By अपर्णा पाटनी
मौसम का बदलाव गिरता तापमान नई धान की कटाई और आयुर्वेद

सनातन पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास का आरंभ होते ही वातावरण में शरद ऋतु की विदाई और हेमंत ऋतु की मधुर शीतल बयार का संचार होने लगता है। वैदिक संहिताओं में इस संधिकाल को केवल प्रकृति का बाह्य परिवर्तन नहीं माना गया है बल्कि यह मानव देह और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के मध्य संतुलन स्थापित करने की अत्यंत संवेदनशील वेला है। जैसे ही उत्तर दिशा से आने वाली शीतल वायु पृथ्वी का स्पर्श करती है मनुष्य के शरीर की आंतरिक जठराग्नि प्रदीप्त होने लगती है। यदि इस समय उचित ऋतुचर्या और सात्विक साधना का आश्रय न लिया जाए तो प्राकृतिक ऊर्जा का संतुलन बिगड़ सकता है। इस पावन कालखंड में शरीर और आत्मा दोनों को स्वस्थ रखने के लिए कुछ निश्चित दैनिक नियमों और शास्त्रोक्त विधानों का परिपालन परम आवश्यक माना गया है।
| साधना और दिनचर्या अंग | वैदिक विधान और ऋतुचर्या निर्देश |
|---|---|
| ऋतु काल एवं पंचांग | चांद्र मार्गशीर्ष मास, हेमंत ऋतु का प्रारंभिक चरण, नवंबर और दिसंबर का संधिकाल |
| अधिष्ठाता देव शक्तियां | भगवान भुवन भास्कर सूर्य, योगेश्वर श्रीकृष्ण और आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि |
| दैनिक मुख्य अनुष्ठान | प्रातःकाल तैल मालिश, सूर्य नमस्कार, तांबे के पात्र से अर्घ्य और शंख पूजन |
| अनुशंसित आहार रस | मधुर, अम्ल और लवण रस प्रधान, शुद्ध गोघृत, तिल, नया गुड़ और नवीन अन्न |
| त्याज्य प्रवृत्तियां | शीतल पेय, बासी भोजन, दिन में शयन, रात्रि जागरण और कटु वचनों का प्रयोग |
| आध्यात्मिक और दैहिक फल | त्रिदोष संतुलन, पाचन अग्नि की दृढ़ता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और मानसिक शांति |
इस ऋतु में प्रातःकाल की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में जागने के साथ होनी चाहिए। जब रात्रि का अंतिम प्रहर शेष हो तब शैया का त्याग कर अपने अंतःकरण में भगवान श्रीकृष्ण और सूर्य नारायण का स्मरण करें। इसके पश्चात गुनगुने जल से आचमन कर नित्य कर्मों से निवृत्त हों।
इस संतुलित वैदिक दिनचर्या का पालन करने से हेमंत ऋतु की भीषण ठंड भी शरीर को हानि नहीं पहुंचा पाती। यह नियम मनुष्य को प्रकृति के साथ लयबद्ध होकर जीने की वह विद्या सिखाते हैं जो दीर्घायु और आंतरिक तेज प्रदान करती है।
जैसे ही कार्तिक मास की पूर्णिमा समाप्त होती है वैसे ही प्रकृति अपनी पुरानी चादर को समेटकर एक सर्वथा नवीन श्रृंगार धारण करने लगती है। उत्तर भारत के विशाल मैदानों से लेकर मध्य भारत के पठारी क्षेत्रों तक गुलाबी ठंड धीरे धीरे सघन शीत लहर में परिवर्तित होने लगती है। सुबह के समय खेतों और सरोवरों के ऊपर मंडराता हुआ श्वेत कुहासा और दूर्वा के तिनकों पर चमकती ओस की बूंदें ऐसी प्रतीत होती हैं मानो प्रकृति ने मोतियों का हार पहन रखा हो। सूर्य की प्रखर किरणें अब ग्रीष्म की भांति झुलसाती नहीं हैं बल्कि उनकी कोमल स्वर्णिम आभा शरीर और मन को एक अवर्णनीय सुख प्रदान करती है।
दिनों का आकार छोटा होने लगता है और रातें लंबी तथा शांत हो जाती हैं। यह समय भारत के कृषि प्रधान जनजीवन के लिए किसी महामहोत्सव से कम नहीं होता। खेतों में लहलहाती हुई धान की सुनहरी बालियां पककर झुक जाती हैं। ग्रामीण अंचल में नई फसल के स्वागत के लिए नवान्न पर्व का उल्लास छा जाता है। जब किसान अपने कठोर परिश्रम से उपजाई गई नई धान की कटाई आरंभ करता है तब संपूर्ण वातावरण एक अलौकिक सुगंध से भर उठता है।
सनातन परंपरा में यह नियम है कि खेत से आई नई फसल का पहला भोग देवताओं और पितरों को अर्पित किया जाता है। अगहन मास के इस संधिकाल में गृहणियां नए चावल को कूटकर उसका पहला चूड़ा, खीर और पिठ्ठा तैयार करती हैं। इसे सबसे पहले भगवान शालिग्राम, कुलदेवता और अग्नि देव को समर्पित किया जाता है। नवीन अन्न का यह समर्पण मनुष्य के भीतर इस कृतज्ञता भाव को जीवित रखता है कि संपूर्ण पोषण का अंतिम स्रोत परमात्मा ही है। चारों ओर फैली यह हरियाली और खलिहानों में बिखरा स्वर्णिम अन्न जनमानस के हृदय में आशा, संपन्नता और उल्लास का नया बीज बो देता है।
आयुर्वेद के आदि ग्रंथ चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में हेमंत ऋतु का अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक विश्लेषण प्राप्त होता है। महर्षि चरक के अनुसार जब बाह्य वातावरण में शीतलता का साम्राज्य स्थापित होता है तब मनुष्य के शरीर की स्वाभाविक ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती। पर्यावरण की ठंडक के कारण शरीर के रोम छिद्र संकुचित हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप देह की आंतरिक अग्नि भीतर ही रुककर उदर में केंद्रित हो जाती है और हमारी जठराग्नि अत्यंत प्रदीप्त और बलवती हो उठती है।
यह अवस्था शरीर के लिए एक वरदान भी है और असावधानी बरतने पर संकट का कारण भी बन सकती है। जब पाचन अग्नि इतनी तीव्र होती है तब वह भारी से भारी और गरिष्ठ भोजन को भी अत्यंत सुगमता से पचाने में समर्थ होती है। किंतु यदि इस समय जठराग्नि को समुचित आहार रूपी ईंधन न दिया जाए तो वही प्रज्वलित अग्नि शरीर के रसों और धातुओं का भक्षण करने लगती है जिससे देह में रुक्षता और दुर्बलता उत्पन्न हो जाती है।
| दोष तत्व | हेमंत ऋतु में दोष की स्थिति | शारीरिक लक्षण | निवारण हेतु उत्तम उपाय |
|---|---|---|---|
| वात | प्राकृतिक रूप से प्रकुपित होने की संभावना | त्वचा में सूखापन, जोड़ों में जकड़न और मांसपेशियों में पीड़ा | अभ्यंग अर्थात तैल मालिश, तिल, बादाम और गुनगुना जल |
| पित्त | शांत और संतुलित अवस्था | पाचन शक्ति का प्रदीप्त होना और भूख का स्वाभाविक बढ़ना | मधुर और स्निग्ध आहार, गोदुग्ध, घृत और नवीन अन्न |
| कफ | शरीर के भीतर संचित होने की प्रारंभिक स्थिति | आलस्य, कफ का हल्का जमाव और भारीपन का अनुभव | सोंठ, पिप्पली, तुलसी का काढ़ा और नियमित व्यायाम |
इस मौसम में वात दोष का प्रभाव सबसे अधिक देखने को मिलता है। ठंडी और शुष्क वायु शरीर की त्वचा, हड्डियों और स्नायु तंत्र में रुक्षता बढ़ा देती है। इसी कारण शास्त्रों में इस समय रूखे और ठंडे भोजन का सर्वथा निषेध किया गया है।
जब मनुष्य आयुर्वेद के इन मूलभूत सिद्धांतों को समझकर अपने खान पान का चयन करता है तब हेमंत ऋतु व्याधियों का काल न बनकर संपूर्ण वर्ष के लिए बल और ऊर्जा संचय करने का अमृत काल बन जाती है।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से मार्गशीर्ष मास का समय कालचक्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस अवधि में जगत के प्रत्यक्ष नेत्र भगवान सूर्य अपनी दक्षिणायन यात्रा के अंतिम चरण में गतिमान होते हैं। सूर्य का झुकाव दक्षिणी गोलार्ध की ओर अधिक होने के कारण पृथ्वी के उत्तरी भाग में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं जिसके कारण तापमान में तीव्र गिरावट दर्ज की जाती है।
मार्गशीर्ष मास के प्रथम पखवाड़े में सूर्य देव मंगल की जल तत्व प्रधान राशि वृश्चिक में गोचर करते हैं। मंगल की ऊर्जा और जल तत्व का यह संगम पृथ्वी के वायुमंडल में एक विशेष प्रकार की नमी और स्निग्धता घोल देता है। इसके उपरांत जब सूर्य देव देवगुरु बृहस्पति की अग्नि तत्व प्रधान राशि धनु में प्रवेश करते हैं तब धनु संक्रांति घटित होती है और खरमास का आरंभ होता है।
| ज्योतिषीय घटक | खगोलीय स्थिति | मानव जीवन और प्रकृति पर प्रभाव |
|---|---|---|
| सूर्य गोचर | वृश्चिक से धनु राशि की ओर गमन | सांसारिक गतिविधियों में ठहराव और आध्यात्मिक चेतना का तीव्र जागरण |
| चंद्र स्थिति | मृगशिरा नक्षत्र में पूर्ण चंद्रमा का वास | चित्त की चंचलता का शमन और आत्मिक अनुसंधान की प्रवृत्ति |
| गुरु का प्रभाव | धनु राशि के माध्यम से ज्ञान और सात्विकता का विस्तार | धार्मिक ग्रंथों के स्वाध्याय और मंत्र जप में असीम सफलता |
| मौसमी प्रकृति | हेमंत ऋतु का पूर्ण यौवन काल | भौतिक वासनाओं का शमन और अंतर्मुखी साधना के लिए अनुकूल वातावरण |
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा और गुरु को ज्ञान का अधिपति माना गया है। जब सूर्य अपने गुरु बृहस्पति के घर में विश्राम करते हैं तब सांसारिक ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने वाले कर्म जैसे विवाह, गृह प्रवेश और बड़े व्यापारिक उत्सव कुछ समय के लिए रोक दिए जाते हैं। हमारे मनीषियों ने यह व्यवस्था इसलिए की ताकि मनुष्य कुछ समय के लिए बाह्य आडंबरों से मुक्त होकर अपनी अंतरात्मा की ओर देख सके।
इस मास की पूर्णिमा का संबंध मृगशिरा नक्षत्र से होता है जिसके स्वामी मंगल और देवता सोम हैं। यह ग्रह योग मानव मन के भीतर छिपे असंतोष को शांत कर उसे ईश्वर भक्ति की ओर प्रेरित करता है। जिनकी जन्म पत्रिका में सूर्य अथवा गुरु कमजोर स्थिति में होते हैं उनके लिए हेमंत ऋतु में सूर्य नमस्कार और गुरु मंत्रों का जप करना एक अचूक उपाय बन जाता है।
हेमंत ऋतु केवल पत्तों के गिरने और ठंड के बढ़ने का नाम नहीं है अपितु यह प्रकृति के गहन आत्ममंथन का पावन समय है। जिस प्रकार एक तपस्वी अपनी इंद्रियों को समेटकर ध्यान की गुफा में प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार संपूर्ण प्रकृति भी इस मौसम में अपनी ऊर्जा को जड़ों में संचित करने लगती है। वृक्ष अपने अनावश्यक भार को त्यागकर मौन साधना में लीन हो जाते हैं ताकि वसंत के आने पर वे नए पल्लवों और पुष्पों से खिल सकें।
मनुष्य जीवन का भी यही शाश्वत सत्य है। अगहन मास और हेमंत ऋतु की यह शीतल शांति हमें यह संदेश देती है कि जीवन में निरंतर दौड़ते रहना ही प्रगति नहीं है। कभी कभी ठहरना, अपने भीतर झांकना और अपनी जड़ों को सींचना भी अत्यंत आवश्यक होता है। जब चारों ओर कोहरे की चादर बिछी हो और सूर्य की सुनहरी किरणें उस कुहासे को चीरकर धरती पर उतरती हैं तब वह दृश्य इस बात का साक्षात प्रमाण बन जाता है कि अज्ञान का अंधकार चाहे कितना भी घना क्यों न हो, ज्ञान का एक नन्हा सा प्रकाश उसे भेदने की पूर्ण सामर्थ्य रखता है। इस पावन ऋतु के साथ अपने कदम मिलाकर चलना और ईश्वर द्वारा रची गई इस प्रकृति के प्रत्येक कण का आदर करना ही मनुष्य के जीवन को पूर्णता और आनंद प्रदान करता है।
अगहन मास में हेमंत ऋतु का मानव शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? हेमंत ऋतु में बाह्य ठंडक के कारण शरीर की जठराग्नि अत्यंत तीव्र हो जाती है जो भारी भोजन को भी पचाने में सक्षम होती है और उचित आहार से शरीर बलवान बनता है।
हेमंत ऋतु में कौन से तीन दोष सबसे अधिक प्रभावित होते हैं? इस ऋतु में शुष्क ठंड के कारण वात दोष के प्रकुपित होने की आशंका रहती है जबकि जठराग्नि के कारण पित्त शांत रहता है और कफ का संचय आरंभ होता है।
नई धान की कटाई के बाद नवान्न पर्व क्यों मनाया जाता है? सनातन परंपरा में नए अन्न का पहला भोग भगवान और पितरों को अर्पित कर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है जिसके बाद ही परिवार उस अन्न को ग्रहण करता है।
हेमंत ऋतु में शरीर की मालिश के लिए कौन सा तेल सर्वोत्तम माना गया है? आयुर्वेद के अनुसार हेमंत ऋतु में वात शमन और त्वचा की कोमलता बनाए रखने के लिए शुद्ध तिल का तेल अथवा सरसों का तेल सर्वोत्तम होता है।
अगहन मास के मौसम में किस प्रकार का भोजन करना चाहिए? इस मौसम में स्निग्ध और पौष्टिक भोजन जैसे शुद्ध देशी घी, नया गुड़, तिल, बाजरा, सूखे मेवे, मूंग की दाल और पाचक मसालों से युक्त गर्म आहार लेना चाहिए।
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