अगहन में प्रदोष व्रत से कष्ट कैसे मिटेंगे?

By पं. सुव्रत शर्मा

भौम और शनि प्रदोष, रुद्राभिषेक विधि, ऋण मुक्ति और शत्रु विजय

अगहन प्रदोष व्रत: भौम शनि प्रदोष विधि, ऋण मुक्ति उपाय

अगहन मास के प्रदोष व्रत का आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व

सनातन काल गणना में मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास को भगवान श्री कृष्ण की साक्षात विभूति माना गया है। इस परम पावन मास में पड़ने वाली दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथियां देवाधिदेव महादेव की अमोघ कृपा को प्राप्त करने का सबसे दुर्लभ अवसर मानी जाती हैं। प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत का विधान शास्त्रों में प्रतिष्ठित है, परंतु अगहन मास की शांत, शीतल और लंबी रात्रियों में किया जाने वाला शिव पूजन साधक की चेतना को सीधे ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ देता है। प्रदोष काल वह दिव्य संधि वेला है जब दिन का अवसान होता है और रात्रि का आगमन होता है, अर्थात सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पूर्व से लेकर 45 मिनट पश्चात तक का समय। इस कालखंड में भगवान शिव अपने नंदीश्वर पर आरूढ़ होकर माता पार्वती के साथ संपूर्ण ब्रह्मांड में विचरण करते हैं और अपने भक्तों के दारिद्र्य व संताप को हरते हैं।

पूजन आयाम शास्त्रीय विवरण
नियम विधान
प्रधान तिथि मार्गशीर्ष कृष्ण एवं शुक्ल त्रयोदशी
मुख्य पूजन वेला सूर्यास्त से 45 मिनट पूर्व और पश्चात का प्रदोष काल
प्रधान आराध्य देव देवाधिदेव महादेव और माता जगदंबा पार्वती
सर्वोत्तम अभिषेक द्रव्य गाय का कच्चा दूध, दही, गोघृत, मधु और शर्करा युक्त पंचामृत
विशेष वार संयोग मंगलवार को भौम प्रदोष और शनिवार को शनि प्रदोष
अनिवार्य सामग्री शमी पत्र, बेलपत्र, भस्म, श्वेत चंदन और अक्षत
प्रधान साधना मंत्र ॐ नमः शिवाय अथवा महामृत्युंजय मंत्र
प्रमुख आध्यात्मिक फल ऋण मुक्ति, शत्रु विजय, संतान सुख और असाध्य रोग नाश

प्रदोष व्रत का अनुष्ठान केवल बाह्य उपवास नहीं है बल्कि यह अंतःकरण की शुद्धि का एक गहरा तांत्रिक और यौगिक उपक्रम है। अगहन मास के शीतल वातावरण में जब साधक अपने आहार और विचारों को नियंत्रित करके संध्या काल में शिवलिंग की सन्निधि में बैठता है, तो उसके भीतर की समस्त तामसिक ग्रंथियां खुलने लगती हैं। इस व्रत को रखने से जीवन के समस्त पापों का क्षय होता है और व्यक्ति मृत्यु के उपरांत शिव लोक को प्राप्त करता है।

प्रदोष काल का खगोलीय और तात्विक रहस्य

शिव पुराण के अनुसार प्रदोष काल में समस्त देवी देवता, यक्ष, गंधर्व और ऋषि गण कैलाश पर्वत पर उपस्थित होकर भगवान नीलकंठ की स्तुति करते हैं। इस समय शिवलिंग में संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा केंद्रित हो जाती है। खगोलीय दृष्टिकोण से सूर्यास्त का समय वातावरण में वायु और अग्नि तत्व के परिवर्तन का काल होता है। दिन की सौर ऊर्जा जब रात्रि की चंद्र ऊर्जा में विलीन होती है तब प्रकृति में एक विशेष प्रकार का शून्य उत्पन्न होता है।

इस शून्य काल में किया गया कोई भी जप, ध्यान अथवा अभिषेक सामान्य दिनों की तुलना में सहस्त्र गुना अधिक फलदायी होता है। जो मनुष्य इस वेला में शयन करता है, भोजन करता है अथवा वासनायुक्त विचारों में लिप्त रहता है, उसके जीवन में दरिद्रता और व्याधियां स्थाई रूप से वास करने लगती हैं। इसके विपरीत जो साधक इस काल में अपने दोनों नेत्रों को आज्ञा चक्र पर केंद्रित करके भगवान शिव का ध्यान करता है, उसके पूर्व जन्मों के संचित कर्मों के बंधन तत्काल शिथिल होने लगते हैं। अगहन मास में पृथ्वी का वातावरण अत्यंत शांत और स्थिर होता है, जिससे मंत्रों की ध्वनि तरंगे बिना किसी अवरोध के आकाश तत्व में व्याप्त हो जाती हैं।

भौम प्रदोष का अलौकिक प्रभाव और ऋण मुक्ति के गुप्त उपाय

जब अगहन मास की त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तो शास्त्रों में इसे भौम प्रदोष के नाम से संबोधित किया जाता है। मंगलवार का दिन भूमिपुत्र मंगल देव को समर्पित है, जो रक्त, भूमि, पराक्रम और ऋण के स्वामी ग्रह माने जाते हैं। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल देव नीच राशि में हों, छठे अथवा आठवें भाव में स्थित होकर पीड़ित हों, तो वह जीवन भर भारी कर्जों के जाल में फंसा रहता है।

भौम प्रदोष के पावन दिन प्रदोष काल में किया गया विशेष अनुष्ठान बड़े से बड़े ऋण से मुक्ति दिलाने की अचूक सामर्थ्य रखता है। इस दिन साधक को तांबे के पात्र में जल, लाल चंदन, कनेर के लाल पुष्प और थोड़ा सा गुड़ मिलाकर भगवान शिव का अभिषेक करना चाहिए। इसके पश्चात भगवान शिव के ऋणमुक्तेश्वर स्वरूप का ध्यान करते हुए ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का ग्यारह बार पाठ करना चाहिए।

  • शिवलिंग पर मसूर की दाल का अर्पण: भौम प्रदोष के दिन शिवलिंग पर 108 लाल मसूर के साबुत दाने ॐ ऋणमुक्तेश्वराय नमः मंत्र का उच्चारण करते हुए चढ़ाने से ऋण का भार तेजी से उतरने लगता है।
  • शहद से अभिषेक: भगवान शिव को शुद्ध शहद अर्पित करने से मंगल जनित क्रूर प्रभाव शांत होते हैं और संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा होता है।
  • लाल कनेर के पुष्प: शिवलिंग पर लाल कनेर अथवा गुड़हल के पुष्प अर्पित करने से साधक के पराक्रम में वृद्धि होती है और गुप्त भय का नाश होता है।
  • मंगल गायत्री का जप: सायंकाल के समय ॐ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् मंत्र का जप करने से व्यापार में फंसे हुए धन की प्राप्ति सुगम हो जाती है।

भौम प्रदोष का यह अनुष्ठान न केवल आर्थिक ऋणों से मुक्ति दिलाता है बल्कि मनुष्य के उस मानसिक तनाव को भी समाप्त कर देता है जो कर्जों के कारण उसके आत्मसम्मान को नष्ट कर रहा होता है।

शनि प्रदोष की महिमा और संतान सुख का वरदान

यदि मार्गशीर्ष मास की त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन पड़ती है, तो इसे ज्योतिष और धर्म शास्त्रों में शनि प्रदोष कहा जाता है। शनि देव कर्मफलदाता और न्याय के देवता हैं, जबकि भगवान शिव उनके परम गुरु और आराध्य हैं। अतः शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और गंभीर पाप प्रभावों को शांत करने का सबसे शक्तिशाली माध्यम सिद्ध होता है।

विशेष रूप से जिन दंपत्तियों को विवाह के कई वर्षों पश्चात भी संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो पा रही हो अथवा जिनकी कुंडली में पंचम भाव पर राहु, केतु या शनि की क्रूर दृष्टि के कारण संतान बाधा उत्पन्न हो रही हो, उनके लिए अगहन का शनि प्रदोष एक कल्पवृक्ष के समान फल देने वाला होता है। इस दिन पति और पत्नी दोनों को मिलकर निर्जल अथवा फलाहार व्रत रखना चाहिए और प्रदोष काल में एक साथ देवाधिदेव की आराधना करनी चाहिए।

  • काले तिल और गंगाजल से अभिषेक: शनि प्रदोष के दिन शिवलिंग पर काले तिल मिश्रित गंगाजल अर्पित करने से पितृ दोष और शनि दोष दोनों का एक साथ शमन होता है।
  • शमी पत्र का विशेष अर्पण: भगवान आशुतोष को 21 शमी पत्र ॐ नमः शिवाय मंत्र बोलते हुए चढ़ाने से संतान प्राप्ति के मार्ग की समस्त अदृश्य बाधाएं भस्म हो जाती हैं।
  • भस्म और नीले अपराजिता के पुष्प: शिवलिंग पर भस्म का त्रिपुंड बनाना और नीले अपराजिता के फूल चढ़ाना शनि देव को परम आनंदित करता है, जिससे संतान का स्वास्थ्य सुधरता है।
  • पीपल के वृक्ष के नीचे दीपदान: प्रदोष पूजा के पश्चात किसी प्राचीन पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का चौमुखा दीपक प्रज्वलित करने से कुल की वंश वृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

शनि प्रदोष का व्रत रखने वाले साधक के जीवन से निराशा और अंधकार पूरी तरह विदा हो जाते हैं और उसके घर में किलकारियों की गूंज से आनंद का वातावरण निर्मित होता है।

प्रदोष काल में शिवलिंग का पंचामृत रुद्राभिषेक विधान

शिवलिंग का रुद्राभिषेक अगहन मास में करने से साक्षात अमृत्व की अनुभूति होती है। प्रदोष काल में किया जाने वाला पंचामृत अभिषेक केवल जल चढ़ाने की साधारण क्रिया नहीं है, अपितु यह पंचमहाभूतों को तृप्त करके अपने स्थूल और सूक्ष्म शरीर का कायाकल्प करने का विज्ञान है।

अभिषेक के लिए सर्वप्रथम गाय का कच्चा दूध अर्पित किया जाता है, जो हमारे चंद्रमा और मन को शांत करता है। इसके उपरांत शुद्ध गाय का दही चढ़ाया जाता है, जो शुक्र ग्रह को बलवान बनाकर पारिवारिक जीवन में स्थिरता और सौंदर्य का संचार करता है। तृतीय क्रम में गाय का शुद्ध घी समर्पित किया जाता है, जो तेज और ओज की वृद्धि करता है। चतुर्थ क्रम में शुद्ध मधु अर्थात शहद अर्पित किया जाता है, जो वाणी में मिठास लाता है और मंगल के दोषों को समाप्त करता है। पंचम क्रम में गन्ने का रस अथवा खांड युक्त शर्करा का जल चढ़ाया जाता है, जो जीवन से दरिद्रता को उखाड़कर ऐश्वर्य की प्रतिष्ठा करता है।

पंचामृत अभिषेक के उपरांत शिवलिंग को शुद्ध सुगंधित जल और गंगाजल से पूर्णतः स्वच्छ किया जाता है। इसके पश्चात मलयगिरि के श्वेत चंदन से शिवलिंग पर त्रिपुंड बनाया जाता है, उस पर अक्षत, इत्र, बिल्वपत्र, धतूरा और भांग अर्पित की जाती है। अभिषेक के समय रुद्राष्टाध्यायी के नमक और चमक मंत्रों का सस्वर पाठ अथवा केवल ॐ नमः शिवाय का अविरल जप करना चाहिए। जो साधक इस विधि से अगहन में अभिषेक करता है, उसके घर में कभी अन्न, धन और आरोग्य की कमी नहीं हो सकती।

असाध्य रोगों और अदालती मुकदमों से मुक्ति का तंत्र

मानव जीवन में कई बार ऐसी विषम परिस्थितियां आ जाती हैं जब आधुनिक औषधियां काम करना बंद कर देती हैं और व्यक्ति असाध्य व्याधियों से घिर जाता है। इसी प्रकार न्यायालय में चलने वाले मुकदमे और शत्रु बाधाएं मनुष्य के वर्षों की संपत्ति और मानसिक शांति को लील जाती हैं। अगहन मास का प्रदोष व्रत इन दोनों आपदाओं से रक्षा करने वाला एक अभेद्य सुरक्षा कवच है।

  • महामृत्युंजय मंत्र का संपुटित जप: प्रदोष काल में शिवलिंग के समक्ष बैठकर महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से प्राण वायु का संचार सुदृढ़ होता है और मृत्युतुल्य कष्ट भी टल जाते हैं।
  • दूर्वा और गन्ने का रस: जो व्यक्ति गंभीर उदर रोगों, यकृत की दुर्बलता अथवा मधुमेह से पीड़ित हैं, उन्हें गन्ने के रस में 108 दूर्वा डुबोकर शिवलिंग पर अर्पित करनी चाहिए।
  • धतूरे पर भस्म लगाकर अर्पण: यदि कोई व्यक्ति वर्षों से झूठे अदालती मुकदमों में फंसा हुआ है, तो उसे प्रदोष के दिन धतूरे के फल पर भस्म और चंदन लगाकर शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए और विजय की प्रार्थना करनी चाहिए।
  • सरसों के तेल से अभिषेक: गंभीर शत्रु बाधा और अदालती विजय के लिए विद्वान ज्योतिषी के मार्गदर्शन में शिवलिंग पर सरसों के तेल की पतली धार से अभिषेक करना एक अचूक उपाय माना गया है।

भगवान शिव का नाम ही आशुतोष है, अर्थात जो बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। जब कोई पीड़ित आत्मा सच्चे अश्रुओं के साथ प्रदोष काल में उनके चरणों में अपना दुख निवेदित करती है, तो महादेव अपने त्रिशूल से उसके समस्त क्लेशों का संहार कर देते हैं।

नवग्रह शांति और प्रारब्ध दोषों का विनाश

मनुष्य का वर्तमान जीवन उसके पूर्व जन्मों के संचित कर्मों और नवग्रहों की चाल से निरंतर संचालित होता रहता है। जन्म कुंडली में जब कई ग्रह प्रतिकूल भावों में बैठकर जीवन की प्रगति को अवरुद्ध कर देते हैं तब साधारण उपाय काम नहीं करते। अगहन मास के प्रदोष व्रत में यह सामर्थ्य है कि वह नवग्रहों के समस्त क्रूर प्रभावों को एक साथ शांत कर देता है। भगवान शिव स्वयं महाकाल हैं और समस्त ग्रह मंडल उनके अनुशासन में ही कार्य करता है।

प्रदोष काल में किए जाने वाले विशिष्ट द्रव्यों के अर्पण से कुंडली का प्रत्येक भाव शुद्ध होने लगता है। जब जातक शिवलिंग पर काले तिल अर्पित करता है तो शनि, राहु और केतु के पीड़ादायक दोष शांत होते हैं। जब वह शुद्ध गाय के दूध की धार चढ़ाता है तो चंद्रमा का विष योग और दुर्बलता दूर होती है। तांबे के पात्र से अर्पित किया गया लाल चंदन युक्त जल सूर्य और मंगल की क्रूरता को हरकर उन्हें राजयोग प्रदाता बना देता है। हरे दूर्वा दल बुध ग्रह की जड़ता को मिटाकर बुद्धि और व्यापार को गति देते हैं, जबकि शहद और पीले गेंदे के पुष्प देवगुरु बृहस्पति को प्रसन्न करके विद्या, संतान और धन के बंद द्वार खोल देते हैं। इस प्रकार एक ही प्रदोष व्रत के माध्यम से नौ ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त करके जातक अपने जीवन पथ को सर्वथा निष्कंटक बना लेता है।

प्रदोष व्रत की सूक्ष्म यौगिक साधना और चक्र जागरण

हठयोग और तंत्र संहिताओं में प्रदोष काल को सुषुम्ना नाड़ी के सक्रिय होने का परम पावन कालखंड माना गया है। अगहन मास की शांत रात्रि में जब बाह्य कोलाहल थम जाता है और शीतलता के कारण चित्त अंतर्मुखी होने लगता है तब मेरुदंड को सीधा रखकर किया गया शिव ध्यान चक्रों के शोधन में तीव्र गति लाता है। मानव देह में स्थित सात प्रमुख चक्र वास्तव में चेतना के वे द्वार हैं जिन पर अज्ञान का आवरण पड़ा रहता है।

प्रदोष व्रत के दिन मूलाधार चक्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए पृथ्वी तत्व को शिव के चरणों में समर्पित किया जाता है, जिससे भौतिक सुरक्षा का भय नष्ट होता है। स्वाधिष्ठान और मणिपूर चक्र पर जब पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय की ध्वनि गूंजती है, तो काम, क्रोध और लोभ की वृत्तियां जलकर भस्म हो जाती हैं। अनाहत चक्र में भगवान शिव और शक्ति के दिव्य युगल स्वरूप का ध्यान करने से असीम करुणा का प्रकटीकरण होता है। विशुद्धि चक्र के जागरण से वाणी में वह सामर्थ्य आ जाता है कि जातक जो कहता है वह सत्य सिद्ध होने लगता है। अंत में आज्ञा चक्र पर दोनों भौहों के मध्य ज्योतिर्लिंग का दर्शन करते हुए जब प्राण वायु सहस्रार चक्र की ओर उठती है तब साधक को ब्रह्मांडीय आनंद का अनुभव होता है। अगहन मास की यह यौगिक साधना एक साधारण गृहस्थ को भी सिद्ध पुरुष की कोटि में ला खड़ा करती है।

मानसिक संताप, अवसाद और अज्ञात भय का संपूर्ण शमन

आधुनिक युग में धन और भौतिक साधनों की प्रचुरता के बाद भी मनुष्य जिस सबसे बड़ी त्रासदी से जूझ रहा है, वह है मानसिक अकेलापन, अवसाद और अकारण लगने वाला भय। शीत ऋतु में सूर्य के प्रकाश की कमी और लंबी रातों के कारण यह मानसिक भारीपन कई गुना बढ़ जाता है। वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार मन का स्वामी चंद्रमा है और चंद्रमा सीधे भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित है।

जब अगहन मास के प्रदोष व्रत में कोई व्यक्ति संध्या के समय शिवलिंग के समक्ष बैठकर केवल दीप दर्शन करता है, तो उसके अवचेतन मन में जमी हुई निराशा की कालिमा छंटने लगती है। घी के दीपक की सात्विक लौ और कपूर की सुगंध मस्तिष्क की नसों में जमे तनाव को दूर कर देती है। भगवान शिव को अर्पित किया जाने वाला सुगंधित श्वेत चंदन मस्तिष्क के आज्ञा चक्र को शीतलता प्रदान करता है, जिससे अनिद्रा, बुरे स्वप्न और अकारण आने वाले पैनिक अटैक पूरी तरह विलीन हो जाते हैं। जो साधक इस व्रत को नियमपूर्वक धारण करता है, उसका अंतःकरण एक शांत सरोवर की भांति निर्मल हो जाता है, जहां अशांति की कोई तरंग नहीं उठ पाती।

अगहन प्रदोष व्रत की संपूर्ण पूजा विधि और संकल्प

अगहन मास के प्रदोष व्रत का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना अनिवार्य होता है। इस व्रत की शुरुआत प्रातः काल से ही हो जाती है, परंतु इसका मुख्य केंद्र बिंदु सायंकाल की पूजा होती है।

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की पूर्ण शुद्धि करें और स्वयं स्नान करके श्वेत अथवा हल्के पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात भगवान शिव के सम्मुख हाथ में जल, अक्षत, सुपारी और पुष्प लेकर संकल्प लें कि मैं अपने समस्त पापों के क्षय, पारिवारिक सुख, ऋण मुक्ति अथवा शत्रु विजय हेतु अगहन मास के प्रदोष व्रत का पालन कर रहा हूँ। दिनभर निराहार रहें अथवा आवश्यकता होने पर केवल फलाहार और जल ग्रहण करें। दिन के समय किसी की निंदा न करें, क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण रखें और मन ही मन पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का स्मरण करते रहें।

सायंकाल सूर्यास्त से आधा घंटा पूर्व पुनः स्नान करें अथवा हाथ पैर धोकर पवित्र हो जाएं। पूजा स्थल पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा के आसन पर बैठें। यदि संभव हो तो किसी शिवालय में जाकर पूजा करें, अन्यथा घर में ही पारद अथवा नर्मदेश्वर शिवलिंग के समक्ष शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। धूप, दीप, गंध, पुष्प, नैवेद्य और बिल्वपत्र से विधिवत षोडशोपचार पूजा संपन्न करें। पूजा के अंत में प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा का श्रवण अथवा पठन अवश्य करना चाहिए। इसके पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती की कपूर से भावपूर्ण आरती उतारनी चाहिए।

आरती के उपरांत साष्टांग प्रणाम करके अपने ज्ञात और अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए। पूजा का विसर्जन करने के पश्चात ही सात्विक फलाहार ग्रहण करें अथवा अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण करके व्रत को पूर्ण करें। अगहन मास में इस प्रकार किया गया अनुष्ठान साधक के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अभूतपूर्व शांति, संपन्नता और विजय का मार्ग प्रशस्त कर देता है।

FAQ

अगहन मास में प्रदोष व्रत की पूजा का सबसे श्रेष्ठ समय कौन सा माना जाता है? प्रदोष व्रत की पूजा के लिए सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पूर्व और 45 मिनट पश्चात तक का प्रदोष काल सबसे उत्तम और फलदायी माना जाता है।

भौम प्रदोष और शनि प्रदोष में क्या मुख्य अंतर होता है? मंगलवार को पड़ने वाला प्रदोष भौम प्रदोष कहलाता है जो ऋण मुक्ति और पराक्रम देता है, जबकि शनिवार को पड़ने वाला शनि प्रदोष संतान सुख और शनि पीड़ा शांति देता है।

क्या अगहन मास के प्रदोष व्रत में अन्न का सेवन किया जा सकता है? प्रदोष व्रत में अन्न का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है, साधक केवल फलाहार, दूध अथवा जल का ही सेवन कर सकता है।

कर्ज से मुक्ति पाने के लिए भौम प्रदोष के दिन शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए? ऋण मुक्ति के लिए भौम प्रदोष के दिन शिवलिंग पर मसूर की दाल, शुद्ध शहद, लाल चंदन और लाल कनेर के पुष्प अर्पित करने चाहिए।

प्रदोष काल में शिवलिंग पर पंचामृत से अभिषेक करने का क्या लाभ है? पंचामृत अभिषेक से शारीरिक आरोग्य प्राप्त होता है, कुंडली के ग्रह दोष शांत होते हैं, मानसिक शांति मिलती है और घर से दरिद्रता का नाश होता है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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