By पं. नीलेश शर्मा
काशी के कोतवाल का प्राकट्य निशिता काल पूजा और भय मुक्ति

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान शिव के सबसे उग्र और न्यायप्रिय स्वरूप भगवान कालभैरव का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। शास्त्रों में इस पावन तिथि को कालभैरव अष्टमी अथवा भैरवाष्टमी के नाम से जाना जाता है। तंत्र शास्त्र में इस रात्रि को महा रात्रि के समान अत्यंत फलदायी और शक्तिशाली माना गया है। जब किसी जातक के जीवन में अज्ञात भय, घोर शत्रु बाधा, असाध्य रोग, भूत प्रेत जनित उपद्रव अथवा अकाल मृत्यु का संकट मंडरा रहा हो तब इस पावन तिथि पर की गई साधना मनुष्य को अभयदान प्रदान करती है। इस दिन निशिता काल अर्थात अर्धरात्रि की वेला में पूजन करने का विशेष विधान है।
| पूजन अंग | वैदिक एवं तांत्रिक निर्देश | शास्त्रोक्त फल |
|---|---|---|
| पावन तिथि व पक्ष | मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि | काल दोष और भय का समूल नाश |
| प्रधान साधना काल | निशिता काल अर्थात अर्धरात्रि 11 बजकर 40 मिनट से 12 बजकर 35 मिनट | तंत्र मंत्र सिद्धि और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति |
| अधिष्ठाता देव | देवाधिदेव महादेव के अवतार बाबा कालभैरव | अकाल मृत्यु निवारण और न्याय की प्राप्ति |
| प्रधान वाहन | कृष्ण वर्ण श्वान अर्थात काला कुत्ता | राहु केतु की शांति और भैरव कृपा |
| प्रमुख नैवेद्य | उड़द के पकोड़े, इमरती, मीठी रोटी और सरसों तेल का भोग | दरिद्रता का नाश और शनि पीड़ा की शांति |
| सिद्ध महामंत्र | ॐ भं भैरवाय नमः अथवा ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय नमः | समस्त आपदाओं और विपत्तियों का तत्काल शमन |
कालभैरव जयंती की साधना प्रारंभ करने के लिए साधक को सायंकाल अथवा निशिता काल में शुद्ध जल से स्नान कर गहरे लाल अथवा काले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा स्थल पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठना इस साधना में अनिवार्य माना गया है क्योंकि दक्षिण दिशा यम और काल की दिशा मानी जाती है।
इस संपूर्ण अनुष्ठान का श्रद्धापूर्वक पालन करने से जातक के भीतर की समस्त तामसिक वृत्तियां भस्म हो जाती हैं। चित्त में निर्भयता का संचार होता है और जीवन में आने वाले भयंकर संकट भी प्रभु की कृपा से तिनके के समान उड़ जाते हैं।
शिव महापुराण के शतरुद्र संहिता और स्कंद पुराण के काशी खंड में भगवान कालभैरव के प्राकट्य की एक अत्यंत रोमांचक और दार्शनिक कथा वर्णित है। प्राचीन काल में एक बार सुमेरु पर्वत के पावन शिखर पर समस्त ऋषि मुनि, देवता और गंधर्व एकत्रित हुए। वहां यह गंभीर प्रश्न उपस्थित हुआ कि इस संपूर्ण चराचर जगत का मूल आधार, अजन्मा और परम तत्व कौन है। वहां उपस्थित चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने अहंकारवश कहा कि मैं ही इस संपूर्ण सृष्टि का रचयिता और परम ब्रह्म हूं, अतः मेरी ही उपासना सर्वोपरि होनी चाहिए।
भगवान श्रीहरि विष्णु ने अत्यंत विनम्रता से इस कथन का प्रतिवाद किया और कहा कि सृष्टि के पालनकर्ता और मूल कारण तो स्वयं नारायण हैं। जब इस विवाद का कोई निर्णय नहीं हुआ तब चारों वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को साक्षी बनाया गया। चारों वेदों ने एक स्वर में उद्घोष किया कि जिनके भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड स्थित है, जो जन्म और मृत्यु से परे हैं और जो संहार तथा अनुग्रह के स्वामी हैं वे केवल और केवल देवाधिदेव महादेव शिव ही हैं।
वेदों के इस अकाट्य सत्य को सुनकर भी ब्रह्मा जी का पांचवां शीश मिथ्या अभिमान में जल उठा। ब्रह्मा जी के उस पांचवें मुख ने भगवान शिव के प्रति अत्यंत अनुचित, अपमानजनक और कटु शब्दों का उच्चारण आरंभ कर दिया। उसी क्षण सभा के मध्य में एक ऐसा अलौकिक प्रकाश स्तंभ प्रकट हुआ जिसकी न कोई सीमा थी और न कोई अंत।
भगवान शिव ने देखा कि ब्रह्मा का अहंकार मर्यादा की समस्त सीमाओं को लांघ चुका है। तब महादेव के भृकुटि मध्य अर्थात तीसरे नेत्र से क्रोधाग्नि की एक अत्यंत भयंकर ज्वाला प्रकट हुई। उस प्रलयंकारी अग्नि से एक विशाल, श्याम वर्ण, विशाल नेत्रों वाले और हाथ में त्रिशूल तथा दंड धारण किए हुए अत्यंत तेजस्वी पुरुष का प्राकट्य हुआ।
इस प्रकार संसार को यह अमर शिक्षा मिली कि सत्ता अथवा ज्ञान का मिथ्या अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह ईश्वरीय न्याय और काल के समक्ष कभी ठहर नहीं सकता।
ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काटने के पश्चात कालभैरव के सम्मुख एक अत्यंत विचित्र और विकट संकट उपस्थित हुआ। यद्यपि ब्रह्मा जी ने अपराध किया था किंतु वे एक परम ज्ञानी ब्राह्मण थे। इस कारण ब्रह्मा जी का सिर काटने के फलस्वरूप कालभैरव को भयानक ब्रह्महत्या के पाप ने घेर लिया। ब्रह्महत्या एक भयानक, विकराल और रक्त वर्ण स्त्री का रूप धारण कर भैरव जी के पीछे पड़ गई। इतना ही नहीं, ब्रह्मा जी का वह कटा हुआ खोपड़ी रूपी शीश कालभैरव के बाएं हाथ की हथेली से इस प्रकार चिपक गया कि वह किसी भी प्रयास से अलग नहीं हो पा रहा था।
कालभैरव व्याकुल होकर भगवान शिव के सम्मुख उपस्थित हुए। महादेव ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि यह लीला संपूर्ण जगत को कर्म की अचूक गति सिखाने के लिए रची गई है। शिवजी ने भैरव को निर्देश दिया कि वे हाथ में उस खप्पर को धारण कर एक कापालिक का रूप लेकर तीनों लोकों के पवित्र तीर्थों में भ्रमण करें। जब वे भ्रमण करते हुए संसार के सबसे पावन तीर्थ में पहुंचेंगे तब यह ब्रह्महत्या उनका पीछा छोड़ देगी और वह कपाल स्वतः हाथ से गिर जाएगा।
भगवान कालभैरव तीनों लोकों के पर्वतों, वनों, सरोवरों और तीर्थों में भटकते रहे। वे प्रयाग, बदरिकाश्रम, पुष्कर और नैमिषारण्य गए किंतु कहीं भी वह कपाल उनके हाथ से अलग नहीं हुआ। अंततः जब वे भगवान शिव की परम प्रिय नगरी काशी की पावन सीमा में प्रविष्ट हुए तब एक महान चमत्कार घटित हुआ।
काशी की सीमा में कदम रखते ही वह भयानक ब्रह्महत्या रूपी छाया चीत्कार करते हुए पाताल लोक में विलीन हो गई। जिस स्थान पर कालभैरव पहुंचे वहां उनके हाथ से वह चिपका हुआ कपाल स्वतः छूटकर भूमि पर गिर पड़ा। उस परम पावन स्थान को आज भी संसार कपाल मोचन तीर्थ के नाम से जानता है।
कालभैरव ने काशी की संपूर्ण व्यवस्था को अपने हाथों में ले लिया। वे पापी आत्माओं को काशी में यमराज के स्थान पर स्वयं अपने दंड से शुद्ध करते हैं जिसे भैरवी यातना कहा जाता है। यह यातना आत्मा के समस्त कर्म बंधनों को एक ही क्षण में काटकर उसे मोक्ष के योग्य बना देती है।
वैदिक ज्योतिष के फलित सिद्धांतों में भगवान कालभैरव का स्वरूप अत्यंत रहस्यमयी और प्रभावशाली माना गया है। नवग्रहों की व्यवस्था में कालभैरव का सीधा संबंध छाया ग्रह राहु, मोक्ष कारक केतु और कर्मफल दाता शनि से स्थापित है। राहु को काल पुरुष का मुख और केतु को उसका धड़ माना जाता है। जब किसी जातक की जन्म पत्रिका में राहु अथवा केतु प्रतिकूल स्थिति में होते हैं तब मनुष्य के जीवन में अकल्पनीय मानसिक भ्रम, भ्रम जाल, भय, अनिद्रा, प्रेत बाधा और अचानक आने वाली आपदाएं बढ़ जाती हैं।
वहीं दूसरी ओर सूर्य पुत्र शनि देव मंद गति से चलने वाले न्याय के देवता हैं। जब किसी जातक पर शनि की साढ़ेसाती अथवा ढैया का प्रभाव पड़ता है तब व्यक्ति के कर्मों का कठोर परीक्षण होता है। भगवान कालभैरव स्वयं भगवान शिव के दंडाधिकारी हैं, अतः शनि, राहु और केतु तीनों ही भैरव जी की आज्ञा के अधीन कार्य करते हैं।
| ज्योतिषीय घटक | कालभैरव साधना का प्रभाव | प्राप्त होने वाला समाधान |
|---|---|---|
| राहु ग्रह दोष | मानसिक संभ्रम, मतिभ्रम, नशा, अज्ञात विष भय | चौमुखी दीपक और भैरव मंत्र से राहु की पीड़ा शांत |
| केतु ग्रह दोष | विचित्र चर्म रोग, तंत्र बाधा, अलगाव और भय | काले श्वान को भोजन कराने से केतु की शुभता में वृद्धि |
| शनि साढ़ेसाती | कार्यों में अत्यधिक विलंब, अपमान, शारीरिक पीड़ा | सरसों के तेल का दान और कालभैरवाष्टकम से राहत |
| अष्टम भाव दोष | अकाल मृत्यु का भय, दुर्घटनाएं, पुरानी व्याधियां | महाकाल स्वरूप के ध्यान से पूर्ण सुरक्षा कवच |
| द्वादश भाव दोष | कारागार योग, अत्यधिक आर्थिक दंड, भारी व्यय | भैरव साधना से मुकदमों और गुप्त शत्रुओं पर विजय |
ज्योतिष शास्त्र में काला कुत्ता भगवान भैरव का वाहन माना गया है। श्वान एक ऐसा संवेदनशील प्राणी है जो सूक्ष्म लोकों की नकारात्मक ऊर्जाओं, भूत प्रेत तरंगों और आने वाली प्राकृतिक आपदाओं को अपनी गंध शक्ति से बहुत पहले ही पहचान लेता है।
यह ज्योतिषीय विधान प्रमाणित करता है कि भैरव जी की उपासना कोई डरावनी अथवा तामसिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह मनुष्य के अंतःकरण और उसके ग्रह मंडल को शुद्ध करने का परम सात्विक विज्ञान है।
तंत्र शास्त्र में वर्ष की चार प्रमुख रात्रियों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है जिनमें कालरात्रि (दीपावली), महारात्रि (शिवरात्रि), मोहरात्रि (जन्माष्टमी) और वीर रात्रि अथवा भैरव रात्रि (कालभैरव अष्टमी) सम्मिलित हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी की रात्रि को संपूर्ण ब्रह्मांड में काल चक्र की गति अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है। इस समय की गई तांत्रिक क्रियाएं, मंत्र जप और यंत्र की स्थापना कई गुना अधिक शक्तिशाली परिणाम देती हैं।
कालभैरव का नाम दो अक्षरों के समन्वय से बना है जिसमें काल का अर्थ समय और मृत्यु होता है जबकि भैरव का अर्थ भयानक अथवा समस्त भयों को हरने वाला होता है। भगवान दत्तात्रेय ने तंत्र ग्रंथों में स्पष्ट किया है कि जो समय का सम्मान नहीं करता कालभैरव उसे अपने दंड से नष्ट कर देते हैं और जो समय का सदुपयोग कर अपनी साधना में लीन रहता है भैरव उसके काल को भी टाल देते हैं।
अकाल मृत्यु संसार का सबसे भीषण संताप मानी जाती है जब कोई जीवात्मा अपने निर्धारित जीवन चक्र को पूरा किए बिना ही रोग, दुर्घटना अथवा शस्त्र के प्रहार से देह त्याग देती है। ऐसी अतृप्त आत्माएं लंबे समय तक भटकती रहती हैं।
आदि शंकराचार्य ने जब काशी में मणिकर्णिका घाट पर ध्यान लगाया था तब उन्हें भगवान कालभैरव के साक्षात दर्शन हुए थे। उस अलौकिक अनुभूति के उपरांत ही उन्होंने कालभैरवाष्टकम की रचना की थी जिसमें उन्होंने भैरव जी को धर्म सेतु, मुक्ति प्रदाता और काशी का शाश्वत रक्षक बताया है।
भगवान कालभैरव का पावन प्राकट्य हमें जीवन का सबसे गहरा सत्य सिखाता है कि अहंकार ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। ब्रह्मा जी जैसा परम ज्ञानी भी जब अपने ज्ञान और पद के घमंड में चूर हुआ तब उसे भी कालभैरव के प्रचंड दंड का सामना करना पड़ा। यह अवतार हमें यह चेतावनी देता है कि हमें अपनी उपलब्धियों, धन और रूप का कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।
भैरव का स्वरूप बाह्य दृष्टि से जितना उग्र और भयानक प्रतीत होता है, अंतर्मन से वे अपने शरणागत भक्तों के लिए उतने ही कोमल और दयालु हैं। वे अपने साधक के भय को हरने के लिए ही भयानक रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार एक पिता अपने अबोध बालक को अंधकार के हिंसक जीवों से बचाने के लिए स्वयं हाथ में लाठी लेकर खड़ा हो जाता है, ठीक उसी प्रकार बाबा कालभैरव भी अपने भक्तों को काल, व्याधि और नकारात्मक शक्तियों से बचाने के लिए दंड हाथ में लिए खड़े रहते हैं।
कालभैरव जयंती की इस पावन वेला में मनुष्य को अपने भीतर के प्रमाद, भय और विकारों को त्यागकर भगवान भैरव के चरणों में पूर्ण समर्पण कर देना चाहिए। जब मनुष्य समय के मूल्य को पहचानता है और धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है तब काल का कोई भी चक्र उसे विचलित नहीं कर सकता। बाबा कालभैरव का स्मरण प्रत्येक प्राणी को इस नश्वर संसार से पार उतारकर परम निर्भयता, आत्मिक शांति और मोक्ष के अमर प्रकाश की ओर अग्रसर करता है।
कालभैरव जयंती किस दिन और किस महीने में मनाई जाती है? कालभैरव जयंती प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है।
भगवान शिव ने कालभैरव अवतार क्यों धारण किया था? भगवान शिव ने ब्रह्मा जी के अहंकार का दमन करने और धर्म की मर्यादा स्थापित करने हेतु अपने तीसरे नेत्र की क्रोधाग्नि से यह अवतार लिया था।
काशी का कोतवाल किसे कहा जाता है और क्यों? भगवान कालभैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है क्योंकि महादेव ने उन्हें काशी का प्रधान दंडाधिकारी और रक्षक नियुक्त किया था।
कालभैरव जयंती पर काले कुत्ते को भोजन कराने का क्या महत्व है? काला कुत्ता भगवान भैरव का वाहन है और उसे भोजन कराने से राहु, केतु तथा शनि के समस्त अशुभ प्रभाव तत्काल शांत हो जाते हैं।
कालभैरवाष्टकम का पाठ करने से क्या फल मिलता है? कालभैरवाष्टकम का पाठ करने से अकाल मृत्यु का भय टलता है, पापों का नाश होता है और मनुष्य को समस्त कष्टों से मुक्ति मिलती है।
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