By पं. नरेंद्र शर्मा
रसोई शुद्धिकरण और अन्नदान से पाएँ अक्षय समृद्धि

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का पावन दिन संपूर्ण ब्रह्मांड के पोषण की अधिष्ठात्री देवी माँ अन्नपूर्णा के प्राकट्य दिवस के रूप में शास्त्रों में मान्य है। गृहस्थ जीवन में अन्न, पोषण और ऐश्वर्य का संचरण इसी दिव्य चेतना से संभव होता है, इसलिए पूजा की विधि और मुहूर्त का सटीक ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
| विषय | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| Pal | Vivaran |
| तिथि | मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| मुख्य देव स्वरूप | माँ अन्नपूर्णा और भिक्षुक सदाशिव |
| दिशा शुद्धि | रसोई का ईशान कोण |
| प्रधान मंत्र | ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भगवति अन्नपूर्णे नमः |
| मुख्य भोग | नवैद्य खीर, अक्षत, ऋतु फल और शुद्ध जल |
| अनिवार्य संकल्प | किसी भी याचक को भूखा न लौटाने का प्रण |
शास्त्रों के अनुसार पूर्णिमा तिथि के सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक का समय साधना के लिए उत्तम फलदायी माना जाता है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की पूर्ण स्वच्छता की जाती है, जिसके उपरांत गंगाजल के छिड़काव से पाकशाला को पवित्र किया जाता है। भोजन बनाने के चूल्हे पर कुमकुम और हल्दी से स्वस्तिक बनाकर अक्षत अर्पित किए जाते हैं। दिन के प्रथम प्रहर में धूप, दीप और गंध से रसोई घर के प्रधान साधन को अलंकृत करना आवश्यक होता है। साधक को इस पूरे दिन सात्विक आचरण रखना होता है और घर के भंडार गृह में माता के नाम का एक दीपक प्रज्वलित करके अन्न के कण का अनादर न करने का व्रत धारण करना पड़ता है।
सनातनी आख्यानों में जब भी प्रकृति और पुरुष के संतुलन की चर्चा होती है, काशी और देवाधिदेव महादेव का प्रसंग स्वाभाविक रूप से सम्मुख आ जाता है। एक बार जगत में माया और सत्य की सूक्ष्म व्याख्या के मध्य जब अन्न को नश्वर कहकर उपेक्षित किया जाने लगा तब प्रकृति स्वरूपा माता पार्वती ने संपूर्ण संसार से अपना पोषण तत्व समेट लिया। समस्त लोकों में हाहाकार मच गया, वनस्पतियां सूखने लगीं और जीव मात्र क्षुधा की ज्वाला में जलने लगा। जब जीव चेतना का अस्तित्व संकट में आ गया तब आदिदेव भगवान शिव को यह बोध हुआ कि देह की स्थिरता के बिना आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा भी संभव नहीं है। जगत के संकट को हरने के लिए भगवान शिव ने स्वयं भिक्षुक का रूप धारण किया और काशी नगरी में प्रकट हुई माँ अन्नपूर्णा के समक्ष अपनी झोली फैला दी।
देवी ने अपने अमृतमय करकमलों से महादेव के पात्र में भिक्षा प्रदान करके संसार को यह संदेश दिया कि अन्न मात्र पदार्थ नहीं बल्कि साक्षात ब्रह्म का ही एक साकार स्वरूप है। भगवान शिव द्वारा देवी के चरणों में शीश झुकाकर भिक्षा ग्रहण करने की यह घटना मनुष्य जाति को विनम्रता और कृतज्ञता का शाश्वत पाठ पढ़ाती है। जो मनुष्य इस रहस्य को समझ लेता है कि जीवन में प्राप्त होने वाला प्रत्येक दाना ईश्वरीय कृपा का प्रसाद है, उसके मन से अहंकार विलीन हो जाता है।
वैदिक वास्तु और ज्योतिष शास्त्र में पाकशाला को केवल भोजन पकाने का स्थान नहीं माना गया है, अपितु यह स्थान मनुष्य के प्रारब्ध और स्वास्थ्य का मूल केंद्र है। रसोई घर में अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी का प्रत्यक्ष समन्वय स्थापित होता है, जो नवग्रहों की ऊर्जा को संतुलित करने की क्षमता रखता है। चूल्हा अग्नि तत्व का साक्षात प्रतिनिधित्व करता है और मंगल देव की ऊर्जा का संवाहक माना जाता है, जबकि जल का स्थान चंद्रमा और शुक्र के नियंत्रण में रहता है।
रसोई के ईशान कोण को देवताओं की दिशा माना जाता है, जहां दिव्य शक्तियों का वास होता है। जब इस पावन कोण में गोघृत का दीपक जलाया जाता है तब घर की समस्त नकारात्मक तरंगें जलकर भस्म हो जाती हैं। यह प्रकाश अंधकार को दूर करने के साथ ही उस घर की आर्थिक सीमाओं को भी विस्तार प्रदान करता है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन अन्नपूर्णा जयंती पर चूल्हे का पूजन केवल एक बाह्य अनुष्ठान नहीं है, अपितु यह जीवनदायिनी ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक महान वैदिक उपक्रम है। प्रातःकाल स्नान के पश्चात संपूर्ण चूल्हे को गंगाजल मिश्रित जल से धोकर पोंछ लिया जाता है। इसके पश्चात उस पर रोली से त्रिकोण और स्वस्तिक का निर्माण किया जाता है। अक्षत अर्थात वह चावल जो टूटा हुआ न हो, पूर्णता का प्रतीक है और इसका अर्पण जीवन में अखंड समृद्धि की कामना का सूचक माना जाता है।
शास्त्रों में विधान है कि चूल्हे पर सर्वप्रथम अग्नि प्रज्वलित करके शुद्ध दूध को उबाला जाए और उससे खीर बनाकर देवी को समर्पित की जाए। यह कर्म घर के भीतर कभी न समाप्त होने वाले धन धान्य के प्रवाह का मार्ग प्रशस्त करता है। इस दिन अन्न के भंडार को खुला रखकर उस पर हल्दी और दुर्वा अर्पित करने से दरिद्रता का प्रवेश द्वार सदा के लिए बंद हो जाता है। जब मनुष्य अपनी पाकशाला को एक मंदिर के समान मानकर उसका सत्कार करता है तब माता अन्नपूर्णा उस भवन में अपनी सूक्ष्म उपस्थिति सदा बनाए रखती हैं।
आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित श्री अन्नपूर्णा स्तोत्र ज्ञान, वैराग्य और भौतिक भरण पोषण का एक अनुपम संगम है। इस पावन स्तोत्र का पाठ करते समय साधक केवल अपनी क्षुधा शांत करने के लिए अन्न नहीं मांगता, अपितु वह आत्मज्ञान और मोक्ष की भी प्रार्थना करता है। नित्य या जयंती के विशिष्ट पर्व पर इसका सस्वर गायन करने से मनुष्य की चेतना शुद्ध होती है और वाणी में माधुर्य आता है।
स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में ब्रह्मांड की जननी के अनुपम सौंदर्य और उनकी करुणा का ऐसा वर्णन है जो कठिन से कठिन कर्म बंधनों को शिथिल कर देता है। जिन घरों में आर्थिक संकट निरंतर बना रहता है या परिवार के सदस्यों के बीच तनाव रहता है, वहां इस स्तोत्र की ध्वनि अत्यंत सकारात्मक परिवर्तन लाती है। यह पाठ अंतःकरण की भूख और शरीर की भूख दोनों को शांत करने वाला एक दिव्य अमोघ उपाय सिद्ध होता है।
वैदिक दर्शन में अन्नदान को महादान की संज्ञा दी गई है क्योंकि यही एक ऐसा दान है जिससे तृप्ति का अनुभव तुरंत होता है। अन्नपूर्णा जयंती के दिन जो व्यक्ति किसी भी याचक को अपने द्वार से खाली हाथ नहीं लौटाता, वह अनंत पुण्यों का भागीदार बन जाता है। पुराणों में कहा गया है कि किसी भूखे जीव को भोजन कराना सीधे भगवान विष्णु और भगवान शिव को संतुष्ट करने के समान है।
जो मनुष्य दूसरों की भूख मिटाने का संकल्प लेता है, उसके जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व स्वयं प्रकृति उठा लेती है। यह कर्म का वह अटल नियम है जो कभी निष्फल नहीं होता और मनुष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संपन्नता प्रदान करता है।
समृद्धि केवल तिजोरी में रखे स्वर्ण या धन का नाम नहीं है, अपितु वह मानसिक शांति, उत्तम स्वास्थ्य और परिजनों के आपसी प्रेम का योग है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा का यह दिव्य पर्व मनुष्य को अपनी मूल जड़ों से जोड़ता है और प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपहारों का आदर करना सिखाता है। जब मनुष्य अपनी पाकशाला को शुद्ध रखता है, भोजन को ब्रह्म मानकर ग्रहण करता है और अभावग्रस्तों के प्रति संवेदनशील रहता है तब उसके घर में कभी अभाव का वास नहीं होता। माँ अन्नपूर्णा की अविरल करुणा हर उस हृदय में बहती है जो करुणा और कृतज्ञता से भरा हुआ है।
अन्नपूर्णा जयंती किस हिंदू माह में मनाई जाती है? अन्नपूर्णा जयंती प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा तिथि को विधि विधान से मनाई जाती है।
अन्नपूर्णा जयंती के दिन रसोई घर के किस कोने में दीपक जलाना चाहिए? इस पावन दिन रसोई घर के ईशान कोण अर्थात पूर्वोत्तर दिशा में शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
इस दिन चूल्हे की पूजा का क्या विशेष महत्व है? चूल्हा अग्नि तत्व और पोषण का साक्षात प्रतीक है, इसकी पूजा करने से घर में मंगल दोष शांत होता है और अन्न की कभी कमी नहीं होती।
क्या अन्नपूर्णा जयंती पर व्रत रखना आवश्यक होता है? इस दिन सात्विक व्रत रखना और केवल फलाहार या एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।
दरिद्रता निवारण के लिए इस दिन कौन सा पाठ करना चाहिए? घर से दरिद्रता दूर करने और समृद्धि की प्राप्ति के लिए आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री अन्नपूर्णा स्तोत्र का पाठ करना सर्वोत्तम उपाय है।
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