे नमः
7 ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
8 ॐ मरीचये नमः
9 ॐ आदित्याय नमः
10 ॐ सवित्रे नमः
11 ॐ अर्काय नमः
12 ॐ भास्कराय नमः

प्रत्येक नाम के साथ एक सूर्य नमस्कार करने की परंपरा है। जो लोग सूर्य नमस्कार नहीं कर सकते, वे केवल इन नामों का जप करके भी पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। रथ सप्तमी से सूर्य नमस्कार का नियमित अभ्यास आरंभ करना स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रथ सप्तमी

  • तिरुमला: आंध्र प्रदेश के तिरुमला में रथ सप्तमी को एक दिवसीय ब्रह्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान वेंकटेश्वर के उत्सव विग्रह को सूर्योदय से रात्रि तक 7 अलग अलग वाहनों पर विराजमान करके शोभायात्रा निकाली जाती है।
  • कोणार्क: ओडिशा में चंद्रभागा मेला लगता है और भोर में समुद्र तट पर सूर्य की पूजा होती है।
  • महाराष्ट्र और कर्नाटक: आंगन में सूर्य रथ की रंगोली बनाई जाती है और दूध को सूर्य की ओर मुख करके उफनने दिया जाता है, जो समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
  • उत्तर भारत: पवित्र नदियों में स्नान, सूर्य अर्घ्य और दान की परंपरा है।

ज्योतिष की दृष्टि से रथ सप्तमी

वैदिक ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा कहा गया है। वे आत्मा, पिता, स्वास्थ्य, हड्डियों, नेत्रों, मान सम्मान, सरकारी कार्य और नेतृत्व के कारक हैं। जिन जातकों की कुंडली में सूर्य कमजोर, नीच या राहु शनि से पीड़ित हो, उन्हें आत्मविश्वास की कमी, पिता से मतभेद, नेत्र रोग, हड्डियों की कमजोरी और सरकारी कार्यों में बाधा का अनुभव हो सकता है।

सप्तमी तिथि के स्वामी स्वयं सूर्य माने जाते हैं और माघ मास में सूर्य उत्तरायण की शुभ यात्रा पर होते हैं। इसलिए रथ सप्तमी सूर्य से जुड़े उपायों के लिए वर्ष का सबसे श्रेष्ठ दिन माना जाता है।

समस्या ज्योतिषीय संकेत रथ सप्तमी पर उपाय
आत्मविश्वास की कमी कमजोर सूर्य अरुणोदय स्नान और उगते सूर्य को अर्घ्य
नेत्र संबंधी कष्ट पीड़ित सूर्य या द्वितीय भाव चाक्षुषोपनिषद या सूर्य के 12 नामों का पाठ
पिता से मतभेद पीड़ित नवम भाव या सूर्य पिता का आशीर्वाद और गुड़ का दान
सरकारी कार्यों में बाधा दशम भाव में कमजोर सूर्य आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ
त्वचा रोग सूर्य और शनि का असंतुलन आक पत्र स्नान और सूर्य उपासना

आरोग्य और आयुर्वेद का संबंध

रथ सप्तमी का समय स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शीत ऋतु के अंत में जब सूर्य की किरणें फिर से प्रबल होने लगती हैं तब सुबह की धूप शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी होती है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि सुबह की धूप शरीर में विटामिन डी के निर्माण में सहायक होती है, जो हड्डियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक है।

भविष्य पुराण और अन्य ग्रंथों में कहा गया है कि इस दिन की गई सूर्य पूजा से नेत्र रोग, त्वचा रोग और दरिद्रता का नाश होता है। इन मान्यताओं को श्रद्धा के साथ अपनाते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गंभीर रोगों में योग्य चिकित्सक की सलाह और उपचार आवश्यक है। सूर्य उपासना उपचार का विकल्प नहीं बल्कि मन और शरीर को शक्ति देने वाला सहायक मार्ग है।

रथ सप्तमी पर क्या करें और क्या न करें?

क्या करें क्या न करें
सूर्योदय से पहले स्नान करें सूर्योदय के बाद तक न सोएं
उगते सूर्य को अर्घ्य दें तेज धूप में सूर्य को सीधे देर तक न देखें
आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें इस दिन क्रोध और अहंकार से बचें
गुड़, गेहूं और लाल वस्त्र का दान करें मांस, मदिरा और तामसिक भोजन न लें
सूर्य नमस्कार का अभ्यास आरंभ करें पिता और बड़ों का अपमान न करें

सात अश्वों पर सवार नवजीवन का प्रकाश

रथ सप्तमी वह दिन है जब प्रकाश की यात्रा अपने पूर्ण वेग पर पहुंचती है। सूर्य देव का रथ हर दिन बिना रुके, बिना थके आकाश में चलता है और संपूर्ण सृष्टि को जीवन देता है। वह न किसी से भेदभाव करता है, न किसी से बदले में कुछ मांगता है। यही निष्काम सेवा का सबसे बड़ा आदर्श है।

जो व्यक्ति इस दिन भोर में स्नान करके उगते सूर्य को अर्घ्य देता है और उसके तेज को अपने भीतर धारण करने का संकल्प लेता है, उसके जीवन में आरोग्य, आत्मबल और उत्साह का नया प्रकाश आता है। सूर्य यह सिखाते हैं कि हर अंधेरी रात के बाद सुबह निश्चित है और हर सुबह एक नया आरंभ है।

FAQ

रथ सप्तमी कब मनाई जाती है? रथ सप्तमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर में यह सामान्यतः जनवरी के अंत से फरवरी के बीच आती है।

रथ सप्तमी को सूर्य जयंती क्यों कहा जाता है? पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान सूर्य 7 घोड़ों वाले दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर प्रकट हुए और जगत को प्रकाशित करना आरंभ किया, इसलिए इसे सूर्य जयंती कहते हैं।

रथ सप्तमी पर स्नान कब करना चाहिए? रथ सप्तमी पर अरुणोदय काल में, अर्थात सूर्योदय से ठीक पहले स्नान करना सबसे शुभ माना जाता है। संभव हो तो आक के 7 पत्तों के साथ स्नान करें।

अचला सप्तमी का क्या अर्थ है? अचला का अर्थ है जो अचल और स्थायी हो। मान्यता है कि इस सप्तमी पर किया गया स्नान, पूजा और दान का पुण्य स्थायी रहता है, इसलिए इसे अचला सप्तमी कहते हैं।

रथ सप्तमी पर क्या दान करना चाहिए? रथ सप्तमी पर गुड़, गेहूं, लाल वस्त्र, तांबे का पात्र और तिल का दान शुभ माना जाता है। इससे सूर्य की कृपा और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

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