सकट चौथ का व्रत इतना खास क्यों?

By पं. अमिताभ शर्मा

संतान रक्षा, संकटमोचन गणेश, तिलकुट और चंद्र अर्घ्य का विधान

सकट चौथ व्रत: पूजा विधि, कथा और चंद्र अर्घ्य

सकट चौथ व्रत की तिथि, नियम और पूजा सार

माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को उत्तर और मध्य भारत में सकट चौथ के रूप में अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है। इसे तिलकुटा चौथ, तिलकुट चतुर्थी और माघी संकष्टी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। पूर्णिमांत पंचांग में यह तिथि माघ कृष्ण चतुर्थी कहलाती है, जबकि अमांत पंचांग में इसे पौष कृष्ण चतुर्थी गिना जाता है। तिथि एक ही है, केवल मास के नाम की गणना में अंतर है। अंग्रेजी कैलेंडर में यह व्रत सामान्यतः जनवरी मास में पड़ता है।

यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन के संकटों से रक्षा के लिए करती हैं। दिन भर निर्जल उपवास के बाद संध्या को भगवान गणेश की पूजा होती है और रात्रि में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है।

व्रत तत्वविवरण
तिथिमाघ कृष्ण चतुर्थी, अमांत पद्धति में पौष कृष्ण चतुर्थी
प्रमुख आराध्यभगवान श्री गणेश और लोक परंपरा में सकट माता
व्रत करने वालेमुख्य रूप से माताएं, संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए
व्रत का स्वरूपसूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जल या फलाहार
प्रमुख भोगतिल और गुड़ से बना तिलकुट, शकरकंद और मौसमी फल
प्रमुख पाठसकट चौथ व्रत कथा और संकटनाशन गणेश स्तोत्र
व्रत का समापनचंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर पारण
अर्घ्य सामग्रीजल, कच्चा दूध, अक्षत, तिल, पुष्प और दूर्वा

व्रत के मूल नियम संक्षेप में

  • प्रातः स्नान करके भगवान गणेश के सामने संतान की रक्षा के लिए व्रत का संकल्प लें।
  • दिन भर निर्जल उपवास रखें, या स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार का नियम अपनाएं।
  • संध्या के समय गणेश जी की पूजा करके तिलकुट का भोग लगाएं और व्रत कथा सुनें।
  • चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य दें और उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें।
  • इस दिन घर में कलह, कटु वचन और तामसिक भोजन से पूरी तरह दूर रहें।

सकट शब्द में छिपा संकट मुक्ति का संदेश

सकट शब्द संकट का लोक रूप माना जाता है। इस व्रत का मूल भाव ही संकटों का नाश है। संकष्टी शब्द का अर्थ भी यही है, अर्थात वह तिथि जो कष्टों से पार ले जाए। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और संकटमोचन कहा गया है। वे किसी भी कार्य के आरंभ में पूजे जाने वाले प्रथम देव हैं। जब एक मां अपनी संतान के लिए इस दिन उपवास करती है, तो वह वास्तव में विघ्नहर्ता से यह प्रार्थना करती है कि उसके बच्चे के जीवन के मार्ग से हर बाधा हट जाए।

प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी का व्रत होता है, परंतु माघ मास की संकष्टी को वर्ष भर की सभी संकष्टियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका एक कारण ऋतु भी है। माघ की कड़ाके की ठंड में बच्चों के स्वास्थ्य पर सबसे अधिक खतरा रहता है। प्राचीन समाज में यह वह समय होता था जब रोग और अभाव दोनों अधिक होते थे। ऐसे समय में मां की प्रार्थना, उपवास और तिल गुड़ जैसे पौष्टिक आहार का प्रसाद, तीनों मिलकर परिवार को आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों प्रकार का संरक्षण देते थे।

उत्तर भारत की लोक परंपरा में इस दिन सकट माता की भी पूजा होती है। कई घरों में दीवार पर या कागज पर सकट माता का चित्र बनाकर उनकी पूजा की जाती है। सकट माता को संकट हरने वाली लोक देवी माना जाता है और उनका स्मरण गणेश पूजा के साथ ही किया जाता है। यह शास्त्रीय और लोक परंपरा के सुंदर मेल का उदाहरण है।

कुम्हार के आंवे की कथा क्या सिखाती है?

सकट चौथ की सबसे प्रसिद्ध लोककथा एक कुम्हार और एक वृद्ध माता से जुड़ी है। कथा के अनुसार एक नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार उसने बर्तन पकाने के लिए आंवा लगाया, परंतु बहुत प्रयास करने पर भी बर्तन नहीं पके। परेशान होकर वह राजा के पास गया। राजा ने राजपुरोहित से उपाय पूछा। पुरोहित ने कहा कि हर बार आंवा लगाते समय एक बालक की बलि देनी होगी। राजा ने आदेश दे दिया कि नगर के प्रत्येक परिवार से बारी बारी से एक बालक दिया जाएगा।

कुछ समय बाद एक वृद्ध माता की बारी आई, जिसका केवल एक ही पुत्र था। संयोग से उस दिन सकट चौथ थी। मां का हृदय दुख से भर गया, परंतु उसने धैर्य नहीं छोड़ा। उसने अपने पुत्र को सकट की सुपारी और दूब का बीड़ा दिया और कहा कि आंवे में बैठकर सकट माता का स्मरण करते रहना। स्वयं वह पूरे दिन उपवास रखकर सकट माता और गणेश जी की पूजा करती रही।

अगली सुबह जब कुम्हार ने आंवा खोला, तो वह आश्चर्य में पड़ गया। बर्तन पूरी तरह पक चुके थे और वह बालक सुरक्षित बैठा था। इतना ही नहीं, उस आंवे में पहले बलि दिए गए बालक भी जीवित मिले। यह समाचार पूरे नगर में फैल गया। राजा ने उस माता को सम्मानित किया और तभी से संतान की रक्षा के लिए सकट चौथ का व्रत करने की परंपरा चल पड़ी।

इस कथा का संदेश गहरा है। संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, श्रद्धा और धैर्य के साथ की गई प्रार्थना उसे पार करने की शक्ति देती है। कथा यह भी बताती है कि एक मां का विश्वास केवल उसके अपने बच्चे की नहीं बल्कि पूरे समाज की रक्षा का कारण बन सकता है।

गणेश जी और चंद्रमा का संबंध

संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देना अनिवार्य है। इसके पीछे एक सुंदर पौराणिक प्रसंग है। कथा के अनुसार एक बार चंद्रमा ने गणेश जी के गज मुख और बड़े उदर को देखकर उनका उपहास किया था। इससे रुष्ट होकर गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दिया कि जो भी उसे देखेगा उस पर मिथ्या कलंक लगेगा। चंद्रमा ने जब क्षमा मांगी, तो गणेश जी ने श्राप को सीमित कर दिया। इसी कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन वर्जित माना जाता है।

परंतु संकष्टी चतुर्थी पर स्थिति बिल्कुल उलटी है। इस दिन चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य के बिना व्रत पूर्ण ही नहीं होता। एक मान्यता यह भी है कि गणेश जी ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया, इसलिए उनका एक नाम भालचंद्र भी है। संकष्टी की रात उगता हुआ चंद्रमा गणेश जी की कृपा का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए अर्घ्य के मंत्र में चंद्रमा को गणेश का प्रतिरूप कहकर संबोधित किया जाता है।

सकट चौथ की संपूर्ण पूजा विधि

चरणविधि
प्रातः संकल्पस्नान के बाद गणेश जी के सामने जल, अक्षत और पुष्प लेकर संतान की रक्षा के लिए व्रत का संकल्प लें
पूजा की तैयारीसंध्या से पहले पूजा स्थान पर चौकी बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
सकट माता का पूजनलोक परंपरा के अनुसार सकट माता का चित्र बनाकर रोली और अक्षत से पूजन करें
गणेश पूजनगणेश जी को रोली, अक्षत, दूर्वा, लाल पुष्प, जनेऊ और सुपारी अर्पित करें
भोगतिलकुट, शकरकंद, गुड़, मौसमी फल और लड्डू का भोग लगाएं
कथा और पाठसकट चौथ व्रत कथा सुनें और संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें
आरतीघी के दीपक से गणेश जी की आरती करें
चंद्र अर्घ्यचंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें
पारणअर्घ्य के बाद तिलकुट का प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें

तिलकुट और तिलकुट के बकरे की परंपरा

इस व्रत का सबसे प्रमुख भोग तिलकुट है। तिलकुट बनाने के लिए भुने हुए तिल और गुड़ को एक साथ कूटा जाता है। इसी से इस चौथ का नाम तिलकुटा चौथ पड़ा। तिल शनि देव से और गुड़ सूर्य देव से जुड़ा माना जाता है। माघ मास में सूर्य शनि की राशि मकर में होते हैं, इसलिए तिल और गुड़ का यह मेल ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत उपयुक्त है।

कुछ क्षेत्रों में तिलकुट से बकरे की आकृति बनाई जाती है। पूजा के बाद घर का कोई बालक या परिवार का सदस्य इस आकृति को प्रतीकात्मक रूप से काटता है और फिर इसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। यह परंपरा बलि प्रथा के सात्विक विकल्प के रूप में देखी जाती है, जिसमें हिंसा के स्थान पर मिठास और प्रसाद का भाव है। तिलकुट के साथ शकरकंद का भोग भी इस दिन की विशेष परंपरा है, क्योंकि शकरकंद इसी मौसम की फसल है।

संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ

संकटनाशन गणेश स्तोत्र नारद पुराण से लिया गया माना जाता है। इसका आरंभ इस श्लोक से होता है: "प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।" इसका भाव है कि गौरी पुत्र विनायक को सिर झुकाकर प्रणाम करके, आयु, कामना और धन की सिद्धि के लिए भक्त को उनका नित्य स्मरण करना चाहिए। इस स्तोत्र में भगवान गणेश के 12 नाम बताए गए हैं, जिनका पाठ संकट निवारण के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है।

क्रमनामअर्थ
1वक्रतुंडमुड़ी हुई सूंड वाले
2एकदंतएक दांत वाले
3कृष्णपिंगाक्षश्याम और पिंगल नेत्रों वाले
4गजवक्त्रहाथी के मुख वाले
5लंबोदरविशाल उदर वाले
6विकटविराट और अद्भुत रूप वाले
7विघ्नराजविघ्नों के स्वामी
8धूम्रवर्णधूम्र वर्ण वाले
9भालचंद्रमस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले
10विनायकविशिष्ट नायक
11गणपतिगणों के स्वामी
12गजाननहाथी के आनन वाले

स्तोत्र की फलश्रुति में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रातः, मध्याह्न और संध्या तीनों समय इन 12 नामों का पाठ करता है, उसे किसी भी विघ्न का भय नहीं रहता। विद्यार्थी को विद्या, धन चाहने वाले को धन और संतान चाहने वाले को संतान की प्राप्ति होती है। सकट चौथ पर संध्या पूजा के समय इस स्तोत्र का कम से कम 3 बार पाठ करना शुभ माना जाता है।

चंद्र अर्घ्य देने के सटीक नियम

चंद्र अर्घ्य इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इसलिए इसे पूरी सावधानी और श्रद्धा से करना चाहिए।

  • चंद्रोदय का समय: अपने नगर के स्थानीय पंचांग से चंद्रोदय का समय अवश्य देखें, क्योंकि यह हर स्थान पर अलग होता है।
  • अर्घ्य की सामग्री: लोटे में जल, थोड़ा कच्चा दूध, अक्षत, सफेद तिल, सफेद पुष्प और दूर्वा रखें।
  • दिशा और मुद्रा: चंद्रमा की ओर मुख करके खड़े हों और दोनों हाथों से लोटा उठाकर धीरे धीरे जल की धारा गिराएं।
  • अर्घ्य का मंत्र: "गगनार्णवमाणिक्य चंद्र दाक्षायणीपते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥" का पाठ करें, या सरलता के लिए ॐ सोमाय नमः का जप करें।
  • बादल होने पर: यदि आकाश में बादल हों और चंद्रमा दिखाई न दे, तो पंचांग में दिए चंद्रोदय के समय पर चंद्रमा की दिशा में अर्घ्य देना मान्य है।
  • परिक्रमा: अर्घ्य के बाद अपने स्थान पर खड़े होकर 3 बार परिक्रमा करें और संतान के सुख की प्रार्थना करें।
  • जल का ध्यान: अर्घ्य का जल पैरों पर न गिरे, इसके लिए नीचे पात्र रखें या पौधों की क्यारी के पास अर्घ्य दें।

पारण कैसे करें?

अर्घ्य देने के बाद गणेश जी को प्रणाम करें और सबसे पहले तिलकुट का प्रसाद ग्रहण करें। इसके बाद सात्विक भोजन से व्रत खोला जाता है। कई परिवारों में व्रत खोलने के बाद भी उस रात अन्न नहीं खाया जाता और केवल फल, शकरकंद और मिष्ठान्न ग्रहण किए जाते हैं। यह स्थानीय परंपरा के अनुसार तय होता है।

निर्जल व्रत एक कठिन तप है। गर्भवती स्त्रियों, रोगियों और वृद्ध माताओं को अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर फलाहार या जल के साथ व्रत करना चाहिए। शास्त्रों में भाव को सर्वोपरि माना गया है और शरीर को कष्ट देकर किया गया व्रत कभी भी आराध्य को प्रसन्न नहीं करता।

ज्योतिष की दृष्टि से सकट चौथ

वैदिक ज्योतिष में चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणेश माने जाते हैं। चंद्रमा मन और माता का कारक है और कुंडली का पंचम भाव संतान से जुड़ा होता है। सकट चौथ पर मां द्वारा चंद्रमा को दिया गया अर्घ्य मातृत्व, मन और संतान तीनों के बीच एक आध्यात्मिक सेतु बनाता है। ज्योतिषीय परंपरा में गणेश जी को केतु के अशुभ प्रभाव शांत करने वाला देव भी माना गया है।

समस्याज्योतिषीय संकेतसकट चौथ पर उपाय
संतान के स्वास्थ्य की चिंतापंचम भाव या पंचमेश पीड़ितनिर्जल व्रत, गणेश पूजन और चंद्र अर्घ्य
मानसिक अशांतिपीड़ित चंद्रमाचंद्र अर्घ्य और ॐ सोमाय नमः का जप
कार्यों में बार बार बाधाकेतु का अशुभ प्रभावसंकटनाशन गणेश स्तोत्र का 3 बार पाठ
शनि से जुड़े कष्टमकर राशि में सूर्य और शनि का प्रभावतिल और गुड़ का दान
पढ़ाई में मन न लगनाबुध या पंचम भाव की दुर्बलतागणेश जी को 21 दूर्वा अर्पित करना

सकट चौथ पर क्या करें और क्या न करें?

क्या करेंक्या न करें
संतान के कल्याण का संकल्प लेकर व्रत करेंव्रत के दिन क्रोध और कलह न करें
गणेश जी को दूर्वा और तिलकुट अर्पित करेंगणेश पूजा में तुलसी दल अर्पित न करें
चंद्रोदय का समय स्थानीय पंचांग से देखेंचंद्र अर्घ्य से पहले व्रत न खोलें
तिल, गुड़ और गर्म वस्त्रों का दान करेंतामसिक भोजन और मदिरा से दूर रहें
स्वास्थ्य के अनुसार व्रत का नियम चुनेंअस्वस्थ होने पर हठपूर्वक निर्जल व्रत न करें

गणेश पूजा में तुलसी दल अर्पित न करने की परंपरा एक पौराणिक कथा से जुड़ी है, जिसके अनुसार तुलसी और गणेश जी के बीच परस्पर श्राप का प्रसंग हुआ था। इसलिए गणेश पूजा में दूर्वा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

मातृ स्नेह का तिलकुट और गणपति की छाया

सकट चौथ केवल एक व्रत नहीं बल्कि मातृत्व का उत्सव है। कड़ाके की ठंड में दिन भर बिना जल के रहकर एक मां जब रात को चंद्रमा की प्रतीक्षा करती है, तो उस प्रतीक्षा में उसका पूरा प्रेम समाया होता है। तिलकुट की मिठास उसी प्रेम का स्वाद है और गणेश जी की कृपा उसी प्रेम का आशीर्वाद।

यह व्रत सिखाता है कि संकट जीवन का हिस्सा हैं, परंतु श्रद्धा, धैर्य और सेवा से उन्हें पार किया जा सकता है। कुम्हार के आंवे से सुरक्षित निकला बालक इस विश्वास का प्रतीक है कि जहां मां की प्रार्थना होती है, वहां विघ्नहर्ता स्वयं रक्षक बनकर खड़े रहते हैं।

FAQ

सकट चौथ कब मनाई जाती है? सकट चौथ माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। अमांत पंचांग में इसे पौष कृष्ण चतुर्थी कहा जाता है और यह सामान्यतः जनवरी में पड़ती है।

सकट चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य कैसे दें? चंद्रोदय के बाद लोटे में जल, कच्चा दूध, अक्षत, तिल, सफेद पुष्प और दूर्वा रखकर चंद्रमा की ओर मुख करके धीरे धीरे अर्घ्य दें और ॐ सोमाय नमः का जप करें।

सकट चौथ पर तिलकुट का भोग क्यों लगाया जाता है? तिलकुट तिल और गुड़ को कूटकर बनाया जाता है। माघ की ठंड में यह पौष्टिक है और ज्योतिष में तिल शनि तथा गुड़ सूर्य से जुड़ा माना जाता है।

सकट चौथ की कथा क्या है? लोककथा के अनुसार एक वृद्ध माता के इकलौते पुत्र को कुम्हार के आंवे में बैठाया गया। माता के सकट व्रत के प्रभाव से बालक सुरक्षित निकला और तभी से यह व्रत प्रचलित हुआ।

क्या सकट चौथ का व्रत फलाहार के साथ रखा जा सकता है? हां, गर्भवती स्त्रियां, रोगी और वृद्ध माताएं स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या जल के साथ यह व्रत रख सकती हैं, क्योंकि व्रत में भाव सबसे महत्वपूर्ण है।

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पं. अमिताभ शर्मा

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