अगहन में भागवत श्रवण से क्या मिलेगा?

By पं. नरेंद्र शर्मा

श्रीमद्भागवत पारायण, कलयुग के तापों से मुक्ति और पितृ मोक्ष

अगहन मास श्रीमद्भागवत कथा महत्व: पितृ मोक्ष और नियम

अगहन मास में श्रीमद्भागवत पारायण के शास्त्रीय नियम और संकल्प विधि

सनातन धर्म के विशाल वैदिक वांग्मय में मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास को भगवान श्री कृष्ण का साक्षात प्रत्यक्ष स्वरूप स्वीकार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय में विभूति योग का निरूपण करते हुए स्वयं योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि समस्त मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। जब संपूर्ण मास ही गोविंद का साकार विग्रह बन जाता है तब इस पावन कालखंड में भगवान के साक्षात वांग्मय स्वरूप श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रवण अथवा पारायण करना मनुष्य जाति के लिए परम कल्याणकारी बन जाता है। अगहन मास की शांत, गंभीर और शीतलता से परिपूर्ण बेला में भागवत कथा का आयोजन अथवा श्रवण करोड़ों अश्वमेध यज्ञों के अनुष्ठान से भी बढ़कर फल देने वाला माना गया है।

भागवत महापुराण कोई साधारण ग्रंथ नहीं है बल्कि यह वेद कल्पवृक्ष का पका हुआ अमृतमय फल है। महर्षि वेदव्यास ने जब चारों वेदों, उपनिषदों और महाभारत की रचना करने के पश्चात भी अपने अंतःकरण में एक अव्यक्त अशांति का अनुभव किया तब देवर्षि नारद की प्रेरणा से उन्होंने इस परम सात्विक ग्रंथ की रचना की थी। इस कथा का श्रवण जीव के संपूर्ण संचित पापों को उसी प्रकार भस्म कर देता है जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन के विशाल ढेर को क्षण भर में राख कर देती है।

अनुष्ठानिक आयाम शास्त्रीय विवरण
नियम विधान
श्रेष्ठ मास काल मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक
पारायण के मुख्य स्वरूप सात दिवसीय सप्ताहानुष्ठान अथवा संपूर्ण मास का नित्य स्वाध्याय
प्रधान कथा वेला प्रातःकाल का प्रथम पहर और सायंकाल का गोधूलि समय
व्यास पीठ का नियम पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख, पीत वस्त्र और शुद्ध आचरण
मूल फलश्रुति जन्म मरण के चक्र से मुक्ति, पितृ मोक्ष और कलयुग के तापों का शमन
अनिवार्य दैनिक अर्पण तुलसी मंजरी, शुद्ध गोघृत का अखंड दीपक, पंचामृत और माखन मिश्री
प्रधान बीज मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अथवा श्री कृष्णः शरणं मम

अगहन मास में श्रीमद्भागवत कथा का अनुष्ठान प्रारंभ करने से पूर्व साधक को अपनी देह और अंतःकरण की शुद्धि का दृढ़ संकल्प लेना अनिवार्य होता है। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में शीतल जल से स्नान करके स्वच्छ पीत वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा गृह में एक सुंदर काष्ठ की चौकी पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर श्रीमद्भागवत महापुराण की पोथी को विराजमान किया जाता है। ग्रंथ के सम्मुख तांबे अथवा पीतल के कलश की स्थापना करके उसमें गंगाजल, आम्र पल्लव, सुपारी और श्रीफल स्थापित किया जाता है। साधक हाथ में कुशा, अक्षत, पुष्प और जल लेकर यह संकल्प लेता है कि मैं कलयुग के समस्त मानसिक, दैहिक और भौतिक संतापों से मुक्ति पाने तथा अपने पितरों के उद्धार के निमित्त अगहन मास में इस परम पावन कथा का नियमपूर्वक श्रवण और पठन करूंगा।

कलयुग के त्रिविध ताप और श्रीमद्भागवत रूपी नौका का तात्विक रहस्य

संसार सागर में जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी तीन प्रकार के भयंकर तापों की अग्नि में निरंतर जलता रहता है। हमारे शास्त्रों में इन्हें आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक ताप कहा गया है। आध्यात्मिक ताप वे हैं जो मनुष्य के अपने शरीर और मन से उत्पन्न होते हैं, जैसे गंभीर रोग, मानसिक अवसाद, ईर्ष्या, भय और शोक। आधिभौतिक ताप वे कष्ट हैं जो अन्य प्राणियों, पशुओं, पिशाचों अथवा शत्रुओं द्वारा दिए जाते हैं। आधिदैविक ताप वे प्राकृतिक आपदाएं, ग्रह पीड़ाएं और भूत प्रेत बाधाएं हैं जो मनुष्य के नियंत्रण से सर्वथा परे होती हैं।

कलयुग के इस घोर अंधकारमय काल में जहां धर्म के तीन चरण सत्य, शौच और तप नष्ट हो चुके हैं और केवल दान रूपी एक चरण ही शेष बचा है, वहां मनुष्य के पास इन भयंकर तापों से बचने का कोई सरल मार्ग नहीं दिखाई देता। ऐसे विपत्ति काल में श्रीमद्भागवत महापुराण एक सुदृढ़ नौका की भांति कार्य करता है जो डूबते हुए जीवों को भवसागर के पार उतारने में पूर्णतः सक्षम है।

पद्म पुराण के उत्तर खंड में वर्णित श्रीमद्भागवत माहात्म्य में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जब कलियुग में भक्ति देवी अपने दो पुत्रों ज्ञान और वैराग्य के साथ वृद्धावस्था को प्राप्त होकर वृंदावन के तट पर अचेत पड़ी थीं तब सनकादिक ऋषियों ने उनके उद्धार के लिए इसी भागवत कथा का अनुष्ठान किया था। भागवत के श्लोकों की ध्वनि तरंगे जैसे ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के कानों में प्रविष्ट हुईं, वे तीनों तत्काल नवयुवक के समान बलशाली और तेजस्वी होकर नृत्य करने लगे। जो कथा साक्षात भक्ति और वैराग्य को नवजीवन दे सकती है, वह किसी साधारण मनुष्य के अंतःकरण के अंधकार को मिटा दे, इसमें कोई संशय नहीं है।

पद्म पुराण का अमर आख्यान और आधे श्लोक के नित्य पाठ की महिमा

वैदिक वांग्मय में पद्म पुराण का स्थान अत्यंत विशिष्ट माना गया है। इस पुराण में अगहन मास के दौरान भागवत स्वाध्याय की ऐसी विलक्षण महिमा गाई गई है जिसे सुनकर मन आश्चर्य से भर जाता है। पद्म पुराण में भगवान सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं कि हे देवि, मार्गशीर्ष के महीने में जो मनुष्य किसी विवशता के कारण संपूर्ण भागवत का पाठ नहीं कर सकता, वह यदि केवल एक श्लोक अथवा उस श्लोक के आधे भाग का भी प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, तो उसे संपूर्ण अठारह पुराणों के पाठ का फल एक ही क्षण में प्राप्त हो जाता है।

श्लोक का वह आधा भाग केवल अक्षरों का समूह नहीं होता बल्कि वह साक्षात भगवद् चेतना का अमिट बीजाक्षर होता है। जब साधक अगहन की शीतल संध्या में अपने घर के मंदिर में बैठकर उस श्लोक का उच्चारण करता है, तो उसके कंठ से निकलने वाली ध्वनि घर की समस्त नकारात्मक तरंगों को जलाकर भस्म कर देती है। जिस गृह में भागवत की पोथी खुली रहती है और उसके पन्नों का दर्शन नित्य होता है, उस घर को यमराज के दूत दूर से ही प्रणाम करके लौट जाते हैं। ऐसे भवन में माता लक्ष्मी अपने समस्त अष्ट ऐश्वर्यों के साथ सदा के लिए स्थिर हो जाती हैं और वहां कभी अन्न व धन की दरिद्रता पैर नहीं पसार सकती।

शीत ऋतु की अनुकूलता और एकाग्र मन का यौगिक विज्ञान

हमारे प्राचीन महर्षियों ने अगहन मास को भागवत कथा के अनुष्ठान के लिए यूं ही नहीं चुना था बल्कि इसके पीछे गहन यौगिक और मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ था। ग्रीष्म ऋतु में शरीर में अत्यधिक ऊष्मा और पसीने के कारण मन बार बार चंचल होकर जल और शीतलता की ओर भागता है। वर्षा ऋतु में जल भराव, कीचड़ और उमस के कारण वायु विकार बढ़ जाते हैं और बैठने में असुविधा होती है। परंतु मार्गशीर्ष मास का मौसम अत्यंत शांत, संतुलित, न अधिक शीतल और न अधिक उष्ण होता है।

इस ऋतु में मानव शरीर की जठराग्नि अत्यंत प्रबल रहती है, जिससे शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है और साधक घंटों तक एक ही आसन पर सुखपूर्वक बैठ सकता है। लंबी रातों और छोटे दिनों के इस संधिकाल में वातावरण की तामसिक हलचल पूरी तरह शांत हो जाती है। जब बाहर का कोलाहल थम जाता है, तो अंतःकरण की एकाग्रता अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाती है।

भागवत कथा कोई साधारण मनोरंजन नहीं है बल्कि यह गोपी गीत, भ्रमर गीत और रास पंचाध्यायी जैसे अत्यंत गूढ़ दार्शनिक रहस्यों से भरी हुई है। इन आध्यात्मिक रहस्यों को समझने के लिए जिस सूक्ष्म बुद्धि और शांत चित्त की आवश्यकता होती है, वह प्राकृतिक रूप से अगहन मास की जलवायु में स्वतः उपलब्ध हो जाती है। शीत ऋतु का यह शांत वातावरण साधक के मस्तिष्क में अल्फा तरंगों का संचार करता है, जिससे कथा का एक एक शब्द सीधे हृदय के मर्मस्थल तक उतर जाता है।

पितरों की परम मुक्ति और कुल के उद्धार का संपूर्ण शास्त्रीय विधान

सनातन संस्कृति में पितृ ऋण को सबसे बड़ा ऋण माना गया है। यदि परिवार के पूर्वज किसी अतृप्त वासना, अकाल मृत्यु अथवा पाप कर्म के कारण प्रेत योनि में भटक रहे हों, तो उस कुल में संतानों का विकास रुक जाता है, विवाह में अवांछित बाधाएं आती हैं और घर में निरंतर क्लेश बना रहता है। अगहन मास में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण पितरों के समस्त बंधनों को काटकर उन्हें सीधे वैकुंठ धाम पहुँचाने का सबसे अमोघ साधन माना गया है।

श्रीमद्भागवत के माहात्म्य में धुंधुकारी और गोकर्ण की अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक कथा आती है। धुंधुकारी एक अत्यंत क्रूर, पापी और महाभ्रष्ट जीव था, जिसकी अकाल मृत्यु के पश्चात वह एक भयानक पिशाच बन गया था। उसके परम ज्ञानी भाई गोकर्ण जी ने जब अगहन मास में उसके उद्धार के लिए सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया, तो वह प्रेत वायु रूप में आकर एक सात गांठों वाले बांस के भीतर प्रविष्ट हो गया। जैसे जैसे कथा का एक एक दिन बीतता गया, भागवत के प्रभाव से बांस की एक एक गांठ फटती गई और सातवें दिन वह भयंकर प्रेत दिव्य पीतांबर धारी चतुर्भुज रूप धारण करके विमान पर बैठकर सीधे भगवान विष्णु के लोक को चला गया।

  • पितरों के निमित्त कलश स्थापना: कथा स्थल पर पितरों के नाम से एक विशेष तांबे अथवा मिट्टी का कलश स्थापित किया जाता है जिस पर काला तिल अर्पित किया जाता है।
  • कुश के आसन पर पितरों का आह्वान: व्यास पीठ के समीप कुश का एक पवित्र आसन बिछाकर यह भावना की जाती है कि हमारे सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वज यहां बैठकर कथा का रसपान कर रहे हैं।
  • प्रतिदिन का भागवत चरणामृत अर्पण: कथा के अंत में भगवान के चरणों का जो चरणामृत प्राप्त होता है, उसे घर के चारों ओर और विशेष रूप से दक्षिण दिशा की ओर छिड़का जाता है जो पितरों की दिशा मानी जाती है।
  • सातवें दिन का मोक्ष तर्पण: कथा की पूर्णाहुति के दिन नए चावल की खीर, काले तिल और गंगाजल से पितरों के निमित्त विशेष तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है।

जो व्यक्ति अगहन के पवित्र महीने में अपने माता पिता और पूर्वजों के नाम से इस कथा का श्रवण करता है, उसके कुल की इक्कीस पीढ़ियों के पूर्वज यमलोक की यातनाओं से मुक्त होकर उस जातक को दीर्घायु, यश और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंधों का दार्शनिक और आध्यात्मिक मर्म

श्रीमद्भागवत महापुराण में कुल बारह स्कंध, तीन सौ पैंतीस अध्याय और अट्ठारह हजार दिव्य श्लोक विद्यमान हैं। ये बारह स्कंध भगवान श्री कृष्ण के शरीर के बारह भिन्न भिन्न अंगों के समान पूजनीय हैं। जब कोई साधक इन स्कंधों का पारायण करता है, तो वह वास्तव में भगवान के नख शिख स्वरूप का ही ध्यान कर रहा होता है।

भागवत का स्कंध भगवान के श्रीअंग का स्वरूप प्रमुख आध्यात्मिक विषयवस्तु
नियम विधान विधान
प्रथम एवं द्वितीय स्कंध भगवान के दोनों चरण कमल अधिकार लीला, सृष्टि का स्वरूप और भागवत का प्राकट्य
तृतीय एवं चतुर्थ स्कंध भगवान की दोनों जंघाएं कपिलावतार, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र और पृथु चरित्र
पंचम स्कंध भगवान का नाभि कमल प्रियव्रत चरित्र, ऋषभदेव अवतार और ब्रह्मांडीय भूगोल
षष्ठ स्कंध भगवान का विशाल वक्षःस्थल अजामिल उद्धार, नारायण कवच और वृत्रासुर आख्यान
सप्तम एवं अष्टम स्कंध भगवान की दोनों भुजाएं प्रह्लाद चरित्र, नृसिंह अवतार, गजेंद्र मोक्ष और समुद्र मंथन
नवम स्कंध भगवान का पवित्र कंठ सूर्यवंश, चंद्रवंश, श्री राम अवतार और कृष्ण जन्म की पूर्व पीठिका
दशम स्कंध भगवान का हास्य युक्त मुखारविंद श्री कृष्ण की बाल लीलाएं, गोपी प्रेम, रासलीला और कंस वध
एकादश स्कंध भगवान का सुंदर ललाट उद्धव गीता, यदुवंश का संहार और परम ज्ञान का उपदेश
द्वादश स्कंध भगवान का मुकुट सुशोभित मस्तक कलयुग का वर्णन, राजा परीक्षित का मोक्ष और भागवत स्तुति

प्रथम दो स्कंध साधक के भीतर वैराग्य और जिज्ञासा को जगाते हैं। तृतीय से नवम स्कंध तक जीव को अपनी उत्पत्ति, संसार के नश्वर स्वरूप और भगवान के विभिन्न अवतारों के संरक्षण का बोध होता है। दशम स्कंध संपूर्ण भागवत का धड़कता हुआ हृदय है जहां केवल और केवल विशुद्ध प्रेमाभक्ति का साम्राज्य है। एकादश स्कंध में भगवान श्री कृष्ण अपने परम सखा उद्धव को ज्ञान और कर्म योग का वह सर्वोच्च उपदेश देते हैं जो मनुष्य को संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते की भांति निर्लिप्त रहना सिखाता है। द्वादश स्कंध में कलयुग की विभीषिका से बचने का एकमात्र उपाय केवल भगवन्नाम संकीर्तन को घोषित किया गया है।

कथा श्रवण के नियम और सात्विक दिनचर्या का पालन

भागवत कथा का श्रवण केवल कानों से शब्द सुनने का नाम नहीं है बल्कि उन वचनों को अपने जीवन के आचरण में उतारने की एक कठिन साधना है। जो फल कथा के श्रवण से मिलता है, वह तभी सुरक्षित रहता है जब साधक शास्त्रीय आचार संहिता का पूर्ण रूप से पालन करे।

कथा के सात दिनों अथवा संपूर्ण मास के दौरान साधक को भूमि पर कुश अथवा ऊनी आसन बिछाकर शयन करना चाहिए। भोजन में प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, बासी अन्न और मसूर की दाल का पूर्ण त्याग होना चाहिए। केवल एक समय सात्विक फलाहार अथवा हविष्यान्न का सेवन करना श्रेष्ठ माना गया है। कथा सुनते समय किसी भी प्रकार का सांसारिक वार्तालाप, मोबाइल फोन का उपयोग अथवा किसी अन्य व्यक्ति की निंदा या चर्चा पूरी तरह वर्जित है। कथा में जो भी प्रसंग आए, उस पर रात्रि के समय एकांत में बैठकर मनन और चिंतन करना चाहिए। साधक को अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखना चाहिए और ब्रह्मचर्य व्रत का दृढ़ता से पालन करना चाहिए।

भागवत की अमृत वाणी से जीवन का संपूर्ण कायाकल्प

मनुष्य का जीवन केवल धन कमाने, परिवार का पालन करने और अंत में मृत्यु की गोद में सो जाने के लिए नहीं हुआ है। इस दुर्लभ मानव देह का वास्तविक प्रयोजन उस परमपिता परमात्मा के साथ अपने सनातन संबंध को पुनः स्थापित करना है। अगहन मास का यह पावन समय हमें उस परम लक्ष्य की ओर लौटने का एक स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है।

श्रीमद्भागवत कथा का एक एक शब्द अमृत की वह बूंद है जो मनुष्य के भीतर के भय, शोक और वासनाओं के विष को पूरी तरह बाहर निकाल देती है। जब मनुष्य राजा परीक्षित की भांति यह मानकर कथा सुनता है कि मेरे जीवन के केवल सात दिन शेष बचे हैं और मुझे इन सात दिनों में अपने कल्याण का मार्ग खोजना है तब उसके अंतःकरण में तक्षक नाग रूपी काल का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण की यह वांग्मयी मूर्ति हर उस भक्त की झोली को भर देती है जो निष्काम भाव से उनके चरणों में समर्पित हो जाता है। इस अगहन मास में अपने घरों में भागवत की पावन ज्योति जलाकर हम न केवल अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं बल्कि अपनी आने वाली अनेक पीढ़ियों के लिए भी धर्म और मोक्ष का राजमार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

FAQ

अगहन मास में श्रीमद्भागवत कथा श्रवण का क्या विशेष महत्व है? मार्गशीर्ष मास स्वयं भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप है, अतः इस मास में भागवत कथा सुनने से करोड़ों यज्ञों के समान पुण्य और मोक्ष मिलता है।

क्या घर पर भागवत का केवल एक श्लोक पढ़ने से भी पुण्य मिलता है? हाँ, पद्म पुराण के अनुसार अगहन मास में प्रतिदिन भागवत के केवल एक श्लोक या आधे श्लोक का पाठ करने से भी समस्त पुराणों का फल प्राप्त होता है।

भागवत कथा श्रवण से पितरों को मुक्ति कैसे मिलती है? कथा के प्रभाव से प्रेत योनि में भटक रहे पूर्वजों के सारे बंधन कट जाते हैं और वे दिव्य रूप धारण करके भगवान के परम धाम को प्राप्त होते हैं।

अगहन के महीने में भागवत कथा का आयोजन किस पक्ष में करना सबसे उत्तम है? अगहन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक का समय भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के आयोजन के लिए सर्वोत्तम और अत्यंत फलदायी माना जाता है।

श्रीमद्भागवत कथा सुनते समय मुख्य रूप से किन नियमों का पालन करना चाहिए? कथा के दौरान सात्विक एक समय का भोजन, भूमि शयन, ब्रह्मचर्य का पालन, मौन या अल्पभाषण और व्यर्थ की निंदा चर्चा से पूरी तरह दूर रहना चाहिए।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

पं. नरेंद्र शर्मा (63)


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