By पं. अमिताभ शर्मा
अक्षराभ्यास संस्कार की वैदिक विधि, अबूझ मुहूर्त और माता पिता के नियम

सनातन धर्म के 16 संस्कारों में विद्यारंभ संस्कार का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसे अक्षराभ्यास, अक्षरारंभ और पाटी पूजन के नाम से भी जाना जाता है। यह वह संस्कार है जिसमें बालक या बालिका को पहली बार औपचारिक रूप से अक्षर ज्ञान और लेखन से परिचित कराया जाता है। माघ शुक्ल पंचमी अर्थात वसंत पंचमी का दिन इस संस्कार के लिए वर्ष का सबसे श्रेष्ठ और स्वयं सिद्ध अबूझ मुहूर्त माना गया है। इस दिन अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती।
| संस्कार तत्व | विवरण |
|---|---|
| श्रेष्ठ दिन | माघ शुक्ल पंचमी अर्थात वसंत पंचमी |
| उपयुक्त आयु | सामान्यतः 3 से 5 वर्ष |
| प्रमुख आराध्य | भगवान गणेश और माँ सरस्वती |
| लेखन का माध्यम | चावल से भरी थाली, स्लेट या पट्टी |
| लेखनी | चांदी की शलाका, सोने की अंगूठी या अनार की टहनी |
| प्रथम अक्षर | ॐ, श्री या ऐं |
| जिह्वा पर लेखन | शहद से ऐं, जो सरस्वती का बीज मंत्र है |
| संस्कार कराने वाले | गुरु, आचार्य, दादा दादी या परिवार के वरिष्ठ विद्वान |
| समापन | गुरु दक्षिणा, प्रसाद वितरण और बड़ों का आशीर्वाद |
सनातन परंपरा में मनुष्य के जीवन को संस्कारों के माध्यम से गढ़ा जाता है। संस्कार का अर्थ है शुद्ध करना और गुणों का आरोपण करना। गर्भ से लेकर अंतिम यात्रा तक 16 प्रमुख संस्कार बताए गए हैं। विभिन्न ग्रंथों में इनकी सूची में थोड़ा अंतर मिलता है, परंतु प्रचलित सूची में विद्यारंभ को एक प्रमुख संस्कार माना गया है।
| क्रम | संस्कार | जीवन की अवस्था |
|---|---|---|
| 1 | गर्भाधान | जीवन का आरंभ |
| 2 | पुंसवन | गर्भ की रक्षा |
| 3 | सीमंतोन्नयन | गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की कामना |
| 4 | जातकर्म | जन्म |
| 5 | नामकरण | नाम रखना |
| 6 | निष्क्रमण | पहली बार घर से बाहर ले जाना |
| 7 | अन्नप्राशन | पहली बार अन्न खिलाना |
| 8 | चूड़ाकर्म | मुंडन |
| 9 | कर्णवेध | कान छेदना |
| 10 | विद्यारंभ | अक्षर ज्ञान का आरंभ |
| 11 | उपनयन | यज्ञोपवीत और गुरु के पास जाना |
| 12 | वेदारंभ | वेद अध्ययन का आरंभ |
| 13 | केशांत | किशोरावस्था का संस्कार |
| 14 | समावर्तन | शिक्षा पूर्ण कर घर लौटना |
| 15 | विवाह | गृहस्थ आश्रम में प्रवेश |
| 16 | अंत्येष्टि | अंतिम संस्कार |
इस सूची से स्पष्ट है कि विद्यारंभ वह बिंदु है जहां बालक का जीवन केवल शारीरिक विकास से आगे बढ़कर बौद्धिक विकास की ओर मुड़ता है। इसीलिए इस संस्कार को जीवन की दिशा तय करने वाला संस्कार कहा जा सकता है।
वसंत पंचमी माँ सरस्वती के प्राकट्य का दिन माना जाता है। जिस दिन स्वयं ज्ञान की देवी प्रकट हुईं, उससे श्रेष्ठ दिन विद्या के आरंभ के लिए और कौन सा हो सकता है। परंपरा में इस दिन को अबूझ मुहूर्त माना गया है। अबूझ का अर्थ है जिसे बूझने अर्थात खोजने या जांचने की आवश्यकता न हो। ऐसे दिन स्वयं इतने शुभ होते हैं कि उनमें किसी भी शुभ कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं रहती।
ऋतु की दृष्टि से भी यह समय उपयुक्त है। वसंत नवसृजन की ऋतु है। जैसे पेड़ों पर नई कोंपलें फूटती हैं, वैसे ही बालक के मन में ज्ञान का पहला अंकुर फूटता है। शीत की जड़ता समाप्त होकर प्रकृति में जो उत्साह आता है, वही उत्साह बालक की शिक्षा के आरंभ में भी होना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि भारत के कुछ क्षेत्रों, विशेषकर केरल और दक्षिण भारत में, विद्यारंभ विजयादशमी के दिन भी बड़े उत्साह से कराया जाता है। दोनों ही दिन देवी की उपासना से जुड़े हैं और दोनों को विद्या के आरंभ के लिए श्रेष्ठ माना गया है। अपनी क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इनमें से कोई भी दिन चुना जा सकता है।
| चरण | विधि |
|---|---|
| तैयारी | पूजा स्थान को स्वच्छ करके पीला वस्त्र बिछाएं और माँ सरस्वती तथा गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें |
| बालक का स्नान | बालक को स्नान कराकर नए पीले या श्वेत वस्त्र पहनाएं और मस्तक पर हल्दी या चंदन का तिलक लगाएं |
| गणेश पूजन | विघ्नहर्ता गणेश जी का पूजन करके निर्विघ्न शिक्षा की प्रार्थना करें |
| सरस्वती पूजन | माँ सरस्वती को पीले पुष्प, अक्षत, चंदन और पीला भोग अर्पित करें |
| संकल्प | माता पिता बालक के नाम से विद्यारंभ का संकल्प लें |
| आसन | गुरु या वरिष्ठ सदस्य पूर्व की ओर मुख करके बैठें और बालक को अपनी गोद में बैठाएं |
| जिह्वा पर लेखन | चांदी की शलाका या अनार की टहनी को शहद में डुबोकर बालक की जिह्वा पर ऐं लिखें |
| प्रथम अक्षर | बालक की दाहिनी तर्जनी पकड़कर चावल की थाली में ॐ, श्री या अपनी भाषा का पहला अक्षर लिखवाएं |
| पुस्तक पूजन | बालक के हाथ से एक नई पुस्तक और कलम का पूजन कराएं |
| आशीर्वाद | बालक से गुरु, माता पिता और बड़ों के चरण स्पर्श कराएं |
| दक्षिणा | गुरु को दक्षिणा, वस्त्र या पुस्तक भेंट करें |
| प्रसाद | उपस्थित सभी लोगों में प्रसाद वितरित करें |
ऐं माँ सरस्वती का बीज मंत्र है। बीज का अर्थ है वह सूक्ष्म ध्वनि जिसमें देवता की पूरी शक्ति समाई होती है, जैसे एक छोटे से बीज में पूरा वृक्ष समाया होता है। जिह्वा वाणी का अंग है। जब शहद से जिह्वा पर ऐं लिखा जाता है, तो यह प्रार्थना की जाती है कि बालक की वाणी मधुर हो, सत्य हो और ज्ञान से भरी हो। शहद मिठास का प्रतीक है और चांदी शुद्धता तथा शीतलता का।
चावल को अक्षत कहा जाता है, अर्थात जो कभी क्षत या नष्ट न हो। अक्षत पर लिखा गया पहला अक्षर इस कामना का प्रतीक है कि बालक का ज्ञान अक्षय हो और कभी नष्ट न हो। साथ ही अन्न पर लिखना यह भी सिखाता है कि ज्ञान और जीवन का पोषण एक दूसरे से जुड़े हैं।
परंपरा में माना जाता है कि विधिपूर्वक विद्यारंभ संस्कार कराने से बालक को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी यह संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण है। बालक के मन में पहली बार जो भाव शिक्षा के साथ जुड़ता है, वह लंबे समय तक बना रहता है। यदि शिक्षा का आरंभ भय और दबाव के साथ होता है, तो बालक पढ़ाई से दूर भागता है। परंतु यदि आरंभ प्रेम, उत्सव और आशीर्वाद के साथ होता है, तो शिक्षा उसके लिए आनंद का विषय बन जाती है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| बालक को प्रसन्न मन से संस्कार में शामिल करें | रोते या थके हुए बालक पर जबरदस्ती न करें |
| शहद की मात्रा बहुत थोड़ी रखें | एक वर्ष से कम आयु के शिशु को शहद न दें |
| स्वच्छ और सुरक्षित लेखनी का प्रयोग करें | नुकीली या असुरक्षित वस्तु का प्रयोग न करें |
| गुरु या विद्वान का सम्मान करें | संस्कार को केवल दिखावे का आयोजन न बनाएं |
| संस्कार के बाद भी घर में अध्ययन का वातावरण बनाएं | संस्कार के बाद बालक की शिक्षा के प्रति उदासीन न हों |
विद्यारंभ केवल एक दिन का आयोजन नहीं है। यह एक संकल्प है कि माता पिता अपने बच्चे की शिक्षा के प्रति जीवन भर जागरूक रहेंगे। संस्कार के बाद घर में पुस्तकों के प्रति सम्मान, नियमित कहानियां सुनाना और बालक के प्रश्नों का धैर्य से उत्तर देना, इन सबसे ही इस संस्कार का वास्तविक फल मिलता है।
वैदिक ज्योतिष में कुंडली का चतुर्थ भाव प्रारंभिक शिक्षा से, पंचम भाव बुद्धि और विद्या से और द्वितीय भाव वाणी से जुड़ा माना जाता है। बुध बुद्धि और लेखन के कारक हैं, जबकि बृहस्पति ज्ञान और गुरु के कारक हैं। सामान्य स्थिति में विद्यारंभ के लिए बुध, गुरु और शुक्र के दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ तिथि देखी जाती है। वसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त मानने के कारण इस दिन इन सभी बातों की अलग से जांच आवश्यक नहीं मानी जाती।
| ज्योतिषीय तत्व | संबंध | संस्कार में महत्व |
|---|---|---|
| चतुर्थ भाव | प्रारंभिक शिक्षा | शिक्षा की नींव |
| पंचम भाव | बुद्धि और विद्या | ज्ञान ग्रहण की क्षमता |
| द्वितीय भाव | वाणी | अभिव्यक्ति की स्पष्टता |
| बुध | लेखन, गणना और बुद्धि | अक्षर ज्ञान |
| बृहस्पति | गुरु और ज्ञान | गुरु कृपा और विवेक |
विद्यारंभ संस्कार वह क्षण है जब एक नन्हा हाथ पहली बार अक्षर बनाता है। वह अक्षर छोटा सा होता है, परंतु उसमें पूरे जीवन की संभावनाएं छिपी होती हैं। जिस प्रकार एक दीपक से हजारों दीपक जलाए जा सकते हैं, उसी प्रकार उस पहले अक्षर से ज्ञान की अनगिनत ज्योतियां प्रकाशित हो सकती हैं।
वसंत पंचमी पर माँ सरस्वती के आशीर्वाद के साथ किया गया यह संस्कार बालक को केवल पढ़ना लिखना नहीं सिखाता। यह उसे सिखाता है कि ज्ञान पवित्र है, गुरु पूजनीय हैं और सीखना एक उत्सव है। जो माता पिता इस भाव को समझकर अपने बच्चे की शिक्षा का आरंभ करते हैं, वे उसे जीवन का सबसे बड़ा उपहार देते हैं।
विद्यारंभ संस्कार किस आयु में करना चाहिए? विद्यारंभ संस्कार सामान्यतः 3 से 5 वर्ष की आयु में किया जाता है, जब बालक अक्षर ज्ञान के लिए तैयार होने लगता है।
वसंत पंचमी को विद्यारंभ के लिए अबूझ मुहूर्त क्यों माना जाता है? वसंत पंचमी माँ सरस्वती के प्राकट्य का दिन है, इसलिए यह स्वयं सिद्ध शुभ दिन माना गया है और इस दिन अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती।
विद्यारंभ में बालक की जिह्वा पर क्या लिखा जाता है? चांदी की शलाका या अनार की टहनी को शहद में डुबोकर बालक की जिह्वा पर ऐं लिखा जाता है, जो माँ सरस्वती का बीज मंत्र है।
विद्यारंभ में पहला अक्षर कहां लिखवाया जाता है? बालक की उंगली पकड़कर चावल से भरी थाली, स्लेट या पट्टी पर पहला अक्षर लिखवाया जाता है, जो प्रायः ॐ या श्री होता है।
क्या विद्यारंभ केवल वसंत पंचमी पर ही हो सकता है? नहीं, कुछ क्षेत्रों में विजयादशमी पर भी विद्यारंभ होता है। परिवार की परंपरा के अनुसार शुभ मुहूर्त देखकर अन्य दिन भी यह संस्कार किया जा सकता है।
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