By पं. अमिताभ शर्मा
गीता के विभूति योग में अगहन मास का दार्शनिक और आध्यात्मिक मर्म

सनातन वैदिक परंपरा में मार्गशीर्ष मास को साक्षात योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात विग्रह स्वीकार किया गया है। जब मनुष्य का चित्त सांसारिक आकर्षणों, मानसिक संताप और प्रारब्ध के बंधनों से विचलित होता है तब अगहन मास में की गई नित्य कृष्ण साधना जीवात्मा को परम शांति और मोक्ष का संबल प्रदान करती है। इस पावन महीने में किए जाने वाले बाल गोपाल पूजन, मंत्र जप और तुलसी सेवा का फल अन्य साधारण महीनों की तुलना में सहस्त्र गुना अधिक फलदायी माना गया है। शास्त्रों में इस पवित्र मास के अनुष्ठान हेतु विशिष्ट नियम, शुद्ध तिथियां और प्रामाणिक पूजन सामग्री का विधान विस्तार से निर्दिष्ट है।
| साधना अंग | वैदिक विधान और शास्त्रोक्त निर्देश |
|---|---|
| शुभ काल एवं तिथियां | संपूर्ण मार्गशीर्ष मास विशेषकर मोक्षदा एकादशी और प्रत्येक गुरुवार |
| अधिष्ठाता परम देव | योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और बाल गोपाल स्वरूप |
| सिद्ध महामंत्र | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अथवा हरे कृष्ण महामंत्र |
| पावन पूजन सामग्री | तुलसी दल, ताजा गोदुग्ध माखन, मिश्री, पीला चंदन, शंख और गोघृत |
| आध्यात्मिक फल | जन्म मरण के चक्र से मुक्ति, त्रिदोष संतुलन और परम भक्ति लाभ |
इस पावन साधना का अनुष्ठान करने के लिए प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होना चाहिए। यदि संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करें अथवा घर में ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर शुद्ध हो जाएं। इसके पश्चात स्वच्छ पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण कर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
नियमित रूप से इस दैनिक आराधना का परिपालन करने से साधक के अंतःकरण में सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। मानसिक व्याधियां स्वतः शांत होने लगती हैं और परिवार में सुख तथा समृद्धि का वास होता है। यह अनुष्ठान मनुष्य को इस नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त कर परमात्मा के शाश्वत प्रेम का साक्षात्कार कराता है।
महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत समाहित श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान, कर्म और भक्ति का वह त्रिवेणी संगम है जो अनादि काल से मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है। जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में धनुर्धर अर्जुन विषाद से घिरकर अपने कर्तव्य पथ से विचलित होने लगे तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने विराट और तेजोमय स्वरूप का अनावरण किया। गीता के 10वें अध्याय जिसे विभूति योग कहा जाता है उसमें अर्जुन ने अत्यंत विनीत भाव से प्रार्थना की कि हे योगेश्वर, मैं किन किन रूपों में आपका चिंतन करूं और इस संपूर्ण ब्रह्मांड में आपके सर्वश्रेष्ठ स्वरूप कौन से हैं।
अर्जुन के इस ज्ञान पिपासु प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रधान विभूतियों का वर्णन आरंभ किया। भगवान ने बताया कि नक्षत्रों में वे चंद्रमा हैं, वेदों में सामवेद हैं, रुद्रों में शंकर हैं और पर्वतों में मेरु हैं। इसी दिव्य क्रम में जब काल गणना और ऋतु चक्र की बात आई तब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत विस्मयकारी उद्घोष किया। भगवान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महीनों में मैं स्वयं मार्गशीर्ष हूं और ऋतुओं में फूलों को खिलाने वाला वसंत हूं।
यह कोई साधारण उपमा नहीं थी। जब परमपिता परमात्मा किसी विशिष्ट कालखंड को स्वयं अपना प्रत्यक्ष शरीर घोषित करते हैं तब उस काल का आध्यात्मिक महत्व अनंत गुना बढ़ जाता है। इस उद्घोष से यह स्पष्ट हो जाता है कि अगहन मास केवल कैलेंडर का एक सामान्य 9वां महीना नहीं है बल्कि वह काल के प्रवाह में साक्षात नारायण की प्रत्यक्ष उपस्थिति है। इस माह में जो व्यक्ति समय के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग भगवत आराधना में करता है वह सीधे भगवान श्रीकृष्ण की चेतना से जुड़ जाता है।
सनातन धर्म की परंपरा में कार्तिक मास दीपदान और तुलसी पूजा के लिए विख्यात है जबकि वैशाख मास जल दान और अक्षय तृतीया के लिए परम पुण्यदायी माना गया है। ऐसे में यह गंभीर दार्शनिक प्रश्न उपस्थित होता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक अथवा वैशाख जैसे अत्यंत प्रसिद्ध महीनों को अपना स्वरूप न बताकर अगहन मास को ही अपनी प्रधान विभूति क्यों चुना। इस रहस्य को समझने के लिए हमें वैदिक इतिहास और खगोलीय संतुलन की गहराइयों में उतरना होगा।
प्रथम कारण यह है कि सतयुग के आरंभ में जब देवताओं ने सृष्टि के काल चक्र का विभाजन किया था तब नववर्ष का शुभारंभ इसी मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से हुआ था। महर्षि कश्यप ने इसी पावन कालखंड में कश्मीर भूमि की स्थापना कर उसे वैदिक साधना का सर्वोच्च केंद्र बनाया था। सतयुग की प्रथम उषा इसी मास में फूटी थी इसलिए यह मास समस्त युगों के प्रारंभ और नई चेतना का सनातन प्रतीक है।
द्वितीय कारण प्रकृति का वह अद्भुत संतुलन है जो केवल अगहन मास में ही दृष्टिगोचर होता है। वैशाख और ज्येष्ठ के महीनों में सूर्य का प्रचंड ताप जीव जगत को व्याकुल कर देता है जिससे शरीर में पित्त और दाह की अधिकता हो जाती है। आषाढ़ और श्रावण में बादलों का घना अंधकार और वर्षा की अधिकता के कारण तमोगुण बढ़ जाता है। दूसरी ओर पौष और माघ के महीनों में भीषण हिमपात और हाड़ कंपाने वाली ठंड के कारण मनुष्य की शारीरिक क्रियाएं शिथिल पड़ जाती हैं।
जब बाह्य प्रकृति इतने शांत और संतुलित भाव में स्थित होती है तब मानव मस्तिष्क के लिए अपनी चंचल इंद्रियों को समेटकर ईश्वर के ध्यान में लीन होना अत्यंत सहज हो जाता है। इसी कारण भगवान ने इस महीने को अपना हृदय स्वीकार किया।
सनातन भक्ति दर्शन में भगवान श्रीकृष्ण की बाल रूप में सेवा को वात्सल्य भाव की पराकाष्ठा माना गया है। मार्गशीर्ष मास में लड्डू गोपाल की सेवा करने का विशेष आध्यात्मिक रहस्य है। एक अबोध बालक के रूप में जब साधक ईश्वर को अपने घर में स्थापित करता है तब उसके भीतर का समस्त मिथ्या अहंकार, ज्ञान का दंभ और सांसारिक बड़प्पन स्वतः विगलित हो जाता है।
जीव जब तक स्वयं को कर्ता और स्वामी मानता है तब तक वह कर्मों के जाल में उलझकर बारंबार 84 लाख योनियों में भटकता रहता है। किंतु जब वह अपने घर के केंद्र में बाल गोपाल को प्रतिष्ठित कर स्वयं को उनका सेवक मान लेता है तब उसके समस्त कर्म निष्काम कर्मयोग में परिवर्तित हो जाते हैं।
अगहन मास में प्रातःकाल बाल गोपाल को शीतल पवन से बचाते हुए कोमल ऊनी वस्त्र धारण कराना, उन्हें हल्के गुनगुने जल से स्नान कराना और ताजे मक्खन तथा मिश्री का भोग लगाना साधक के हृदय में पराभक्ति का अंकुरण करता है। इस मास में द्वादशाक्षर मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप जन्म जन्मांतर के संचित पापों को भस्म करने की अमोघ शक्ति रखता है।
इस मंत्र में विद्यमान 12 अक्षर वर्ष के 12 महीनों और मानव शरीर की 12 प्रमुख नाड़ियों का शोधन करते हैं। जब साधक निष्काम भाव से इस मंत्र का आश्रय लेता है तब भगवान श्रीकृष्ण उसके अज्ञान रूपी अंधकार को अपनी मुरली की तान से हर लेते हैं। इस प्रकार जीवात्मा इस भवसागर के जन्म और मरण के क्रूर चक्र से सदा के लिए मुक्त होकर प्रभु के परम धाम गोलोक की प्राप्ति करती है।
वैदिक ज्योतिष के गूढ़ फलित सिद्धांतों में मार्गशीर्ष मास का संबंध ज्ञान के अधिपति देवगुरु बृहस्पति, कालपुरुष की आत्मा भगवान सूर्य और मन के कारक चंद्र देव के पावन समन्वय से माना गया है। इस महीने में आकाशगंगा का 5वां नक्षत्र मृगशिरा सक्रिय होता है जिसके अधिष्ठाता स्वयं अमृत तत्व के स्वामी सोम अर्थात चंद्र देव हैं और नक्षत्र स्वामी भूमिपुत्र मंगल हैं।
| ज्योतिषीय तत्व | अगहन मास में ग्रहों की स्थिति | मानव जीवन पर पड़ने वाला आध्यात्मिक प्रभाव |
|---|---|---|
| प्रधान नक्षत्र | मृगशिरा नक्षत्र (23 अंश 20 कला वृषभ से 6 अंश 40 कला मिथुन) | चंचलता का रूपांतरण सत्य की खोज और प्रज्ञा में |
| सौर संक्रांति | सूर्य देव का जल राशि वृश्चिक से अग्नि राशि धनु में प्रवेश | भौतिक कर्मों से विराम और आत्मिक साधना का विस्तार |
| गुरु का प्रभाव | धनु राशि के माध्यम से देवगुरु बृहस्पति का सात्विक नियंत्रण | ज्ञान, वैराग्य, सदाचार और धर्म का अभ्युदय |
| चंद्र देव का प्रभाव | पूर्णिमा पर 16 कलाओं से युक्त पूर्ण अमृतमयी चंद्रमा | मानसिक अवसाद का समूल नाश और चित्त में शांति |
मार्गशीर्ष मास के उत्तरार्ध में जब भगवान सूर्य देवगुरु बृहस्पति की राशि धनु में प्रवेश करते हैं तब धनु संक्रांति घटित होती है। ज्योतिष शास्त्र में इसे खरमास कहा जाता है जिसमें सांसारिक विवाह और नवीन गृह निर्माण जैसे सकाम कर्म रोक दिए जाते हैं। हमारे त्रिकालदर्शी ऋषियों ने यह व्यवस्था इसलिए की ताकि मनुष्य सांसारिक प्रपंचों से अपना ध्यान हटाकर केवल हरि संकीर्तन, श्रीमद्भागवत श्रवण और दान में अपने समय का सदुपयोग कर सके।
यह ग्रह गोचर यह स्पष्ट करता है कि अगहन मास संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा को ईश्वरोन्मुखी बनाने का सर्वोत्तम प्राकृतिक समय है।
मार्गशीर्ष मास का यह पावन संदेश संपूर्ण मानव जाति के लिए एक आध्यात्मिक संजीवनी है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसे अपना स्वरूप बताकर हमें यह सिखाया है कि परमात्मा को पाने के लिए किसी भीषण हठयोग अथवा शरीर को सुखाने वाली तपस्या की आवश्यकता नहीं है। जीवन को सहज, सरल और प्रकृति के साथ संतुलित बनाना ही सच्ची पूजा है।
जिस प्रकार अगहन मास की शांत धूप समस्त चराचर जगत को नवजीवन प्रदान करती है उसी प्रकार ईश्वर का स्मरण हमारे मुरझाए हुए अंतःकरण को नई ताजगी से भर देता है। जब हम बाल गोपाल की मुस्कान में संपूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन करते हैं और अपने प्रत्येक कर्म को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देते हैं तब जीवन का प्रत्येक दिन एक उत्सव बन जाता है। इस पावन महीने में अपने भीतर के अहंकार को विसर्जित कर श्रीकृष्ण के पावन नाम की शरण ग्रहण करना ही मानव जीवन की सर्वोच्च सार्थकता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में मार्गशीर्ष मास के बारे में क्या कहा है? श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मैं महीनों में स्वयं मार्गशीर्ष मास हूं और ऋतुओं में वसंत ऋतु हूं।
श्रीकृष्ण ने अगहन मास को ही अपना स्वरूप क्यों घोषित किया? सतयुग का आरंभ इसी मास से हुआ था और यह महीना अत्यधिक गर्मी तथा अत्यधिक ठंड से रहित समत्व भाव का प्रतीक है इसलिए इसे चुना गया।
अगहन मास में बाल गोपाल की सेवा किस प्रकार करनी चाहिए? प्रातःकाल गुनगुने जल से स्नान कराकर बाल गोपाल को कोमल वस्त्र पहनाएं और ताजे माखन तथा मिश्री का भोग तुलसी दल के साथ अर्पित करें।
मार्गशीर्ष मास में किस महामंत्र का जप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है? इस पावन महीने में द्वादशाक्षर मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अथवा हरे कृष्ण महामंत्र का 108 बार तुलसी माला से जप करना सर्वोत्तम है।
अगहन मास में धनु संक्रांति के समय मांगलिक कार्य क्यों वर्जित होते हैं? धनु संक्रांति के समय सूर्य देवगुरु बृहस्पति की राशि में जाकर शिष्य भाव में आ जाते हैं जिससे भौतिक कर्म रोककर केवल आध्यात्मिक साधना की जाती है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ