By पं. नरेंद्र शर्मा
अष्टांग हृदयम् विधि, वात रोग शमन और शनि शांति टोटके

सनातन परंपरा और वैदिक ऋतुचर्या में अगहन अर्थात मार्गशीर्ष मास का स्थान अत्यंत विशिष्ट माना गया है। हेमंत ऋतु के इस कालखंड में वातावरण में शीतलता और रूखापन तेजी से बढ़ता है, जिसके कारण मानव शरीर में वात दोष का असंतुलन स्वाभाविक रूप से होने लगता है। आयुर्वेद के महान ग्रंथ अष्टांग हृदयम में इस ऋतु के दौरान नित्य अभ्यंग अर्थात तेल मालिश को अनिवार्य दिनचर्या के रूप में रेखांकित किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठानिक एवं चिकित्सीय विधान |
|---|---|
| नियम | विधान |
| सर्वोत्तम काल | प्रातःकाल सूर्योदय के तुरंत बाद की कोमल धूप |
| श्रेष्ठ मालिश तेल | शुद्ध कृष्ण तिल का तेल अथवा सरसों का तेल |
| प्रमुख अधिष्ठाता ग्रह | कर्मफलदाता शनि देव और स्नायु कारक बुध |
| उपचारात्मक दिशा | हृदय की ओर गति करते हुए ऊपर से नीचे व जोड़ों पर वृत्ताकार |
| उबटन सामग्री | बेसन, हल्दी, चंदन, जौ का आटा और कच्चा दूध |
| स्नान का माध्यम | औषधीय जड़ी बूटियों से युक्त सुखोष्ण गुनगुना जल |
| प्राथमिक स्वास्थ्य फल | वात व्याधियों का शमन, अस्थि संवर्धन और ओज की वृद्धि |
अभ्यंग आरंभ करने से पूर्व तेल को किसी कांस्य अथवा ताम्र पात्र में रखकर हल्का गुनगुना कर लेना चाहिए। सबसे पहले सिर के मध्य भाग में स्थित सहस्रार चक्र पर तेल की कुछ बूंदें रखकर हल्के हाथों से मालिश करनी चाहिए। इसके पश्चात कानों के पीछे, पैरों के तलवों और हाथों की हथेलियों पर तेल का मर्दन करना अनिवार्य होता है। शरीर के लंबे अंगों जैसे हाथ और पैरों पर सीधी रेखा में और घुटनों, कंधों व कोहनियों के जोड़ों पर वृत्ताकार दिशा में मालिश करनी चाहिए। मालिश के उपरांत कम से कम पंद्रह से बीस मिनट तक प्रातःकालीन धूप का सेवन करना चाहिए ताकि तेल त्वचा के सातों स्तरों में गहराई तक समाहित हो सके।
महर्षि वाग्भट द्वारा विरचित अष्टांग हृदयम में स्पष्ट निर्देश मिलता है कि जो मनुष्य शीत ऋतु में नियमित रूप से अभ्यंग का आश्रय लेता है, जरा अर्थात बुढ़ापा और दुर्बलता उसके शरीर को शीघ्र आक्रांत नहीं कर सकती। मार्गशीर्ष की सूखी ठंड त्वचा की प्राकृतिक नमी को सोख लेती है, जिससे स्नायु तंत्र में खिंचाव और जोड़ों में कड़ापन आने लगता है।
तिल का तेल प्रकृति से अत्यंत सूक्ष्म, उष्ण और त्वचा में तत्काल प्रविष्ट होने वाला माना जाता है। जब इस तेल से देह की मालिश की जाती है, तो यह त्वचा के नीचे स्थित सूक्ष्म रक्त नलिकाओं को सक्रिय कर देता है। यह प्रक्रिया शरीर के भीतर संचित विषैले आम तत्व को बाहर निकालने में सहायता करती है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में अस्सी प्रकार के वात रोग माने गए हैं, जिनमें गठिया, साइटिका, अनिद्रा और मांसपेशियों का तनाव प्रमुख हैं। नित्य तेल मालिश इन समस्त व्याधियों की जड़ों को काट देती है और मांसपेशियों को वज्र के समान सुदृढ़ता प्रदान करती है।
वैदिक ज्योतिष में त्वचा का आधिपत्य बुध ग्रह के पास है, जबकि स्नायु तंत्र, अस्थि मज्जा का आधार, घुटने और संपूर्ण शरीर की नसें शनि देव के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। तेल स्वयं शनि देव का साक्षात द्रव्य माना गया है। जब कोई व्यक्ति मार्गशीर्ष मास में तेल से अपने शरीर का मर्दन करता है, तो वह वास्तव में अपनी कुंडली के दो अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रहों को एक साथ साध रहा होता है।
शनि देव को श्रम और अनुशासन का देवता माना जाता है। जब मनुष्य अपने शरीर की थकान को मिटाने के लिए यह सात्विक उपाय करता है, तो शनि देव प्रसन्न होकर जीवन में आने वाले अप्रत्याशित अवरोधों को दूर कर देते हैं।
अभ्यंग के तुरंत बाद केवल साबुन से स्नान करना शास्त्रों और आयुर्वेद दोनों में वर्जित बताया गया है। तेल मालिश के पश्चात त्वचा के रोमछिद्र खुल जाते हैं और उनमें स्थित मैल बाहर आने लगता है। इस अवस्था में प्राकृतिक उबटन का प्रयोग ही त्वचा को वास्तविक चमक और कांति प्रदान करता है।
उबटन तैयार करने के लिए चने का बेसन, जौ का आटा, शुद्ध कस्तूरी हल्दी, रक्त चंदन अथवा श्वेत चंदन का चूर्ण और थोड़ा सा कच्चा गोदुग्ध एक साथ मिलाना चाहिए। इस लेप को पूरे शरीर पर लगाकर हल्के हाथों से रगड़ना चाहिए। यह प्रक्रिया त्वचा के मृत तंतुओं को पूरी तरह हटा देती है और अतिरिक्त तेल को सोख लेती है। स्नानागार में प्रवेश करते समय कभी भी सिर पर सीधे अत्यधिक गर्म जल नहीं डालना चाहिए, क्योंकि इससे नेत्र ज्योति और केशों की जड़ों को भारी क्षति पहुँचती है। जल सदैव सुखोष्ण होना चाहिए और स्नान का शुभारंभ पैरों से करते हुए धीरे धीरे कंधों और अंत में सिर पर जल डालना चाहिए।
वैदिक शास्त्रों में मनुष्य के भौतिक शरीर के चारों ओर एक सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्र माना गया है, जिसे प्रभामंडल अथवा आभा मंडल कहा जाता है। जब शरीर वात रोगों से पीड़ित और अशुद्धियों से भरा होता है, तो यह ऊर्जा क्षेत्र क्षीण और मलिन हो जाता है, जिससे नकारात्मक शक्तियां और मानसिक तनाव मनुष्य को घेर लेते हैं।
अगहन मास में तिल के तेल की मालिश और उसके बाद औषधीय स्नान से सातों चक्रों की ऊर्जा संतुलित होने लगती है। तेल की स्नेहशीलता और धूप का सौर तेज मिलकर साधक के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा घेरा बना देते हैं। इससे व्यक्ति के चेहरे पर एक दिव्य तेज दिखाई देने लगता है, जिसे वैदिक भाषा में ओज कहा जाता है। जिस व्यक्ति का ओज बलवान होता है, वह जहां भी जाता है, वहां लोग उसकी ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं और उसके सभी कार्य बिना किसी बाधा के सिद्ध होने लगते हैं।
केवल बाह्य मालिश ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इसके साथ सात्विक और बलवर्धक खानपान का सामंजस्य भी अनिवार्य माना गया है। अगहन मास में मनुष्य की जठराग्नि अत्यंत तीव्र होती है, इसलिए इस समय शरीर को भारी और पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है।
जब आहार और विहार दोनों शास्त्रों के अनुकूल होते हैं तब मनुष्य शीत ऋतु के इस पावन काल का पूर्ण आध्यात्मिक और शारीरिक आनंद प्राप्त कर पाता है।
सनातन दर्शन कहता है कि यह मानव शरीर केवल हाड़ मांस का ढांचा नहीं है बल्कि साक्षात परमात्मा का जीवंत मंदिर है। इस मंदिर को स्वच्छ, स्वस्थ और विकार रहित रखना प्रत्येक साधक का पहला आध्यात्मिक कर्तव्य है। जब हम अगहन मास में अपने शरीर की तेल मालिश और स्नान द्वारा सेवा करते हैं, तो यह आत्म सम्मान और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक माध्यम बन जाता है।
एक स्वस्थ शरीर के भीतर ही एकाग्र मन और शुद्ध बुद्धि का वास संभव है। जब शरीर वात जनित पीड़ाओं से मुक्त रहता है, तभी साधक घंटों बैठकर ध्यान, जप और स्वाध्याय कर सकता है। मार्गशीर्ष मास की यह पारंपरिक दिनचर्या हमें सिखाती है कि भौतिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक चेतना एक दूसरे के पूरक हैं। अपनी देह का सत्कार करके हम वास्तव में उस परम चेतना की ही पूजा कर रहे होते हैं जो हमारे भीतर श्वास बनकर प्रवाहित हो रही है।
अगहन मास में मालिश के लिए कौन सा तेल सबसे उत्तम माना जाता है? अगहन मास में शरीर की मालिश के लिए काले तिल का तेल अथवा शुद्ध सरसों का तेल सबसे उत्तम और गुणकारी माना जाता है।
अभ्यंग करने के बाद कितनी देर बाद स्नान करना चाहिए? मालिश के बाद कम से कम पंद्रह से तीस मिनट तक धूप का सेवन करना चाहिए और उसके बाद उबटन लगाकर गुनगुने जल से स्नान करना चाहिए।
क्या तिल के तेल से मालिश करने से शनि देव की पीड़ा शांत होती है? हाँ, तिल का तेल शनि देव का प्रिय द्रव्य है, इससे मालिश करने पर शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और वात रोगों के कष्टों में भारी राहत मिलती है।
स्नान करते समय सिर पर गर्म जल क्यों नहीं डालना चाहिए? सिर पर अत्यधिक गर्म जल डालने से नेत्रों की ज्योति क्षीण होती है और बालों की जड़ें कमजोर होकर बाल झड़ने की समस्या उत्पन्न होती है।
पारंपरिक उबटन बनाने के लिए किन मुख्य सामग्रियों का उपयोग करना चाहिए? उबटन बनाने के लिए चने का बेसन, जौ का आटा, कस्तूरी हल्दी, चंदन चूर्ण और कच्चे दूध का उपयोग करना सर्वोत्तम माना जाता है।
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