By पं. अभिषेक शर्मा
तीव्र जठराग्नि अभ्यंग मालिश और त्रिदोष संतुलन के आयुर्वेदिक नियम

सनातन परंपरा में आयुर्वेद को केवल चिकित्सा पद्धति नहीं अपितु वेदों का उपवेद मानकर जीवन जीने की आध्यात्मिक कला के रूप में स्वीकार किया गया है। जब मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास का आगमन होता है तब प्रकृति में सूर्य का तेज मंद पड़ने लगता है और वायुमंडल में शीतलता का प्रसार हो जाता है। इस संधिकाल में मानव शरीर के भीतर जैविक और रासायनिक परिवर्तन अत्यंत तीव्र गति से होते हैं। महर्षि चरक और वाग्भट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस कालखंड में की गई स्वास्थ्य साधना संपूर्ण वर्ष के लिए ओज और बल का संचय करती है। यदि अगहन मास में दैनिक चर्या का नियमपूर्वक पालन न किया जाए तो प्रदीप्त पाचन अग्नि स्वयं शरीर के धातुओं को भस्म करने लगती है।
| दिनचर्या अंग | वैदिक एवं आयुर्वेदिक निर्देश | शास्त्रोक्त लाभ |
|---|---|---|
| जागरण काल | प्रातः सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त काल | सात्विक बुद्धि और प्राण ऊर्जा का जागरण |
| दैनिक अभ्यंग | गुनगुने तिल अथवा सरसों तेल से सर्वांग मालिश | वात का शमन, त्वचा की स्निग्धता और अस्थि पुष्टि |
| स्नान विधान | गुनगुने जल से स्नान, शीतल जल का त्याग | जठराग्नि की रक्षा और रक्त प्रवाह का संतुलन |
| सूर्योपासना | ताम्र पात्र से अर्घ्य और बीस मिनट धूप सेवन | प्राकृतिक विटामिन, अस्थि बल और नेत्र ज्योति |
| प्रधान रस | मधुर, अम्ल और लवण रस प्रधान पोषण | प्रदीप्त अग्नि का तृप्तिकरण और धातु संवर्धन |
| त्याज्य तत्व | जीरा, बासी भोजन, शीतल पेय और दिन का शयन | त्रिदोष प्रकोप, मंदाग्नि और आम विष से सुरक्षा |
अगहन मास के आरंभ होते ही प्रत्येक साधक को अपने दिन का आरंभ अत्यंत अनुशासित रूप से करना चाहिए। प्रातःकाल शैया त्यागने के पश्चात बासी मुंह गुनगुना जल पीना चाहिए जिससे रात्रि में संचित अपान वायु सहजता से निष्कासित हो सके।
इस वैज्ञानिक दिनचर्या का पालन करने से मनुष्य का शरीर ऋतु परिवर्तन के आघातों से सुरक्षित रहता है। यह नियम केवल रोगों से बचाव नहीं करते बल्कि चित्त को एकाग्र कर ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त भूमि तैयार करते हैं।
आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथ चरक संहिता के सूत्र स्थान में हेमंत ऋतु के अंतर्गत अगहन मास का अत्यंत गूढ़ शारीरिक विश्लेषण मिलता है। महर्षि चरक कहते हैं कि इस काल में बाहर वातावरण में अत्यंत शीतल वायु बहती है। प्रकृति के इस शीतल प्रभाव के कारण मानव शरीर के सूक्ष्म रोमछिद्र संकुचित हो जाते हैं। जब त्वचा के रोमछिद्र बंद हो जाते हैं तब शरीर की स्वाभाविक आंतरिक ऊष्मा बाहर विसर्जित नहीं हो पाती।
शरीर की यह संचित ऊष्मा उदर में एकत्र होकर पाचन संस्थान को प्रदीप्त कर देती है। इसी आंतरिक ताप को आयुर्वेद में जठराग्नि कहा जाता है। अगहन मास में यह पाचन अग्नि संपूर्ण बारह महीनों की तुलना में अपने चरम उत्कर्ष पर होती है। यह अग्नि ठीक उसी प्रकार कार्य करती है जैसे किसी भट्टी की वायु नली बंद कर देने पर उसके भीतर का कोयला प्रचंड वेग से धधकने लगता है।
जब जठराग्नि इतनी प्रचंड होती है तब मनुष्य को स्वाभाविक रूप से तीव्र भूख का अनुभव होता है। इस समय ग्रहण किया गया भारी, गरिष्ठ, चिकनाई युक्त और पौष्टिक भोजन भी अत्यंत सुगमता से पचकर रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सातों धातुओं में परिवर्तित हो जाता है।
किंतु यदि इस प्रज्वलित अग्नि को पर्याप्त और पौष्टिक आहार रूपी ईंधन न मिले तो एक भीषण संकट उत्पन्न हो जाता है। ईंधन के अभाव में यह प्रचंड अग्नि शरीर के संचित रसों और धातुओं का ही दहन करने लगती है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य का वजन अचानक घटने लगता है, देह में शुष्कता छा जाती है और गंभीर वात व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए अगहन मास में उपवास करने के स्थान पर समय पर पौष्टिक और ऊर्जावान आहार ग्रहण करने का स्पष्ट विधान बनाया गया है।
मानव शरीर वात, पित्त और कफ इन तीन मूल स्तंभों पर टिका हुआ है। अगहन मास में गिरते तापमान और शुष्क शीतल वायु के कारण शरीर में वात दोष के प्रकुपित होने की आशंका सर्वाधिक रहती है। वात का स्वाभाविक गुण रुक्ष, शीतल और चंचल होना है। जब पर्यावरण में ठंड बढ़ती है तब वात हड्डियों, जोड़ों और स्नायु तंत्र में पीड़ा उत्पन्न करने लगता है। वहीं दूसरी ओर जठराग्नि के कारण पित्त अपनी स्वाभाविक क्रिया में रहता है किंतु कफ दोष धीरे धीरे शरीर के भीतर संचित होना आरंभ कर देता है।
आयुर्वेद के अनुसार इस ऋतु में वात का शमन करने के लिए स्निग्ध, उष्ण और मधुर आहार सर्वोत्तम माना गया है। प्राचीन लोक परंपरा में एक अत्यंत प्रसिद्ध कहावत है कि अगहन जीरा पूस धना अर्थात अगहन के महीने में जीरे का सेवन वर्जित माना गया है। इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक कारण यह है कि जीरा अत्यंत रूखा, वातकारक और तासीर में पित्त शामक होता है। अगहन मास में शरीर को प्रदीप्त अग्नि और स्निग्धता की आवश्यकता होती है, जबकि जीरे का अधिक प्रयोग आंतरिक आंतों में सूखापन बढ़ाकर वात को भड़का देता है।
| समय पहर | अनुशंसित आयुर्वेदिक आहार | सेवन विधि और प्रमुख नियम |
|---|---|---|
| प्रातः काल | भीगे बादाम, अखरोट, मुनक्का और गुनगुना जल | खाली पेट चबाकर खाएं, शरीर में ऊष्मा का संचार |
| दोपहर भोजन | नया चावल, बाजरा रोटी, मूंग दाल, घी और गुड़ | भोजन के अंत में छाछ न पिएं, ताजा गर्म भोजन करें |
| संध्या काल | भुने चने, तिल की पट्टी अथवा मेवे की खीर | हल्का सुपाच्य अल्पाहार, चाय कॉफी का त्याग |
| रात्रि भोजन | दलिया, मूंग खिचड़ी, लौकी अथवा परवल सब्जी | सोने से 2 घंटे पूर्व भोजन, अल्प मात्रा में ग्रहण |
| शयन पूर्व | देशी गाय का उबला दूध, सोंठ अथवा केसर युक्त | वात शामक, गहरी अनिद्रा नाशक और धातु पुष्टिकारक |
इस मास में खेतों से कटकर आए नए चावल का सेवन अत्यंत हितकारी माना गया है क्योंकि नवीन अन्न शरीर को तात्कालिक पुष्टि प्रदान करता है। बाजरे की रोटी में विद्यमान प्राकृतिक उष्णता शरीर को भीतर से गर्म रखती है। शुद्ध गुड़ का सेवन शरीर में लौह तत्व को बढ़ाता है और पाचन तंत्र को सक्रिय रखता है।
जब मनुष्य इस ऋतु के अनुरूप अपने भोजन का चयन करता है तब उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि आने वाले शिशिर और वसंत ऋतु में भी कोई संक्रामक व्याधि उसे छू नहीं पाती।
आयुर्वेद में तैल मालिश को अभ्यंग की संज्ञा दी गई है। महर्षि वाग्भट ने अष्टांग हृदयम में लिखा है कि मनुष्य को प्रतिदिन अभ्यंग का अभ्यास करना चाहिए क्योंकि यह वृद्धावस्था, थकावट और वात विकारों को समूल नष्ट कर देता है। अगहन मास में अभ्यंग का महत्व सौ गुना बढ़ जाता है क्योंकि ठंडी हवाएं त्वचा की प्राकृतिक नमी को छीनकर उसे खुरदरा बना देती हैं।
जब त्वचा रूखी होती है तब स्नायु तंत्र में तनाव बढ़ता है और रक्त का संचार धीमा पड़ जाता है। इस ऋतु में शुद्ध तिल का तेल अभ्यंग के लिए सर्वश्रेष्ठ औषधि है। तिल का तेल स्वभाव से उष्ण, सूक्ष्म और त्वचा की सातों परतों को भेदकर अस्थि मज्जा तक पहुंचने की अद्भुत क्षमता रखता है। यदि तिल का तेल उपलब्ध न हो तो सरसों के तेल का उपयोग भी किया जा सकता है।
अभ्यंग करते समय तेल को हल्का गुनगुना कर लेना चाहिए। मालिश सदैव शांत और वात रहित स्थान पर बैठकर करनी चाहिए। शरीर के अंगों पर मालिश करने की एक निश्चित वैज्ञानिक दिशा होती है। हृदय की ओर रक्त के संचार को सुगम बनाने के लिए हाथों और पैरों में नीचे से ऊपर की दिशा में मालिश की जाती है, जबकि जोड़ों पर वृत्ताकार गति में तेल का मर्दन किया जाता है।
अभ्यंग से न केवल शारीरिक सौंदर्य और कांति में वृद्धि होती है बल्कि यह स्नायु तंत्र को असीम शांति प्रदान कर मानसिक अवसाद को दूर भगाता है।
वैदिक ज्योतिष और आयुर्वेद का संबंध अत्यंत अभिन्न है। ज्योतिष शास्त्र में शरीर की पाचन शक्ति और जठराग्नि का सीधा संबंध अग्नि तत्व के अधिपति ग्रहों भगवान सूर्य और पराक्रमी मंगल से माना गया है। अगहन मास का समय कालचक्र में वह संधिकाल है जब सूर्य देव जल तत्व की राशि वृश्चिक से निकलकर देवगुरु बृहस्पति की अग्नि तत्व राशि धनु की ओर अग्रसर होते हैं।
वहीं दूसरी ओर अगहन मास की पूर्णिमा का संबंध मृगशिरा नक्षत्र से है जिसके स्वामी साक्षात मंगल देव हैं। मंगल को ज्योतिष में रक्त, अस्थि मज्जा, शारीरिक ऊर्जा और पाचक पित्त का नैसर्गिक कारक माना गया है। जब मंगल का नक्षत्र इस महीने में सक्रिय होता है तब मानव शरीर के भीतर रक्त का प्रवाह तीव्र होता है और यकृत तथा आमाशय की कार्य प्रणाली अत्यंत सक्रिय हो जाती है।
| ज्योतिषीय ग्रह तत्व | शारीरिक धातु एवं तंत्र | अगहन मास में प्रभाव एवं संतुलन |
|---|---|---|
| सूर्य देव | आत्मा, अस्थि संस्थान और जठराग्नि | धूप सेवन और अर्घ्य से अस्थि बल तथा आत्मबल की वृद्धि |
| मंगल देव | रक्त, मांसपेशी और पाचक पित्त रस | नए अन्न, गुड़ और तिल से रक्त की शुद्धि और ओज की वृद्धि |
| चंद्र देव | मन, जल तत्व और शरीर के तरल रस | पूर्णिमा अर्घ्य और दुग्ध सेवन से मानसिक शांति और कफ नियंत्रण |
| देवगुरु बृहस्पति | मेद धातु, यकृत और सात्विक बुद्धि | हल्दी दूध और सात्विक आहार से यकृत की सुरक्षा और विवेक |
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य अथवा मंगल नीच राशि में हों या राहु केतु से पीड़ित हों तो उसकी पाचन शक्ति प्रायः असंतुलित रहती है। ऐसे जातकों को अगहन मास में विशेष रूप से सूर्य को तांबे के लोटे से जल अर्पित करना चाहिए और मंगल के बीज मंत्रों का मनन करना चाहिए।
सूर्य का प्रकाश जब प्रातःकाल हमारी त्वचा पर पड़ता है तब वह शरीर में स्थित मेद धातु को पुष्ट करता है और आलस्य का निवारण करता है। इस मास में की गई सूर्योपासना से कुंडली का प्रथम भाव अर्थात आरोग्य भाव और पंचम भाव अर्थात विवेक भाव दोनों अत्यंत बलवान हो जाते हैं।
अगहन मास केवल कैलेंडर का एक महीना नहीं है बल्कि यह मनुष्य को प्रकृति की लय के साथ पुनः जुड़ने का ईश्वरीय आमंत्रण है। आधुनिक युग की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य ने कृत्रिम सुख साधनों के फेर में प्रकृति के सनातन नियमों का उल्लंघन करना आरंभ कर दिया है। असमय भोजन, देर रात तक जागना और बासी कृत्रिम आहार का सेवन ही समस्त असाध्य रोगों की मूल जड़ है।
अगहन मास हमें स्मरण कराता है कि जब बाह्य जगत में शीतलता बढ़ रही हो तब हमें अपने भीतर की दिव्य अग्नि को ज्ञान, संयम और सात्विक पोषण से प्रज्वलित रखना चाहिए। हमारा यह भौतिक शरीर ही वह पावन मंदिर है जिसके भीतर परब्रह्म परमात्मा का वास है। शरीर को स्वस्थ और निरोगी रखना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि की प्रथम सीढ़ी है।
जब हम शुद्ध तिल, गुड़ और नए अन्न का सेवन करते हुए अपने शरीर को अभ्यंग से पुष्ट करते हैं और मन को ईश्वर चिंतन में लगाते हैं तब हमारी चेतना समस्त विकारों से मुक्त हो जाती है। प्रकृति के इस पावन परिवर्तन का आदर करें, अपनी दिनचर्या को वेदोक्त मर्यादा में ढालें और अगहन के इस अमृत काल का उपयोग अपनी काया को वज्र के समान सुदृढ़ बनाने में करें।
अगहन में जठराग्नि तीव्र क्यों होती है? बाहरी वातावरण में अत्यधिक शीतलता होने के कारण त्वचा के रोमछिद्र बंद हो जाते हैं जिससे आंतरिक ऊष्मा उदर में एकत्र होकर जठराग्नि को प्रचंड बना देती है।
इस माह जीरा खाना वर्जित क्यों है? अगहन में जीरे का सेवन इसलिए वर्जित है क्योंकि जीरा रूखा और वातवर्धक होता है जो शीत ऋतु में आंतों की स्निग्धता समाप्त कर वात दोष को भड़का सकता है।
अभ्यंग के लिए कौन सा तेल उत्तम है? अगहन मास में संपूर्ण शरीर की मालिश के लिए शुद्ध और हल्का गुनगुना तिल का तेल सर्वोत्तम माना गया है क्योंकि यह उष्ण और परम वात नाशक होता है।
अगहन मास का मुख्य आहार क्या है? इस मास में नया चावल, बाजरा, गुड़, तिल, शुद्ध गाय का घी, मेथी के लड्डू, सोंठ और बादाम जैसे स्निग्ध और ऊर्जावान खाद्य पदार्थ मुख्य आहार हैं।
इस ऋतु में कौन सा दोष बढ़ता है? अगहन और हेमंत ऋतु में ठंडी और शुष्क वायु के प्रभाव से शरीर में मुख्य रूप से वात दोष के प्रकुपित होने की आशंका सर्वाधिक रहती है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ