By पं. नीलेश शर्मा
7 अनिवार्य कर्तव्य, 7 वर्जित गलतियां, जीरा निषेध और शंख साधना

सनातन धर्म की सनातन काल गणना में मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास को अत्यंत पावन और साक्षात भगवान श्री कृष्ण का प्रत्यक्ष विग्रह माना गया है। इस महीने में किए गए छोटे से सात्विक कर्म का फल भी सहस्त्र गुना होकर प्राप्त होता है, परंतु इसके साथ ही शास्त्रों ने इस कालखंड के लिए अत्यंत कड़े नियम और कड़े निषेध भी निर्धारित किए हैं। जब प्रकृति शीत ऋतु की ओर अग्रसर होती है तब मनुष्य के शरीर, मन और प्राण पर इस मौसमी परिवर्तन का अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ता है। इस समय यदि खान पान और आचरण में थोड़ी सी भी असावधानी बरती जाए, तो न केवल शारीरिक व्याधियां घेर लेती हैं बल्कि जातक की संपूर्ण पूजा और साधना भी पूरी तरह निष्फल हो जाती है।
शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि विधि विधान से किया गया कोई भी व्रत तभी सार्थक होता है जब वर्जित कार्यों का पूरी तरह से त्याग किया जाए। यदि कोई व्यक्ति दिनभर जप और तप करता है, लेकिन साथ ही परनिंदा, दिन में शयन अथवा तामसिक पदार्थों का सेवन करता है, तो उसका संचित पुण्य जलती हुई अग्नि में कपूर की भांति समाप्त हो जाता है। मार्गशीर्ष मास की दिव्यता और गरिमा को बनाए रखने के लिए हर साधक, विद्यार्थी और गृहस्थ को शास्त्रीय आचार संहिता का निष्ठा से पालन करना चाहिए। इस पावन मास में मनुष्य के कर्मों का लेखा जोखा अत्यंत तीव्र गति से फलित होता है, इसलिए हर कदम पर धर्म और मर्यादा का ध्यान रखना अनिवार्य है।
| आचरण आयाम | शास्त्रीय विधान और स्वरूप | मुख्य आध्यात्मिक प्रभाव |
|---|---|---|
| नियम | विधान | विधान |
| प्रातः जागरण | ब्रह्म मुहूर्त में तारों की छांव में उठना | बुद्धि शुद्धि, तेज और दीर्घायु की प्राप्ति |
| मुख्य देव साधना | भगवान श्री कृष्ण और शंख चक्र गदाधर विष्णु पूजन | पाप क्षय, मानसिक शांति और वैकुंठ प्राप्ति |
| स्नान विधान | तीर्थ जल अथवा गंगाजल मिश्रित शीतल जल से स्नान | अश्वमेध यज्ञ समान महान पुण्य की प्राप्ति |
| वर्जित आहार | अत्यधिक जीरा, तामसिक अन्न, बासी भोजन और मदिरा | जठराग्नि रक्षा और अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि |
| अनिवार्य दान | काले तिल, देसी गुड़, गर्म वस्त्र और अन्नदान | सूर्य व शनि दोष निवारण और अक्षय पुण्य |
| निषिद्ध दिनचर्या | दिन के समय सोना और कटु वचनों का प्रयोग | लक्ष्मी कृपा का संरक्षण और दरिद्रता नाश |
| शंख साधना | दक्षिणवर्ती अथवा सामान्य शंख का नित्य पूजन व जल छिड़काव | वास्तु दोष निवारण और सकारात्मक ऊर्जा |
| गौ सेवा विधान | प्रातः प्रथम ग्रास गोमाता को और पक्षियों को दाना | तैंतीस कोटि देवताओं का आशीर्वाद और पितृ शांति |
| इंद्रिय संयम | काम, क्रोध, लोभ और अहंकार का पूर्ण परित्याग | ओज, तेज और आत्मबल का स्थायी निर्माण |
अगहन मास में अपने दैनिक जीवन को इन शास्त्रीय मानकों के अनुसार ढालना ही मनुष्य जीवन की सच्ची साधना मानी गई है। नियमों का पालन करने से मनुष्य का आत्मबल हिमालय के समान सुदृढ़ हो जाता है और वह सांसारिक प्रपंचों से ऊपर उठकर ईश्वरीय चेतना के निकट पहुँच जाता है। जब मनुष्य प्रकृति के नियमों का आदर करता है, तो प्रकृति भी उसके जीवन की समस्त बाधाओं को दूर करके उसे सुख और शांति का उपहार प्रदान करती है।
शास्त्रों में मार्गशीर्ष मास के दौरान सात ऐसे विशिष्ट और कल्याणकारी कर्म बताए गए हैं, जिन्हें निष्ठापूर्वक करने से साधक को कभी भी जीवन में अन्न, धन और सम्मान का अभाव नहीं देखना पड़ता।
इन सात अनिवार्य कर्तव्यों का जो साधक श्रद्धा से पालन करता है, उसके घर में कभी अशांति का वास नहीं होता और उसकी आने वाली पीढ़ियां भी धर्म के मार्ग पर अग्रसर रहती हैं।
जिस प्रकार अच्छे कर्म जीवन को संवारते हैं, उसी प्रकार शास्त्रों द्वारा बनाए गए निषेधों की अवहेलना करने से मनुष्य भारी पाप और पतन का भागी बनता है। अगहन मास के दौरान सात ऐसी गंभीर गलतियां हैं जिन्हें शास्त्रों में महापाप के समान माना गया है और इनसे बचना ही श्रेयस्कर है।
इन सात वर्जित गलतियों से अपने आप को बचाकर रखना ही इस मास का सबसे बड़ा धर्म है। जो मनुष्य इन नियमों की रक्षा करता है, धर्म उसकी समस्त संकटों से स्वयं रक्षा करता है।
सनातन संस्कृति का कोई भी नियम केवल अंधविश्वास अथवा धार्मिक हठधर्मिता पर आधारित नहीं है बल्कि उसके पीछे गहरा मानव शरीर विज्ञान और ऋतु अनुकूल स्वास्थ्य का दृष्टिकोण छिपा हुआ है। अगहन मास में जीरा न खाने का स्पष्ट निर्देश चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम जैसे महान आयुर्वेदिक ग्रंथों में विस्तार से समझाया गया है।
मार्गशीर्ष मास में बाहर का वातावरण अत्यंत ठंडा और शुष्क होता है। जीरा अपने गुण धर्म में रुक्ष, वात वर्धक और शीत वीर्य माना जाता है। जब शीत ऋतु में मानव शरीर पहले से ही बाह्य ठंड से जूझ रहा होता है तब भोजन में जीरे का अधिक प्रयोग त्वचा और आंतरिक नसों के भीतर की प्राकृतिक नमी को तेजी से सोख लेता है। इसके परिणामस्वरूप जोड़ों में भयानक दर्द, त्वचा का फटना, होंठों का सूखना, गंभीर कब्ज और पेट में अफारा जैसी वात व्याधियां जन्म ले लेती हैं। इसके अतिरिक्त जीरा जठराग्नि को उस स्तर पर प्रदीप्त नहीं कर पाता जिसकी आवश्यकता इस मौसम में भारी भोजन को पचाने के लिए होती है।
इसके विपरीत, इस मौसम में ऐसे मसालों और द्रव्यों का सेवन करने का निर्देश दिया गया है जो तासीर में गर्म, चिकने और पाचक हों। अगहन के पूरे महीने में मेथी, सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली, दालचीनी, लौंग, तिल और गुड़ का नियमित सेवन शरीर को आंतरिक ऊष्मा प्रदान करता है और जठराग्नि को प्रचंड बनाए रखता है। इससे खाया पिया भोजन शरीर के सातों धातुओं में ठीक से रूपांतरित होता है और शरीर में अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण होता है। अतः जीरे का त्याग करना वास्तव में बदलते मौसम के अनुसार अपने शरीर को निरोगी रखने का एक अत्यंत वैज्ञानिक और सटीक उपाय है।
अगहन मास में भगवान विष्णु के परम प्रिय आयुध पाञ्चजन्य शंख की पूजा का अत्यंत अलौकिक और चमत्कारी महत्व माना गया है। समुद्र मंथन के समय जब चौदह रत्न प्रकट हुए थे तब शंख भी उसी क्षीरसागर से उत्पन्न हुआ था, जिसके कारण इसे माता लक्ष्मी का सहोदर भ्राता माना जाता है। जिस भवन में नित्य शंख की पूजा होती है और शंख की ध्वनि गूंजती है, वहां कभी दरिद्रता, कलह और अशांति के बादल नहीं ठहर सकते।
पूजा की विधि के अनुसार प्रातःकाल स्नान के उपरांत एक तांबे अथवा चांदी की सुंदर थाली में शंख को स्थापित करना चाहिए। शंख पर गंगाजल और कच्चे दूध से अभिषेक करके उस पर केसर, कुमकुम और श्वेत चंदन का त्रिपुंड लगाना चाहिए। इसके पश्चात शंख में शुद्ध जल भरकर उसे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के चरणों से स्पर्श कराना चाहिए और ॐ शंखाय नमः मंत्र का जप करना चाहिए।
पूजा संपन्न होने के पश्चात उस शंख के जल को आम के पत्तों अथवा दूर्वा की सहायता से घर के प्रत्येक कमरे, तिजोरी के स्थान, रसोई घर और विशेष रूप से मुख्य द्वार पर श्रद्धापूर्वक छिड़कना चाहिए। यह अभिमंत्रित जल घर के वातावरण में तैर रही समस्त नकारात्मक ऊर्जा, नजर दोष, ईर्ष्या की तरंगों और सूक्ष्म वास्तु दोषों को तत्काल समाप्त कर देता है।
इसके अतिरिक्त, सायंकाल के समय सूर्यास्त के ठीक बाद घर के आंगन अथवा बालकनी में खड़े होकर तीन बार शंख की गंभीर ध्वनि करनी चाहिए। आधुनिक भौतिक विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि शंख की ध्वनि से उत्पन्न होने वाली विशिष्ट कंपन तरंगे वातावरण में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करने की असाधारण क्षमता रखती हैं। अगहन मास में किया गया यह शंख अनुष्ठान परिवार के सभी सदस्यों के मानसिक तनाव को दूर करके घर में सुख और समृद्धि का नया सवेरा लेकर आता है।
अक्सर सांसारिक लोग ब्रह्मचर्य का बहुत संकीर्ण अर्थ निकालते हैं और इसे केवल शारीरिक दूरी तक सीमित मान लेते हैं, परंतु वैदिक दर्शन में ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ है अपनी चेतना को ब्रह्म के चिंतन में लीन रखना। अगहन मास की लंबी, शांत और गंभीर रात्रियां मनुष्य के भीतर सोई हुई आध्यात्मिक शक्तियों को जगाने के लिए प्रकृति का सबसे बड़ा वरदान मानी गई हैं।
सर्दियों के इस मौसम में जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों, भोगों और कामुक विचारों से समेटकर अंतर्मुखी बनाता है तब उसके शरीर में सुरक्षित वीर्य शक्ति और प्राण ऊर्जा नीचे से ऊपर की ओर उर्ध्वगामी होने लगती है। यह ऊर्जा मेरुरज्जु के मार्ग से होती हुई जब मस्तिष्क के आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र तक पहुँचती है, तो वह एक दिव्य तेज, ओज और आत्मबल में परिवर्तित हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति इस मास में भोग विलास और शारीरिक सुखों में अत्यधिक लिप्त रहता है, तो शीत ऋतु की प्राकृतिक शक्ति संचय करने की पूरी जैविक प्रक्रिया छिन्न भिन्न हो जाती है, जिससे वह आगामी पूरे वर्ष दुर्बलता और बीमारियों का शिकार बना रहता है।
जो साधक अगहन मास में मन, वचन और कर्म से पवित्रता का व्रत धारण करता है, उसकी स्मरण शक्ति और एकाग्रता अद्भुत रूप से बढ़ जाती है। उसके चेहरे पर एक ऐसा सम्मोहक और शांत तेज दिखाई देने लगता है जो दूसरों को भी शांति प्रदान करता है। मन का संयम ही वह द्वार है जहां से ईश्वर की सच्ची कृपा का प्रवाह जीवन में प्रारंभ होता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि घाव बाणों से लगे हों तो भर जाते हैं, परंतु कटु वाणी से लगे घाव कभी नहीं भरते। अगहन मास में वाणी की शुद्धि पर अत्यधिक बल दिया गया है क्योंकि वाणी साक्षात देवी सरस्वती का वास स्थान है। जब मनुष्य बिना सोचे समझे बोलता है, दूसरों की आलोचना करता है अथवा व्यर्थ के वाद विवाद में समय नष्ट करता है, तो उसकी अमूल्य प्राण शक्ति व्यर्थ में बह जाती है।
अगहन मास में प्रतिदिन कम से कम एक घंटा मौन रहने का अभ्यास करना चाहिए। मौन रहने से मन की भटकन शांत होती है, रक्तचाप सामान्य रहता है और मस्तिष्क को गहरा विश्राम मिलता है। जब मुख बंद होता है तब अंतःकरण की आंखें खुलती हैं और मनुष्य अपने स्वयं के दोषों को देख पाता है।
यदि बोलना अत्यंत आवश्यक हो, तो केवल वही बोलें जो सत्य हो, प्रिय हो और दूसरों का कल्याण करने वाला हो। इस महीने में किसी भी व्यक्ति का उपहास उड़ाना, किसी पर झूठा आक्षेप लगाना अथवा कटु वचनों से किसी का हृदय दुखाना महापाप माना गया है। जो मनुष्य अपनी वाणी को वश में कर लेता है, वह संपूर्ण संसार पर विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य हासिल कर लेता है।
मार्गशीर्ष मास को दान का साक्षात महापर्व कहा गया है। शीत ऋतु के प्रचंड प्रकोप के समय जब निर्धन, असहाय और अनाथ लोग कड़ाके की ठंड में कांप रहे होते हैं, उस समय उनके लिए किए गए छोटे से प्रयास का मूल्य करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से भी अधिक माना जाता है। शास्त्रों का मत है कि संकट के समय दिया गया दान ही वास्तविक धर्म है।
दान देते समय मन में तनिक भी अहंकार नहीं आना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि ईश्वर ने हमें देने योग्य बनाया है, यह उसकी परम कृपा है। जब हम किसी कांपते हुए व्यक्ति के तन को ढंकते हैं, तो वास्तव में हम भगवान नारायण के ही विराट स्वरूप की सेवा कर रहे होते हैं। यह पुण्य कभी निष्फल नहीं जाता और जीवन के अंत समय में जीव की ढाल बनकर खड़ा रहता है।
सनातन धर्म केवल मंदिर जाने और मंत्र जपने की बाह्य क्रियाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन को एक अत्यंत अनुशासित, पवित्र, स्वस्थ और सुंदर लय में जीना सिखाता है। अगहन मास के ये कड़े नियम और वर्जित कार्य मनुष्य को प्रकृति के शाश्वत नियमों के साथ पूर्ण तालमेल बिठाकर चलने की प्रेरणा देते हैं। जब हम अपने जीवन से प्रमाद, आलस्य, वासना और तामसिक वृत्तियों का परित्याग करते हैं, तो हमारे भीतर छुपा हुआ देवत्व स्वयं प्रकट होने लगता है।
शीत ऋतु का यह स्वर्णिम कालखंड आत्म निरीक्षण करने, अपने चरित्र की कमियों को दूर करने और नई आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय करने का सबसे उत्तम अवसर है। जो साधक और गृहस्थ अगहन मास की इस पावन आचार संहिता को अपने जीवन का अंग बना लेता है, उसके जीवन से दरिद्रता, भय और शोक का सदा के लिए लोप हो जाता है। उसके घर में प्रेम, सौहार्द, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड समृद्धि का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। नियमों का यह कड़ा पालन ही मनुष्य को नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त करके परम पद की ओर ले जाने वाला सबसे सरल और प्रामाणिक राजमार्ग है।
अगहन मास में जीरा खाना क्यों वर्जित माना गया है? अगहन में ठंड के कारण जीरा शरीर में रूखापन और वात दोष बढ़ाता है, जिससे जोड़ों का दर्द और पाचन विकार हो सकते हैं, इसलिए इसका त्याग हितकर है।
इस महीने में दिन में सोने की मनाही क्यों की गई है? दिन में सोने से शरीर में कफ और तमस बढ़ता है, जठराग्नि मंद होती है, बुद्धि की तीक्ष्णता घटती है और शास्त्रों के अनुसार घर में दरिद्रता आती है।
अगहन मास में शंख में जल भरकर छिड़कने का क्या लाभ है? शंख जल छिड़कने से घर के समस्त वास्तु दोष, नकारात्मक ऊर्जा और सूक्ष्म रोगाणु नष्ट होते हैं तथा माता लक्ष्मी की स्थाई कृपा प्राप्त होती है।
अगहन के महीने में कौन से सात मुख्य कार्य अवश्य करने चाहिए? ब्रह्म मुहूर्त स्नान, गीता पाठ, शंख पूजन, गर्म कपड़ों का दान, तुलसी सेवा, सात्विक आहार और गौ सेवा इस मास के सात अनिवार्य कर्तव्य हैं।
क्या अगहन मास में सामान्य व्यक्ति को भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए? हाँ, इस मास में शारीरिक और मानसिक संयम रखने से प्राण शक्ति और ओज की रक्षा होती है, जिससे आध्यात्मिक साधना शीघ्र फलित होती है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ