By पं. संजीव शर्मा
गायत्री महामंत्र जप, कुंडलिनी जागरण, चक्र शोधन और छात्र स्मरण शक्ति

सनातन धर्म की अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक योग परंपरा में मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास को आंतरिक चेतना के शोधन और आत्मिक उत्थान का सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय में स्वयं को महीनों में मार्गशीर्ष कहकर इस समय की आध्यात्मिक महत्ता को स्थापित किया है। हेमंत ऋतु के इस पावन कालखंड में जब बाह्य प्रकृति में तापमान तेजी से नीचे गिरता है तब मनुष्य की प्राण शक्ति स्वतः बाहर के विषयों से सिमटकर शरीर के भीतर अंतर्मुखी होने लगती है। जब यह ऊर्जा भीतर केंद्रित होती है तब वेदों की जननी कही जाने वाली भगवती गायत्री की साधना से साधक अपने भीतर प्रसुप्त पड़ी कुंडलिनी शक्ति को सहजता से जाग्रत कर सकता है।
शास्त्रों में गायत्री महामंत्र को समस्त वैदिक मंत्रों का प्राण माना गया है। यह केवल एक धार्मिक प्रार्थना नहीं है बल्कि यह ध्वनि विज्ञान, प्राण चिकित्सा और सौर ऊर्जा का एक अत्यंत शक्तिशाली संगम है। अगहन मास के इस विशेष समय में यदि कोई भी साधक अथवा विद्यार्थी पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और शास्त्रीय नियमों के साथ गायत्री महामंत्र का नियमित अनुष्ठान करता है, तो उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों का एक साथ परिशोधन संपन्न हो जाता है।
| साधना आयाम | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| नियम | विधान |
| साधना काल | मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा अथवा संपूर्ण मास |
| श्रेष्ठ दैनिक वेला | प्रातः ब्रह्म मुहूर्त अर्थात सूर्योदय से 1 घंटा पूर्व |
| मुख की दिशा | पूर्व दिशा की ओर मुख, स्वर्णिम प्रभात का ध्यान |
| उपयुक्त आसन | लाल ऊनी कंबल अथवा कुशा का आसन |
| जप माला | शुद्ध पंचमुखी रुद्राक्ष अथवा तुलसी की माला |
| न्यूनतम जप संख्या | प्रतिदिन 3 अथवा 5 माला अर्थात 324 या 540 मंत्र |
| अधिष्ठाता देवता | सविता अर्थात प्रातःकालीन बाल सूर्य एवं वेदमता गायत्री |
| प्रमुख आध्यात्मिक प्रतिफल | सातों चक्रों का शोधन, कुंडलिनी जागरण, ओज वृद्धि और तीक्ष्ण बुद्धि |
गायत्री साधना का आरंभ करने से पूर्व शरीर और पूजा स्थल की शुद्धि अनिवार्य होती है। साधक को प्रातःकाल तारों की छांव में शीतल अथवा सुखोष्ण जल से स्नान करके स्वच्छ, धुले हुए श्वेत अथवा हल्के पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा गृह में काष्ठ की एक चौकी पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाकर मां गायत्री का चित्र या विग्रह स्थापित करना चाहिए। प्रतिमा के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का एक मुखी दीपक प्रज्वलित करें और धूपबत्ती सुलगाएं।
तांबे के पात्र में स्वच्छ जल भरकर रखें, जिसे साधना की समाप्ति के उपरांत सूर्य देव को अर्घ्य के रूप में अर्पित किया जाएगा अथवा चरणामृत के रूप में ग्रहण किया जाएगा। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प लें कि मैं अपनी आत्मिक शुद्धि, आंतरिक ऊर्जा के संचय और बुद्धि की तीक्ष्णता के लिए अगहन मास में इस गायत्री साधना का संपादन कर रहा हूँ। संकल्प के पश्चात मेरुदंड को बिल्कुल सीधा रखकर, दोनों नेत्रों को कोमलता से बंद करके जप प्रारंभ करना चाहिए।
वैदिक ऋषियों ने प्रत्येक साधना के लिए विशिष्ट ऋतुओं का जो निर्धारण किया था, उसके पीछे अत्यंत गूढ़ शरीर क्रिया विज्ञान और खगोलीय सत्य छिपा हुआ था। अगहन मास में हेमंत ऋतु अपनी पूर्ण गरिमा के साथ उपस्थित रहती है। इस मौसम में वातावरण की आर्द्रता और धूल कण नीचे बैठ जाते हैं, जिससे आकाश मंडल अत्यंत निर्मल और स्वच्छ दिखाई देता है। बाहर चलने वाली शीतल बयार मानव शरीर की त्वचा के सूक्ष्म रोमछिद्रों को स्वाभाविक रूप से संकुचित कर देती है।
आयुर्वेद और हठयोग के अनुसार जब बाह्य शीतलता के कारण त्वचा के छिद्र बंद होते हैं तब शरीर के भीतर की ऊष्मा बाहर नष्ट नहीं हो पाती। यह ऊष्मा जठराग्नि के रूप में उदर में और कुंडलिनी के रूप में मूलाधार चक्र में संचित होने लगती है। ग्रीष्म ऋतु में जहां मनुष्य का पसीना और शारीरिक ऊर्जा बाहर बहकर उसे शिथिल कर देती है, वहीं अगहन मास में प्राण वायु शरीर की सुषुम्ना नाड़ी के मुहाने पर आकर एकत्र हो जाती है।
इस समय मन की चंचलता स्वाभाविक रूप से कम होती है क्योंकि वातावरण में शीतलता के कारण एक विशेष प्रकार की शांति और स्थिरता व्याप्त रहती है। जब कोई योगी इस अनुकूल प्राकृतिक वातावरण में बैठकर गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों का उच्चार करता है, तो उसके द्वारा खींची गई श्वास सीधे मूलाधार चक्र को झंकृत करती है। यह ऋतु प्राण ऊर्जा के संचय का एक ऐसा प्राकृतिक अवसर है जो वर्ष के अन्य किसी भी मास में इतनी सरलता से सुलभ नहीं होता।
गायत्री महामंत्र में चौबीस दिव्य अक्षर विद्यमान हैं, जिन्हें वैदिक वांग्मय में चौबीस शक्तियों, चौबीस तत्वों और चौबीस दिव्य ऋषियों का मूर्त रूप माना गया है। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् यह मंत्र केवल शब्दों की सामान्य लड़ी नहीं है बल्कि यह मानव देह में स्थित बहत्तर हजार नाड़ियों को शुद्ध करने वाली एक दिव्य ध्वनि तरंग है। जब साधक इस मंत्र का उच्चारण करता है, तो उसकी जिह्वा, तालु, कंठ, होंठ और नाभि की मांसपेशियों का एक विशेष क्रम में संकुचन और फैलाव होता है।
मानव मुख के भीतर स्थित विभिन्न तंत्रिका केंद्र सीधे मेरुरज्जु और मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर से जुड़े होते हैं। गायत्री के अक्षरों के उच्चारण से जो सूक्ष्म कंपन पैदा होता है, वह सुषुम्ना नाड़ी के भीतर स्थित सात ऊर्जा चक्रों को एक एक करके आलोकित करने लगता है।
इस प्रकार नियमित 3 या 5 माला का जप करने से साधक के सातों चक्र अपने आप संतुलित होने लगते हैं। शरीर में किसी भी प्रकार का चक्र दोष नहीं रहता और कुंडलिनी महाशक्ति अपनी सुप्त अवस्था से जागकर धीरे धीरे ऊर्ध्वगामी होने लगती है।
आधुनिक युग में विद्यार्थियों और शोधार्थियों के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती मानसिक भटकाव, एकाग्रता की कमी और अत्यधिक अध्ययन के बाद भी भूल जाने की समस्या है। अगहन मास में की जाने वाली यह साधना छात्रों के लिए साक्षात वरदान सिद्ध होती है। गायत्री मंत्र का सीधा संबंध 'धी' तत्व अर्थात बुद्धि से है, जिसकी प्रार्थना इस मंत्र के अंतिम चरण 'धियो यो नः प्रचोदयात्' में की गई है। इसका अर्थ ही यह है कि हे परमपिता परमात्मा, हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।
जब कोई विद्यार्थी प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस मंत्र का पाठ करता है, तो उसके मस्तिष्क के अग्र भाग अर्थात प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में रक्त का संचार सुगम होने लगता है। मस्तिष्क में अल्फा और थीटा तरंगों की तीव्रता बढ़ जाती है, जो गहन अध्ययन और स्मृति को स्थायी रूप से संचित करने के लिए अनिवार्य होती हैं।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में गुरुकुलों के भीतर सभी शिष्यों को सबसे पहले इसी मंत्र की दीक्षा दी जाती थी ताकि उनकी मेधा शक्ति कुशाग्र हो सके और वे समस्त वेदों व विधाओं को अल्पकाल में ही कंठस्थ कर सकें।
गायत्री महामंत्र के जप के लिए शास्त्रों में मुख्य रूप से दो प्रकार की मालाओं का विधान किया गया है, रुद्राक्ष की माला और तुलसी की माला। इन दोनों ही मालाओं का अपना विशिष्ट तात्विक प्रभाव और शारीरिक स्वास्थ्य से गहरा संबंध होता है।
रुद्राक्ष भगवान सदाशिव का साक्षात अश्रु माना गया है और यह विद्युत चुंबकीय ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। यदि साधक का उद्देश्य अपनी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करना, अपने भीतर ऊर्जा और साहस का संचार करना तथा शनि, राहु अथवा केतु जैसे क्रूर ग्रहों के प्रभाव को शांत करना है, तो उसे पांच मुखी शुद्ध रुद्राक्ष की माला का चयन करना चाहिए। रुद्राक्ष की माला से जप करने पर रक्तचाप सामान्य रहता है और हृदय की धड़कनें शांत होती हैं, जिससे शीत ऋतु में रक्त संचार में आने वाली रुकावटें दूर हो जाती हैं।
दूसरी ओर, तुलसी की माला साक्षात भगवान नारायण और माता लक्ष्मी की कृपा का संवाहक है। यदि साधक का उद्देश्य मन की अत्यधिक चंचलता को शांत करना, बौद्धिक एकाग्रता प्राप्त करना, वाणी में मिठास लाना और सात्विक भावों का विस्तार करना है, तो उसके लिए शुद्ध तुलसी की माला सर्वोत्तम मानी गई है। तुलसी की माला स्पर्श मात्र से शरीर के इर्द गिर्द एक दिव्य सुरक्षा घेरा बना देती है, जिससे किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा अथवा नजर दोष साधक की चेतना को स्पर्श नहीं कर पाते।
माला का उपयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि माला नाभि से नीचे न जाए और उसे सदैव एक स्वच्छ सूती अथवा रेशमी गोमुखी के भीतर रखकर ही जप किया जाए। सुमेरु अर्थात माला के सबसे बड़े मुख्य मनके को कभी लांघना नहीं चाहिए बल्कि 108 मनके पूर्ण होने पर माला को वहीं से घुमाकर पुनः जप प्रारंभ करना चाहिए।
गायत्री महामंत्र के मूल देवता 'सविता' हैं, जो सूर्य देव के उस दिव्य प्रकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं जो संपूर्ण ब्रह्मांड को चेतना और जीवन प्रदान करता है। अगहन मास में जब सूर्य देव 'मित्र' स्वरूप में तपते हैं तब उनकी किरणें अत्यंत कोमल और अमृतमयी होती हैं। गायत्री साधना तब तक पूर्ण फल प्रदान नहीं करती जब तक उसके साथ सूर्य अर्घ्य और सविता ध्यान का संयोजन न किया जाए।
प्रातःकाल जब साधना समाप्त हो जाए तब तांबे के पात्र में रखे हुए जल में थोड़ा सा लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत और लाल पुष्प मिलाएं। खुले आकाश के नीचे खड़े होकर दोनों हाथों को मस्तक से ऊपर उठाएं और गिरती हुई पतली जलधारा के मध्य से उगते हुए स्वर्णिम सूर्य के बिंब का दर्शन करें। अर्घ्य समर्पित करते समय 3 बार गायत्री मंत्र का सस्वर उच्चारण करें। इसके उपरांत वहीं खड़े होकर यह ध्यान करें कि भगवान सविता की स्वर्णिम, तेजस्वी किरणें आपके मस्तक के ब्रह्मरंध्र से प्रविष्ट होकर आपके संपूर्ण शरीर, नसों और रक्त कणिकाओं में समाहित हो रही हैं।
यह सविता ध्यान मनुष्य के भीतर के अंधकार, निराशा और अवसाद को उसी प्रकार मिटा देता है जैसे सूर्य का उदय होते ही रात्रि का घना कोहरा छंट जाता है। यह क्रिया शरीर में प्राकृतिक विटामिन डी के निर्माण को तेज करती है, नेत्रों की ज्योति को बढ़ाती है और साधक के चेहरे पर एक अलौकिक आकर्षण और तेज भर देती है। जो साधक इस नियम का पालन करता है, उसका समाज में मान सम्मान और प्रशासनिक प्रभाव स्वतः बढ़ने लगता है।
गायत्री साधना एक अत्यंत पवित्र आंतरिक यज्ञ है और किसी भी यज्ञ की सफलता हविष्य की शुद्धता पर निर्भर करती है। साधना के इस पावन मास में साधक का भोजन उसके विचारों और मंत्र की शक्ति को सीधे प्रभावित करता है। यदि भोजन दूषित होगा, तो मन में अशुद्ध विचार उठेंगे और जप का संपूर्ण फल नष्ट हो जाएगा।
इन नियमों का निष्ठा से पालन करने पर साधक की आंतरिक भूमि इतनी उर्वर हो जाती है कि गायत्री मंत्र का बीजाक्षर उसमें तत्काल अंकुरित होकर दिव्य फल देने लगता है।
जब कोई निष्ठावान साधक अगहन मास के शांत और शीतल वातावरण में प्रतिदिन 3 या 5 माला का जप पूर्ण अनुशासन के साथ करता है, तो कुछ ही दिनों में उसके सूक्ष्म शरीर में अद्भुत परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। रीढ़ की हड्डी के निचले भाग में एक हल्की सी मीठी ऊष्मा और स्पंदन का अनुभव होने लगता है, जो इस बात का संकेत है कि मूलाधार चक्र में सोई हुई कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होने लगी है।
साधक का मन व्यर्थ के सांसारिक दुखों, चिंताओं और कलह से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। उसे ऐसा प्रतीत होने लगता है मानो उसके चारों ओर प्रकाश का एक दिव्य कवच बन गया है जो हर संकट से उसकी रक्षा कर रहा है। उसकी निर्णय क्षमता इतनी सटीक हो जाती है कि भविष्य में घटने वाली घटनाओं का उसे पहले से ही पूर्वाभास होने लगता है। उसके मुख से निकले हुए शब्द सत्य सिद्ध होने लगते हैं, जिसे शास्त्रों में वाक् सिद्धि कहा गया है।
मार्गशीर्ष का यह पावन मास हमें अपनी बाह्य दौड़धूप को रोककर अपने भीतर झांकने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करता है। गायत्री महामंत्र वह दिव्य चाबी है जो मनुष्य के भीतर बंद पड़ी असीम शक्तियों के कपाट खोल देती है। जो व्यक्ति इस अगहन मास में इस गुप्त साधना का आश्रय ले लेता है, उसका यह नश्वर जीवन केवल सांसारिक दृष्टि से ही सफल नहीं होता बल्कि वह जन्म मरण के बंधनों से मुक्त होकर उस परम पद को प्राप्त कर लेता है जिसे प्राप्त करके कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता।
अगहन मास में गायत्री साधना के लिए प्रतिदिन कितनी माला जप करना चाहिए? अगहन मास में आत्मिक शांति, कुंडलिनी जागरण और बौद्धिक विकास के लिए प्रतिदिन कम से कम 3 या 5 माला जप करना सर्वोत्तम फलदायी माना गया है।
गायत्री मंत्र का जप करने के लिए कौन सी माला सबसे अधिक शुभ होती है? ऊर्जा और साहस संचय के लिए शुद्ध पंचमुखी रुद्राक्ष की माला और मानसिक शांति व सात्विकता के लिए तुलसी की माला सबसे उत्तम मानी गई है।
क्या विद्यार्थियों के लिए अगहन मास में गायत्री मंत्र का जप लाभकारी होता है? हाँ, विद्यार्थियों द्वारा ब्रह्म मुहूर्त में गायत्री मंत्र का जप करने से उनकी स्मरण शक्ति तेज होती है, परीक्षा का भय मिटता है और बौद्धिक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
गायत्री मंत्र का जप करते समय किस दिशा की ओर मुख रखना चाहिए? प्रातःकाल गायत्री साधना करते समय सदैव पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए ताकि सूर्य देव की प्रत्यक्ष सात्विक किरणों का पूरा लाभ मिल सके।
गायत्री साधना के दौरान किस प्रकार के भोजन का सेवन करना अनिवार्य है? साधना काल में पूर्णतः सात्विक, ताजा और अल्पाहार लेना चाहिए तथा प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, बासी अन्न और तामसिक भोजन का पूरी तरह त्याग करना चाहिए।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ