By पं. अमिताभ शर्मा
खरमास से पूर्व विवाह मुहूर्त, गुरु शुक्र गोचर और अष्टकूट मिलान

कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु के चार मास की योगनिद्रा से जागृत होते ही संपूर्ण भूमंडल पर मांगलिक अनुष्ठानों का अवरोध समाप्त हो जाता है। इसके ठीक पश्चात आने वाला मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के लिए वर्ष का सबसे स्वर्णिम समय माना जाता है। पंद्रह से सोलह दिसंबर को जब सूर्य देव धनु राशि में प्रवेश करते हैं तब खरमास का आरंभ होता है और समस्त शुभ कार्य एक मास के लिए स्थगित हो जाते हैं। अतः अगहन मास के इस कालखंड में विवाह संस्कारों की भरमार देखने को मिलती है।
| मांगलिक मुहूर्त तिथि | शास्त्रीय नक्षत्र | शुभ लग्न वेला | विशेष ज्योतिषीय योग |
|---|---|---|---|
| नियम | विधान | विधान | विधान |
| अगहन शुक्ल द्वितीया | अनुराधा नक्षत्र | वृश्चिक एवं कुंभ लग्न | सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत वेला |
| अगहन शुक्ल पंचमी | उत्तराषाढ़ा नक्षत्र | मकर एवं मीन लग्न | त्रिपुष्कर योग और श्रीवत्स योग |
| अगहन शुक्ल सप्तमी | शतभिषा नक्षत्र | कुंभ एवं वृषभ लग्न | रवि योग और विजय मुहूर्त |
| अगहन शुक्ल दशमी | रेवती नक्षत्र | मीन एवं मिथुन लग्न | अमृत सिद्धि योग और शुभ योग |
| अगहन शुक्ल द्वादशी | अश्विनी नक्षत्र | मेष एवं कर्क लग्न | गोधूलि वेला और सिद्धि योग |
| अगहन शुक्ल त्रयोदशी | भरणी व रोहिणी नक्षत्र | वृषभ एवं सिंह लग्न | त्रिपुष्कर योग और प्रीति योग |
| अगहन पूर्णिमा पूर्व संध्या | मृगशिरा नक्षत्र | मिथुन एवं कन्या लग्न | स्वयं सिद्ध मुहूर्त और स्थिर लग्न |
विवाह के लिए शास्त्रों में स्थिर लग्नों वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ को प्राथमिकता दी गई है, क्योंकि स्थिर लग्न में बंधा दांपत्य जीवन आजीवन अटूट और सुखी रहता है। अगहन मास के इन पावन मुहूर्तों में पाणिग्रहण संस्कार संपन्न कराने से वर और वधू दोनों के परिवारों में अखंड ऐश्वर्य का विस्तार होता है।
वैदिक ज्योतिष में विवाह संस्कार की सफलता दो प्रमुख ग्रहों देवगुरु बृहस्पति और भृगु पुत्र शुक्र देव की कृपा पर पूर्ण रूप से निर्भर करती है। देवगुरु बृहस्पति कन्या की कुंडली में पति सुख, संतान और सौभाग्य के कारक ग्रह माने जाते हैं, जबकि शुक्र देव वर की कुंडली में पत्नी सुख, काम चेतना, भौतिक समृद्धि और वैवाहिक सामंजस्य के स्वामी हैं।
अगहन मास की इस अवधि में दोनों ही ग्रह आकाश मंडल में उदित अवस्था में रहकर अपनी शुभ रश्मियों से पृथ्वी को आलोकित करते हैं। इस समय सूर्य देव वृश्चिक राशि में गोचर करते हैं, जो मंगल की राशि होने के कारण ऊर्जा और दृढ़ संकल्प का संचार करती है। गुरु और शुक्र का तारा इस मास में अस्त नहीं होता, जिससे गुरुबल और शुक्रबल दोनों नैसर्गिक रूप से बलवान रहते हैं। जब दोनों शुभ ग्रह बलवान हों, तो विवाह की वेदी पर ली गई प्रतिज्ञाएं जीवन भर पवित्र और अडिग बनी रहती हैं। इस प्रकार की ग्रह स्थिति दांपत्य जीवन में अलगाव और कलह की संभावनाओं को शून्य कर देती है।
मार्गशीर्ष मास के उत्तरार्ध में पंद्रह अथवा सोलह दिसंबर को सूर्य देव अपने मित्र गुरु की आग्नेय राशि धनु में प्रवेश करते हैं। सूर्य के इस गोचर को सनातन ज्योतिष में धनु संक्रांति अथवा खरमास कहा जाता है। यह समय साधना और दान के लिए तो उत्तम है, परंतु पाणिग्रहण जैसे जीवन निर्माणक संस्कारों के लिए पूर्णतः निषिद्ध माना गया है।
सनातन धर्म की यह सूक्ष्म दृष्टि दर्शाती है कि मनुष्य के कर्मों का प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ कितना गहरा तादात्म्य है। समय की शुद्धता को पहचानकर किया गया कार्य ही दीर्घकालिक सुख का कारण बनता है।
अगहन मास के विवाह मुहूर्तों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस अवधि में कई स्वयं सिद्ध और दुर्लभ योगों का निर्माण होता है। जब भद्रा रहित शुभ तिथियों में विशिष्ट वार और नक्षत्रों का संयोग बनता है तब त्रिपुष्कर और सर्वार्थ सिद्धि जैसे महायोग उदित होते हैं। त्रिपुष्कर योग में किए गए शुभ कर्म का फल तीन गुना होकर जीवन में वापस लौटता है, जिससे दांपत्य जीवन में सुख, संपत्ति और संतति की त्रिगुणी वृद्धि होती है।
सर्वार्थ सिद्धि योग समस्त प्रकार के अनिष्टों को भस्म करने वाला माना गया है। यदि किसी वर अथवा वधू की व्यक्तिगत कुंडली में कोई छोटा मोटा ग्रह दोष विद्यमान भी हो, तो सर्वार्थ सिद्धि योग की पावन अग्नि उस दोष के प्रभाव को पूरी तरह निष्प्रभावी कर देती है। इस योग में अग्नि को साक्षी मानकर लिए गए सात फेरे वर वधू को दीर्घायु, उत्तम आरोग्य और पारस्परिक निष्ठा का ईश्वरीय आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह योग गृहस्थ आश्रम की नींव को एक अभेद्य दुर्ग की भांति सुदृढ़ बना देता है।
सनातन परंपरा में विवाह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं है, अपितु यह दो कुलों, दो आत्माओं और उनके संचित संस्कारों का महामिलन है। इसलिए अगहन मास के श्रेष्ठ मुहूर्तों का लाभ उठाते समय भी अष्टकूट मिलान के मूलभूत नियमों की उपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए।
जब कुंडली के न्यूनतम अठारह गुण मिलते हों और दोनों कुंडलियों में कोई असाध्य दोष न हो, तभी विवाह की अनुमति दी जाती है। अगहन मास के शुभ नक्षत्रों में किया गया ऐसा विवाह दोनों कुलों की कई पीढ़ियों को यशस्वी बना देता है।
धार्मिक और ज्योतिषीय कारणों के अतिरिक्त, अगहन मास का मौसमी चक्र भी वैवाहिक आयोजनों के लिए सबसे अधिक अनुकूल माना गया है। नवंबर और दिसंबर के इस संधिकाल में न तो ग्रीष्म ऋतु जैसी झुलसाने वाली धूप होती है और न ही वर्षा ऋतु जैसी कीचड़ और उमस। शीतल, मंद और सुगंधित बयार के बीच दिन के समय गुनगुनी धूप का आनंद हर किसी के मन को प्रफुल्लित कर देता है।
आयुर्वेद के अनुसार इस ऋतु में मनुष्य की जठराग्नि अत्यंत प्रबल होती है, जिससे विविध प्रकार के मिष्ठान्न, गरिष्ठ भोजन और पारम्परिक व्यंजनों का पाचन सहजता से हो जाता है। विवाह में सम्मिलित होने वाले दूर दराज के अतिथियों के लिए यह यात्रा का सबसे सुखद समय होता है। वस्त्रों और आभूषणों को धारण करने में किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती। प्रकृति का यह मनोहारी रूप सामाजिक उत्सवों में नई उमंग और ऊर्जा भर देता है, जिससे वैवाहिक आयोजनों का उत्साह कई गुना बढ़ जाता है।
चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है क्योंकि अन्य तीनों आश्रम ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास इसी आश्रम के सहारे पलते हैं। अगहन मास में जब दो जीवात्माएं एक दूसरे का हाथ थामकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों को साथ मिलकर पूरा करने का संकल्प लेती हैं, तो यह संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए एक उत्सव बन जाता है।
विवाह की वेदी पर सप्तपदी के सात वचन वर और वधू को यह सिखाते हैं कि सुख और दुख दोनों में एक दूसरे की ढाल बनकर कैसे खड़ा रहा जाता है। मार्गशीर्ष मास की पावन अग्नि को साक्षी मानकर दिया गया वचन कभी झूठा नहीं होता। जो दंपत्ति इस पवित्र महीने में अपने नए जीवन की शुरुआत करते हैं, उन पर भगवान सूर्यनारायण, देवगुरु बृहस्पति और माता लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। यह संस्कार उन्हें केवल सांसारिक सुख ही नहीं देता बल्कि जीवन के अंतिम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार की ओर भी अग्रसर करता है।
अगहन मास में विवाह के लिए सबसे उत्तम नक्षत्र कौन से माने जाते हैं? रोहिणी, मृगशिरा, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, रेवती और मकर संक्रांति से पूर्व अश्विनी नक्षत्र विवाह के लिए सर्वोत्तम माने गए हैं।
खरमास कब से शुरू होता है और इसमें विवाह क्यों वर्जित हैं? पंद्रह या सोलह दिसंबर को जब सूर्य धनु राशि में प्रवेश करते हैं तब खरमास आरंभ होता है, इस दौरान गुरु का तेज क्षीण होने से विवाह वर्जित रहते हैं।
विवाह के लिए गुरु और शुक्र का उदित होना क्यों अनिवार्य है? गुरु कन्या के लिए पति और संतान सुख के कारक हैं और शुक्र वर के लिए दांपत्य सुख व समृद्धि के कारक हैं, अतः इनका उदित रहना जरूरी है।
कुंडली मिलान में न्यूनतम कितने गुण मिलना आवश्यक माना जाता है? वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुल छत्तीस गुणों में से कम से कम अठारह गुण मिलना सफल और सुखी दांपत्य जीवन के लिए अनिवार्य है।
अगहन मास में विवाह करने से क्या विशेष ज्योतिषीय लाभ मिलता है? इस मास में मौसम सुखद रहता है, गुरु और शुक्र बली रहते हैं और कई स्वयं सिद्ध योग बनने से दांपत्य जीवन में स्थिरता और अखंड सौभाग्य आता है।
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