अगहन मास में क्या करें क्या न करें?

By पं. नीलेश शर्मा

7 अनिवार्य कर्तव्य, 7 वर्जित गलतियां, जीरा निषेध और शंख साधना

अगहन मास नियम और निषेध: क्या करें और क्या न करें

अगहन मास के आचार विचार और शास्त्रीय अनुशासन

सनातन धर्म की सनातन काल गणना में मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास को अत्यंत पावन और साक्षात भगवान श्री कृष्ण का प्रत्यक्ष विग्रह माना गया है। इस महीने में किए गए छोटे से सात्विक कर्म का फल भी सहस्त्र गुना होकर प्राप्त होता है, परंतु इसके साथ ही शास्त्रों ने इस कालखंड के लिए अत्यंत कड़े नियम और कड़े निषेध भी निर्धारित किए हैं। जब प्रकृति शीत ऋतु की ओर अग्रसर होती है तब मनुष्य के शरीर, मन और प्राण पर इस मौसमी परिवर्तन का अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ता है। इस समय यदि खान पान और आचरण में थोड़ी सी भी असावधानी बरती जाए, तो न केवल शारीरिक व्याधियां घेर लेती हैं बल्कि जातक की संपूर्ण पूजा और साधना भी पूरी तरह निष्फल हो जाती है।

शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि विधि विधान से किया गया कोई भी व्रत तभी सार्थक होता है जब वर्जित कार्यों का पूरी तरह से त्याग किया जाए। यदि कोई व्यक्ति दिनभर जप और तप करता है, लेकिन साथ ही परनिंदा, दिन में शयन अथवा तामसिक पदार्थों का सेवन करता है, तो उसका संचित पुण्य जलती हुई अग्नि में कपूर की भांति समाप्त हो जाता है। मार्गशीर्ष मास की दिव्यता और गरिमा को बनाए रखने के लिए हर साधक, विद्यार्थी और गृहस्थ को शास्त्रीय आचार संहिता का निष्ठा से पालन करना चाहिए। इस पावन मास में मनुष्य के कर्मों का लेखा जोखा अत्यंत तीव्र गति से फलित होता है, इसलिए हर कदम पर धर्म और मर्यादा का ध्यान रखना अनिवार्य है।

आचरण आयाम शास्त्रीय विधान और स्वरूप मुख्य आध्यात्मिक प्रभाव
नियम विधान विधान
प्रातः जागरण ब्रह्म मुहूर्त में तारों की छांव में उठना बुद्धि शुद्धि, तेज और दीर्घायु की प्राप्ति
मुख्य देव साधना भगवान श्री कृष्ण और शंख चक्र गदाधर विष्णु पूजन पाप क्षय, मानसिक शांति और वैकुंठ प्राप्ति
स्नान विधान तीर्थ जल अथवा गंगाजल मिश्रित शीतल जल से स्नान अश्वमेध यज्ञ समान महान पुण्य की प्राप्ति
वर्जित आहार अत्यधिक जीरा, तामसिक अन्न, बासी भोजन और मदिरा जठराग्नि रक्षा और अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि
अनिवार्य दान काले तिल, देसी गुड़, गर्म वस्त्र और अन्नदान सूर्य व शनि दोष निवारण और अक्षय पुण्य
निषिद्ध दिनचर्या दिन के समय सोना और कटु वचनों का प्रयोग लक्ष्मी कृपा का संरक्षण और दरिद्रता नाश
शंख साधना दक्षिणवर्ती अथवा सामान्य शंख का नित्य पूजन व जल छिड़काव वास्तु दोष निवारण और सकारात्मक ऊर्जा
गौ सेवा विधान प्रातः प्रथम ग्रास गोमाता को और पक्षियों को दाना तैंतीस कोटि देवताओं का आशीर्वाद और पितृ शांति
इंद्रिय संयम काम, क्रोध, लोभ और अहंकार का पूर्ण परित्याग ओज, तेज और आत्मबल का स्थायी निर्माण

अगहन मास में अपने दैनिक जीवन को इन शास्त्रीय मानकों के अनुसार ढालना ही मनुष्य जीवन की सच्ची साधना मानी गई है। नियमों का पालन करने से मनुष्य का आत्मबल हिमालय के समान सुदृढ़ हो जाता है और वह सांसारिक प्रपंचों से ऊपर उठकर ईश्वरीय चेतना के निकट पहुँच जाता है। जब मनुष्य प्रकृति के नियमों का आदर करता है, तो प्रकृति भी उसके जीवन की समस्त बाधाओं को दूर करके उसे सुख और शांति का उपहार प्रदान करती है।

अगहन मास के सात अनिवार्य कर्तव्य

शास्त्रों में मार्गशीर्ष मास के दौरान सात ऐसे विशिष्ट और कल्याणकारी कर्म बताए गए हैं, जिन्हें निष्ठापूर्वक करने से साधक को कभी भी जीवन में अन्न, धन और सम्मान का अभाव नहीं देखना पड़ता।

  • सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त स्नान: इस पूरे मास में सूर्य की पहली किरण फूटने से पहले तारों की छांव में स्नान करना अनिवार्य माना गया है। यदि किसी पवित्र नदी के तट पर जाना संभव न हो, तो घर में ही सामान्य जल में कुछ बूंदें गंगाजल और तुलसी पत्र मिलाकर स्नान करना चाहिए। यह शीतल स्नान देह के समस्त तमस को धोकर चित्त को निर्मल और एकाग्र बना देता है।
  • श्रीमद्भगवद्गीता और भागवत का नित्य पाठ: चूंकि यह मास भगवान श्री कृष्ण का साक्षात स्वरूप है, अतः प्रतिदिन गीता के कम से कम एक पूरे अध्याय अथवा श्रीमद्भागवत के पावन श्लोकों का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह स्वाध्याय मनुष्य की वाणी को शुद्ध करता है और उसकी निर्णय क्षमता को अद्वितीय बना देता है।
  • शंख पूजन और शंख जल का छिड़काव: अगहन मास में शंख की विधिवत गंध, अक्षत और पुष्प से पूजा करके उसमें जल भरकर पूरे घर में छिड़कना चाहिए। शंख की दिव्य ध्वनि और उसके जल से घर के समस्त वास्तु दोष और नकारात्मक शक्तियां तत्काल भस्म हो जाती हैं।
  • दीन दुखियों को गर्म वस्त्र और तिल गुड़ का दान: शीत ऋतु के आगमन पर असहाय और निर्धन लोगों को ऊनी कंबल, वस्त्र, जूते और तिल गुड़ का दान करना चाहिए। यह दान सीधे शनि, राहु और केतु के क्रूर प्रभाव को शांत करके भाग्य के बंद दरवाजों को खोल देता है।
  • पवित्र तुलसी और शालिग्राम की संयुक्त सेवा: प्रातःकाल तुलसी के मूल में जल अर्पित करना और संध्या काल में गोधूलि वेला में गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाना अक्षय पुण्य प्रदान करता है। भगवान शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराकर तुलसी मंजरी अर्पित करने से घर में माता लक्ष्मी का चिरस्थाई वास हो जाता है।
  • सात्विक एवं संयमित दिनचर्या का पालन: इस मास में कम से कम एक समय बिना नमक का अथवा सात्विक भोजन ग्रहण करने का संकल्प लेना चाहिए। अपनी वाणी पर पूर्ण नियंत्रण रखना, कटु वचनों का त्याग करना और सत्य का आश्रय लेना एक महान तपस्या के समान फल देता है।
  • गौ सेवा और पक्षियों को दाना पानी: प्रतिदिन भोजन बनाते समय पहली ताजी रोटी गाय के लिए निकालना और घर की छत पर पक्षियों के लिए बाजरा व जल रखना अगहन मास का मुख्य धर्म माना गया है। यह सरल कर्म कुंडली के समस्त पितृ दोषों और अज्ञात अरिष्टों को शांत कर देता है।

इन सात अनिवार्य कर्तव्यों का जो साधक श्रद्धा से पालन करता है, उसके घर में कभी अशांति का वास नहीं होता और उसकी आने वाली पीढ़ियां भी धर्म के मार्ग पर अग्रसर रहती हैं।

अगहन मास में भूलकर भी न करें ये सात वर्जित कार्य

जिस प्रकार अच्छे कर्म जीवन को संवारते हैं, उसी प्रकार शास्त्रों द्वारा बनाए गए निषेधों की अवहेलना करने से मनुष्य भारी पाप और पतन का भागी बनता है। अगहन मास के दौरान सात ऐसी गंभीर गलतियां हैं जिन्हें शास्त्रों में महापाप के समान माना गया है और इनसे बचना ही श्रेयस्कर है।

  • दिन के समय शयन करना: इस पावन मास में दोपहर अथवा दिन के किसी भी पहर में सोना पूरी तरह वर्जित माना गया है। दिन में सोने से शरीर में कफ और वात दोष बुरी तरह बिगड़ते हैं, बुद्धि कुंद हो जाती है, शरीर में भारीपन आता है और शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने वाले के घर से लक्ष्मी सदा के लिए रुष्ट होकर चली जाती हैं। केवल अत्यंत वृद्ध, गंभीर रोगी और छोटे बालकों को ही इस कड़े नियम से छूट दी गई है।
  • भोजन में जीरे का अत्यधिक सेवन: आयुर्वेद और धर्म शास्त्रों में अगहन मास के दौरान जीरे का सेवन पूरी तरह से वर्जित बताया गया है। इस मौसम में जीरा शरीर के भीतर की आवश्यक चिकनाई को सुखा देता है, रक्त में शीतलता बढ़ाता है और पाचन तंत्र को मंद कर देता है। इसके स्थान पर सोंठ, अजवाइन, मेथी और हींग का उपयोग अत्यंत गुणकारी माना गया है।
  • तामसिक भोजन और मदिरा का सेवन: मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन, बासी अन्न और मसूर की दाल का सेवन इस पूरे महीने में कड़ाई से त्याज्य है। तामसिक आहार मनुष्य की आध्यात्मिक ऊर्जा का नाश कर देता है, उसकी बुद्धि को भ्रष्ट करता है और मन में काम, क्रोध, वासना व आलस्य को तीव्र गति से बढ़ाता है।
  • दूसरों की निंदा और कटु वचनों का प्रयोग: किसी भी व्यक्ति की पीठ पीछे बुराई करना, मिथ्या भाषण करना, किसी को धोखा देना और क्रोध में अपशब्द कहना इस मास में किए गए समस्त शुभ कर्मों को तत्काल भस्म कर देता है। अगहन मास में वाणी का संयम और मौन का अभ्यास ही सबसे बड़ा तप माना गया है।
  • ब्रह्मचर्य व्रत का खंडन: मार्गशीर्ष मास में शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर पूर्ण संयम रखना अत्यंत आवश्यक होता है। इस कालखंड में इंद्रिय सुखों और भोग विलास में अत्यधिक लिप्त रहने से शरीर की ओज शक्ति समाप्त हो जाती है और व्यक्ति का आध्यात्मिक प्रभामंडल पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
  • देर तक सोना और सूर्योदय के बाद जागना: सूर्य निकलने के बाद तक बिस्तर पर पड़े रहना सूर्य नारायण और मित्र आदित्य का सीधा अपमान माना जाता है। इससे मनुष्य का आत्मबल क्षीण होता है, कार्यक्षेत्र में असफलताएं मिलती हैं और समाज में मान प्रतिष्ठा की भारी हानि होती है।
  • अन्न और जल का अनादर करना: चूंकि यह मास माता अन्नपूर्णा के अवतरण और खेतों से नई फसल के घर आने का काल है, अतः भोजन की थाली में जूठन छोड़ना अथवा अन्न को व्यर्थ फेंकना अक्षम्य अपराध माना गया है। जितना भोजन करना हो, केवल उतना ही थाली में लेना चाहिए और अन्न को परब्रह्म मानकर आदर सहित ग्रहण करना चाहिए।

इन सात वर्जित गलतियों से अपने आप को बचाकर रखना ही इस मास का सबसे बड़ा धर्म है। जो मनुष्य इन नियमों की रक्षा करता है, धर्म उसकी समस्त संकटों से स्वयं रक्षा करता है।

जीरा निषेध और आहार चर्या का वैज्ञानिक व आयुर्वेदिक पक्ष

सनातन संस्कृति का कोई भी नियम केवल अंधविश्वास अथवा धार्मिक हठधर्मिता पर आधारित नहीं है बल्कि उसके पीछे गहरा मानव शरीर विज्ञान और ऋतु अनुकूल स्वास्थ्य का दृष्टिकोण छिपा हुआ है। अगहन मास में जीरा न खाने का स्पष्ट निर्देश चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम जैसे महान आयुर्वेदिक ग्रंथों में विस्तार से समझाया गया है।

मार्गशीर्ष मास में बाहर का वातावरण अत्यंत ठंडा और शुष्क होता है। जीरा अपने गुण धर्म में रुक्ष, वात वर्धक और शीत वीर्य माना जाता है। जब शीत ऋतु में मानव शरीर पहले से ही बाह्य ठंड से जूझ रहा होता है तब भोजन में जीरे का अधिक प्रयोग त्वचा और आंतरिक नसों के भीतर की प्राकृतिक नमी को तेजी से सोख लेता है। इसके परिणामस्वरूप जोड़ों में भयानक दर्द, त्वचा का फटना, होंठों का सूखना, गंभीर कब्ज और पेट में अफारा जैसी वात व्याधियां जन्म ले लेती हैं। इसके अतिरिक्त जीरा जठराग्नि को उस स्तर पर प्रदीप्त नहीं कर पाता जिसकी आवश्यकता इस मौसम में भारी भोजन को पचाने के लिए होती है।

इसके विपरीत, इस मौसम में ऐसे मसालों और द्रव्यों का सेवन करने का निर्देश दिया गया है जो तासीर में गर्म, चिकने और पाचक हों। अगहन के पूरे महीने में मेथी, सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली, दालचीनी, लौंग, तिल और गुड़ का नियमित सेवन शरीर को आंतरिक ऊष्मा प्रदान करता है और जठराग्नि को प्रचंड बनाए रखता है। इससे खाया पिया भोजन शरीर के सातों धातुओं में ठीक से रूपांतरित होता है और शरीर में अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण होता है। अतः जीरे का त्याग करना वास्तव में बदलते मौसम के अनुसार अपने शरीर को निरोगी रखने का एक अत्यंत वैज्ञानिक और सटीक उपाय है।

शंख पूजन का महत्व और घर की नकारात्मक ऊर्जा का निष्कासन

अगहन मास में भगवान विष्णु के परम प्रिय आयुध पाञ्चजन्य शंख की पूजा का अत्यंत अलौकिक और चमत्कारी महत्व माना गया है। समुद्र मंथन के समय जब चौदह रत्न प्रकट हुए थे तब शंख भी उसी क्षीरसागर से उत्पन्न हुआ था, जिसके कारण इसे माता लक्ष्मी का सहोदर भ्राता माना जाता है। जिस भवन में नित्य शंख की पूजा होती है और शंख की ध्वनि गूंजती है, वहां कभी दरिद्रता, कलह और अशांति के बादल नहीं ठहर सकते।

पूजा की विधि के अनुसार प्रातःकाल स्नान के उपरांत एक तांबे अथवा चांदी की सुंदर थाली में शंख को स्थापित करना चाहिए। शंख पर गंगाजल और कच्चे दूध से अभिषेक करके उस पर केसर, कुमकुम और श्वेत चंदन का त्रिपुंड लगाना चाहिए। इसके पश्चात शंख में शुद्ध जल भरकर उसे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के चरणों से स्पर्श कराना चाहिए और ॐ शंखाय नमः मंत्र का जप करना चाहिए।

पूजा संपन्न होने के पश्चात उस शंख के जल को आम के पत्तों अथवा दूर्वा की सहायता से घर के प्रत्येक कमरे, तिजोरी के स्थान, रसोई घर और विशेष रूप से मुख्य द्वार पर श्रद्धापूर्वक छिड़कना चाहिए। यह अभिमंत्रित जल घर के वातावरण में तैर रही समस्त नकारात्मक ऊर्जा, नजर दोष, ईर्ष्या की तरंगों और सूक्ष्म वास्तु दोषों को तत्काल समाप्त कर देता है।

इसके अतिरिक्त, सायंकाल के समय सूर्यास्त के ठीक बाद घर के आंगन अथवा बालकनी में खड़े होकर तीन बार शंख की गंभीर ध्वनि करनी चाहिए। आधुनिक भौतिक विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि शंख की ध्वनि से उत्पन्न होने वाली विशिष्ट कंपन तरंगे वातावरण में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करने की असाधारण क्षमता रखती हैं। अगहन मास में किया गया यह शंख अनुष्ठान परिवार के सभी सदस्यों के मानसिक तनाव को दूर करके घर में सुख और समृद्धि का नया सवेरा लेकर आता है।

ब्रह्मचर्य और मन के संयम का आध्यात्मिक विज्ञान

अक्सर सांसारिक लोग ब्रह्मचर्य का बहुत संकीर्ण अर्थ निकालते हैं और इसे केवल शारीरिक दूरी तक सीमित मान लेते हैं, परंतु वैदिक दर्शन में ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ है अपनी चेतना को ब्रह्म के चिंतन में लीन रखना। अगहन मास की लंबी, शांत और गंभीर रात्रियां मनुष्य के भीतर सोई हुई आध्यात्मिक शक्तियों को जगाने के लिए प्रकृति का सबसे बड़ा वरदान मानी गई हैं।

सर्दियों के इस मौसम में जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों, भोगों और कामुक विचारों से समेटकर अंतर्मुखी बनाता है तब उसके शरीर में सुरक्षित वीर्य शक्ति और प्राण ऊर्जा नीचे से ऊपर की ओर उर्ध्वगामी होने लगती है। यह ऊर्जा मेरुरज्जु के मार्ग से होती हुई जब मस्तिष्क के आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र तक पहुँचती है, तो वह एक दिव्य तेज, ओज और आत्मबल में परिवर्तित हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति इस मास में भोग विलास और शारीरिक सुखों में अत्यधिक लिप्त रहता है, तो शीत ऋतु की प्राकृतिक शक्ति संचय करने की पूरी जैविक प्रक्रिया छिन्न भिन्न हो जाती है, जिससे वह आगामी पूरे वर्ष दुर्बलता और बीमारियों का शिकार बना रहता है।

जो साधक अगहन मास में मन, वचन और कर्म से पवित्रता का व्रत धारण करता है, उसकी स्मरण शक्ति और एकाग्रता अद्भुत रूप से बढ़ जाती है। उसके चेहरे पर एक ऐसा सम्मोहक और शांत तेज दिखाई देने लगता है जो दूसरों को भी शांति प्रदान करता है। मन का संयम ही वह द्वार है जहां से ईश्वर की सच्ची कृपा का प्रवाह जीवन में प्रारंभ होता है।

वाणी का संयम, मौन का फल और मानसिक शांति का संचय

शास्त्रों में कहा गया है कि घाव बाणों से लगे हों तो भर जाते हैं, परंतु कटु वाणी से लगे घाव कभी नहीं भरते। अगहन मास में वाणी की शुद्धि पर अत्यधिक बल दिया गया है क्योंकि वाणी साक्षात देवी सरस्वती का वास स्थान है। जब मनुष्य बिना सोचे समझे बोलता है, दूसरों की आलोचना करता है अथवा व्यर्थ के वाद विवाद में समय नष्ट करता है, तो उसकी अमूल्य प्राण शक्ति व्यर्थ में बह जाती है।

अगहन मास में प्रतिदिन कम से कम एक घंटा मौन रहने का अभ्यास करना चाहिए। मौन रहने से मन की भटकन शांत होती है, रक्तचाप सामान्य रहता है और मस्तिष्क को गहरा विश्राम मिलता है। जब मुख बंद होता है तब अंतःकरण की आंखें खुलती हैं और मनुष्य अपने स्वयं के दोषों को देख पाता है।

यदि बोलना अत्यंत आवश्यक हो, तो केवल वही बोलें जो सत्य हो, प्रिय हो और दूसरों का कल्याण करने वाला हो। इस महीने में किसी भी व्यक्ति का उपहास उड़ाना, किसी पर झूठा आक्षेप लगाना अथवा कटु वचनों से किसी का हृदय दुखाना महापाप माना गया है। जो मनुष्य अपनी वाणी को वश में कर लेता है, वह संपूर्ण संसार पर विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य हासिल कर लेता है।

शीतकालीन वस्त्र दान, अन्नदान और गुप्त दान का महात्म्य

मार्गशीर्ष मास को दान का साक्षात महापर्व कहा गया है। शीत ऋतु के प्रचंड प्रकोप के समय जब निर्धन, असहाय और अनाथ लोग कड़ाके की ठंड में कांप रहे होते हैं, उस समय उनके लिए किए गए छोटे से प्रयास का मूल्य करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से भी अधिक माना जाता है। शास्त्रों का मत है कि संकट के समय दिया गया दान ही वास्तविक धर्म है।

  • गर्म ऊनी कंबलों का दान: शनिवार अथवा अमावस्या के दिन किसी कुष्ठ रोगी, अत्यंत वृद्ध अथवा खुले में सोने वाले असहाय व्यक्ति को काला या गहरा कंबल ओढ़ाना राहु और शनि की समस्त क्रूर दशाओं को शांत कर देता है।
  • जूते और चप्पलों का वितरण: शीत ऋतु में नंगे पैर चलने वाले निर्धनों को जूते या चप्पल पहनाने से व्यक्ति को अपने जीवन के कठिन रास्तों पर ईश्वरीय संबल प्राप्त होता है और पैरों के समस्त रोग नष्ट होते हैं।
  • अन्न और खिचड़ी का दान: नए चावल, मूंग की दाल और गाय के शुद्ध घी से बनी गरमागरम खिचड़ी का वितरण भूखे लोगों में करने से घर के अन्न भंडार कभी खाली नहीं होते।
  • गुप्त दान की महिमा: जब दान इस प्रकार दिया जाए कि बाएं हाथ को भी पता न चले कि दाहिने हाथ ने क्या दिया है, तो वह गुप्त दान साक्षात वैकुंठ का मार्ग प्रशस्त करता है।

दान देते समय मन में तनिक भी अहंकार नहीं आना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि ईश्वर ने हमें देने योग्य बनाया है, यह उसकी परम कृपा है। जब हम किसी कांपते हुए व्यक्ति के तन को ढंकते हैं, तो वास्तव में हम भगवान नारायण के ही विराट स्वरूप की सेवा कर रहे होते हैं। यह पुण्य कभी निष्फल नहीं जाता और जीवन के अंत समय में जीव की ढाल बनकर खड़ा रहता है।

आत्म अनुशासन से जीवन का वास्तविक और स्थायी रूपांतरण

सनातन धर्म केवल मंदिर जाने और मंत्र जपने की बाह्य क्रियाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन को एक अत्यंत अनुशासित, पवित्र, स्वस्थ और सुंदर लय में जीना सिखाता है। अगहन मास के ये कड़े नियम और वर्जित कार्य मनुष्य को प्रकृति के शाश्वत नियमों के साथ पूर्ण तालमेल बिठाकर चलने की प्रेरणा देते हैं। जब हम अपने जीवन से प्रमाद, आलस्य, वासना और तामसिक वृत्तियों का परित्याग करते हैं, तो हमारे भीतर छुपा हुआ देवत्व स्वयं प्रकट होने लगता है।

शीत ऋतु का यह स्वर्णिम कालखंड आत्म निरीक्षण करने, अपने चरित्र की कमियों को दूर करने और नई आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय करने का सबसे उत्तम अवसर है। जो साधक और गृहस्थ अगहन मास की इस पावन आचार संहिता को अपने जीवन का अंग बना लेता है, उसके जीवन से दरिद्रता, भय और शोक का सदा के लिए लोप हो जाता है। उसके घर में प्रेम, सौहार्द, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड समृद्धि का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। नियमों का यह कड़ा पालन ही मनुष्य को नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त करके परम पद की ओर ले जाने वाला सबसे सरल और प्रामाणिक राजमार्ग है।

FAQ

अगहन मास में जीरा खाना क्यों वर्जित माना गया है? अगहन में ठंड के कारण जीरा शरीर में रूखापन और वात दोष बढ़ाता है, जिससे जोड़ों का दर्द और पाचन विकार हो सकते हैं, इसलिए इसका त्याग हितकर है।

इस महीने में दिन में सोने की मनाही क्यों की गई है? दिन में सोने से शरीर में कफ और तमस बढ़ता है, जठराग्नि मंद होती है, बुद्धि की तीक्ष्णता घटती है और शास्त्रों के अनुसार घर में दरिद्रता आती है।

अगहन मास में शंख में जल भरकर छिड़कने का क्या लाभ है? शंख जल छिड़कने से घर के समस्त वास्तु दोष, नकारात्मक ऊर्जा और सूक्ष्म रोगाणु नष्ट होते हैं तथा माता लक्ष्मी की स्थाई कृपा प्राप्त होती है।

अगहन के महीने में कौन से सात मुख्य कार्य अवश्य करने चाहिए? ब्रह्म मुहूर्त स्नान, गीता पाठ, शंख पूजन, गर्म कपड़ों का दान, तुलसी सेवा, सात्विक आहार और गौ सेवा इस मास के सात अनिवार्य कर्तव्य हैं।

क्या अगहन मास में सामान्य व्यक्ति को भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए? हाँ, इस मास में शारीरिक और मानसिक संयम रखने से प्राण शक्ति और ओज की रक्षा होती है, जिससे आध्यात्मिक साधना शीघ्र फलित होती है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

पं. नीलेश शर्मा (63)


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