By अपर्णा पाटनी
30 तिथियों का संपूर्ण कैलेंडर, एकादशी, पूर्णिमा और प्रमुख व्रत

सनातन काल गणना के वैदिक सिद्धांतों के अनुसार मार्गशीर्ष मास संपूर्ण वर्ष का सर्वाधिक पावन और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण कालखंड माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने यह स्पष्ट घोषणा की है कि समस्त महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। जब साक्षात जगदीश्वर इस महीने के स्वरूप में प्रतिष्ठित होते हैं तब इस मास का प्रत्येक दिन, प्रत्येक तिथि और प्रत्येक मुहूर्त साधक के लिए किसी महायज्ञ से कम नहीं होता। अगहन मास का पंचांग केवल तिथियों का संकलन नहीं है बल्कि यह मानव चेतना को भौतिक बंधनों से मुक्त करके परम पद की ओर ले जाने वाली एक अत्यंत व्यवस्थित आध्यात्मिक समय सारणी है।
इस पावन मास में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक कुल 30 तिथियां आती हैं, जिनमें व्रत, पर्व और उत्सवों की एक अटूट श्रृंखला प्रवाहित होती है। कृष्ण पक्ष में जहां कालभैरव अष्टमी और उत्पन्ना एकादशी जैसी कठोर तपस्या वाली तिथियां आती हैं, वहीं शुक्ल पक्ष में विवाह पंचमी, चंपा षष्ठी, मोक्षदा एकादशी, गीता जयंती, अनंग त्रयोदशी, धनु संक्रांति और मार्गशीर्ष पूर्णिमा अर्थात दत्तात्रेय जयंती जैसे महापर्व मानव जीवन को धन्य बनाते हैं।
| पंचांग आयाम | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| नियम | विधान |
| मास का वैदिक नाम | मार्गशीर्ष मास अर्थात अगहन मास |
| काल गणना आधार | पूर्णिमांत मास प्रणाली और सौर संक्रांति संयोग |
| प्रमुख एकादशी तिथियां | उत्पन्ना एकादशी और मोक्षदा एकादशी |
| मास का सर्वोच्च ज्ञान पर्व | श्रीमद्भगवद्गीता जयंती |
| प्रधान खगोलीय घटना | सूर्य देव का धनु राशि में प्रवेश अर्थात धनु संक्रांति |
| प्रमुख जयंती उत्सव | भगवान दत्तात्रेय जयंती, कालभैरव जयंती और अन्नपूर्णा जयंती |
| प्रधान स्नान पर्व | अगहन अमावस्या और मार्गशीर्ष त्रिदिवसीय पूर्णिमा स्नान |
यह पंचांग साधक को यह समझने में सहायता करता है कि किस विशिष्ट तिथि पर किस देवी देवता की आराधना करने से प्रारब्ध के दोष कटते हैं। समय के इस दिव्य विभाजन का लाभ उठाकर कोई भी मनुष्य अपने जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन से सुसज्जित कर सकता है।
अगहन मास का कृष्ण पक्ष कार्तिक पूर्णिमा के ठीक अगले दिन से प्रारंभ होता है। इस पखवाड़े में चंद्रमा की कलाएं धीरे धीरे घटती हैं, जिससे यह समय अंतर्मुखी साधना, तपस्या, तंत्र शोधन और पितरों की तृप्ति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
| तिथि क्रम | तिथि नाम | प्रमुख व्रत एवं पर्व | शास्त्रीय देवता एवं साधना विधान |
|---|---|---|---|
| नियम | विधान | विधान | विधान |
| प्रथम दिन | कृष्ण प्रतिपदा | अगहन मास स्नान व्रत आरंभ | भगवान केशव पूजन और प्रातः नदी स्नान संकल्प |
| दूसरा दिन | कृष्ण द्वितीया | अशून्य शयन व्रत | भगवान लक्ष्मीनारायण पूजन और दांपत्य सुख कामना |
| तीसरा दिन | कृष्ण तृतीया | कजरी तृतीया उपवास | माता गौरी आराधना और सौभाग्य संवर्धन |
| चौथा दिन | कृष्ण चतुर्थी | अखुरथ संकष्टी चतुर्थी | मूषक वाहन श्री गणेश पूजन और चंद्र दर्शन अर्घ्य |
| पांचवां दिन | कृष्ण पंचमी | नाग पंचमी व्रत | नाग देवता पूजन और कालसर्प दोष निवारण |
| छठा दिन | कृष्ण षष्ठी | स्कंद षष्ठी अनुष्ठान | भगवान कार्तिकेय पूजन और पराक्रम वृद्धि |
| सातवां दिन | कृष्ण सप्तमी | मित्र सप्तमी व्रत | भगवान सूर्य मित्र आदित्य पूजन और तांबे से अर्घ्य |
| आठवां दिन | कृष्ण अष्टमी | कालभैरव जयंती एवं अष्टमी | भगवान कालभैरव साधना, भय नाश और शत्रु शमन |
| नौवां दिन | कृष्ण नवमी | नवमी व्रत | माता दुर्गा नवार्ण मंत्र जप और शक्ति आराधना |
| दसवां दिन | कृष्ण दशमी | दशमी व्रत | दिगपाल पूजन और दिशा दोष निवारण |
| ग्यारहवां दिन | कृष्ण एकादशी | उत्पन्ना एकादशी महाव्रत | एकादशी देवी प्राकट्य, भगवान विष्णु पूजन, रात्रि जागरण |
| बारहवां दिन | कृष्ण द्वादशी | पारण एवं गौ द्वादशी | उत्पन्ना एकादशी पारण, तुलसी पूजन और गोग्रास दान |
| तेरहवां दिन | कृष्ण त्रयोदशी | भौम अथवा शनि प्रदोष व्रत | प्रदोष काल शिवलिंग रुद्राभिषेक और ऋण मुक्ति |
| चौदहवां दिन | कृष्ण चतुर्दशी | मासिक शिवरात्रि व्रत | भगवान भोलेनाथ पर जलधारा अर्पण और निशीथ काल पूजा |
| पंद्रहवां दिन | कृष्ण अमावस्या | मार्गशीर्ष अगहन अमावस्या | पितृ तर्पण, काले तिल का दान, पीपल दीपदान और तीर्थ स्नान |
कृष्ण पक्ष के इस पखवाड़े में कालभैरव अष्टमी और उत्पन्ना एकादशी का विशेष महत्व होता है। कालभैरव अष्टमी के दिन काशी के कोतवाल भगवान भैरव की उपासना से मनुष्य के भीतर का अज्ञात भय और अकाल मृत्यु का संकट टल जाता है। वहीं उत्पन्ना एकादशी के दिन एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ था, जिन्होंने मुर नामक दैत्य का संहार करके भगवान नारायण की रक्षा की थी। इस दिन जो साधक अन्न का पूर्ण त्याग करके उपवास रखता है, उसके सैकड़ों जन्मों के संचित पाप जलकर भस्म हो जाते हैं।
अगहन अमावस्या के पश्चात शुक्ल पक्ष का शुभारंभ होता है, जिसमें चंद्रमा की कलाएं दिन प्रतिदिन बढ़ती हैं। यह पखवाड़ा मांगलिक अनुष्ठानों, विवाह, ज्ञान के संवर्धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए परम कल्याणकारी माना गया है।
| तिथि क्रम | तिथि नाम | प्रमुख व्रत एवं पर्व | शास्त्रीय देवता एवं साधना विधान |
|---|---|---|---|
| नियम | विधान | विधान | विधान |
| सोलहवां दिन | शुक्ल प्रतिपदा | नवान्न पर्व शुभारंभ | खेतों से आई नई फसल का पूजन और कुलदेवता भोग |
| सत्रहवां दिन | शुक्ल द्वितीया | यम द्वितीया अनुष्ठान | चित्रगुप्त पूजन और यमुना स्नान |
| अठारहवां दिन | शुक्ल तृतीया | रंभा तृतीया व्रत | माता लक्ष्मी और अप्सरा रंभा पूजन, सौंदर्य वृद्धि |
| उन्नीसवां दिन | शुक्ल चतुर्थी | विनायक चतुर्थी व्रत | विघ्नहर्ता गणेश जी को 21 दूर्वा अर्पण और मोदक भोग |
| बीसवां दिन | शुक्ल पंचमी | विवाह पंचमी महापर्व | श्री राम और माता जानकी विवाह उत्सव, रामायण पाठ |
| इक्कीसवां दिन | शुक्ल षष्ठी | चंपा षष्ठी अर्थात स्कंद षष्ठी | भगवान खंडोबा और कार्तिकेय पूजन, बैंगन बाजरा भोग |
| बाईसवां दिन | शुक्ल सप्तमी | सूर्य सप्तमी व्रत | मित्र आदित्य ध्यान और आरोग्यता हेतु सौर अर्घ्य |
| तेईसवां दिन | शुक्ल अष्टमी | दुर्गाष्टमी व्रत | मां जगदंबा पूजन और कन्या पूजन |
| चौबीसवां दिन | शुक्ल नवमी | नंदा नवमी व्रत | कुलदेवी आराधना और सौभाग्य रक्षा |
| पच्चीसवां दिन | शुक्ल दशमी | मोक्षदा पूर्व पीठिका | भगवान विष्णु के केशव स्वरूप का ध्यान |
| छब्बीसवां दिन | शुक्ल एकादशी | मोक्षदा एकादशी एवं गीता जयंती | श्रीमद्भगवद्गीता पूजन, गीता पाठ, मोक्ष प्राप्ति व्रत |
| सत्ताईसवां दिन | शुक्ल द्वादशी | मत्स्य द्वादशी अनुष्ठान | भगवान विष्णु के प्रथम मत्स्य अवतार का पूजन |
| अट्ठाईसवां दिन | शुक्ल त्रयोदशी | अनंग त्रयोदशी एवं प्रदोष | कामदेव रति पूजन, शिव शक्ति आराधना, दांपत्य प्रेम |
| उनतीसवां दिन | शुक्ल चतुर्दशी | पिशाच मोचन शिव चतुर्दशी | शिव आराधना और कुल के भटके पूर्वजों का उद्धार |
| तीसवां दिन | शुक्ल पूर्णिमा | मार्गशीर्ष पूर्णिमा एवं दत्तात्रेय जयंती | भगवान दत्तात्रेय प्राकट्य, अन्नपूर्णा जयंती, सत्यनारायण कथा |
शुक्ल पक्ष का यह पखवाड़ा सनातन धर्म के दो सबसे बड़े ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रसंगों को अपने भीतर समेटे हुए है। शुक्ल पंचमी को विवाह पंचमी के रूप में मनाया जाता है, जिस दिन त्रेतायुग में मिथिलापुरी में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और जनक दुलारी माता सीता का पावन पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ था। इस दिन घरों और मंदिरों में राम चरित मानस का पाठ करने से परिवार में अटूट प्रेम और मर्यादा की स्थापना होती है।
इसके पश्चात शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती का महापर्व आता है। द्वापर युग में कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि पर जब धनुर्धर अर्जुन विषाद से घिर गए थे तब इसी पावन तिथि पर भगवान श्री कृष्ण ने उनके समस्त संशयों को मिटाने के लिए अमृतमयी श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था। यह विश्व का एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती पर्व के रूप में मनाई जाती है। इस दिन गीता की पोथी की पूजा करना और उसके ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना मनुष्य को साक्षात मोक्ष के द्वार पर खड़ा कर देता है।
अगहन मास के उत्तरार्ध में पंद्रह अथवा सोलह दिसंबर के आसपास सूर्य देव अपनी राशि बदलते हैं। सूर्य जब मंगल की वृश्चिक राशि से निकलकर देवगुरु बृहस्पति की आग्नेय राशि धनु में प्रवेश करते हैं, तो सनातन ज्योतिष में इस खगोलीय घटना को धनु संक्रांति कहा जाता है। सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करते ही संपूर्ण भूमंडल पर एक मास के लिए खरमास अर्थात मलमास लग जाता है।
शास्त्रों का यह अटल नियम है कि खरमास के दौरान विवाह, सगाई, नए गृह का निर्माण, गृह प्रवेश, मुंडन और यज्ञोपवीत जैसे समस्त मांगलिक कार्य पूरी तरह स्थगित कर दिए जाते हैं। इसका कारण यह है कि सूर्य देव जब गुरु की राशि में जाते हैं, तो वे गुरु के तेज और सात्विक ऊर्जा को अपनी प्रचंड किरणों से क्षीण कर देते हैं। गुरु ग्रह ज्ञान, वैवाहिक सुख और संतति का कारक है, इसलिए उनका बल क्षीण होने पर मांगलिक कार्यों का फल शुभ नहीं मिलता। यद्यपि यह समय सांसारिक उत्सवों के लिए वर्जित है, परंतु जप, तप, तीर्थ स्नान, भागवत कथा श्रवण और दान के लिए धनु संक्रांति का काल अत्यंत फलदायी माना गया है।
अगहन मास की अंतिम तिथि अर्थात मार्गशीर्ष पूर्णिमा इस संपूर्ण मास का मुकुट मणि है। इस पावन तिथि को त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त साकार अवतार भगवान दत्तात्रेय के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पातिव्रत्य धर्म की परीक्षा लेने जब त्रिदेव पहुंचे तब माता अनसूया ने अपने तपोबल से तीनों देवों को अबोध शिशु बना दिया था। बाद में देवी अनसूया के वात्सल्य भाव से ही तीनों देवों के अंश से भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ।
भगवान दत्तात्रेय को सनातन परंपरा में गुरुओं का परम गुरु माना गया है। उन्होंने प्रकृति के चौबीस तत्वों को अपना गुरु मानकर यह संदेश दिया कि सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए संपूर्ण सृष्टि ही एक खुली पाठशाला है। अगहन पूर्णिमा के दिन भगवान दत्तात्रेय की पूजा करने से गुरु ग्रह के समस्त दोष शांत हो जाते हैं और मनुष्य के भीतर का अज्ञान सदा के लिए मिट जाता है।
इसी पावन पूर्णिमा को काशी की अधिष्ठात्री माता अन्नपूर्णा की जयंती भी मनाई जाती है। जब संपूर्ण पृथ्वी पर अन्न का अकाल पड़ा था तब भगवान शिव ने स्वयं भिक्षुक बनकर माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी ताकि संसार के प्राणियों का पोषण हो सके। अतः अगहन पूर्णिमा के दिन रसोई घर की शुद्धि, चूल्हे का पूजन और जरूरतमंदों को भरपेट अन्न खिलाने से उस घर में कभी दरिद्रता और भुखमरी का प्रवेश नहीं होता।
अगहन मास का यह पंचांग केवल तिथियों का हिसाब रखने का माध्यम नहीं है बल्कि यह मानव जीवन के समग्र कल्याण का एक दिव्य खाका है। जब मनुष्य प्रतिदिन के वार, नक्षत्र और तिथि के महत्व को जानकर अपना जीवन जीता है, तो वह प्रकृति के सूक्ष्म प्रवाह के साथ एकाकार हो जाता है।
प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठना, शीतल जल से स्नान करना, भगवान केशव का ध्यान करना और संध्या समय तुलसी के समीप दीपदान करना मनुष्य के तन और मन को एक नई स्फूर्ति से भर देता है। अगहन मास के ये तीस दिन मनुष्य को अपने संचित पापों को धोने, अपनी जठराग्नि और वात दोषों को संतुलित रखने तथा अपने कुल के पूर्वज पितरों को तृप्त करने का सर्वोत्तम अवसर देते हैं। जो साधक इस पंचांग का निष्ठापूर्वक अनुसरण करता है, उसके घर में वर्ष भर सुख, शांति, आरोग्यता और अटूट समृद्धि का वास रहता है।
अगहन मास में आने वाली दो प्रमुख एकादशियों के नाम क्या हैं? अगहन मास के कृष्ण पक्ष में उत्पन्ना एकादशी और शुक्ल पक्ष में मोक्षदा एकादशी का परम पावन व्रत रखा जाता है।
गीता जयंती अगहन मास की किस तिथि को मनाई जाती है? मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी के साथ ही संपूर्ण विश्व में गीता जयंती मनाई जाती है।
विवाह पंचमी का क्या महत्व है और यह किस दिन आती है? मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को विवाह पंचमी कहते हैं, इसी पावन तिथि पर भगवान श्री राम और माता सीता का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था।
अगहन मास में खरमास कब से प्रारंभ होता है? पंद्रह अथवा सोलह दिसंबर को जब सूर्य देव धनु राशि में प्रवेश करते हैं तब धनु संक्रांति के साथ ही खरमास का आरंभ होता है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन किन दो प्रमुख देवताओं की जयंती मनाई जाती है? मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन त्रिदेव रूप भगवान दत्तात्रेय और संसार का पोषण करने वाली माता अन्नपूर्णा की जयंती मनाई जाती है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ