खरमास में क्यों रुक जाते हैं सभी मांगलिक कार्य?

By अपर्णा पाटनी

खरमास पौराणिक कथा, ज्योतिषीय कारण और विष्णु सहस्रनाम पाठ

खरमास क्यों लगता है नियम और धार्मिक उपाय
विवरण तिथि एवं अवधि संप्रदाय मुख्य पूजन सामग्री मुख्य नियम
खरमास (मलमास) धनु संक्रांति से मकर संक्रांति तक (एक माह) सनातन एवं वैदिक तुलसी पत्र, पीत वस्त्र, गंगाजल, दीप स्वाध्याय, नाम जप, सात्विक आचरण
मुख्य देव भगवान श्री हरि विष्णु एवं सूर्य देव समस्त गुड़, तिल, फल, गोपी चंदन मांगलिक कार्य वर्जित, ब्रह्मचर्य
पुण्य फल आत्मिक शुद्धि, पाप नाश, गुरु-सूर्य कृपा सनातन अन्न, वस्त्र, दीप एवं तिल दान अहंकार त्याग, तीर्थ स्नान

जैसे ही प्रत्यक्ष देव सूर्य भगवान जल तत्वीय वृश्चिक राशि का भ्रमण समाप्त करके देवगुरु बृहस्पति की स्वामीत्व वाली अग्नि तत्वीय धनु राशि में प्रवेश करते हैं, उसी क्षण से संपूर्ण सनातन परंपरा में एक मास की अवधि के लिए खरमास अथवा मलमास का आरंभ हो जाता है। यह अवधि प्रतिवर्ष मध्य दिसंबर से प्रारंभ होकर मध्य जनवरी में मकर संक्रांति तक निरंतर चलती है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार इस एक मास के दौरान सौर ऊर्जा और प्राकृतिक तरंगों में एक विशेष प्रकार का अंतर्मुखी परिवर्तन घटित होता है। यही कारण है कि इस समय काल में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नामकरण और नवीन व्यापार के शुभारंभ जैसे समस्त सांसारिक और लौकिक मांगलिक कार्यों को पूर्णतः रोक दिया जाता है तथा मनुष्य को अपना ध्यान बाह्य उत्सवों से हटाकर आंतरिक शुद्धि की ओर लगाने का परामर्श दिया जाता है।

खरमास का पौराणिक और वैदिक रहस्य क्या है?

खरमास के प्रारंभ होने के पीछे वैदिक साहित्य और पुराणों में अत्यंत रोचक कथा का वर्णन प्राप्त होता है। सूर्य देव अपने दिव्य रथ में सात अश्वों को जोतकर बिना रुके संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं ताकि सृष्टि का संचालन सुचारू रूप से चलता रहे। अपनी इस अनवरत और निरंतर यात्रा के दौरान एक समय ऐसा आता है जब सूर्य देव के अश्व अत्यधिक थक जाते हैं और उनका वेग धीमा होने लगता है। अपने अश्वों को अत्यंत व्याकुल और थका हुआ देखकर सूर्य देव की करुणा जागृत होती है और वे अपने अश्वों को विश्राम देने के उद्देश्य से एक पावन सरोवर के निकट रुकते हैं।

उस सरोवर के तट पर दो खर अर्थात् गधे खड़े थे। सूर्य देव अपने थके हुए अश्वों को रथ से खोलकर सरोवर का जल पीने के लिए छोड़ देते हैं और अपनी यात्रा को निरंतर बनाए रखने के लिए उन दो खर यानी गधों को अपने रथ में जोत लेते हैं। गधों की गति अत्यंत मंद और असंतुलित होती है जिसके कारण सूर्य के रथ का वेग अत्यंत धीमा पड़ जाता है। सूर्य का यही मंद वेग खरमास के नाम से जाना जाता है। जब सूर्य देव एक मास के पश्चात मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो वे पुनः अपने शक्तिशाली अश्वों को रथ में जोत लेते हैं और उनका तेज तथा वेग पुनः अपनी पूर्ण अवस्था में लौट आता है जिससे मांगलिक कार्यों का शुभारंभ पुनः हो जाता है।

खरमास का ज्योतिषीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है?

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को राजा, आत्मा और तेज का कारक माना गया है जबकि बृहस्पति को ज्ञान, गुरु, धर्म और ऐश्वर्य का प्रतीक माना गया है। जब सूर्य देव अपने परम मित्र देवगुरु बृहस्पति की धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं तो वे सांसारिक और भौतिक इच्छाओं का त्याग करके गुरु की सेवा और आध्यात्मिक चिंतन में लीन हो जाते हैं। इस स्थिति में सूर्य का सांसारिक तेज क्षीण हो जाता है और वे अंतर्मुखी हो जाते हैं। किसी भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह या गृह प्रवेश के लिए सूर्य और बृहस्पति दोनों का बलवान होना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

ग्रह / तत्व स्थिति और प्रभाव ज्योतिषीय और व्यावहारिक परिणाम
सूर्य देव गुरु की राशि में सेवाभाव से स्थिति सांसारिक तेज की कमी, भौतिक कार्यों में असफलता की संभावना
देवगुरु बृहस्पति सूर्य के प्रभाव से आच्छादित ज्ञान और विवेक की वृद्धि परंतु लौकिक सुखों में उदासीनता
प्राकृतिक वातावरण हेमंत ऋतु का प्रभाव, सौर ऊर्जा में कमी स्वास्थ्य संरक्षण और अंतर्मुखी साधना के लिए अनुकूल समय

वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टिकोण से भी इस अवधि में पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं जिसके कारण सौर ऊर्जा की तीव्रता घट जाती है। मौसम में अत्यधिक शीत का आगमन होता है जो शारीरिक ऊर्जा को सुस्त करता है। ऐसे समय में भारी मांगलिक आयोजन करना या नया निर्माण कार्य प्रारंभ करना व्यावहारिक दृष्टि से अनुकूल नहीं माना जाता। इसीलिए ऋषि-मुनियों ने इस समय को उत्सवों के स्थान पर योग, ध्यान और शरीर की शुद्धि के लिए नियत किया है।

खरमास में पूजा विधि और साधना के नियम क्या हैं?

यद्यपि खरमास के दौरान भौतिक और लौकिक मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं, परंतु यह समय आध्यात्मिक साधना, मंत्र जप, श्रीमद्भागवत कथा और सूर्य आराधना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ और फलदायी माना गया है। इस मास में प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान ध्यान करना चाहिए और भगवान सूर्य देव तथा भगवान श्री हरि विष्णु की संयुक्त पूजा करनी चाहिए।

  1. प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदी या घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  2. सूर्य देव को तांबे के पात्र से जल, रोली, अक्षत और लाल पुष्प मिलाकर अर्घ्य प्रदान करें।
  3. भगवान विष्णु के सामने गाय के घी का दीपक जलाकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें।
  4. प्रतिदिन श्रीमद्भगवद्गीता या विष्णुसहस्रनाम का भक्तिपूर्वक पाठ करें।
  5. सायंकाल के समय तुलसी के पौधे के समीप घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  6. साधक को इस पूरे मास में केवल एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।
  7. तिल, गुड़, वस्त्र और गर्म कपड़ों का जरूरतमंद लोगों में आदरपूर्वक दान करें।

इस अवधि में किया गया जप, तप और दान सामान्य दिनों की तुलना में सौ गुणा अधिक पुण्य फल प्रदान करता है। जो साधक खरमास में नियमपूर्वक विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हैं उनके जीवन से सभी प्रकार के संकट समाप्त हो जाते हैं।

इस एक माह में क्या करना चाहिए और क्या नहीं?

  • प्रतिदिन सूर्य देव को अर्घ्य दें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • निर्धन और जरूरतमंद लोगों को अन्न, तिल, गुड़ और गर्म वस्त्रों का दान करें।
  • धर्म ग्रंथों का अध्ययन करें और सात्विक जीवन शैली का पालन करें।
  • तीर्थ यात्रा करना और पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • इस अवधि में विवाह, सगाई और वधु प्रवेश जैसे कार्य भूलकर भी न करें।
  • नए भवन का निर्माण प्रारंभ करना या गृह प्रवेश करना पूर्णतः वर्जित है।
  • नया व्यापार शुरू करना या नई संपत्ति और वाहन का क्रय करना टालें।
  • बच्चे का मुंडन संस्कार या कर्णवेध संस्कार इस मास में न कराएं।

FAQ

खरमास कब से कब तक रहता है? खरमास धनु संक्रांति (मध्य दिसंबर) से प्रारंभ होकर मकर संक्रांति (मध्य जनवरी) तक लगभग एक महीने की अवधि के लिए रहता है।

खरमास के दौरान विवाह आदि मांगलिक कार्य क्यों नहीं किए जाते? इस अवधि में सूर्य का तेज अंतर्मुखी हो जाता है और गुरु की शक्ति क्षीण होती है, जिससे मांगलिक कार्यों का शुभ फल प्राप्त नहीं होता।

क्या खरमास के दौरान पूजा पाठ और धार्मिक अनुष्ठान किए जा सकते हैं? हाँ, खरमास का समय आध्यात्मिक साधना, नाम जप, सूर्य पूजा और विष्णु सहस्रनाम के पाठ के लिए अत्यंत उत्तम माना गया है।

खरमास में किन वस्तुओं का दान करना सबसे शुभ माना जाता है? खरमास में तिल, गुड़, गेहूं, तांबे के बर्तन और गर्म वस्त्रों का दान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

खरमास समाप्त होने पर कौन सा पर्व मनाया जाता है? खरमास का समापन मकर संक्रांति के पावन पर्व के साथ होता है जिसके बाद से पुनः सभी शुभ और मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।

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लेखक

अपर्णा पाटनी

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