By पं. अमिताभ शर्मा
भगवान दत्तात्रेय २४ गुरु संदेश, वज्रकवच और गुरु चांडाल योग शांति

| विवरण | तिथि एवं समय | संप्रदाय | मुख्य पूजन सामग्री | मुख्य नियम |
|---|---|---|---|---|
| दत्तात्रेय जयंती | मार्गशीर्ष मास, पूर्णिमा तिथि (प्रदोष काल) | सनातन एवं दत्त संप्रदाय | सफेद पुष्प, गोपी चंदन, पंचामृत, पंचमेवा | सात्विक उपवास, दत्तात्रेय वज्रकवच पाठ |
| मुख्य देव | भगवान दत्तात्रेय (त्रिदेव रूप) | समस्त | पीले वस्त्र, तुलसी दल, दूर्वा, धूप-दीप | समभाव, प्राणीमात्र के प्रति दया, स्वाध्याय |
| पुण्य फल | गुरु चांडाल योग शांति, पितृ दोष मुक्ति | सनातन | अन्न, वस्त्र, पादुका एवं फल दान | अहंकार त्याग, प्रकृति से शिक्षा ग्रहण |
मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा तिथि को प्रदोष काल के अत्यंत पावन मुहूर्त में त्रिदेवों के संयुक्त अवतार भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ था। महर्षि अत्रि और माता अनसूया के अनुपम पातिव्रत्य तपोबल की परिणति के रूप में अवतरित भगवान दत्तात्रेय सनातन परंपरा में ज्ञान, वैराग्य और परम अवधूत अवस्था के साक्षात प्रतीक हैं। वे केवल एक संप्रदाय के इष्ट नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के शाश्वत गुरु हैं। दिगंबर रूप में विचरण करने वाले दत्तात्रेय भगवान ने सिद्ध किया कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती। उन्होंने किसी एक व्यक्ति को अपना गुरु न मानकर प्रकृति के चौबीस तत्वों से जीवन का परम सत्य सीखा। इस पावन जयंती पर भगवान दत्तात्रेय का पूजन करने से साधक को ब्रह्म ज्ञान, मानसिक शांति और जीवन जीने की सर्वोच्च कला प्राप्त होती है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध में राजा यदु और भगवान दत्तात्रेय के बीच हुए संवाद का अत्यंत सुंदर वर्णन आता है। जब राजा यदु ने अवधूत रूप में लीन दत्तात्रेय जी से उनकी अगाध शांति और प्रसन्नता का रहस्य पूछा तब उन्होंने प्रकट किया कि उन्होंने संसार के चौबीस विभिन्न घटकों से शिक्षा ग्रहण करके अपना गुरु बनाया है। उन्होंने पृथ्वी से सहनशीलता, वायु से असंगता और स्पर्श से परे रहना, आकाश से आत्मा की निर्लिप्तता तथा जल से पवित्रता सीखी। इसी प्रकार उन्होंने अग्नि से तपस्या, चंद्रमा से घटते-बढ़ते समय में भी अपरिवर्तनीय रहना और सूर्य से बिना किसी पक्षपात के अपनी किरणें सब पर बिखेरना सीखा।
भगवान दत्तात्रेय ने यह सिखाया कि यदि मनुष्य के भीतर सीखने की जिज्ञासा हो तो संसार का प्रत्येक छोटा-बड़ा प्राणी उसे आध्यात्मिक मार्ग दिखा सकता है।
ज्योतिष शास्त्र में भगवान दत्तात्रेय को देवगुरु बृहस्पति का सर्वोच्च आध्यात्मिक और सात्विक स्वरूप माना गया है। जब कुंडली में बृहस्पति ग्रह कमजोर होता है या राहु के प्रभाव में आकर गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है तब व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और उसे सही दिशा नहीं मिलती। ऐसे समय में दत्तात्रेय भगवान की आराधना कल्पवृक्ष के समान कार्य करती है।
| ग्रह दोष / योग | आध्यात्मिक कारण | दत्तात्रेय पूजन का ज्योतिषीय लाभ |
|---|---|---|
| गुरु चांडाल योग (गुरु + राहु) | बुद्धि और धर्म पथ से भटकाव | मानसिक भ्रम का अंत, सही निर्णय क्षमता और ज्ञान वृद्धि |
| पितृ दोष | पूर्वजों का असंतोष और कर्म बंधन | पूर्वजों की आत्मा को शांति और वंश वृद्धि में आ रही बाधाओं का अंत |
| कमजोर बृहस्पति | भाग्य हानि और विद्या में रुकावट | नवग्रहों की अनुकूलता और जीवन में आध्यात्मिक उन्नति |
दत्तात्रेय जयंती के दिन दत्तात्रेय वज्रकवच का विधिपूर्वक पाठ करने से कुंडली के समस्त असाध्य दोष क्षीण होने लगते हैं। जो जातक मानसिक रूप से अत्यंत व्यथित रहते हैं या जिनकी शिक्षा और करियर में निरंतर बाधाएं आ रही हैं, वे इस पावन अवसर पर अवधूत रूप का ध्यान करके सभी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं।
इस पावन तिथि पर प्रातःकाल स्नान ध्यान करके भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा अथवा उनके चित्र के समक्ष व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजन के लिए प्रदोष काल अर्थात् सायंकाल का समय सबसे श्रेष्ठ माना गया है। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर दत्तात्रेय भगवान की स्थापना करें और उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं।
साधक को इस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपना ध्यान सात्विक विचारों में लगाना चाहिए। भगवान दत्तात्रेय पादुका पूजन से अत्यंत प्रसन्न होते हैं, इसलिए इस दिन उनकी काष्ठ पादुकाओं का पूजन करना विशेष फलदायी है।
भगवान दत्तात्रेय किसके अवतार माने जाते हैं? भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों देवों के संयुक्त एकाकार अवतार माने जाते हैं।
दत्तात्रेय जयंती पर किस कवच का पाठ करने से ग्रह दोष शांत होते हैं? दत्तात्रेय जयंती पर दत्तात्रेय वज्रकवच का पाठ करने से गुरु चांडाल योग और पितृ दोष तत्काल शांत होते हैं।
भगवान दत्तात्रेय ने कितने गुरु बनाए थे? भगवान दत्तात्रेय ने प्रकृति और जीवों के चौबीस तत्वों को अपना गुरु बनाया था।
दत्तात्रेय जयंती की पूजा का मुख्य समय कौन सा होता है? दत्तात्रेय जयंती की पूजा का मुख्य समय मार्गशीर्ष पूर्णिमा का प्रदोष काल अर्थात् सायंकाल माना जाता है।
भगवान दत्तात्रेय का मुख्य मंत्र कौन सा है? भगवान दत्तात्रेय का मूल एवं अत्यंत प्रभावशाली मंत्र ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः है।
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