By अपर्णा पाटनी
अगहन संकष्टी कथा, 21 दूर्वा अर्पण विधि, चंद्र अर्घ्य और टोटके

सनातन पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के पावन नाम से जाना जाता है। संकष्टी का शाब्दिक अर्थ ही संकटों को हरने वाली तिथि है और जब यह अगहन के पवित्र मास में आती है, तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव अनंत गुना बढ़ जाता है। अखुरथ शब्द दो मूल पदों के संयोग से बना है, जिसमें अखु का अर्थ मूषक अर्थात चूहा है और रथ का अर्थ सवारी अथवा वाहन है। इस पावन तिथि पर मूषक की सवारी करने वाले प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के विशिष्ट स्वरूप की अर्चना की जाती है। शीत ऋतु के आगमन के साथ जब मानव शरीर और प्रकृति में तमोगुण, जड़ता और आलस्य का संचार होने लगता है तब यह साधना चेतना में नवीन प्राण शक्ति और तीक्ष्ण मेधा का बीजारोपण करती है।
पूजन आयाम शास्त्रीय विधान विवरण नियम विधान प्रधान तिथि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष चतुर्थी व्रत का मुख्य स्वरूप दिनभर निराहार अथवा सात्विक फलाहार, चंद्रोदय पर पारण आराध्य देव स्वरूप अखुरथ मूषक वाहन श्री गणेश प्रधान पूजन सामग्री 21 दूर्वा दल, मोदक, श्वेत तिल, गुड़, रोली और लाल पुष्प चंद्र अर्घ्य द्रव्य तांबे या चांदी के पात्र में जल, कच्चा दूध, अक्षत और श्वेत चंदन मुख्य साधना मंत्र ॐ गं गणपतये नमः अथवा ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि मुख्य धार्मिक फल समस्त ज्ञात और अज्ञात विघ्नों का समूल नाश, बुद्धि शुद्धि और आर्थिक स्थिरताइस व्रत का अनुष्ठान करने वाले साधक को प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में शय्या का त्याग कर देना चाहिए। घर की समुचित स्वच्छता के उपरांत स्वयं को गंगाजल युक्त जल से पवित्र करके स्वच्छ लाल अथवा पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। दिन के प्रथम पहर में पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके भगवान गणेश के सम्मुख व्रत का मानसिक संकल्प लिया जाता है। दिनभर वाणी में संयम, मन में सात्विकता और व्यवहार में सौम्यता बनाए रखना इस व्रत का अनिवार्य आंतरिक नियम माना गया है। रात्रि में जब आकाश में चंद्र देव का उदय होता है तब रोली, अक्षत और दूध मिश्रित जल से चंद्रमा को अर्घ्य समर्पित करने के उपरांत ही इस महाव्रत की पूर्णता मानी जाती है।
गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में अखुरथ संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी अत्यंत पावन और शिक्षाप्रद कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में जब एक भयानक दैत्य मत्सरासुर के आतंक से तीनों लोकों में त्राहिमाम मच गया था तब समस्त देवता अपनी रक्षा की गुहार लेकर भगवान शिव और माता पार्वती की शरण में पहुँचे। मत्सरासुर वास्तव में ईर्ष्या, डाह और द्वेष की साकार आसुरी ऊर्जा का साक्षात रूप था, जिसने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके यह वरदान पा लिया था कि वह किसी भी साधारण शस्त्र से पराजित नहीं हो सकेगा।
देवताओं के आर्तनाद को सुनकर भगवान सदाशिव के निर्देश पर माता पार्वती के नंदन भगवान श्री गणेश ने अखुरथ रूप धारण किया। अखु अर्थात मूषक चंचलता, सूक्ष्म अंधकार और अकारण कुतरने की क्षुद्र मनोवृत्ति का प्रतीक है। भगवान गणेश ने उस चंचल मूषक को अपने वश में करके उसे अपना वाहन बनाया, जो इस बात का शाश्वत संदेश देता है कि जब तक मनुष्य अपनी चंचल इंद्रियों और ईर्ष्या रूपी मत्सरासुर को नियंत्रित नहीं करता तब तक वह परम सत्य की अनुभूति नहीं कर सकता। भगवान लंबोदर ने अपने तीक्ष्ण परशु और पाश के प्रहार से मत्सरासुर का संहार किया और समस्त लोकों को अभय दान दिया। जिस दिन यह महान विजय प्राप्त हुई, वह मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की पावन चतुर्थी तिथि थी। तभी से इस तिथि को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के रूप में पूजने की अखंड परंपरा चली आ रही है।
नवंबर और दिसंबर के महीनों में जब अगहन मास की शीत लहर चलने लगती है तब मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में एक प्रकार का धीमापन और आलस्य घर करने लगता है। आयुर्वेद और योग शास्त्र दोनों इस सत्य का समर्थन करते हैं कि शीत ऋतु में कफ और वात दोषों का प्रभाव बढ़ने से मनुष्य की निर्णय क्षमता और एकाग्रता शिथिल पड़ने लगती है।
भगवान गणेश सनातन परंपरा में बुद्धि, विवेक, स्मरण शक्ति और समस्त सिद्धियों के अधिष्ठाता देवता माने गए हैं। अखुरथ संकष्टी के दिन उपवास रखने से शरीर का पाचन तंत्र विश्राम पाता है और आंतरिक ऊर्जा का प्रवाह पेट से ऊपर उठकर मस्तिष्क की ओर गतिशील होने लगता है। जब साधक इस दिन गणेश जी के मूल बीज मंत्रों का जप करता है, तो उसके आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र में स्थित सूक्ष्म नाड़ियों का संकोच दूर होने लगता है। यह साधना विद्यार्थी वर्ग के लिए स्मरण शक्ति बढ़ाने वाली, लेखकों व शोधार्थियों के लिए मौलिक विचार जगाने वाली और व्यावसायिक नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों के लिए अचूक रणनीति बनाने की शक्ति प्रदान करने वाली सिद्ध होती है। मानसिक जड़ता का अंधकार मिटते ही मनुष्य अपने कार्यों को दुगने उत्साह और गति के साथ संपन्न करने में सक्षम हो जाता है।
सनातन अनुष्ठानों में भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है, परंतु अखुरथ संकष्टी के दिन 21 दूर्वा दल चढ़ाने का विशेष तांत्रिक और वैज्ञानिक महत्व शास्त्रों में बताया गया है। पौराणिक आख्यान के अनुसार जब भगवान गणेश ने अनलासुर नामक दैत्य को निगल लिया था तब उनके उदर में भयानक दाह और जलन उत्पन्न हो गई थी। उस प्रचंड अग्नि को शांत करने के लिए महर्षि कश्यप ने 21 दूर्वा दल एकत्र करके गणेश जी के मस्तक पर रखे थे, जिससे उनकी जलन तत्काल समाप्त हो गई थी।
दूर्वा केवल एक साधारण घास नहीं है बल्कि यह अमृत तत्व से परिपूर्ण एक अद्वितीय वनौषधि है। दूर्वा की जड़ें पाताल तक जाकर पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को खींचती हैं और इसकी पत्तियों में सूर्य की ऊर्जा को सोखने की अद्भुत क्षमता होती है। अखुरथ संकष्टी के दिन 21 दूर्वा की गांठें बनाकर उन्हें एक एक करके विशिष्ट नामों का उच्चारण करते हुए भगवान गणेश के चरणों और मस्तक पर अर्पित किया जाता है:
यह 21 दूर्वा दल वास्तव में मानव देह के 21 मूल तत्वों पंच महाभूत, पंच ज्ञानेंद्रियां, पंच कर्मेंद्रियां, पंच प्राण और एक मन के पूर्ण समर्पण का प्रतीक हैं। जब साधक इन तत्वों को विघ्नहर्ता के चरणों में समर्पित कर देता है, तो उसके भीतर की समस्त नकारात्मक ऊष्मा और मानसिक तनाव उसी प्रकार शांत हो जाते हैं जैसे अनलासुर का विष शांत हुआ था।
नारद पुराण से उद्धृत संकटनाशन गणेश स्तोत्र सनातन वांग्मय का वह सिद्ध स्तोत्र है जिसका नित्य अथवा संकष्टी के दिन पाठ करने से मनुष्य के जीवन के बड़े से बड़े अवरोध तिनके की भांति उड़ जाते हैं। देवर्षि नारद द्वारा रचित इस स्तोत्र में भगवान गणेश के बारह परम पावन नामों का संकीर्तन किया गया है, जो जातक के प्रभामंडल को अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ करते समय साधक को शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करके गणेश जी के विग्रह के सम्मुख पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। स्तोत्र के बारह नाम सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्ननाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन हैं। इन नामों का तीन बार श्रद्धापूर्वक पाठ करने से जातक को विद्या, धन, संतान और मोक्ष की सहज प्राप्ति होती है। जिन लोगों के बने बनाए कार्य अंतिम क्षण में बिगड़ जाते हैं, व्यापार में लगातार घाटा हो रहा हो, अथवा जिनके घर में अज्ञात भय का वातावरण बना रहता हो, उन्हें अखुरथ संकष्टी के दिन इस स्तोत्र का कम से कम 11 बार सस्वर पाठ अवश्य करना चाहिए। इस स्तोत्र की ध्वनि तरंगे घर के संपूर्ण वास्तु दोषों को भस्म करके वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर कर देती हैं।
संकष्टी चतुर्थी के व्रत का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य चरण है रात्रि में चंद्र देव को अर्घ्य समर्पित करना। सनातन धर्म में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। चतुर्थी तिथि के दिन चंद्रमा की कलाएं और उनकी गुरुत्वाकर्षण तरंगे मनुष्य के अंतःकरण के जल तत्व को अत्यधिक उद्वेलित करती हैं। यही कारण है कि इस तिथि को चंद्र दर्शन सीधे न करके जल की धारा के मध्य से करने का विधान ऋषियों ने बनाया है।
अखुरथ संकष्टी की रात्रि में जब चंद्रोदय होता है तब साधक को एक शुद्ध पात्र में गंगाजल, कच्चा गोदुग्ध, अक्षत, रोली और श्वेत पुष्प एकत्र करने चाहिए। इसके उपरांत दोनों हाथों को मस्तक के ऊपर उठाकर गिरती हुई जलधारा के बीच से चंद्रमा के बिंब का दर्शन करते हुए अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय ॐ सों सोमाय नमः अथवा ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात् मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। यह क्रिया साधक के मन की चंचलता को शांत करती है, अवसाद को मिटाती है और कुंडली में स्थित चंद्र दोष को पूरी तरह समाप्त कर देती है। अर्घ्य का जल पैरों में न लगे, इसके लिए नीचे कोई थाली अथवा गमला रखना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
वैदिक ज्योतिष में भगवान गणेश को केतु ग्रह का अधिष्ठाता देवता माना गया है, जो मोक्ष, वैराग्य, पराविद्या और अचानक आने वाली आपदाओं का स्वामी है। इसके अतिरिक्त, बुध ग्रह जो बुद्धि और वाणी का कारक है, वह भी गणेश जी की आराधना से परम बलवान होता है। जब कोई जातक अगहन की अखुरथ संकष्टी का व्रत करता है, तो उसकी कुंडली में बुध, केतु और राहु से उत्पन्न होने वाले समस्त अनिष्ट प्रभाव स्वतः शांत हो जाते हैं।
भगवान गणेश का मूषक वाहन केवल एक पौराणिक कथा नहीं है बल्कि यह गहन व्यावहारिक दर्शन है। चूहा भूमि के भीतर अंधकार में रहता है और किसी भी मजबूत वस्तु को धीरे धीरे कुतर कर नष्ट कर देता है। हमारे भीतर छिपी हुई वासनाएं, अविश्वास और संशय भी उसी चूहे की भांति हमारे आत्मबल और पुण्य कर्मों को धीरे धीरे कुतरते रहते हैं। भगवान गणेश जब मूषक की पीठ पर आरूढ़ होते हैं, तो वे यह दिखाते हैं कि विवेक के द्वारा इन क्षुद्र वृत्तियों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया जाना चाहिए। जब मनुष्य अपनी चंचल इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, तभी वह जीवन में अखुरथ सिद्धि को प्राप्त कर पाता है।
मार्गशीर्ष मास की इस पावन तिथि पर किए जाने वाले कुछ विशिष्ट और अनुभूत तांत्रिक टोटके मनुष्य के जीवन की दिशा को पूरी तरह बदलने का सामर्थ्य रखते हैं। इन उपायों को पूर्ण श्रद्धा और गोपनीयता के साथ संपन्न किया जाना चाहिए।
यह उपाय साधक की दरिद्रता को हरने वाले और उसके जीवन में अखंड सुख, शांति और सुरक्षा की प्रतिष्ठा करने वाले सिद्ध होते हैं।
इस परम पावन व्रत की पूर्ण फलश्रुति के लिए प्रामाणिक पूजन विधि का पालन करना आवश्यक है। प्रातःकाल स्नानादि के पश्चात पूजा गृह में एक स्वच्छ चौकी पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की अखुरथ स्वरूप वाली प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। प्रतिमा के सम्मुख एक तांबे के कलश में जल भरकर रखें और उसके मुख पर आम के पत्ते व नारियल स्थापित करें।
सर्वप्रथम घी का एक दीपक और अगरबत्ती प्रज्वलित करें। इसके पश्चात भगवान गणेश को जल, पंचामृत और पुनः शुद्ध जल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं। उन्हें सिंदूर, रोली, चंदन, अक्षत और लाल पुष्प अर्पित करें। 21 दूर्वा दलों को उनके मस्तक पर श्रद्धापूर्वक समर्पित करें। भोग के रूप में शुद्ध घी से बने मोदक, तिलकुट अथवा ऋतु फल अर्पित करें। इसके बाद संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें और गणेश जी की आरती उतारें। दिनभर उपवास रखें और संध्या समय चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को विधिपूर्वक अर्घ्य देकर ही फलाहार ग्रहण करें। अगहन मास में इस विधि से किया गया अखुरथ संकष्टी व्रत मनुष्य के जीवन के समस्त संतापों को भस्म करके उसे परम पद की ओर अग्रसर करता है।
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी किस हिंदू माह में मनाई जाती है? अखुरथ संकष्टी चतुर्थी प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है।
अखुरथ शब्द का शास्त्रीय और शाब्दिक अर्थ क्या है? अखुरथ शब्द में अखु का अर्थ मूषक अर्थात चूहा है और रथ का अर्थ सवारी है, जिसका अर्थ मूषक की सवारी करने वाले भगवान गणेश है।
संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन और अर्घ्य देना क्यों अनिवार्य माना जाता है? चंद्रमा मन का कारक है और चतुर्थी तिथि पर उसकी तरंगे तीव्र होती हैं, अर्घ्य देने से मानसिक शांति मिलती है और व्रत पूर्ण माना जाता है।
भगवान गणेश को 21 दूर्वा दल अर्पित करने का क्या महत्व है? 21 दूर्वा दल मानव देह के 21 मूल तत्वों का प्रतीक हैं, इन्हें चढ़ाने से अंतःकरण की जलन शांत होती है और समस्त विघ्न टल जाते हैं।
इस व्रत में कौन सा स्तोत्र पढ़ना सबसे अधिक फलदायी माना गया है? अखुरथ संकष्टी के दिन नारद पुराण में वर्णित संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करना समस्त बाधाओं को दूर करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
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