By पं. अमिताभ शर्मा
तिल मिश्रित जल से रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जप और बिल्वपत्र के नियम

यद्यपि माघ मास को मुख्य रूप से भगवान विष्णु और सूर्य देव का मास माना जाता है, परंतु परंपरा में कहा गया है कि भगवान शिव की आराधना के बिना यह मास अधूरा है। इसका एक ज्योतिषीय कारण यह है कि माघ मास में सूर्य मकर राशि से कुंभ राशि की ओर बढ़ते हैं और ये दोनों राशियां शनि देव की हैं, जिन्हें परंपरा में भगवान शिव का परम भक्त माना गया है। माघ मास के सोमवार और प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर तिल मिश्रित जल से रुद्राभिषेक करने को विशेष फलदायी माना गया है।
| पूजा तत्व | विवरण |
|---|---|
| श्रेष्ठ दिन | माघ मास के सोमवार, प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि |
| अभिषेक का पात्र | तांबे या चांदी का लोटा |
| अभिषेक सामग्री | गंगाजल, काले तिल, थोड़ा कच्चा दूध और शहद |
| प्रमुख अर्पण | बिल्वपत्र, धतूरा, आक के पुष्प, भस्म और चंदन |
| प्रमुख मंत्र | ॐ नमः शिवाय और महामृत्युंजय मंत्र |
| विशेष अनुष्ठान | महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख जप |
| ज्योतिषीय संबंध | शनि की राशियों में सूर्य का गोचर |
| अपेक्षित फल | आरोग्य, निर्भयता, मानसिक शांति और शनि कष्टों में कमी |
माघ मास में सूर्य पहले मकर राशि में और फिर कुंभ संक्रांति के बाद कुंभ राशि में संचार करते हैं। ये दोनों राशियां शनि देव की हैं। परंपरा में माना जाता है कि शनि देव ने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके ही न्याय के देवता और कर्मफल दाता का पद प्राप्त किया था। इसलिए शनि को शिव का परम भक्त माना जाता है और शिव की उपासना को शनि के कष्टों से मुक्ति का सबसे प्रभावी मार्ग कहा गया है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अमांत पंचांग के अनुसार महाशिवरात्रि माघ कृष्ण चतुर्दशी को आती है। पूर्णिमांत पंचांग में यही तिथि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी कहलाती है। तिथि एक ही है, केवल मास के नाम की गणना अलग है। इस प्रकार माघ मास का अंतिम भाग शिवरात्रि की तैयारी का समय भी है।
माघ मास की ठंड भी शिव उपासना से जुड़ी है। भगवान शिव हिमालय के कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। वे शीत और तपस्या के देवता हैं। कड़ाके की ठंड में शिवलिंग पर जल अर्पित करना तपस्या और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान शिव के रुद्र स्वरूप का अभिषेक। यह शिव पूजा की सबसे प्रभावशाली विधियों में से एक है। माघ मास में अभिषेक के जल में काले तिल मिलाना विशेष शुभ माना जाता है, क्योंकि तिल शनि का प्रिय द्रव्य है और इस मास में शनि की राशियों का प्रभाव रहता है।
| चरण | विधि |
|---|---|
| तैयारी | तांबे या चांदी के लोटे में गंगाजल मिला शुद्ध जल लें |
| सामग्री मिलाना | जल में थोड़े काले तिल, थोड़ा कच्चा दूध और कुछ बूंदें शहद मिलाएं |
| संकल्प | आरोग्य, शांति और कष्टों से मुक्ति के लिए संकल्प लें |
| गणेश स्मरण | पूजा से पहले भगवान गणेश का स्मरण करें |
| अभिषेक | ॐ नमः शिवाय या रुद्र मंत्रों का जप करते हुए धीरे धीरे अभिषेक करें |
| शुद्ध जल | अंत में शुद्ध जल से अभिषेक करें |
| श्रृंगार | चंदन, भस्म और अक्षत अर्पित करें |
| बिल्वपत्र | नियमों के अनुसार बिल्वपत्र अर्पित करें |
| धूप दीप | धूप और घी का दीपक जलाकर आरती करें |
| परिक्रमा | शिवलिंग की आधी परिक्रमा करें |
विस्तृत रुद्राभिषेक में शुक्ल यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है। यह विधि योग्य आचार्य द्वारा कराई जाती है। गृहस्थ स्वयं ॐ नमः शिवाय मंत्र के साथ सरल अभिषेक कर सकते हैं, जो श्रद्धा से करने पर उतना ही फलदायी माना गया है।
महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का मंत्र है, जिसे मृत्यु पर विजय दिलाने वाला मंत्र कहा गया है।
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"
इस मंत्र का भाव यह है कि साधक त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की उपासना करता है, जो सुगंधित हैं और सबका पोषण करते हैं। साधक प्रार्थना करता है कि जैसे पका हुआ ककड़ी का फल अपनी बेल से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही वह मृत्यु के बंधन से मुक्त हो, परंतु अमृत अर्थात मोक्ष से कभी अलग न हो।
इस मंत्र का सुंदर संदेश यह है कि मृत्यु से भयभीत होने के स्थान पर जीवन को इतना परिपक्व बना लिया जाए कि जब समय आए, तो आत्मा सहजता से बंधन से मुक्त हो सके।
परंपरा में गंभीर रोग, अकाल मृत्यु का भय या बड़े संकट के समय महामृत्युंजय मंत्र के सवा लाख जप का विधान है। यह जप प्रायः कई दिनों तक योग्य आचार्यों द्वारा संकल्प सहित कराया जाता है और अंत में दशांश हवन किया जाता है। गृहस्थ स्वयं प्रतिदिन 1 से 11 माला जप कर सकते हैं।
परंपरा में माना जाता है कि महामृत्युंजय मंत्र का जप अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है और रोगों से रक्षा करता है। शीत ऋतु में जब हृदय रोग और पक्षाघात जैसी गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है तब यह मंत्र मन को शक्ति और धैर्य देता है। परंतु यह अत्यंत आवश्यक है कि किसी भी रोग के लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क किया जाए। मंत्र चिकित्सा का विकल्प नहीं बल्कि मन और आत्मा का सहारा है। सीने में दर्द, अचानक कमजोरी, बोलने में कठिनाई या चेहरे का टेढ़ा होना जैसे लक्षण आपात स्थिति के संकेत हैं, जिनमें बिना देरी चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
बिल्वपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। परंपरा में बिल्वपत्र अर्पण के कुछ विशेष नियम बताए गए हैं।
| नियम | विवरण |
|---|---|
| पत्ते का स्वरूप | 3 पत्तियों वाला पूरा बिल्वपत्र, जिसे त्रिदल कहते हैं |
| पत्ते की स्थिति | कटा, फटा या कीड़े लगा बिल्वपत्र न चढ़ाएं |
| चढ़ाने का ढंग | चिकनी सतह शिवलिंग की ओर रखकर अर्पित करें |
| डंठल | डंठल का मोटा भाग तोड़कर अर्पित करने की परंपरा है |
| तोड़ने का निषेध | परंपरा के अनुसार सोमवार, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या और संक्रांति पर बिल्वपत्र न तोड़ें |
| पुनः प्रयोग | बिल्वपत्र बासी नहीं माना जाता, इसे धोकर पुनः चढ़ाया जा सकता है |
| मंत्र | अर्पण के समय ॐ नमः शिवाय का जप करें |
बिल्वपत्र की 3 पत्तियों को भगवान शिव के 3 नेत्रों, त्रिशूल के 3 शूलों और सत्व, रज तथा तम, इन 3 गुणों का प्रतीक माना जाता है।
| समस्या | ज्योतिषीय संकेत | माघ मास में उपाय |
|---|---|---|
| शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या | शनि का अशुभ गोचर | शनिवार और प्रदोष पर तिल मिश्रित जल से अभिषेक |
| मानसिक अशांति | पीड़ित चंद्रमा | सोमवार को दूध मिश्रित जल से अभिषेक |
| स्वास्थ्य की चिंता | लग्न या षष्ठ भाव पीड़ित | महामृत्युंजय मंत्र का जप |
| अकाल मृत्यु का भय | अष्टम भाव पीड़ित | योग्य आचार्य से सवा लाख महामृत्युंजय जप |
| राहु केतु के कष्ट | अशुभ राहु या केतु | शिवलिंग पर जल और ॐ नमः शिवाय का जप |
चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं, इसलिए सोमवार को शिव पूजा चंद्रमा से जुड़े मानसिक कष्टों को शांत करने वाली मानी जाती है। शनि शिव के भक्त हैं, इसलिए शनिवार और शनि प्रदोष को शिव पूजा शनि के कष्टों को कम करने वाली मानी जाती है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| तिल मिश्रित जल से अभिषेक करें | शिवलिंग पर तुलसी दल अर्पित न करें |
| पूरे और स्वच्छ बिल्वपत्र चढ़ाएं | केतकी का पुष्प अर्पित न करें |
| शिवलिंग की आधी परिक्रमा करें | जलधारी को लांघकर पूरी परिक्रमा न करें |
| महामृत्युंजय मंत्र का श्रद्धा से जप करें | रोग के लक्षणों में चिकित्सक की उपेक्षा न करें |
| सोमवार और प्रदोष पर व्रत रखें | पूजा के दिन क्रोध और कलह से बचें |
भगवान शिव हिमालय की बर्फीली चोटियों पर ध्यानमग्न रहते हैं। वे शीत के देवता भी हैं और तप के भी। माघ मास की कड़ाके की ठंड में जब साधक शिवलिंग पर तिल मिश्रित जल अर्पित करता है और महामृत्युंजय मंत्र का जप करता है, तो वह शिव के उसी तप और वैराग्य का एक अंश अपने भीतर धारण करता है।
जो व्यक्ति इस मास में श्रद्धा से शिव की आराधना करता है, उसके मन से भय धीरे धीरे मिटने लगता है। उसे यह विश्वास हो जाता है कि जिसके सिर पर महाकाल का हाथ है, उसे किसी संकट से डरने की आवश्यकता नहीं। यही निर्भयता माघ मास में शिव पूजा का सबसे बड़ा वरदान है।
माघ मास में शिव पूजा क्यों आवश्यक मानी गई है? माघ मास में सूर्य शनि की राशियों मकर और कुंभ में होते हैं और शनि को शिव का परम भक्त माना जाता है। इसलिए इस मास में शिव पूजा शनि कष्टों को कम करने वाली मानी गई है।
माघ मास में रुद्राभिषेक कैसे करें? तांबे या चांदी के लोटे में गंगाजल मिले जल में काले तिल, थोड़ा कच्चा दूध और शहद मिलाकर ॐ नमः शिवाय का जप करते हुए शिवलिंग का अभिषेक करें।
महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख जप कैसे होता है? यह जप प्रायः कई दिनों तक योग्य आचार्यों द्वारा संकल्प सहित कराया जाता है और अंत में दशांश हवन होता है। गृहस्थ प्रतिदिन 1 से 11 माला जप कर सकते हैं।
बिल्वपत्र चढ़ाने के क्या नियम हैं? 3 पत्तियों वाला पूरा और स्वच्छ बिल्वपत्र चिकनी सतह शिवलिंग की ओर रखकर चढ़ाएं। कटा फटा पत्ता न चढ़ाएं और निषिद्ध तिथियों पर बिल्वपत्र न तोड़ें।
क्या महाशिवरात्रि माघ मास में आती है? अमांत पंचांग के अनुसार महाशिवरात्रि माघ कृष्ण चतुर्दशी को आती है। पूर्णिमांत पंचांग में इसी तिथि को फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी कहा जाता है।
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