By पं. सुव्रत शर्मा
मित्र आदित्य पूजन, तांबे के अर्घ्य विधि और स्वास्थ्य लाभ

सृष्टि के प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य नारायण वर्ष के बारह मासों में द्वादश आदित्यों के रूप में संपूर्ण चराचर जगत को अपनी ऊर्जा से अनुप्राणित करते हैं। सनातन काल गणना के अनुसार अगहन अर्थात मार्गशीर्ष मास में सूर्य देव के मित्र स्वरूप की पूजा का विधान शास्त्रों में सर्वोपरि माना गया है। गिरते तापमान के बीच जब प्रकृति शीतलता की चादर ओढ़ लेती है तब यह सौर साधना जीवन में प्राण तत्व का संरक्षण करती है।
| पूजन आयाम | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| नियम | विधान |
| मास के अधिष्ठाता आदित्य | श्री मित्र आदित्य |
| सर्वोत्तम पूजन वेला | सूर्योदय का प्रथम प्रहर अर्थात स्वर्णिम प्रभात |
| अर्घ्य पात्र | शुद्ध तांबे का लोटा |
| अर्घ्य सामग्री | अक्षत, रोली, लाल चंदन, शुद्ध गुड़ और लाल कनेर या गुड़हल |
| प्रधान बीज मंत्र | ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः |
| मित्र आदित्य ध्यान मंत्र | ॐ मित्राय नमः |
| मुख्य शारीरिक प्रभाव | अस्थियों की सुदृढ़ता, नेत्र ज्योति और रोग प्रतिरोधक क्षमता |
सूर्योदय से पूर्व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ ताम्र पात्र में शुद्ध जल भरना चाहिए। उस जल में थोड़ा सा कुमकुम अथवा रक्त चंदन, अक्षत, गुड़ का छोटा टुकड़ा और लाल पुष्प समर्पित करें। दोनों हाथों को मस्तक से ऊपर उठाकर गिरती हुई जलधारा के मध्य से सूर्य देव के बिंब का दर्शन करते हुए तीन बार में अर्घ्य समर्पित करना चाहिए। अर्घ्य का जल पैरों पर न पड़े, इसलिए नीचे कोई पात्र अथवा पुष्प क्यारी का होना अनिवार्य है। अर्घ्य अर्पण के पश्चात वहीं खड़े होकर तीन बार प्रदक्षिणा करनी चाहिए और धरती पर गिरे जल की बूंदों को अपने माथे और दोनों नेत्रों पर लगाना चाहिए।
वैदिक संहिताओं और पुराणों में सूर्य देव के बारह विभिन्न रूपों का वर्णन मिलता है, जो ऋतु चक्र और सौर मंडल की गति के अनुसार पृथ्वी पर अपने विशिष्ट प्रभाव छोड़ते हैं। चैत्र से लेकर फाल्गुन तक प्रत्येक मास का अपना एक अधिष्ठाता आदित्य होता है। अगहन मास में तपने वाले सूर्य को मित्र कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ है समस्त जीवों का हितैषी, सौहार्द का विस्तारक और सर्वकल्याणकारी बंधु।
मित्र आदित्य की किरणें अत्यंत तीक्ष्ण या दाहक नहीं होतीं बल्कि वे शीत से कांपते हुए जीवों को जीवनदायिनी ऊष्मा प्रदान करके अभय दान देती हैं। इस मास में जब पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में ठंड का प्रकोप बढ़ने लगता है तब मित्र आदित्य का यह रूप मनुष्य को अवसाद और आलस्य से उबारकर कार्यक्षेत्र में सक्रिय रहने का वरदान देता है। जो साधक इस मास में मित्र आदित्य का नियमित ध्यान करता है, उसके हृदय से द्वेष और ईर्ष्या का नाश होता है तथा उसके सामाजिक संबंधों में अद्वितीय मधुरता और सौहार्द का संचार होने लगता है।
प्राचीन ऋषियों ने पूजा पद्धतियों का निर्माण इस प्रकार किया था कि वे मनुष्य के आध्यात्मिक उत्थान के साथ साथ शारीरिक स्वास्थ्य को भी पूर्ण सुरक्षा प्रदान कर सकें। नवंबर और दिसंबर के महीनों में जब तापमान गिरता है तब मनुष्य की जठराग्नि और आंतरिक चयापचय में भारी बदलाव आते हैं। इस मौसम में प्रातःकालीन धूप का सेवन केवल धार्मिक कृत्य नहीं है बल्कि यह एक अनिवार्य जैविक आवश्यकता भी है।
जब साधक खुले आकाश के नीचे खड़े होकर सूर्य का अभिनंदन करता है, तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को प्राकृतिक कवच प्राप्त होता है। यह सौर ऊर्जा शीत ऋतु में होने वाले श्वास रोगों और जोड़ों के दर्द से भी शरीर की रक्षा करती है।
सूर्य नमस्कार केवल एक शारीरिक व्यायाम नहीं है बल्कि यह बारह सौर मंत्रों के साथ किया जाने वाला एक संपूर्ण आध्यात्मिक योग अनुष्ठान है। अगहन मास में जब मांसपेशियां ठंड के कारण अकड़ने लगती हैं तब सूर्य नमस्कार का अभ्यास शरीर के प्रत्येक जोड़ और स्नायु तंत्र को लचीला और शक्तिशाली बना देता है।
प्रातःकाल पूर्व दिशा की ओर मुख करके प्रणामासन से अभ्यास का शुभारंभ करना चाहिए। प्रत्येक आसन के साथ सूर्य के बारह नामों का मानसिक या सस्वर जप करना अनिवार्य माना गया है, जिसमें ॐ मित्राय नमः का उच्चारण सर्वप्रथम किया जाता है। इसके पश्चात हस्तउत्तानासन, पादहस्तासन, अश्वसंचालासन, पर्वतासन, अष्टांग नमस्कार, भुजंगासन का क्रमबद्ध चक्र शरीर के भीतर अग्नि तत्व को जाग्रत कर देता है। अगहन की शीतल सुबह में सूर्य नमस्कार के कम से कम बारह चक्रों का नियमित अभ्यास शरीर के भीतर ऊर्जा का एक ऐसा सुरक्षा कवच निर्मित कर देता है जो पूरे दिन ठंड के नकारात्मक प्रभाव को पास नहीं फटकने देता।
वैदिक ज्योतिष में सूर्य देव को आत्मा, पिता, मान सम्मान, नेत्र और राजसत्ता का स्वाभाविक कारक ग्रह माना गया है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य देव नीच राशि में हों, राहु केतु से पीड़ित हों अथवा छठवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित होकर निर्बल हो रहे हों, तो उसे जीवन में पग पग पर अपमान, पिता से मतभेद, नेत्र विकार और कार्यक्षेत्र में असफलता का सामना करना पड़ता है।
जिस जातक को अपने व्यवसाय या आजीविका में बार बार बाधाओं का सामना करना पड़ रहा हो, उसे अगहन के महीने में रविवार का व्रत रखकर बिना नमक का सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। यह साधना कुंडली के समस्त दोषों को भस्म करके जातक को समाज में राजा के समान प्रतिष्ठा प्रदान करती है।
अगहन मास में सूर्य साधना की पूर्णता विशिष्ट मंत्रों के अनुष्ठान से ही संभव होती है। मंत्रों के शुद्ध उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें साधक के प्रभामंडल को शुद्ध करती हैं और अंतःकरण में तेज का संचार करती हैं।
प्रातः अर्घ्य देने के पश्चात लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करें। इसके बाद रुद्राक्ष अथवा लाल चंदन की माला से ॐ घृणिः सूर्य आदित्याय नमः अथवा ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणाय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा मंत्र का कम से कम एक माला जप अवश्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, वाल्मीकि रामायण में वर्णित श्री आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार पाठ करना अगहन मास में चमत्कारिक परिणाम प्रदान करता है। यह वही स्तोत्र है जिसका उपदेश महर्षि अगस्त्य ने भगवान श्री राम को रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए दिया था। जब मनुष्य पूर्ण श्रद्धा से इस स्तोत्र का गान करता है, तो उसके समस्त दृश्य और अदृश्य शत्रु शांत हो जाते हैं।
सूर्य केवल आकाश में चमकता हुआ एक तारा नहीं है बल्कि वह ब्रह्मांड की जीवित आत्मा और काल चक्र का निर्माता है। अगहन मास का यह पावन संदेश है कि जिस प्रकार सूर्य बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक प्राणी को अपनी धूप और जीवन रस प्रदान करता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने भीतर मित्र भाव का विस्तार करना चाहिए। जब मनुष्य अपने हृदय को संकीर्णताओं से मुक्त करके परोपकार और सेवा के मार्ग पर चलता है तब उसके भीतर का सौर तेज स्वतः जागृत हो जाता है। शीत के इस मास में अपने भीतर ऊर्जा, उत्साह और अध्यात्म की ज्योति को जलाए रखना ही मित्र आदित्य की सच्ची उपासना है।
अगहन मास में सूर्य के किस स्वरूप की पूजा का विधान है? अगहन अर्थात मार्गशीर्ष मास में द्वादश आदित्यों में से भगवान सूर्य के मित्र स्वरूप की पूजा का विधान है।
सूर्य देव को अर्घ्य देते समय तांबे के लोटे में क्या सामग्री मिलानी चाहिए? तांबे के लोटे में शुद्ध जल के साथ रोली, लाल चंदन, अक्षत, थोड़ा सा गुड़ और लाल पुष्प मिलाना चाहिए।
सूर्य देव को अर्घ्य देने का सबसे उत्तम समय कौन सा होता है? सूर्योदय के समय जब सूर्य की किरणें लालिमा लिए हुए हों अर्थात दिन के प्रथम प्रहर में अर्घ्य देना सर्वोत्तम होता है।
सर्दियों की प्रातःकालीन धूप लेने से शरीर को क्या लाभ मिलते हैं? प्रातःकालीन धूप से शरीर को भरपूर विटामिन डी मिलता है, अस्थियां मजबूत होती हैं, इम्युनिटी बढ़ती है और मौसमी अवसाद दूर होता है।
कुंडली में सूर्य ग्रह को मजबूत करने के लिए कौन सा स्तोत्र सबसे प्रभावशाली है? कुंडली में कमजोर सूर्य को बलवान करने और मान प्रतिष्ठा पाने के लिए श्री आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ सबसे प्रभावशाली माना जाता है।
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