अगहन मास का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

By पं. अभिषेक शर्मा

बाह्य शीतलता, आंतरिक दिव्यता, गीता सार और संपूर्ण जीवन कायाकल्प

अगहन मास का आध्यात्मिक महत्व: सार, साधना और रहस्य

सनातन चेतना में अगहन मास का शाश्वत स्वरूप

सनातन काल गणना के विशाल क्षितिज पर मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास को केवल ऋतुओं के एक साधारण संधिकाल के रूप में नहीं देखा जाता, अपितु यह मास मानवीय जीवात्मा को परमात्मा के साथ एकरस करने वाला एक महातीर्थ है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय में स्वयं योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी परम विभूतियों का उद्घाटन करते हुए अर्जुन से कहा था कि मासानां मार्गशीर्षोऽहम् अर्थात समस्त बारह महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। जब स्वयं जगदाधार भगवान विष्णु इस मास के मूर्त विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं तब इस कालखंड का प्रत्येक क्षण अलौकिक ऊर्जा से भर जाता है।

यह वह पावन बेला है जब प्रकृति बाह्य कोलाहल को समेटकर एक गहरी, शांत और गंभीर शीतलता में प्रवेश करती है। इस समय चलने वाली सर्द हवाएं मनुष्य को यह मौन संदेश देती हैं कि संसार की बाह्य दौड़धूप को विराम देकर अब अपने अंतःकरण की गहराइयों में उतरने का समय आ चुका है। जो साधक इस ऋतु परिवर्तन के सूक्ष्म रहस्य को समझ लेता है, उसके लिए यह महीना मात्र कैलेंडर की तारीखों का प्रवाह न रहकर आत्म साक्षात्कार की एक स्वर्णिम सीढ़ी बन जाता है।

आध्यात्मिक आयाम शास्त्रीय विवरण गूढ़ दार्शनिक फल
नियम विधान विधान
मास का सर्वोच्च अधिष्ठाता साक्षात योगेश्वर श्री कृष्ण एवं नारायण जीवात्मा का परमात्मा से सनातन संयोग
खगोलीय नक्षत्र स्थिति मृगशिरा एवं आर्द्रा नक्षत्र की प्रधानता अन्वेषण बुद्धि और शिव भाव का जागरण
बाह्य प्राकृतिक लक्षण हेमंत ऋतु का चरम, गिरता तापमान, मंद धूप इंद्रिय संयम और विषयों से उपरामता
आंतरिक यौगिक प्रक्रिया प्राण वायु का अंतर्मुखी संचरण मूलाधार से सहस्रार की ओर कुंडलिनी गति
प्रधान साधना माध्यम गीता पाठ, गायत्री जप, नदी स्नान और अन्न सेवा संचित पापों का भस्म होना और चित्त शुद्धि
मुख्य जीवन दृष्टि कृतज्ञता, करुणा, आत्मसंयम और त्याग आगामी वर्ष के लिए शारीरिक व मानसिक संबल
प्रधान आहार नियम सात्विक उष्ण अन्न, नए गुड़ तिल का सेवन, जीरा त्याग जठराग्नि रक्षा, त्रिदोष संतुलन और दीर्घायु
मुख्य देव अनुष्ठान शंख पूजन, तुलसी शालिग्राम सेवा और दीपदान वास्तु शोधन, लक्ष्मी कृपा और दारिद्र्य नाश

प्रकृति का यह शांत वातावरण मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराने के लिए सबसे अनुकूल पृष्ठभूमि तैयार करता है। जब बाह्य जगत में प्रकाश कम होने लगता है और रातें लंबी होने लगती हैं तब अंतःकरण में ज्ञान का अखंड दीपक जलाना ही इस मास की सर्वोपरि साधना मानी जाती है। जो मनुष्य इस समय को पहचानकर अपने विचारों को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है, उसके अंतःकरण से सांसारिक दुखों का अंधकार सदा के लिए मिट जाता है।

बाह्य शीतलता और आंतरिक आध्यात्मिक अग्नि का समन्वय

हेमंत ऋतु में जब वातावरण का तापमान गिरता है, तो उसका सीधा प्रभाव मानव देह और मन पर पड़ता है। आयुर्वेद और योग शास्त्र दोनों इस बात की पुष्टि करते हैं कि जैसे ही बाहर ठंड बढ़ती है, शरीर के सूक्ष्म रोमछिद्र बंद हो जाते हैं। इससे शरीर की जैविक ऊर्जा बाहर नष्ट होने से बच जाती है और जठराग्नि के रूप में उदर में तथा प्राण शक्ति के रूप में सुषुम्ना नाड़ी में केंद्रित होने लगती है।

साधारण अज्ञानी मनुष्य इस संचित ऊर्जा को केवल अधिक सोने, आलस्य करने अथवा अत्यधिक गरिष्ठ भोजन करके व्यर्थ गंवा देता है, जबकि एक प्रबुद्ध साधक इस प्राकृतिक स्थिति का उपयोग अपनी आंतरिक साधना को प्रदीप्त करने में करता है। वैदिक परंपरा का यह स्पष्ट संदेश है कि जब बाहर की दुनिया ठंडी, धुंधली और शांत हो जाए तब मनुष्य को अपने भीतर ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की दिव्य अग्नि प्रज्वलित करनी चाहिए।

यह समय अपनी दुर्बलताओं पर विजय पाने का है। जिस प्रकार एक बीज शीत काल में भूमि के भीतर शांत रहकर अपनी अंकुरण शक्ति को संचित करता है और वसंत आते ही प्रस्फुटित होकर एक विशाल वृक्ष बन जाता है, ठीक उसी प्रकार अगहन मास में की गई मौन तपस्या मनुष्य के संपूर्ण आगामी वर्ष के व्यक्तित्व का निर्माण करती है। इस महीने में मन की चंचलता को वश में करना वर्ष के अन्य महीनों की तुलना में सबसे अधिक सुगम होता है, क्योंकि प्रकृति स्वयं हमें स्थिरता की ओर अग्रसर करती है।

अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् और कृतज्ञता का पावन दर्शन

तैत्तिरीय उपनिषद् में महर्षि वरुण अपने पुत्र भृगु को उपदेश देते हुए कहते हैं कि अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् अर्थात अन्न को ही साक्षात ब्रह्म जानो। अगहन मास इस वैदिक उद्घोष का सबसे प्रत्यक्ष और सजीव प्रमाण है। इस महीने में खेतों से खरीफ की स्वर्णिम धान की फसल कटकर खलिहानों और घरों में आती है।

ग्रामीण भारत में इस समय नवान्न पर्व मनाया जाता है, जो सनातन संस्कृति की अटूट कृतज्ञता को दर्शाता है। आज का आधुनिक मानव उपभोग को अपना अधिकार समझता है, परंतु वैदिक संस्कृति हमें सिखाती है कि प्रकृति से प्राप्त प्रत्येक वस्तु वास्तव में ईश्वरीय कृपा का एक उपहार है। नए अन्न को अपनी जिह्वा पर रखने से पूर्व उसका प्रथम भाग कुलदेवता, ग्राम देवता, पितरों, गौमाता और अग्नि देव को समर्पित करना एक अनिवार्य धर्म माना गया है।

  • भूमि माता के प्रति नमन: जिस माटी ने अपने सीने पर हल के प्रहार सहे और हमें जीवनदायिनी ऊर्जा दी, उसके प्रति शीश झुकाना सनातन मर्यादा है।
  • कृषक के श्रम का सम्मान: दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करने वाले अन्नदाता किसान के पसीने का आदर करना ही वास्तविक राष्ट्र धर्म माना गया है।
  • निर्धनों की क्षुधा तृप्ति: समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन ग्रहण करने से मनुष्य के पाप कटते हैं।
  • जूठन न छोड़ने का संकल्प: थाली में अन्न का एक भी दाना व्यर्थ न फेंकना साक्षात माता अन्नपूर्णा की सबसे बड़ी और सच्ची भक्ति है।
  • पंचमहायज्ञ का संपादन: नए अन्न से देव, ऋषि, पितृ, मनुष्य और भूत यज्ञ करके मनुष्य समस्त सांसारिक ऋणों से मुक्त हो जाता है।

जब मनुष्य इस भाव से अन्न ग्रहण करता है, तो वह भोजन केवल रक्त और मांस का निर्माण नहीं करता बल्कि वह उसकी बुद्धि को सात्विक बनाकर उसकी चेतना को दिव्य बना देता है। अन्न का प्रत्येक कण उस परमात्मा के वात्सल्य का साक्षात प्रमाण बन जाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता का अमर ज्ञान और जीवन में उसका व्यावहारिक रूपांतरण

मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को संपूर्ण विश्व में गीता जयंती का महापर्व मनाया जाता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध प्रांगण में जब महारथी अर्जुन विषाद और मोह के भयंकर अंधकार में डूबकर अपने गांडीव धनुष को रख चुके थे तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वह केवल अर्जुन के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए अमर पथ प्रदर्शक बन गया।

गीता कोई संन्यासियों का ग्रंथ नहीं है बल्कि वह कर्मक्षेत्र में जूझ रहे हर सामान्य मनुष्य की मानसिक व्याधियों की अचूक औषधि है। अगहन मास हमें यह सिखाता है कि जीवन की विषमताओं से भागना नहीं है बल्कि अपने स्वधर्म पर अडिग रहकर निष्काम भाव से कर्म करना है। जब मनुष्य फल की आसक्ति से मुक्त होकर अपना कर्तव्य निभाता है, तो उसके भीतर का तनाव, निराशा और पराजय का भय पूरी तरह विलीन हो जाता है।

इस मास में गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ, जिसमें भगवान के विश्वरूप दर्शन का वर्णन है, मनुष्य के अहंकार को एक क्षण में चूर चूर कर देता है। जब साधक यह समझ जाता है कि इस चराचर जगत में सब कुछ उस एक परमात्मा की इच्छा से ही घटित हो रहा है, तो उसके भीतर की समस्त व्यग्रता शांत हो जाती है। यह बोध ही मनुष्य को जीवन के प्रत्येक संघर्ष में मुस्कुराते हुए खड़े रहने का असीम संबल प्रदान करता है।

सेवा, करुणा और शीतकालीन महादान का मर्म

सनातन धर्म में दान को केवल धन का त्याग नहीं माना गया है बल्कि यह अपने भीतर जमे हुए संचय के लोभ को काटने की एक आध्यात्मिक शल्य क्रिया है। अगहन मास की कड़ाके की ठंड उन लोगों के लिए एक भीषण परीक्षा बन जाती है जिनके पास तन ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र और सिर छिपाने के लिए पक्की छत नहीं होती।

ऐसे समय में किसी कांपते हुए असहाय वृद्ध के कंधों पर गर्म ऊनी कंबल डालना, नंगे पैर चलने वाले किसी निर्धन को जूते पहनाना और किसी भूखे जीव को गरम खिचड़ी खिलाना साक्षात भगवान विष्णु की पूजा करने के समान है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि संकट के समय दिया गया दान ही वास्तविक पुण्य का निर्माण करता है।

  • काले तिल और गुड़ का दान: सूर्य और शनि के संतुलन से कुंडली के समस्त पाप कटते हैं और शरीर में आरोग्यता आती है।
  • मूक पशु पक्षियों का पोषण: ठंड में भटकती हुई गायों के लिए चारे और अलाव की व्यवस्था करना तैंतीस कोटि देवताओं को एक साथ प्रसन्न करता है।
  • गुप्त दान का संकल्प: अपने शुभ कर्मों का तनिक भी प्रचार न करना और निस्वार्थ भाव से सेवा करना अंतःकरण को निर्मल करता है।
  • वात्सल्य और अपनत्व का विस्तार: समाज के उपेक्षित वर्ग को प्रेम और सम्मान देना ही सच्ची नारायण सेवा मानी गई है।
  • औषध और जल का वितरण: बीमार और निर्धन व्यक्तियों को शीतकालीन औषधियां और गर्म पेय उपलब्ध कराना महान धर्म का कार्य है।

यह सेवा भाव मनुष्य के हृदय को संकीर्ण स्वार्थों से मुक्त करके उसे विराट चेतना के साथ जोड़ देता है। जो हाथ दूसरों के आंसू पोंछने के लिए उठते हैं, वे हाथ स्वयं ईश्वर के करकमल बन जाते हैं।

ब्रह्म मुहूर्त का अमृत रस और पवित्र नदियों में स्नान

अगहन मास की प्रातःकालीन बेला का वर्णन शब्दों में करना संभव नहीं है। जब संपूर्ण संसार गहरी निद्रा में लीन होता है तब आकाश में तारों की मंद रोशनी के नीचे ब्रह्म मुहूर्त का उदय होता है। इस समय वायुमंडल में ऑक्सीजन और प्राण शक्ति अपने उच्चतम और शुद्धतम स्तर पर होती है।

पद्म पुराण का यह स्पष्ट निर्देश है कि मार्गशीर्ष मास में सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, विशेष रूप से यमुना जी में स्नान करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। जब साधक शीतल जल में डुबकी लगाता है, तो उसके शरीर का रक्त संचार तीव्र गति से चलने लगता है, जिससे समस्त नसें और नाड़ियां जाग उठती हैं। यह स्नान केवल शरीर के मैल को नहीं धोता बल्कि अंतःकरण के विकारों और मानसिक अवसाद को भी बहा ले जाता है।

यदि किसी कारणवश नदियों तक जाना संभव न हो, तो घर पर ही तांबे के पात्र में रखे जल में थोड़ा सा गंगाजल, काले तिल और तुलसी पत्र मिलाकर स्नान करने से वही दिव्य फल प्राप्त होता है। इस स्नान के पश्चात जब साधक उगते हुए सूर्य को तांबे के लोटे से अर्घ्य देता है, तो उसका ओज और तेज देखते ही बनता है।

शंख ध्वनि, दीपदान और गृह ऊर्जा का परिशोधन

अगहन मास में गृह शुद्धि का अत्यंत विशेष विधान बताया गया है। शीत ऋतु में कमरों के बंद रहने के कारण जो नमी और भारीपन घर के भीतर जमा हो जाता है, वह घर के सदस्यों की मानसिक स्थिति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इस दोष को दूर करने के लिए वैदिक वास्तु और तंत्र शास्त्रों ने शंख और दीपदान का अचूक उपाय सुझाया है।

शंख को माता लक्ष्मी का सहोदर भ्राता माना गया है। अगहन मास में शंख में गंगाजल भरकर पूरे घर में छिड़कने से घर के समस्त वास्तु दोष और बुरी नजर का प्रभाव समाप्त हो जाता है। इसके साथ ही, सायंकाल गोधूलि वेला में घर के मुख्य द्वार और तुलसी के पौधे के पास गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाना साक्षात वैकुंठ लोक को घर में आमंत्रित करने के समान है।

जब शंख की गंभीर ध्वनि घर के आंगन में गूंजती है, तो उसकी कंपन तरंगे वातावरण में मौजूद हानिकारक सूक्ष्म रोगाणुओं को नष्ट कर देती हैं। घर का आभा मंडल पूरी तरह स्वच्छ हो जाता है और वहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के मन में सकारात्मकता, शांति और नवीन उत्साह का संचार होने लगता है।

यम, नियम और इंद्रिय निग्रह का यौगिक विज्ञान

अष्टांग योग में महर्षि पतंजलि ने यम और नियम को साधना का पहला आधार स्तंभ बताया है। अगहन मास की गंभीरता मनुष्य को अपनी इंद्रियों को वश में करने की सबसे बड़ी प्रेरणा देती है। शीत ऋतु में जिह्वा का स्वाद और शरीर का आलस्य मनुष्य को पतन की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं, परंतु साधक को इस समय विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए।

इस महीने में दिन में सोना पूरी तरह वर्जित किया गया है, क्योंकि दिन में सोने से कफ और तमस बढ़ता है जो बुद्धि को मंद कर देता है। भोजन में अत्यधिक जीरे का त्याग करना चाहिए ताकि शरीर में वात विकार न भड़कें। वाणी पर नियंत्रण रखना और परनिंदा से दूर रहना एक महान तपस्या मानी गई है।

जब मनुष्य अपने मन और इंद्रियों को भोग विलास से हटाकर आत्म चिंतन में लगाता है तब उसकी शक्ति का ऊर्ध्वगमन प्रारंभ होता है। मूलाधार चक्र में सोई हुई कुंडलिनी शक्ति धीरे धीरे जागकर रीढ़ की हड्डी के रास्ते ऊपर उठने लगती है। यह योग साधना मनुष्य को सामान्य सांसारिक स्तर से उठाकर एक सिद्ध और तेजस्वी पुरुष की श्रेणी में ला खड़ा करती है।

नवग्रहों का संतुलन और प्रारब्ध कर्मों का शमन

मनुष्य का जीवन उसके पूर्व जन्मों के संचित प्रारब्ध और नवग्रहों की रश्मियों के अधीन होता है। अगहन मास में कुछ विशिष्ट वैदिक अनुष्ठानों का पालन करके कोई भी व्यक्ति अपनी कुंडली के समस्त अनिष्ट ग्रहों को अपने अनुकूल बना सकता है।

  • सूर्य और मंगल की शुभता: मित्र आदित्य को अर्घ्य देने और लाल वस्तुओं का दान करने से पराक्रम, यश और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
  • चंद्रमा और बुध का उत्थान: शंख पूजन, तुलसी सेवा और पवित्र स्नान से मन की चंचलता समाप्त होती है और व्यापारिक बुद्धि तीव्र होती है।
  • गुरु ग्रह का वरदान: भगवान शालिग्राम का पंचामृत अभिषेक और गीता पाठ करने से विद्या, ज्ञान और पारिवारिक सुख के बंद द्वार खुलते हैं।
  • शुक्र ग्रह का परिष्कार: घर की पाकशाला को स्वच्छ रखने और अन्न का सम्मान करने से भौतिक समृद्धि और दांपत्य प्रेम बढ़ता है।
  • शनि, राहु और केतु की शांति: काले तिल, ऊनी वस्त्र और जूतों का दान करने से साढ़ेसाती, ढैय्या और आकस्मिक संकट तत्काल टल जाते हैं।

इस प्रकार, अगहन मास का पूरा कालखंड एक ऐसा दिव्य अवसर है जहां मनुष्य अपने जीवन के संपूर्ण ग्रह चक्र को बिना किसी भारी खर्च के केवल अपनी सात्विक साधना के बल पर संतुलित कर सकता है।

तीस दिनों की तपस्या से आगामी वर्ष का कायाकल्प

अगहन मास के तीस दिन वास्तव में मनुष्य के संपूर्ण वर्ष के जीवन की नींव तैयार करने की एक प्रयोगशाला हैं। इन तीस दिनों में अपनाया गया सात्विक आहार, ब्रह्म मुहूर्त में उठने का अनुशासन, पवित्र नदियों का स्नान और प्रतिदिन किया जाने वाला गायत्री व विष्णु जप मनुष्य की संपूर्ण जैविक घड़ी को पुनर्स्थापित कर देता है।

आयुर्वेद के अनुसार इस काल में संचित किया गया ओज मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता को इतना मजबूत कर देता है कि आगामी ग्रीष्म और वर्षा ऋतु में भी उसका शरीर व्याधियों से सर्वथा सुरक्षित रहता है। मानसिक स्तर पर, गीता के स्वाध्याय और मौन के अभ्यास से जो स्थिरता प्राप्त होती है, वह वर्ष भर आने वाली पारिवारिक, व्यावसायिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने के लिए एक अभेद्य ढाल का काम करती है।

आध्यात्मिक स्तर पर, अगहन मास में जगाई गई अंतःचेतना मनुष्य को विषय वासनाओं के दलदल में धंसने से रोकती है। यह मास हमें सिखाता है कि जीवन का वास्तविक आनंद बाहर की वस्तुओं के संचय में नहीं बल्कि भीतर की शांति और संतोष में है। जो व्यक्ति इस साधना को अपने जीवन में उतार लेता है, उसका आगामी वर्ष सुख, समृद्धि और आरोग्यता से परिपूर्ण रहता है।

पूर्णता की ओर प्रस्थान और नव जीवन का शुभारंभ

मार्गशीर्ष पूर्णिमा के पावन दिवस पर जब भगवान दत्तात्रेय और माता अन्नपूर्णा की जयंती का उत्सव संपन्न होता है तब यह मास अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। यह समापन किसी अंत की सूचना नहीं है बल्कि यह साधना से पुष्ट हुए एक नए, ओजस्वी और दिव्य जीवन का भव्य शुभारंभ है।

अगहन मास हमें एक श्रेष्ठ, संतुलित और मानवीय गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति बनने का मार्ग दिखाकर जाता है। जब हम बाह्य जगत की शीतलता के बीच अपने भीतर की दिव्यता को पहचान लेते हैं तब संसार का कोई भी अंधकार हमें विचलित नहीं कर सकता।

आइए, हम सब अपने जीवन में मार्गशीर्ष के इस पावन संदेश को धारण करें, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहें, अपने कर्तव्यों का निष्काम भाव से पालन करें और प्रत्येक प्राणी में उसी एक परम चेतना का दर्शन करते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाएं। यह साधना ही हमारे जीवन को नश्वरता से अमरता की ओर ले जाने वाला शाश्वत प्रकाश स्तंभ बनेगी।

FAQ

अगहन मास को भगवान श्री कृष्ण का साक्षात स्वरूप क्यों माना जाता है? श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि समस्त मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ, इसलिए यह मास भगवान का साक्षात विग्रह है।

अगहन मास की साधना से पूरे वर्ष के लिए क्या लाभ मिलता है? इस मास में संचित की गई शारीरिक ऊर्जा, ओज और मानसिक स्थिरता मनुष्य को आगामी पूरे वर्ष रोगों से मुक्त रखती है और आध्यात्मिक संबल देती है।

इस महीने में नए अन्न का भोग लगाने की परंपरा का क्या रहस्य है? अन्न को साक्षात ब्रह्म माना गया है, अतः खेतों से आई नई फसल को सर्वप्रथम ईश्वर, पितरों और प्रकृति को अर्पित करके कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

अगहन मास में गीता जयंती मनाने का क्या विशेष महत्व है? मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का अमर उपदेश दिया था, इस दिन गीता पाठ करने से जीवन के समस्त संशय और विषाद मिट जाते हैं।

शीत ऋतु में आंतरिक ऊर्जा को सुरक्षित रखने के लिए क्या करना चाहिए? ब्रह्म मुहूर्त में जागरण, सात्विक गर्म आहार, नित्य गायत्री जप, ध्यान और व्यर्थ के सांसारिक प्रपंचों से दूर रहकर मौन का अभ्यास करना चाहिए।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


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