By पं. संजीव शर्मा
जानिए अंग्रेजी कैलेंडर और हिंदू पंचांग में अगहन मास की समय सारिणी

सनातन वैदिक पंचांग में काल की गति को सूर्य और चंद्रमा के पारस्परिक संबंध से मापा जाता है। हिंदू वर्ष का 9वां मास मार्गशीर्ष जिसे जनमानस में अगहन मास कहा जाता है, अपनी विशिष्ट खगोलीय और आध्यात्मिक प्रकृति के लिए प्रसिद्ध है। यह पावन महीना अंग्रेजी कैलेंडर के नवंबर और दिसंबर माह के संधिकाल में आता है। जब सूर्य अपनी दक्षिणायन यात्रा के अंतिम चरण में होते हैं और प्रकृति शरद ऋतु से हेमंत ऋतु में प्रवेश करती है, तब इस मास का शुभारंभ होता है। इस कालखंड में की जाने वाली साधना मनुष्य के चित्त को स्थिरता और दिव्यता प्रदान करती है। इस मास की प्रमुख तिथियों, अंग्रेजी माह के साथ इसके संबंध और दैनिक नियमों को व्यवस्थित रूप से समझना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है।
| पंचांग और काल तत्व | वैदिक सिद्धांत और समय सारिणी |
|---|---|
| हिंदू पंचांग क्रम | चांद्र वर्ष का 9वां मास और हेमंत ऋतु का संधिकाल |
| अंग्रेजी कैलेंडर काल | सामान्यतः 15 नवंबर से 25 दिसंबर के मध्य 30 दिनों की अवधि |
| गणना प्रणाली भेद | उत्तर भारत में पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमावस्यानंत |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान श्रीकृष्ण, श्रीहरि विष्णु, चंद्र देव और देवगुरु बृहस्पति |
| प्रमुख व्रत एवं पर्व | कालभैरव अष्टमी, उत्पन्ना एकादशी, विवाह पंचमी और मोक्षदा एकादशी |
| दैनिक श्रेष्ठ साधना | सूर्योदय पूर्व ब्रह्म मुहूर्त स्नान, शंख पूजन, गीता पाठ और अन्न दान |
अगहन मास के आरंभ होते ही प्रकृति में सात्विक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है। इस पूरे महीने में प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदियों में अथवा घर पर ही गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करने का नियम है।
इस अनुष्ठानिक अनुशासन से मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता सुदृढ़ होती है और मानसिक तनाव का निवारण होता है। यह पावन समय जातक को भौतिक संसार के कोलाहल से दूर ले जाकर आत्म साक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदू पंचांग की दो मुख्य गणना प्रणालियां प्रचलित हैं जिन्हें पूर्णिमांत और अमावस्यानंत कहा जाता है। उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में पूर्णिमांत पंचांग का अनुसरण किया जाता है। इस प्रणाली के अनुसार माह का समापन पूर्णिमा के दिन होता है और नवीन मास का आरंभ कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन अर्थात कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से माना जाता है। इस गणना के आधार पर अगहन मास का आरंभ अंग्रेजी कैलेंडर के नवंबर माह के दूसरे अथवा तीसरे सप्ताह में हो जाता है।
इसके विपरीत दक्षिण भारत के राज्यों जैसे कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल तथा पश्चिमी भारत के महाराष्ट्र और गुजरात में अमावस्यानंत पंचांग को मान्यता दी जाती है। इस प्रणाली में महीने की गणना अमावस्या के अगले दिन अर्थात शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जब उत्तर भारत में अगहन मास का कृष्ण पक्ष समाप्त होकर शुक्ल पक्ष प्रारंभ होता है, तब दक्षिण और पश्चिम भारत में अगहन मास का प्रथम दिन माना जाता है।
यद्यपि दोनों प्रणालियों में 15 दिनों का कालगत अंतर दिखाई देता है, तथापि शुक्ल पक्ष की सभी महत्वपूर्ण तिथियां संपूर्ण भारतवर्ष में एक ही दिन संपन्न होती हैं। उदाहरण के लिए मोक्षदा एकादशी और विवाह पंचमी जैसे महापर्व दोनों ही पंचांगों में एक समान दिन मनाए जाते हैं। पूर्णिमांत प्रणाली चंद्र गति के आधार पर पूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ती है, जबकि अमावस्यानंत प्रणाली नव चंद्र दर्शन से अगले नव चंद्र दर्शन तक की यात्रा तय करती है।
ग्रेगोरियन कैलेंडर एक पूर्णतः सौर कैलेंडर है जो पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगे 365.2422 दिनों पर आधारित है। दूसरी ओर हिंदू चांद्र कैलेंडर चंद्रमा की कलाओं पर निर्भर करता है। चंद्रमा का एक चक्र लगभग 29.53 दिनों में पूर्ण होता है, जिसके कारण 12 चांद्र मासों का एक वर्ष लगभग 354.36 दिनों का होता है।
इस गणितीय भिन्नता के कारण प्रत्येक वर्ष सौर वर्ष और चांद्र वर्ष के मध्य लगभग 11 दिनों का एक बड़ा अंतराल उत्पन्न हो जाता है। यदि इस अंतराल को संतुलित न किया जाए, तो हिंदू महीने अपनी निर्धारित ऋतुओं से भटक जाएंगे। वैदिक खगोल विज्ञान ने इस अंतर को दूर करने के लिए अत्यंत वैज्ञानिक व्यवस्था की है जिसे अधिक मास अथवा मलमास कहा जाता है। प्रत्येक 32 माह और 16 दिन के अंतराल पर चांद्र पंचांग में 1 अतिरिक्त माह जोड़ दिया जाता है, जिससे चांद्र वर्ष पुनः सौर वर्ष और ऋतु चक्र के समतुल्य हो जाता है।
इसी खगोलीय नियम के कारण अगहन मास प्रत्येक वर्ष अंग्रेजी कैलेंडर की एक ही निश्चित तारीख पर नहीं आता। कभी यह 12 नवंबर से प्रारंभ होता है, तो कभी 25 नवंबर से। इस मास का समापन सामान्यतः 12 दिसंबर से 26 दिसंबर के बीच मार्गशीर्ष पूर्णिमा के साथ होता है। यह समय चक्र यह सिद्ध करता है कि सनातन पंचांग प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तनों और ऋतुओं की ऋतुचर्या के साथ पूर्णतः तालमेल बनाकर चलता है।
मार्गशीर्ष मास के उत्तरार्ध में एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना घटित होती है जिसे ज्योतिष शास्त्र में धनु संक्रांति कहा जाता है। जब भगवान सूर्य वृश्चिक राशि से निकलकर देवगुरु बृहस्पति की आग्नेय राशि धनु में प्रवेश करते हैं, तब से धनु मास अथवा खरमास का आरंभ होता है। सामान्यतः यह संक्रांति अंग्रेजी कैलेंडर की 15 अथवा 16 दिसंबर को घटित होती है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य देव आत्मा, तेज, सम्मान और राजसत्ता के कारक हैं, जबकि देवगुरु बृहस्पति धर्म, ज्ञान, विवेक और गुरु कृपा के स्वामी हैं। जब सूर्य अपने गुरु की राशि में प्रवेश करते हैं, तब वे अपने प्रचंड ताप को शांत कर गुरु सेवा और शिष्य भाव में लीन हो जाते हैं। सूर्य के इस स्वभावगत परिवर्तन के कारण पृथ्वी पर भौतिक और सांसारिक विस्तार की ऊर्जा मंद पड़ जाती है और आत्मिक चेतना की ऊर्जा अत्यंत बलवती हो जाती है।
ज्योतिष शास्त्र यह स्पष्ट करता है कि खरमास कोई अशुभ समय नहीं है, बल्कि यह भौतिक आकर्षणों से विराम लेकर ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण करने का सर्वोत्तम आध्यात्मिक अवसर है।
आयुर्वेद और वैदिक जीवन शैली में मार्गशीर्ष मास को हेमंत ऋतु का प्रवेश द्वार माना गया है। जैसे ही अगहन मास प्रारंभ होता है, वातावरण में बहने वाली ठंडी हवाएं मानव शरीर की जठराग्नि को तीव्र कर देती हैं। चरक संहिता के अनुसार जब बाह्य वातावरण ठंडा होता है, तब शरीर की आंतरिक ऊष्मा भीतर ही रुककर पाचन शक्ति को अत्यंत प्रदीप्त कर देती है।
इस ऋतु में यदि शरीर को समुचित और पौष्टिक आहार न दिया जाए, तो वही प्रदीप्त जठराग्नि शरीर की धातुओं को सुखाने लगती है। इसलिए हमारे आचार्यों ने अगहन मास के खान पान के लिए विशेष शास्त्रोक्त नियम निर्धारित किए हैं। इस मास में स्निग्ध, उष्ण और मधुर रस से युक्त आहार का सेवन स्वास्थ्य के लिए अमृत तुल्य माना गया है।
यह शारीरिक नियम केवल देह की पुष्टि के लिए नहीं हैं, बल्कि एक स्वस्थ शरीर में ही एकाग्र मन का वास होता है। जब शरीर निरोगी और ऊर्जावान रहता है, तभी साधक बिना किसी शारीरिक बाधा के लंबी अवधि तक ध्यान और मंत्र जप में लीन रह सकता है।
मार्गशीर्ष मास का अंग्रेजी कैलेंडर के साथ यह संबंध हमें स्मरण कराता है कि समय केवल घड़ियों और पन्नों पर अंकित तारीखों का नाम नहीं है। काल साक्षात ईश्वर का विराट स्वरूप है जो निरंतर परिवर्तनशील होते हुए भी शाश्वत है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने काल बनकर संपूर्ण संसार को संचालित करने की घोषणा की है।
जब नवंबर और दिसंबर की गुलाबी ठंड में अगहन मास का आगमन होता है, तब यह प्रकृति के माध्यम से हमें संदेश देता है कि हमें अपनी बाहरी दौड़ धूप को थोड़ा विश्राम देना चाहिए। जिस प्रकार किसान अपनी पकी हुई फसलों को समेटकर घर लाता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने बिखरे हुए विचारों को समेटकर अपनी अंतरात्मा में प्रतिष्ठित होना चाहिए। अगहन मास का यह पावन समय चक्र आत्म संयम, परोपकार और भगवत भक्ति का ऐसा सुअवसर है जो मनुष्य के जीवन को सदा के लिए आलोकित कर देता है।
अगहन मास अंग्रेजी कैलेंडर के किन महीनों में आता है? अगहन मास सामान्यतः अंग्रेजी कैलेंडर के नवंबर माह के मध्य से प्रारंभ होकर दिसंबर माह के मध्य अथवा अंतिम सप्ताह तक रहता है।
पूर्णिमांत और अमावस्यानंत पंचांग में क्या अंतर होता है? पूर्णिमांत पंचांग में माह का समापन पूर्णिमा को होता है और यह उत्तर भारत में प्रचलित है, जबकि अमावस्यानंत में माह अमावस्या को समाप्त होता है और यह दक्षिण भारत में माना जाता है।
अगहन मास में मांगलिक कार्य क्यों रोक दिए जाते हैं? अगहन मास के उत्तरार्ध में जब सूर्य धनु राशि में प्रवेश करते हैं तब खरमास लग जाता है, जिसमें भौतिक मांगलिक कार्य वर्जित होकर आध्यात्मिक साधना को प्रधानता दी जाती है।
अगहन मास को भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप क्यों कहा जाता है? श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि सब महीनों में मैं स्वयं मार्गशीर्ष मास हूं, इसलिए इसे उनका साक्षात स्वरूप माना गया है।
अगहन मास में किस देवता की पूजा सर्वाधिक फलदायी होती है? इस पावन मास में भगवान श्रीकृष्ण, श्रीहरि विष्णु, दक्षिणावर्ती शंख, चंद्र देव और देवगुरु बृहस्पति की आराधना सर्वाधिक कल्याणकारी मानी जाती है।
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