By पं. नरेंद्र शर्मा
दक्षिणावर्ती शंख साधना से दरिद्रता नाश और वास्तु दोष निवारण

सनातन धर्म की पावन परंपरा में मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास को साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना गया है। इस परम पवित्र महीने में शंख की विधिवत प्रतिष्ठा, नित्य पूजन और उसकी दिव्य ध्वनि का श्रवण समस्त प्रकार की दरिद्रता का समूल नाश करने वाला माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि अगहन मास में शंख पूजन का प्रभाव सहस्त्र गुना बढ़ जाता है क्योंकि यह समय भगवान नारायण और माता महालक्ष्मी के अनुग्रह को सहजता से आकर्षित करने का श्रेष्ठ कालखंड होता है। जब किसी जातक के जीवन में धन का अभाव, व्यापार में निरंतर अवरोध अथवा वास्तु दोष के कारण मानसिक अशांति बनी रहती है तब शंख साधना परम कल्याणकारी सिद्ध होती है। इस पावन अनुष्ठान को संपन्न करने के लिए शुभ मुहूर्त, प्रामाणिक पूजन सामग्री और शास्त्रसम्मत नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
| साधना और अभिषेक अंग | वैदिक निर्देश और शुभ विधान |
|---|---|
| पावन काल और माह | संपूर्ण मार्गशीर्ष मास विशेषकर शुक्ल पक्ष की शुभ तिथियां |
| श्रेष्ठ दिन और वार | प्रत्येक गुरुवार और शुक्रवार तथा एकादशी और पूर्णिमा तिथि |
| पूजन हेतु श्रेष्ठ समय | प्रातः सूर्योदय की पावन वेला अथवा संध्या का गोधूलि काल |
| अधिष्ठाता देव शक्तियां | भगवान श्रीहरि विष्णु, माता महालक्ष्मी और शंख देवता |
| सिद्ध पूजन सामग्री | दक्षिणावर्ती शंख, कच्चा गोदुग्ध, केसर, गंगाजल, तुलसी और श्वेत चंदन |
| आध्यात्मिक और भौतिक फल | दरिद्रता का समूल नाश, वास्तु दोष निवारण, व्यापार वृद्धि और अक्षय लक्ष्मी |
इस साधना को प्रारंभ करने के लिए गुरुवार अथवा शुक्रवार के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होना चाहिए। स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण कर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। पूजा वेदी पर एक शुद्ध ताम्र अथवा रजत की चौकी स्थापित करें और उस पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं।
इस पावन विधि का अगहन मास में नियमित पालन करने से घर के भीतर संचित समस्त नकारात्मक तरंगें तत्काल विलीन हो जाती हैं। परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम बढ़ता है और आर्थिक अवरोध समाप्त होने लगते हैं।
पौराणिक काल में जब देवराज इंद्र के प्रमाद के कारण तीनों लोकों की श्री और ऐश्वर्य क्षीरसागर में विलीन हो गए थे तब सृष्टि के संरक्षण हेतु देवताओं और दानवों ने मिलकर मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकी को नेती बनाकर समुद्र मंथन का महान कार्य आरंभ किया था। उस अलौकिक मंथन से चौदह दुर्लभ दिव्य रत्न प्रकट हुए थे। उन चौदह रत्नों में साक्षात धन और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी माता महालक्ष्मी प्रकट हुईं और उसी क्षीरसागर के गर्भ से दिव्य शंख का भी प्राकट्य हुआ।
चूंकि माता लक्ष्मी और शंख दोनों का जन्म एक ही समुद्र के गर्भ से हुआ है इसलिए वैदिक संहिताओं में शंख को माता लक्ष्मी का सगा भाई अर्थात सहोदर स्वीकार किया गया है। यही कारण है कि जहां शंख की उपस्थिति होती है और जहां शंख का विधिवत आदर होता है वहां माता लक्ष्मी बिना बुलाए ही स्थायी रूप से वास करती हैं। जिस प्रकार एक बहन अपने भाई के घर में प्रसन्नतापूर्वक निवास करती है उसी प्रकार माता महालक्ष्मी शंख की उपस्थिति वाले स्थान पर अपनी पूर्ण कृपा बरसाती हैं।
भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन से उत्पन्न इस परम तेजस्वी रत्न को अत्यंत आदरपूर्वक अपने हाथों में धारण किया। भगवान श्रीहरि के चार आयुधों में शंख का स्थान सर्वोच्च है। उनके हाथ में सुशोभित शंख का नाम पंचजन्य है जिसकी ध्वनि अधर्मियों के हृदय को दहला देती है और धर्मनिष्ठ आत्माओं को निर्भयता प्रदान करती है। महाभारत के युद्ध में जब भगवान श्रीकृष्ण ने पंचजन्य शंख का नाद किया था तब संपूर्ण दिशाएं कंपित हो उठी थीं और सत्य की विजय का शंखनाद हुआ था।
सृष्टि के निर्माण की मूल ध्वनि ओंकार मानी जाती है। शंख की प्राकृतिक बनावट और उसके भीतर से निकलने वाली गूंज साक्षात ओंकार का ही भौतिक नाद है। इसलिए जो मनुष्य अगहन मास में शंख की सेवा करता है वह अप्रत्यक्ष रूप से संपूर्ण सृष्टि की मूल चेतना और माता लक्ष्मी के परम प्रिय सहोदर का पूजन करता है।
शंख मुख्यतः दो प्रकार के पाए जाते हैं जिन्हें वामावर्ती और दक्षिणावर्ती कहा जाता है। जिस शंख का मुख बाईं ओर खुलता है वह वामावर्ती कहलाता है और इसका उपयोग मुख्य रूप से ध्वनि करने अथवा बजाने के लिए किया जाता है। इसके विपरीत जिस शंख का मुख दाईं ओर खुलता है उसे दक्षिणावर्ती शंख कहा जाता है। यह शंख अत्यंत दुर्लभ और दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण माना जाता है। तंत्र शास्त्र और वास्तु विज्ञान में दक्षिणावर्ती शंख को साक्षात कुबेर और महालक्ष्मी का कोष माना गया है। इसे कभी बजाया नहीं जाता बल्कि इसे केवल पूजा वेदी पर जल भरकर स्थापित किया जाता है।
आधुनिक वास्तु शास्त्र के अनुसार जिस भवन में ऊर्जा का प्रवाह बाधित हो जाता है अथवा जहां उत्तर पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण दूषित होता है वहां वास्तु दोष उत्पन्न हो जाते हैं। वास्तु दोष के कारण घर में बिना कारण कलह, सदस्यों का अस्वस्थ रहना, धन का अनावश्यक व्यय और मानसिक तनाव बना रहता है।
वास्तु शास्त्र यह स्पष्ट करता है कि शंख की बनावट ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आकर्षित करने वाले एक विशेष चक्रव्यूह जैसी होती है। जब इसमें जल भरा जाता है तो वह जल ब्रह्मांड की सकारात्मक रश्मियों को अपने भीतर सोख लेता है। वही जल जब छिड़का जाता है तब वह संपूर्ण भवन के ऊर्जा क्षेत्र को शुद्ध कर एक दिव्य सुरक्षा कवच निर्मित कर देता है।
व्यापार और आजीविका के क्षेत्र में जब मनुष्य को कठोर परिश्रम के उपरांत भी उचित प्रतिफल नहीं मिलता अथवा दिया गया धन लंबे समय तक फंस जाता है तब अगहन मास में शंख द्वारा किया गया विशेष अभिषेक अचूक उपाय सिद्ध होता है। अगहन मास के किसी भी शुक्ल पक्ष के गुरुवार अथवा शुक्रवार को यह प्रयोग विशेष रूप से फलित होता है।
इस अनुष्ठान के लिए प्रातःकाल स्नानादि के पश्चात एक दक्षिणावर्ती शंख में शुद्ध कच्चा गाय का दूध भरें और उसमें दो चुटकी केसर मिला दें। इसके उपरांत भगवान शालिग्राम अथवा भगवान विष्णु और माता महालक्ष्मी की संयुक्त प्रतिमा को एक तांबे के पात्र में रखें। उस शंख के दूध से अत्यंत धीमी धार बनाते हुए भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का अभिषेक करें।
| अभिषेक का क्रम | वैदिक मंत्र और मानसिक भावना | फल की प्राप्ति |
|---|---|---|
| प्रथम चरण | ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्ध लक्ष्म्यै नमः | मानसिक दारिद्र्य का नाश और ऋण मुक्ति |
| द्वितीय चरण | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का सस्वर उच्चारण | व्यापारिक प्रतिष्ठा और रुका हुआ धन वापस आना |
| तृतीय चरण | श्री सूक्त के सोलह पावन ऋचाओं का पाठ | तिजोरी में स्थायी धन बरकत और ऐश्वर्य का वास |
| चतुर्थ चरण | शुद्ध गंगाजल से भगवान का पुनः स्नान | चित्त की शांति और समस्त ग्रह दोषों का शमन |
अभिषेक संपन्न होने के पश्चात उस दूध को किसी तुलसी के पौधे में अथवा पीपल की जड़ में अर्पित कर दें। इसके उपरांत शंख को स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें और उसमें एक चांदी का सिक्का अथवा एक गोमती चक्र रखकर उसे पीले रेशमी वस्त्र में लपेट लें। इस अभिमंत्रित शंख को अपने व्यापारिक गल्ले, कार्यालय की तिजोरी अथवा घर की अलमारी में स्थापित कर दें।
यह साधना तिजोरी में धन के रिसाव को रोकती है और अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण स्थापित करती है। जो व्यापारी निरंतर घाटे का सामना कर रहे हैं उन्हें अगहन मास में अपने कार्यस्थल पर दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना अवश्य करनी चाहिए। यह उपाय व्यापार में ग्राहकों की वृद्धि करता है और अटके हुए भुगतानों को सुगम बनाता है।
वैदिक ज्योतिष के फलित सिद्धांतों में शंख का सीधा संबंध जल तत्व के अधिपति चंद्र देव और सुख समृद्धि के कारक शुक्र ग्रह से माना गया है। शंख समुद्र से उत्पन्न होता है और समुद्र का अधिपति चंद्रमा है। मानव शरीर में मन और रक्त का कारक चंद्रमा ही है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा नीच का होता है अथवा राहु और केतु के प्रभाव से ग्रहण दोष बना रहा होता है तब व्यक्ति मानसिक अवसाद, अज्ञात भय और निर्णय लेने में दुर्बलता का शिकार हो जाता है।
वहीं दूसरी ओर दैत्यगुरु शुक्र भौतिक सुख, वाहन, भवन, दांपत्य प्रेम और ऐश्वर्य के स्वामी हैं। कुंडली में शुक्र के पीड़ित होने पर व्यक्ति को जीवन भर आर्थिक तंगी और दांपत्य कलह झेलनी पड़ती है। अगहन मास में शंख पूजन इन दोनों प्रमुख ग्रहों को एक साथ बलवान बनाने का सबसे सरल और शक्तिशाली माध्यम है।
ज्योतिष शास्त्र यह प्रमाणित करता है कि शंख केवल एक पूजा का उपकरण नहीं है बल्कि वह नवग्रहों की ऊर्जा को संतुलित करने वाला एक प्राकृतिक खगोलीय यंत्र है। जो जातक प्रतिदिन शंख का दर्शन और नमन करता है उसके जीवन से ग्रहों का अशुभ प्रभाव स्वतः क्षीण होने लगता है।
अगहन मास में शंख पूजन का यह आध्यात्मिक रहस्य हमें सिखाता है कि जीवन में बाह्य धन का अर्जन तब तक सार्थक नहीं होता जब तक अंतःकरण में शांति और सात्विकता न हो। शंख की बनावट हमें यह संदेश देती है कि जिस प्रकार शंख बाहर से कठोर होता है किंतु भीतर से अत्यंत कोमल और जल को धारण करने वाला होता है उसी प्रकार मनुष्य को भी बाहर से अपने कर्तव्य में दृढ़ और भीतर से करुणा से परिपूर्ण होना चाहिए।
शंख से निकलने वाली गंभीर ध्वनि मनुष्य के चित्त को अंतर्मुखी बनाती है। जब अगहन की शांत प्रातःवेला में शंख की गूंज वातावरण में तैरती है तब वह समस्त संशयों और दुखों को मिटाकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ देती है। इस पावन महीने में दक्षिणावर्ती शंख को अपने घर में स्थापित कर उसकी सेवा करना साक्षात अक्षय लक्ष्मी को अपने द्वार पर आमंत्रित करना है। जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर श्रद्धा भाव से शंख देवता का वंदन करता है तब उसके घर से दरिद्रता का अंधकार सदा के लिए विदा हो जाता है और जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का पावन प्रकाश जगमगा उठता है।
अगहन मास में किस शंख की पूजा सर्वाधिक फलदायी होती है? अगहन मास में दक्षिणावर्ती शंख की पूजा सर्वाधिक फलदायी मानी जाती है क्योंकि इसे माता लक्ष्मी का सगा भाई और धन का साक्षात प्रतीक माना गया है।
शंख को माता लक्ष्मी का भाई क्यों माना जाता है? पौराणिक समुद्र मंथन के समय माता लक्ष्मी और शंख दोनों एक ही क्षीरसागर के गर्भ से प्रकट हुए थे इसलिए शंख को लक्ष्मी जी का सहोदर भाई कहा जाता है।
घर में शंख जल का छिड़काव करने से क्या लाभ होता है? शंख में भरे पवित्र जल का घर में छिड़काव करने से समस्त प्रकार के वास्तु दोष, नकारात्मक ऊर्जा, तंत्र बाधा और पारिवारिक कलह तत्काल शांत हो जाते हैं।
रुका हुआ धन वापस पाने के लिए शंख से कौन सा उपाय करें? अगहन मास के गुरुवार को दक्षिणावर्ती शंख में कच्चा दूध और केसर भरकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का अभिषेक करने से रुका हुआ धन वापस लौटता है।
क्या दक्षिणावर्ती शंख को बजाया जा सकता है? नहीं, दक्षिणावर्ती शंख को कभी बजाया नहीं जाता बल्कि इसे केवल पूजा वेदी पर शुद्ध जल भरकर स्थापित किया जाता है जबकि वामावर्ती शंख बजाने के लिए होता है।
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