संत रविदास का संदेश क्यों अमर है?

By पं. नीलेश शर्मा

माघ पूर्णिमा, मन की पवित्रता और कठौती में गंगा का रहस्य

संत रविदास जयंती: जीवन, शिक्षाएं और माघ पूर्णिमा

संत रविदास जयंती की तिथि और उत्सव का सार

माघ पूर्णिमा की पावन तिथि केवल स्नान और दान का ही पर्व नहीं है। इसी दिन महान समाज सुधारक, संत कवि और निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख प्रणेता संत शिरोमणि रविदास की जयंती मनाई जाती है। उन्हें रैदास के नाम से भी जाना जाता है। संत रविदास ने बाहरी पाखंड, जाति पांति के भेदभाव और आडंबरों को नकारते हुए आंतरिक शुद्धि पर बल दिया और वह अमर वाणी दी जो आज भी जन जन की जुबान पर है: "मन चंगा तो कठौती में गंगा।"

जयंती तत्वविवरण
तिथिमाघ पूर्णिमा
संत का नामसंत शिरोमणि गुरु रविदास, जिन्हें रैदास भी कहा जाता है
जन्म स्थानकाशी अर्थात वाराणसी, परंपरा के अनुसार सीर गोवर्धनपुर
काललगभग 15वीं शताब्दी
भक्ति धारानिर्गुण भक्ति
प्रमुख संदेशमन की शुद्धता, समानता, परिश्रम और ईश्वर भक्ति
प्रसिद्ध वाणीमन चंगा तो कठौती में गंगा
प्रमुख आयोजनशोभायात्रा, पद गायन, सत्संग और लंगर

जयंती मनाने की मुख्य परंपराएं

  • प्रातः पवित्र स्नान करके संत रविदास के चित्र पर पुष्प अर्पित करें।
  • उनके पदों और दोहों का पाठ या गायन करें।
  • सत्संग में उनके जीवन और शिक्षाओं का स्मरण करें।
  • लंगर या सामूहिक भोजन में सभी वर्गों के लोगों को एक साथ भोजन कराएं।
  • किसी जरूरतमंद की सहायता करके उनके सेवा भाव को जीवन में उतारें।

संत रविदास का जीवन परिचय

संत रविदास का जन्म काशी में लगभग 15वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। परंपरा के अनुसार उनका जन्म माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनका परिवार चर्मकार का कार्य करता था, अर्थात जूते बनाने और चमड़े का काम करने वाला। उस समय समाज में ऐसे कार्य करने वालों के साथ गहरा भेदभाव होता था। परंतु रविदास ने कभी अपने कार्य को हीन नहीं माना। वे जीवन भर परिश्रम से जूते बनाते रहे और उसी के साथ ईश्वर का भजन भी करते रहे।

परंपरा के अनुसार वे स्वामी रामानंद के शिष्य थे, जो उस युग के महान भक्ति आचार्य माने जाते हैं। रविदास बचपन से ही साधु संतों की सेवा में रुचि रखते थे। कहा जाता है कि वे अपने बनाए जूते साधुओं को निःशुल्क दे दिया करते थे। उनकी इस उदारता के कारण परिवार को कई बार कठिनाई भी उठानी पड़ती थी, परंतु उन्होंने सेवा का भाव कभी नहीं छोड़ा।

उनकी भक्ति और ज्ञान की ख्याति इतनी फैली कि समाज के हर वर्ग के लोग उनके पास आने लगे। परंपरा में मान्यता है कि भक्त शिरोमणि मीराबाई ने भी संत रविदास को अपना गुरु माना था। सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में संत रविदास के 40 से अधिक पद संकलित हैं, जो उनकी वाणी के व्यापक सम्मान का प्रमाण है।

मन चंगा तो कठौती में गंगा की कथा

संत रविदास की सबसे प्रसिद्ध कथा उनकी अमर वाणी से जुड़ी है। कथा के अनुसार एक बार कुछ लोग गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। उन्होंने रविदास से भी साथ चलने का आग्रह किया। रविदास ने कहा कि उन्होंने किसी को समय पर जूते देने का वचन दिया है, इसलिए वे नहीं जा सकते। वचन तोड़कर गंगा स्नान करने से उन्हें पुण्य नहीं मिलेगा।

उन्होंने एक व्यक्ति को एक सुपारी या कौड़ी देकर कहा कि इसे गंगा माता को अर्पित कर देना। कथा के अनुसार जब उस व्यक्ति ने गंगा में वह भेंट अर्पित की, तो गंगा माता ने स्वयं हाथ बढ़ाकर उसे स्वीकार किया और बदले में रविदास के लिए एक स्वर्ण कंगन दिया। उस व्यक्ति के मन में लोभ आ गया और उसने वह कंगन रविदास को देने के स्थान पर राजा की रानी को भेंट कर दिया। रानी को कंगन इतना पसंद आया कि उसने दूसरा कंगन मांग लिया।

संकट में फंसा वह व्यक्ति रविदास के पास पहुंचा और सारी बात बताई। रविदास ने उसे क्षमा किया और अपनी कठौती, अर्थात चमड़ा भिगोने वाले पानी के पात्र, के पास बैठकर गंगा माता का ध्यान किया। कथा के अनुसार गंगा माता उस कठौती के जल में प्रकट हुईं और दूसरा कंगन दे दिया। तभी रविदास ने कहा: "मन चंगा तो कठौती में गंगा।"

इस वाणी का अर्थ अत्यंत गहरा है। यदि मन पवित्र है, तो चर्मकार की कठौती का जल भी साक्षात गंगाजल बन जाता है। पवित्रता किसी स्थान, जाति या बाहरी कर्मकांड में नहीं बल्कि मन की शुद्धता में है।

माघ स्नान और आंतरिक शुद्धि का गहरा संबंध

यह एक सुंदर संयोग है कि संत रविदास की जयंती माघ पूर्णिमा पर आती है, जो पूरे माघ मास के पवित्र स्नान का समापन दिवस है। पूरे महीने करोड़ों लोग गंगा और संगम में डुबकी लगाते हैं और महीने के अंतिम दिन संत रविदास की वाणी याद दिलाती है कि सबसे पवित्र स्नान मन का स्नान है।

संत रविदास का संदेश माघ स्नान का विरोध नहीं करता बल्कि उसके मूल मर्म को स्पष्ट करता है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि यदि मन में क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अहंकार भरा हो, तो तीर्थ स्नान का फल नहीं मिलता। बाहरी जल शरीर को धोता है, परंतु मन को केवल सत्य, प्रेम और सेवा ही धो सकते हैं। जब बाहरी स्नान के साथ मन का स्नान भी होता है, तभी माघ स्नान पूर्ण होता है।

बाहरी शुद्धिआंतरिक शुद्धि
पवित्र नदी में स्नानमन से क्रोध और ईर्ष्या का त्याग
तीर्थ यात्राअपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा
दान और दक्षिणानिःस्वार्थ सेवा और करुणा
पूजा और कर्मकांडसत्य, ईमानदारी और विनम्रता
तिलक और मालासभी मनुष्यों में ईश्वर का दर्शन

संत रविदास की प्रमुख शिक्षाएं

संत रविदास की वाणी सरल, सहज और लोक भाषा में है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 600 वर्ष पहले थे।

  • मन की पवित्रता: बाहरी आडंबर से अधिक महत्वपूर्ण मन की शुद्धता है।
  • मानव समानता: जन्म से कोई ऊंचा या नीचा नहीं होता, मनुष्य अपने कर्मों से महान बनता है।
  • परिश्रम का सम्मान: कोई भी ईमानदार कार्य छोटा नहीं होता। श्रम ही सच्ची पूजा है।
  • ईश्वर सर्वव्यापी: ईश्वर किसी मंदिर या तीर्थ तक सीमित नहीं, वह हर हृदय में निवास करता है।
  • अहंकार का त्याग: अहंकार भक्ति का सबसे बड़ा शत्रु है। विनम्रता ही ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग है।
  • सेवा भाव: दूसरों की सेवा में ही ईश्वर की सेवा है।

बेगमपुरा का सपना

संत रविदास ने अपनी वाणी में एक आदर्श नगर की कल्पना की, जिसे उन्होंने बेगमपुरा कहा। बेगमपुरा का अर्थ है बिना गम अर्थात बिना दुख का नगर। उनकी कल्पना में यह ऐसा नगर था जहां न कोई दुख हो, न कोई चिंता, न कोई कर। जहां कोई ऊंचा नीचा न हो और सभी लोग समान रूप से प्रेम और सम्मान के साथ रहें।

उनका एक प्रसिद्ध दोहा उनकी इसी भावना को व्यक्त करता है, जिसमें वे ऐसे राज्य की कामना करते हैं जहां सबको अन्न मिले और छोटे बड़े सब समान रूप से बसें। यह सपना आज के समाज के लिए भी एक प्रेरणा है। एक ऐसे समाज का निर्माण, जहां कोई भूखा न रहे और किसी के साथ भेदभाव न हो, वास्तव में संत रविदास की सबसे सच्ची पूजा है।

संत रविदास जयंती कैसे मनाई जाती है?

संत रविदास जयंती पूरे देश में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली में बड़े उत्साह से मनाई जाती है। वाराणसी में उनके जन्म स्थान सीर गोवर्धनपुर में इस दिन विशाल आयोजन होता है, जहां देश विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

आयोजनविवरण
शोभायात्रासंत रविदास के चित्र और झांकियों के साथ नगर में शोभायात्रा
पद गायनउनके पदों और दोहों का सामूहिक गायन
सत्संगउनके जीवन और शिक्षाओं पर प्रवचन
लंगरसभी वर्गों के लोगों के लिए सामूहिक भोजन
सेवा कार्यजरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और सहायता
पवित्र स्नानमाघ पूर्णिमा का स्नान और गंगा दर्शन

ज्योतिष और आध्यात्मिक दृष्टि

माघ पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं में होता है। ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है। यह संयोग अत्यंत अर्थपूर्ण है कि मन की पवित्रता का संदेश देने वाले संत की जयंती उसी दिन आती है जब मन का कारक ग्रह पूर्ण बल में होता है। इस दिन मन को शुद्ध करने की साधना, जैसे ध्यान, भजन और सेवा, विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।

शनि ग्रह को ज्योतिष में परिश्रम, सेवा और श्रमिक वर्ग का कारक माना जाता है। संत रविदास ने जीवन भर श्रम और सेवा को ही पूजा माना। माघ मास में सूर्य प्रायः शनि की राशि मकर में होते हैं। इस दृष्टि से संत रविदास का जीवन शनि के सबसे उज्ज्वल गुणों, अर्थात परिश्रम, न्याय, धैर्य और विनम्रता का जीवंत उदाहरण है।

संत रविदास जयंती पर क्या करें और क्या न करें?

क्या करेंक्या न करें
संत रविदास के पदों का पाठ और गायन करेंकिसी के साथ जाति या कार्य के आधार पर भेदभाव न करें
सभी के साथ बैठकर सामूहिक भोजन करेंकिसी भी श्रम या कार्य को हीन न समझें
जरूरतमंदों की सहायता करेंबाहरी आडंबर को ही धर्म न मानें
अपने कार्य को ईमानदारी से करने का संकल्प लेंअपने वचन को हल्के में न तोड़ें
मन की शुद्धि के लिए ध्यान और भजन करेंअहंकार और घृणा को मन में स्थान न दें

कठौती के जल में झिलमिलाती गंगा

संत रविदास का जीवन इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए किसी विशेष जन्म, पद या धन की आवश्यकता नहीं होती। एक साधारण चर्मकार, जो जीवन भर अपने हाथों से जूते बनाता रहा, अपने मन की पवित्रता और भक्ति के बल पर संत शिरोमणि बन गया। राजा, रानियां और विद्वान उसके चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने लगे।

माघ पूर्णिमा पर जब करोड़ों लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं तब संत रविदास की वाणी हर हृदय में गूंजती है कि असली गंगा मन के भीतर बहती है। जो व्यक्ति इस दिन पवित्र स्नान के साथ अपने मन को भी भेदभाव, अहंकार और घृणा से मुक्त करने का संकल्प लेता है, उसके लिए साधारण जल भी गंगाजल बन जाता है। यही संत रविदास जयंती का सबसे बड़ा संदेश है।

FAQ

संत रविदास जयंती कब मनाई जाती है?
संत रविदास जयंती प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। परंपरा के अनुसार इसी दिन काशी में संत रविदास का जन्म हुआ था।

मन चंगा तो कठौती में गंगा का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि यदि मन पवित्र है तो साधारण पात्र का जल भी गंगाजल के समान पवित्र है। पवित्रता बाहरी स्थान में नहीं, मन की शुद्धता में है।

संत रविदास के गुरु कौन थे?
परंपरा के अनुसार संत रविदास स्वामी रामानंद के शिष्य थे। मान्यता है कि मीराबाई ने भी संत रविदास को अपना गुरु माना था।

बेगमपुरा क्या है?
बेगमपुरा संत रविदास द्वारा कल्पित एक आदर्श नगर है, जहां कोई दुख, चिंता या भेदभाव न हो और सभी लोग समान रूप से प्रेम के साथ रहें।

संत रविदास जयंती कैसे मनाई जाती है?
इस दिन शोभायात्रा, उनके पदों का गायन, सत्संग और लंगर का आयोजन होता है। वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में विशाल उत्सव मनाया जाता है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

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