By पं. नीलेश शर्मा
श्रीमद्भगवद्गीता प्राकट्य कथा, पूजा विधि और ग्रह दोष निवारण

| विवरण | तिथि एवं समय | संप्रदाय | मुख्य पूजन सामग्री | मुख्य नियम |
|---|---|---|---|---|
| गीता जयंती | मार्गशीर्ष मास, शुक्ल पक्ष एकादशी | सनातन एवं वैष्णव | श्रीमद्भगवद्गीता ग्रंथ, पीले पुष्प, गंगाजल | स्वाध्याय, गीता पाठ |
| मुख्य देव | भगवान श्री कृष्ण (योगेश्वर) | समस्त | माखन-मिश्री, तुलसी दल, पीत वस्त्र | सत्य आचरण, समत्व भाव |
| पुण्य फल | अज्ञान का नाश, ग्रह दोष शांति | सनातन | वस्त्र, ग्रंथ एवं तिल दान | संशय और मोह का त्याग |
मार्तंड सूर्य की पावन रश्मियों के तले कुरुक्षेत्र के प्रांगण में जब महासमर की भेरी बज चुकी थी तब विषाद से भरे अर्जुन के मन को आलोकित करने के लिए भगवान श्री कृष्ण के श्रीमुख से कालजयी वाणी का प्राकट्य हुआ। विश्व इतिहास में श्रीमद्भगवद्गीता ही एकमात्र ऐसा अलौकिक ग्रंथ है जिसकी जयंती संपूर्ण विश्व में अत्यंत श्रद्धा और उत्सव के साथ मनाई जाती है। मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को जब मृगशिरा नक्षत्र का योग बना था तब दोपहर के दिव्य मुहूर्त में योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन को 700 श्लोकों के माध्यम से जीवन का शाश्वत सत्य समझाया था। यह पवित्र दिन न केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण कराता है बल्कि प्रत्येक मानव के भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व को समाप्त करके कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग की ओर अग्रसर करने का मार्ग दिखाता है।
महाभारत युद्ध के आरंभ होने से ठीक पूर्व कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दोनों ओर की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। कौरव और पांडव पक्ष के असंख्य योद्धा युद्ध के शंखनाद की प्रतीक्षा कर रहे थे। पांडु पुत्र अर्जुन ने अपने सारथि बने भगवान श्री कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाने की प्रार्थना की ताकि वे देख सकें कि उन्हें किनके साथ युद्ध करना है। जब अर्जुन ने सामने अपने दादा भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, भाइयों और अपने ही संबंधियों को शस्त्र तानकर खड़े देखा तो उनका हृदय करुणा और मोह से भर गया। उनके हाथ से गांडीव धनुष छूट गया और वे अत्यंत व्याकुल होकर रथ के पिछले हिस्से में बैठ गए। अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया और कहा कि अपने ही परिजनों को मारकर मिलने वाले राज्य का वे क्या करेंगे।
अर्जुन की इस कायरता और मोह को देखकर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जगाया और आत्मा की अमरता का रहस्य समझाया। श्री कृष्ण ने अर्जुन को स्मरण कराया कि शरीर नश्वर है परंतु आत्मा अजर और अमर है, जिसे न तो शस्त्र काट सकते हैं और न ही अग्नि जला सकती है। जब अर्जुन का संशय फिर भी दूर नहीं हुआ तब श्री कृष्ण ने उन्हें अपना विराट विश्वरूप दिखाया जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड, समस्त काल और सारे देवी-देवता समाहित थे। उस दिव्य रूप को देखकर अर्जुन का अज्ञान पूरी तरह नष्ट हो गया और उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ धर्म की स्थापना हेतु धनुष उठाकर युद्ध करने का दृढ संकल्प लिया।
वैदिक ज्योतिष में मार्गशीर्ष मास और एकादशी तिथि के संयोग को अत्यंत उच्च ऊर्जा का कारक माना गया है। गीता जयंती के समय सूर्य और चंद्रमा की स्थितियां ऐसी बनती हैं जो व्यक्ति की चेतना को जागृत करती हैं और मानसिक भ्रम को समाप्त करती हैं। गीता के श्लोकों में ऐसी ध्वनि तरंगे और स्पंदन समाहित हैं जो कुंडली में स्थित गंभीर से गंभीर ग्रह दोषों को शांत करने की क्षमता रखते हैं। विशेष रूप से जब मन का कारक चंद्रमा कमजोर होता है या राहु-केतु के प्रभाव से बुद्धि भ्रमित होती है तब गीता का पाठ औषधि की तरह कार्य करता है।
| ग्रह / दोष | गीता अध्याय पाठ | आध्यात्मिक और ज्योतिषीय प्रभाव |
|---|---|---|
| राहु-केतु / मानसिक भ्रम | एकादश अध्याय (विश्वरूप दर्शन) | अलौकिक दृष्टि, भय का नाश और भ्रम से मुक्ति |
| सूर्य-गुरु / पितृ दोष | पंचदश अध्याय (पुरुषोत्तम योग) | ज्ञान में वृद्धि, आत्मबल और पितृ कृपा की प्राप्ति |
| शनि / कर्म बंधन | चतुर्थ अध्याय (ज्ञानकर्मसंन्यास) | कर्म चक्र की शुद्धि और भाग्य में वृद्धि |
ज्योतिषीय गणना के अनुसार गीता के 11वें अध्याय अर्थात् विश्वरूप दर्शन योग का पाठ करने से साधक के भीतर का अज्ञात भय समाप्त होता है और कुंडली में स्थित राहु तथा केतु के नकारात्मक प्रभाव क्षीण होते हैं। इसी प्रकार 15वें अध्याय अर्थात् पुरुषोत्तम योग का पाठ करने से सूर्य और बृहस्पति मजबूत होते हैं, जिससे व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और कुंडली का पितृ दोष शांत होता है।
इस पावन तिथि पर प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान ध्यान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। तत्पश्चात अपने घर के देवस्थान में भगवान श्री कृष्ण और श्रीमद्भगवद्गीता ग्रंथ की स्थापना करनी चाहिए। ग्रंथ को पवित्र जल या गंगाजल से प्रोक्षित करके पीले वस्त्र पर विराजमान करें। भगवान श्री कृष्ण और गीता माता को चंदन का तिलक लगाएं, पीले पुष्प अर्पित करें और धूप-दीप प्रज्वलित करें।
पूजा के समय मन में पूरी श्रद्धा और एकाग्रता होनी चाहिए। इस दिन गीता ग्रंथ का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। यदि संभव हो तो किसी विद्वान से गीता के अध्यायों का अर्थ सुनना चाहिए और अपने जीवन में उसके कम से कम एक उपदेश को उतारने का संकल्प लेना चाहिए।
गीता जयंती का पर्व क्यों मनाया जाता है? मार्गशीर्ष एकादशी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था, इसलिए इस दिन गीता जयंती मनाई जाती है।
कुंडली के दोष शांत करने के लिए गीता के किस अध्याय का पाठ करना चाहिए? राहु केतु दोष और भ्रम के लिए 11वें अध्याय तथा सूर्य गुरु दोष और पितृ दोष की शांति के लिए 15वें अध्याय का पाठ करना चाहिए।
क्या गीता जयंती के दिन गीता ग्रंथ का दान करना शुभ होता है? हां, इस पावन तिथि पर श्रीमद्भगवद्गीता का दान करने से अनंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है और ज्ञान का प्रसार होता है।
गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र में किस समय दिया गया था? ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार गीता का उपदेश मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को दोपहर के समय दिया गया था।
गीता जयंती पर भगवान श्री कृष्ण को क्या भोग लगाना चाहिए? भगवान श्री कृष्ण को माखन, मिश्री और तुलसी दल का भोग लगाना सबसे उत्तम और प्रिय माना जाता है।
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