By पं. अमिताभ शर्मा
मार्तंड भैरव खण्डोबा अवतार हल्दी महा अभिषेक और अंगारक दोष निवारण

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को चंपा षष्ठी और स्कंद षष्ठी के अत्यंत पावन पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह तिथि भगवान शिव के अत्यंत तेजस्वी और उग्र अवतार भगवान मार्तंड भैरव अर्थात मल्हारी खण्डोबा तथा देवसेनापति भगवान कार्तिकेय की विजय को समर्पित है। शास्त्रों में इस दिन को समस्त प्रकार के शत्रुओं के दमन, अंगारक दोष की शांति, रक्त विकारों के निवारण और जीवन में अदम्य साहस के संचरण के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जो जातक निरंतर पारिवारिक कलह, भूमि विवाद, न्यायालयीन समस्याओं अथवा अज्ञात भयों से घिरे रहते हैं उनके लिए यह साधना एक दिव्य रक्षा कवच का निर्माण करती है। इस पावन व्रत और पूजन के लिए सुनिश्चित शास्त्रीय मुहूर्त, विशेष पूजन सामग्री और नियमों का परिपालन अनिवार्य माना गया है।
| साधना अंग | वैदिक नियम और शास्त्रोक्त निर्देश |
|---|---|
| पावन तिथि व मास | मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि |
| अधिष्ठाता देव स्वरूप | भगवान मार्तंड भैरव खण्डोबा और देवसेनापति भगवान कार्तिकेय |
| पूजन का श्रेष्ठ समय | प्रातः सूर्योदय वेला अथवा मध्याह्न काल |
| सिद्ध महामंत्र | ॐ मार्तंडाय नमः अथवा ॐ शारवणभवाय नमः |
| मुख्य भोग नैवेद्य | भुना हुआ बैंगन का भर्ता, बाजरे की रोटी और प्याज |
| प्रधान पूजन सामग्री | शुद्ध पिसी हुई हल्दी का भंडार, बेलपत्र, चंपा के पुष्प और सरसों का तेल |
| आध्यात्मिक और ज्योतिषीय फल | अंगारक दोष शमन, शत्रु विजय, रक्त शुद्धि और अचल साहस |
चंपा षष्ठी के पावन दिन साधक को प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होना चाहिए। यदि संभव हो तो स्नान के जल में एक चुटकी शुद्ध पिसी हुई हल्दी मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ पीले अथवा लाल वस्त्र धारण कर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
इस शास्त्रसम्मत अनुष्ठान का श्रद्धापूर्वक पालन करने से साधक के जीवन से समस्त नकारात्मक ऊर्जाएं तत्क्षण निष्कासित हो जाती हैं। परिवार में शांति का वातावरण बनता है और शारीरिक दुर्बलताएं दूर होने लगती हैं।
प्राचीन काल में मणि और मल्ल नामक दो अत्यंत बलशाली और क्रूर असुर भाइयों ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उन्हें कोई भी साधारण देवता, मानव अथवा अस्त्र शस्त्र पराजित न कर सके। इस वरदान के मद में अंधा होकर उन दोनों दैत्यों ने पृथ्वी पर घोर उत्पात मचाना आरंभ कर दिया। उन्होंने ऋषियों के आश्रमों को विध्वंस कर दिया, यज्ञों को अपवित्र किया और पृथ्वी के संपूर्ण धर्म आचरण को नष्ट करने का प्रयास किया।
ऋषि मुनि अपनी रक्षा के लिए भगवान देवाधिदेव महादेव की शरण में पहुंचे और उनसे रक्षा की गुहार लगाई। उनकी करुण पुकार सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे। महादेव ने उन दुष्ट असुरों का संहार करने हेतु सूर्य के समान जाज्वल्यमान एक अत्यंत उग्र और भव्य रूप धारण किया जिसे मार्तंड भैरव कहा गया। इस दिव्य रूप में भगवान शिव का वर्ण पिघले हुए सोने के समान दीप्तिमान था और उनके हाथ में त्रिशूल, खड्ग और डमरू सुशोभित था। लोक संस्कृति में इसी पावन स्वरूप को भगवान खण्डोबा अथवा मल्हारी के नाम से जाना जाता है।
भगवान मार्तंड भैरव ने अपनी दिव्य सेना के साथ मणि और मल्ल की विशाल असुर सेना पर धावा बोल दिया। यह प्रलयंकारी धर्म युद्ध लगातार छह दिनों तक चलता रहा। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होकर यह महायुद्ध षष्ठी तिथि तक अनवरत चला।
इस प्रकार संसार को यह सनातन सत्य प्राप्त हुआ कि अधर्म और आतंक का विस्तार चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, ईश्वरीय न्याय के सम्मुख उसका विनाश निश्चित होता है।
उत्तर और दक्षिण भारत में मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी का दिन भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय के पूजन का महापर्व माना जाता है। दक्षिण भारत में इन्हें मुरुगन, सुब्रह्मण्यम और स्कंद के नाम से पूजा जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब तारकासुर नामक दैत्य ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था, तब भगवान शिव के वीर्य और अग्नि के तेज से कार्तिकेय का प्राकट्य हुआ था।
उनका लालन पालन कृतिकाओं द्वारा किए जाने के कारण उनका नाम कार्तिकेय पड़ा। जब वे बड़े हुए तब समस्त देवताओं ने उन्हें अपनी सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त किया। भगवान कार्तिकेय ने अपने दिव्य भाले जिसे वेल कहा जाता है, उसके एक ही वार से तारकासुर और उसके भाइयों का संहार कर धर्म का विजय पताका फहराया।
चंपा षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की उपासना करने से व्यक्ति के भीतर नेतृत्व क्षमता, बौद्धिक तीक्ष्णता और असीम शौर्य का विकास होता है। दक्षिण भारत के पावन तीर्थों जैसे पलानी, तिरुचेंदूर और स्वामीमलाई में इस दिन लाखों भक्त कांवड़ यात्रा निकालते हैं और अपने आराध्य देव को दूध और चंदन से स्नान कराते हैं। यह दिन हमें यह सिखाता है कि आत्म संयम और एकाग्रता के बल पर जीवन के बड़े से बड़े संकट को जीता जा सकता है।
चंपा षष्ठी के पर्व पर भगवान खण्डोबा के मंदिरों में, विशेष रूप से महाराष्ट्र के प्रसिद्ध जेजुरी धाम में, हल्दी का ऐसा महा अभिषेक होता है जिसकी उपमा संपूर्ण विश्व में कहीं नहीं मिलती। इस पावन अवसर पर लाखों श्रद्धालु एकत्रित होकर हल्दी का चूर्ण आकाश में उछालते हैं जिससे संपूर्ण पर्वत और प्रांगण स्वर्ण वर्ण में रंग जाता है। इस पवित्र अनुष्ठान को लोकभाषा में भण्डारा कहा जाता है। इस समय भक्त अत्यंत उत्साह से येलकोट येलकोट जय मल्हार का जयघोष करते हैं।
हल्दी का यह महा अभिषेक केवल एक बाह्य उत्सव नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरा दार्शनिक और चिकित्सीय रहस्य छिपा हुआ है। आयुर्वेद में हल्दी को साक्षात हरिद्रा कहा गया है जो समस्त प्रकार के विष, संक्रमण और रक्त विकारों का नाश करने वाली परम औषधि है। जब वातावरण में शीत ऋतु का प्रवेश होता है तब हल्दी का उबटन और उसका दर्शन शरीर में प्राकृतिक ऊष्मा का संचार करता है।
इस प्रकार हल्दी का यह महा अभिषेक साधक के बाह्य और आंतरिक दोनों शरीरों को शुद्ध कर उसे देवत्व की ओर अग्रसर करता है।
चंपा षष्ठी के पावन अवसर पर भगवान खण्डोबा को अर्पित किया जाने वाला भोग अत्यंत अनूठा और लोक संस्कृति का दर्पण है। इस दिन भगवान को किसी छप्पन भोग अथवा राजसी मिष्ठान्न के स्थान पर अंगारों पर भुने हुए बैंगन का भर्ता और हाथ से बनी बाजरे की रोटी का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही कच्चा प्याज और लहसुन भी कुछ विशेष लोक परंपराओं में प्रसाद रूप में चढ़ाया जाता है।
यह परंपरा इस बात का साक्षात प्रमाण है कि सनातन धर्म में ईश्वर और प्रकृति के बीच कोई भेद नहीं है। मार्गशीर्ष मास में नई फसल के रूप में खेतों में ताजे बैंगन और नया बाजरा तैयार होता है। भारतीय संस्कृति का यह सनातन नियम रहा है कि खेत से उत्पन्न होने वाले नए अन्न का पहला भाग देवताओं को कृतज्ञतापूर्वक समर्पित किया जाए।
वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टि से भी यह भोग हेमंत ऋतु के अनुकूल है। बाजरा शरीर को आवश्यक गर्मी और ऊर्जा प्रदान करता है तथा पाचन को सुदृढ़ बनाता है। भुना हुआ बैंगन शरीर के वात दोष को नियंत्रित करने में सहायक होता है। भगवान खण्डोबा जो किसानों, पशुपालकों और श्रमजीवियों के परम रक्षक हैं, वे इस सादे और पवित्र अन्न को देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यह नैवेद्य मनुष्य को यह शिक्षा देता है कि परमात्मा को आडंबर नहीं बल्कि सादगी और निस्वार्थ प्रेम प्रिय है।
वैदिक ज्योतिष के फलित सिद्धांतों में षष्ठी तिथि का आधिपत्य देवसेनापति भगवान कार्तिकेय को प्राप्त है। ज्योतिष शास्त्र में षष्ठी तिथि और नवग्रहों के सेनापति मंगल देव का अत्यंत घनिष्ठ संबंध माना गया है। मंगल देव शौर्य, पराक्रम, अचल संपत्ति, रक्त और युद्ध कौशल के अधिष्ठाता ग्रह हैं।
जब किसी जातक की जन्म पत्रिका में मंगल का संबंध राहु अथवा केतु जैसे छाया क्रूर ग्रहों से हो जाता है तब अंगारक दोष का निर्माण होता है। इस दोष के प्रभाव से व्यक्ति का स्वभाव अत्यंत क्रोधी, हिंसक और अस्थिर हो जाता है। उसे रक्त विकार, दुर्घटनाएं, मुकदमों में पराजय और शत्रुओं से निरंतर भय बना रहता है। चंपा षष्ठी का दिन इस भयंकर दोष की शांति के लिए संपूर्ण वर्ष का सबसे शक्तिशाली और अचूक दिन माना गया है।
| ज्योतिषीय घटक | चंपा षष्ठी साधना का प्रभाव | प्राप्त होने वाला समाधान |
|---|---|---|
| अंगारक दोष | अत्यधिक क्रोध, दुर्घटनाएं और रक्त की अशुद्धि | कार्तिकेय पूजन और हल्दी अर्पण से दोष का शमन |
| छठा भाव दोष | गुप्त शत्रु, भारी ऋण, मुकदमेबाजी और असाध्य रोग | मार्तंड भैरव के स्मरण से शत्रुओं का तत्काल दमन |
| मंगल की नीच स्थिति | आत्मविश्वास का अभाव, पराक्रम में कमी और भय | चंपा षष्ठी व्रत से आत्मबल और पौरुष की वृद्धि |
| भूमि भवन विवाद | अचल संपत्ति की प्राप्ति में बाधा और पैतृक विवाद | षष्ठी तिथि पर दीपदान से संपत्ति के मार्ग प्रशस्त |
| स्नायु व रक्त विकार | उच्च रक्तचाप, त्वचा रोग और मांसपेशियों में खिंचाव | तांबे के पात्र से जल अर्पण और हल्दी लेप से आरोग्य |
चंपा षष्ठी पर भगवान कार्तिकेय और खण्डोबा की संयुक्त उपासना करने से मंगल की नकारात्मक ज्वाला शांत होकर सात्विक ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है।
यह ज्योतिषीय विश्लेषण प्रमाणित करता है कि चंपा षष्ठी की साधना मनुष्य के भीतर के भय को समाप्त कर उसे विजय का वरदान प्रदान करती है।
चंपा षष्ठी का यह पावन पर्व हमें स्मरण कराता है कि जीवन में शांति की स्थापना के लिए कभी कभी दुष्ट प्रवृत्तियों के विरुद्ध युद्ध करना अनिवार्य हो जाता है। भगवान मार्तंड भैरव और कार्तिकेय दोनों ही इस बात के प्रतीक हैं कि शक्ति जब धर्म और करुणा के अधीन होती है तभी वह संपूर्ण जगत का कल्याण करती है।
हमारे भीतर छिपे हुए काम, क्रोध, लोभ और अहंकार ही वे मणि और मल्ल दैत्य हैं जो हमारी आत्मा के विवेक को नष्ट करते रहते हैं। चंपा षष्ठी की यह साधना हमें अपने भीतर के इन विकारों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। जब हम अपनी संकीर्णताओं को त्यागकर ज्ञान रूपी हल्दी के भंडार को अपने जीवन में अपनाते हैं, तब हमारा संपूर्ण अस्तित्व ईश्वरीय सुगंध से महक उठता है। भगवान खण्डोबा और कार्तिकेय का स्मरण प्रत्येक साधक को भयमुक्त कर जीवन के प्रत्येक संग्राम में विजयी होने का दिव्य मार्ग आलोकित करता है।
चंपा षष्ठी किस दिन और किस महीने में मनाई जाती है? चंपा षष्ठी प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है।
चंपा षष्ठी पर भगवान खण्डोबा को हल्दी क्यों अर्पित की जाती है? असुरों के संहार के पश्चात देवताओं ने विजय उल्लास में हल्दी की वर्षा की थी, अतः हल्दी आरोग्य, विजय और सात्विक तेज का प्रतीक है।
चंपा षष्ठी पर किस पारंपरिक भोग का विशेष महत्व है? इस पावन दिन भगवान को अंगारों पर भुने हुए बैंगन का भर्ता और ताजी बाजरे की रोटी का पारंपरिक भोग लगाया जाता है।
चंपा षष्ठी के दिन किस ज्योतिषीय दोष की शांति होती है? इस दिन व्रत और पूजन करने से कुंडली का भयंकर अंगारक दोष शांत होता है और मंगल ग्रह के समस्त अशुभ प्रभाव दूर होते हैं।
भगवान खण्डोबा किसके अवतार माने जाते हैं? भगवान खण्डोबा देवाधिदेव महादेव शिव के मार्तंड भैरव रूप के अत्यंत तेजस्वी और उग्र योद्धा अवतार माने जाते हैं।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ